भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 343 में से

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अ.-१, आ.-७, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४९ अत्र परकीयं मतम् आशङ्कते—दूषयिष्यामीति— विविक्तभूतलज्ञानं घटाभावमतिर्यथा । तथा चेच्छुक्तिकाज्ञानं रूप्यज्ञानाप्रमात्ववित् ॥ ७ ॥ इह शुक्तिकाज्ञानं स्वात्मानं संविदत् स्वात्माभिन्नं प्रमाणं बुध्यते, 'तत्परिच्छिनत्ति' इति न्यायात्, तत्परिच्छेदानान्तरीयकतश्च अन्यव्यवच्छेद इत्यशुक्तिज्ञानरूपस्य रजतज्ञानस्याप्रमाणत्व- वेदनं तदेव उच्यते—यत् एतत् शुक्तिकासंवेदनाभिन्नप्रमाणत्ववेदनम्, न च एतत् अपूर्वं—यत् वस्त्वन्तरज्ञानमेव वस्त्वराभावज्ञानम् इति, शुद्धभूभागग्रहणमेव हि घटाभावज्ञानम् इति प्रसिद्ध- मेतत् । एवम् अप्रमाणतासंवेदनमेव रजतज्ञानस्य बाध्यत्वम् उच्यते, अतश्च बाध्यबाधकत्वम् एवं सिद्धम्, इति चेत् अस्माभिः उच्यते—तत् किं प्रमात्रैक्येनेति ॥ ७ ॥ अत्र प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य सिद्धौ तत्त्वमुपपादयिष्यन् दृष्टान्तमेव तावत् परदर्शने दूषयति— अब बाध्य-बाधकभाव में दूसरे के मत की आशंका करते हुए उसका खण्डन करेंगे— घटादि के अभावरूप शुद्ध भूतल में जैसे घटाभाव बुद्धि होती है उसी प्रकार रजतज्ञान के अप्रमाज्ञान में शुक्तिका का ज्ञान होता है ॥ ७ ॥ भूतल में शुक्तिका सम्बन्धी ज्ञान होता है उस शुक्तिका ज्ञान को अपने स्वरूप से अभिन्न जानता हुआ परिच्छिन्न अर्थात् स्वस्वरूप प्रमाण मानता हुआ जिसको जानता है उससे जो भिन्न है—उसे दूर कर देता है, 'तत्परिच्छिनत्ति' इस युक्ति द्वारा और उससे भिन्न का परिच्छेद करना आवश्यक होता है इसलिए यहाँ अन्यव्यवच्छेद [ रूप्य व्यवच्छेद ] इस अशुक्ति ज्ञानरूप रजतज्ञान की अप्रमाणता का ज्ञान करना इसी को कहा जाता है जो यह शुक्तिज्ञान का अभेदरूप प्रमाण जानता है और यह कोई नयी बात नहीं है, जो कि दूसरी वस्तु का ज्ञान ही उससे भिन्न वस्तु के अभाव का ज्ञान कराता हो, जैसा कि शुद्ध भूतल का ज्ञान करना ही घटाभाव ज्ञान है—यह प्रसिद्ध है। इस प्रकार अप्रमाणरूप ज्ञान ही रजतज्ञान को बाधित करता है, इसलिए ऐसा बाध्य- बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि बाध्य-बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि दूसरे लोग कहते हो तो हमने भी कहा है कि प्रमाता के ऐक्य ज्ञान से क्या लाभ होगा ? ॥ ७ ॥ इस प्रसंग से अभाव व्यवहार सिद्ध हो जाने पर यथार्थता सिद्ध करते हुए दूसरों के दर्शन में दृष्टान्त [ विविक्त भूतल ज्ञान ] को ही दूषित करते हैं— इस प्रकार मिथ्या ज्ञानों के विकल्परूप जो रजत-सर्पादि हैं उनका व्यवहार नीलादि पदार्थों के समान होता है और इन सबों में चिद्रूप की प्रकाश मानता विद्यमान रहती है, वही उनका परमार्थत्व माना जाता है; क्योंकि वह चिद्रूप की अभिव्यक्ति है इसलिए यह फैलाव-विस्तार उस-उस रूप से शिव का ही है ठीक-ठीक रूप से तो मात्र मिथ्यात्व का भेद ही व्यवहार का प्रयोजक होता है जिससे घट ज्ञान और रजत ज्ञान इन दोनों में भेद देखा जाता है किन्तु परमार्थतः नहीं के बराबर है और व्यवहार की सत्यता से परमार्थ की सत्यता बाधित भी नहीं होती, सर्वत्र व्यवहार वैसा ही होता है।

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