भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 343 में से

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पृष्ठ 173

१५० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-८-९ नैवं शुद्धस्थलज्ञानात्सिद्ध्येत्तस्याघटात्मता । न तूपलब्धियोग्यस्याप्यत्राभावो घटात्मनः ॥ ८ ॥ यो दृष्टान्त उक्तः स एव न, कुतः ? इति चेत् उच्यते—इह भूतलं न घट इति तादात्म्येन अभावो व्यवहर्तव्यः कदाचित्, कदाचित् व्यतिरेकेण ‘इह भूतले घटो न’ इति । तत्र शुद्धभूतल- ज्ञानात् आद्योऽयं व्यवहारः सिध्यति, यत्र दृश्यत्वं न उपयोगि, उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरपि हि यस्य नास्ति पिशाचादेः—स्वभावबलात्, यस्य वा शब्दादेः तद्ग्राहक श्रोत्रादिसामग्रीसाकल्यस्य, तत्र एकज्ञानसंसर्गिवस्त्वन्तरप्रतिपत्त्यभावेनापि निश्चयात् तस्यापि तादात्म्येन अभावो व्यवहार्यः— भूतलं न पिशाचो न शब्दः इति, यत्र तु दृश्यत्वं विशेषणम् अवश्यम् उपयोगि तत्र व्यतिरेकेण अभावे व्यवहर्तव्ये न एषोऽभ्युपायः ॥ ८ ॥ कुतः ? इति चेत्—अतिप्रसङ्गात् इति ब्रूमः, तमेव दर्शयति— विविक्तं भूतलं शश्वद्भावानां स्वात्मनिष्ठितेः । तत्कथं जातु तज्ज्ञानं भिन्नस्याभावसाधनम् ॥ ९ ॥ विद्यमानेऽपि घटे भूतलं शुद्धमेव, नहि भावा मिश्रीभवन्ति ततश्च तदापि शुद्धभूतलज्ञानम् अस्ति, इति सत्यपि घटे कथम् अभावो व्यतिरेकेण न व्यवह्रियेत—अत्र भूतले घटो नास्ति इति, शुद्ध भूतल ज्ञान से उसका घटाभावरूप नहीं सिद्ध हो सकता। वहाँ पर घटरूप योग्य प्रतियोगी की उपलब्धि का भी अभाव है ॥ ८ ॥ जहाँ पर घटाभाव रहता है वही अधिकरणरूप ही घटाभाव माना जाता है, इसमें दृष्टान्त दिया है सो नहीं हो सकता ? क्योंकि यहाँ भूतल है, घट नहीं है, घटाभाव को भूतलरूप ही समझो, भूतल में घटाभाव है तो वह भूतलरूप है। जैसा कि वृक्ष में पिशाचाभाव है तो वृक्षरूप ही है ‘इह भूतले घटो न’ अर्थात् यहाँ पर भूतल में घट नहीं है। शुद्ध भूतल ज्ञान होने से तादात्म्य का ही व्यवहार सिद्ध होता है, जहाँ पर प्रतियोगी की दृश्यता उपयोगी नहीं है, वहाँ पर उसकी प्राप्ति भी तो नहीं हो सकती हैं; क्योंकि उसका वैसा स्वभाव ही है, जैसा कि शब्दादि को ग्रहण करने में श्रोत्रादि सामग्री की सफलता होती है, उस [शब्दादि] में एक ज्ञान के सम्बन्धि दूसरी वस्तु की सफलता रहती है, एकज्ञान संसर्गी दूसरी वस्तु में ज्ञान का अभाव रहने से भी निश्चय उस [पिशाच शब्दादि] को भी रूप से अभाव व्यवहृत होता है—जैसे भूतल न तो पिशाच है और न शब्द है, जहाँ पर दृश्यत्व विशेषण होगा वहाँ पर ही इसका उपयोग घट सकता है। यदि वहाँ व्यतिरेक से व्यवहार करना हो तो, यह उपाय नहीं हो सकता है ॥ ८ ॥ किस से ? यह यदि कहो तो, अत्यन्त आसक्तिपूर्वक हम कहते हुए उसी को दिखाते हैं— पदार्थों का स्वरूप अपने में परिनिष्ठित होने से भूतल तो सर्वदा शुद्ध ही रहता है। कभी भी शुद्ध भूतल का ज्ञान घट से भिन्न अभाव का साधन घट के रहते हुए नहीं हो सकता है ॥ ९ ॥ घट के विद्यमान रहने पर भी भूतल शुद्ध ही रहता है, भाव-पदार्थ किसी में मिलकर नहीं रहते हैं—तो फिर, घट के रहने के समय में भी शुद्ध भूतल का ही ज्ञान रहता है, इस प्रकार

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