ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-७, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५१ 'तज्ज्ञानमिति' विविक्तभूतलभागज्ञानं 'जातु इति' कस्यांचिदेव दशायां घटासंनिधानरूपायां, भिन्नस्य घटस्य अभावं साधयति न तु सर्वदा-इति केन प्रकारेण भवेत्, एतेन अत्र भूतले पिशाचो नास्ति इत्यपि स्यात् - इति आपतितं मन्तव्यम् ॥ ९ ॥ ननु एव व्यतिरेकाभावनिष्ठो व्यवहारो लोके तावत् अविगीतः कस्यांचित् एव दशायां दृष्टः, तत्र का गतिः ? इत्याशङ्क्य चिरन्तनैरपरिदृष्टं तत्सिद्धिप्रकारं दर्शयति- किं त्वालोकचयोऽन्धस्य स्पर्शो वोष्णादिको मृदुः । तत्रास्ति साधयेत्तस्य स्वज्ञानमघटात्मताम् ॥ १० ॥ इह भाव एव भावान्तरस्य 'अभाव' इति व्यवहर्तव्यः इति अयं तावत् अपरित्यज्यः प्रातीतिकः पन्थाः, तत्र भावस्य भावान्तरेण य आधाराधेयिभावः स एव भावतदभावयोः, ततश्च भूतले घटव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं शिलादिकम् आलोकपुञ्जादिकं वा यत् चाक्षुषे ज्ञाने भाति तदेव व्यवह्रियते- भूतले घटाभावो भूतले घटो नास्ति इति वा, यत्रापि नास्ति चक्षुर्व्यापारो नेत्र- निमीलनसंतमसादौ तत्रापि भूतले घटोचितकठिनस्पर्शविविक्तं मृदुम् उष्णं शीतम् अनुष्णाशीतं वा गृह्णन् तमेव अत्र घटाभाव इति व्यवहरति-वायुस्पर्शस्य सर्वगस्य अवश्यं भावात्, इति वाक्यार्थः । घट के रहने पर भी व्यतिरेक बुद्धि से अभाव का व्यवहार क्यों नहीं होता है ? ऐसा व्यवहार क्यों नहीं बनता है कि भूतल में घट नहीं है, 'तज्ज्ञानमिति' शुद्ध भूतल का ज्ञान 'जातु' किसी भी अवस्था में घट के असंनिधान दशा में, घट के रहने की दशा में ही घट से भिन्न अभाव को साधते हैं, सर्वदा नहीं-इसलिए 'जातु' शब्द का प्रयोग किया गया है, किस प्रकार से होगा, इस व्यतिरेक अभाव से भूतल में पिशाच नहीं है-यह भी ज्ञान हो सकता है, ऐसा मानना पड़ेगा ॥ ९ ॥ अब शंका करते हैं कि व्यतिरेक अभाव से होनेवाला व्यवहार लोक में प्रसिद्ध है, किसी- किसी घट के असंनिधान दशा में देखा जाता है-सर्वदा नहीं, वहाँ पर फिर क्या करोगे ? ऐसी आशंका करके पूर्व के लोगों द्वारा नहीं देखा गया अभाव व्यवहार की सिद्धि के प्रकार को दिखाते हैं- अन्धे व्यक्ति को आलोकपुंज का अनुभव नहीं होता है, किन्तु शीत-उष्ण के स्पर्श का भान मृदु-कठिन के रूप में अवश्य होता है । इसी प्रकार भूतल में आलोकादि के समान घटाभाव का अज्ञान सिद्ध करता है ॥ १० ॥ इस प्रस्तुत भाव-शीलादि में भाव ही दूसरे भाव का 'अभाव' ऐसा व्यवहार कराता है, यह स्वाभाविक मार्ग अपरित्यज्य है, एक भाव का दूसरे भाव से आधार-आधेयभाव सम्बन्ध होता है-वही भाव अभाव का भी सम्बन्ध रखता है और इससे भूतल में घट से भिन्न कोई दूसरी वस्तु शिलादि घटरूप स्पर्श विलक्षण का आलोक पुञ्जादि जो चाक्षुष ज्ञान में भासित होता है-उसी का व्यवहार होता है । जैसा कि भूतल में घट विद्यमान है अथवा नहीं है इत्यादि । जहाँ पर चाक्षुष व्यापार नहीं होता है जैसा कि नेत्र के बंद कर लेने पर अथवा गाढे अन्धकार में वहाँ पर भी भूतल में घटादिकों का मृदु-कठिन, शीत-उष्ण अथवा अनुष्ण-शीत ग्रहण करते हुए इसमें घटाभाव का व्यवहार होता है, जैसा कि वायु का स्पर्श सर्वत्र व्याप्त रहता ही है उसी प्रकार अन्धे व्यक्ति भी अपना सब व्यवहार किसी-न-किसी प्रकार सम्पादन कर ही लेते हैं ।