ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१०
पदार्थस्तु—‘किं तु’ इति स्वमतोपक्षेपाय प्रतिभाप्रश्नपरामर्शः, किं पुनरत्र न्याय्यमिति तत्राह ‘तत्र’ भूतले ‘आलोकचयः’ तावत् अस्ति ज्ञेयः ‘अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्श’ अस्ति ‘तस्य’ आलोकचयस्य स्पर्शस्य वा यत् ‘स्वज्ञानम्’ अन्यघटादिविविक्तेन स्वेन रूपेण ज्ञानं, तत् कर्तृ, ‘तस्य’ आलोकादेः अघटरूपतां घटाभावरूपतां ‘तत्र’ भूतले साधयति इति शक्योऽयमर्थः । ‘शकि लिङ् च’ ( पा० सू० ३-३-१७२ ) इति लिङ् । आन्तरप्राणस्पन्दनजनितसूक्ष्मशब्दाकर्णनाच्च श्रोत्रादिसाकल्यं सम्भावयमानः तमेव शब्दम् एकज्ञानसंसर्गिणं शृण्वन् शब्दान्तरं निषेधयति ‘न इह अन्यः शब्द’ इति । तत् सूक्ष्मशब्दाभावमपि सूक्ष्मतमान्तर्नादावहितश्रोत्रो वेदयते, रसगन्ध- स्पर्शाभावोऽपि दन्तोदकरसं त्रिपुटिकागन्धं कायीयं च स्पर्शं संवेदयमानेनैव संवेद्यः, नहि एकज्ञान- संसर्गयोग्यवस्त्वन्तरोपलब्भेन विना उपलब्धिकारणसाकल्यनिश्चयोऽस्ति, इति एकान्त एषः अचिरप्रवृत्तितत्तद्विषयानुभवकल्पितस्य तदैव ध्वंसानाशङ्कनात् करणस्य कारणसाकल्यनिश्चयः किम् एकज्ञानसंसर्गतया ? इति चेत् न—तत्तदभावोपलिप्सुः हि प्रयत्नेन तत्तदिन्द्रियाधिष्ठानं व्यापारयन् एव लक्ष्यते ॥ १० ॥ ननु एवम् अदृश्यस्यापि पिशाचादेः निषेधव्यवहारो व्यतिरेकेणापि प्राप्नोति, स हि आलोकपुञ्जो यथा घटात् अन्यः तद्वत् पिशाचादेरपि ? तदेतत् आशङ्क्याह—
अब पद के अर्थ को कहते हैं—'किन्तु' इससे अपने मत का उपक्षेप करने के लिए प्रतिभा अर्थात् तीक्ष्ण बुद्धिरूपी प्रश्न का परामर्श करती है, यहाँ पर न्याय करना चाहिए, इसके लिए कहते हैं—'तत्र' भूतल में 'आलोकचयः' प्रकाशपुञ्ज ज्ञेयरूप है 'अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्शः' अर्थात् उष्णादि का स्पर्श अन्धे व्यक्ति को होता है 'तस्य' उस प्रकाशपुञ्ज के स्पर्श का तो ज्ञान अन्य घटादि के ज्ञान से भिन्न अपने स्वरूप में होता है। वह ज्ञान तो किसी कर्ता के माध्यम से हो सकता है, 'तस्य' उस आलोकादि का तो अघटरूप हो अथवा घटाभावरूप हो 'तत्र' उस भूतल में जाना जा सकता है। यहाँ 'शकि लिङ् च' पाणिनीय सूत्र ( ३-३-१७२ ) से शक्त अर्थ में लिङ् लकार हुआ है। शरीर के भीतर स्पन्दन से उत्पन्न हुआ सूक्ष्म शब्दों के सुनने से श्रोत्रादि- इन्द्रियों की सफलता संभाव्य है, वही शब्द किसी एक ज्ञान से संपर्क करके सुनाते हुए दूसरे शब्द का निषेध करते हैं 'न इह अन्यः शब्दः' यहाँ पर कोई अन्य शब्द नहीं है। इसी प्रकार से सूक्ष्म-सूक्ष्मतर शब्दों को भी श्रोत्र-इन्द्रिय व्यक्त करती हैं, इस प्रकार रस-गन्ध-स्पर्श और उनके अभाव को भी रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, और स्पर्श के लिए त्वगिन्द्रिय से संविदित होता है, एक ज्ञान के संसर्ग के योग्य दूसरी वस्तु के ज्ञान बिना उपलब्धि का निश्चय नहीं होता है—यही एकान्त निश्चय है, एक कारण के साथ दूसरे कारण का ज्ञान संसर्ग के बिना नहीं होता है, इसलिए उन-उन अभावों का भी ज्ञान उन-उन इन्द्रियों के अधिष्ठान के व्यापार से ही उपलक्षित होता है ॥ १० ॥ अब शंका करते हैं कि अदृश्य [ इह भूतले पिशाचो नास्ति तादात्म्याभावस्तु स्वसिद्ध एव इत्यपि शब्दस्य अर्थः ] जो इस भूतल में पिशाच नहीं है—ऐसा तादात्म्य अभाव तो 'स्वतः' अपने से ही सिद्ध है और निषेध व्यवहार 'अभाव व्यवहार' व्यतिरेक से भी तो प्राप्त होता है, वही प्रकाशपुञ्ज है। जैसा कि घटाभावरूप व्यवहार अर्थात् घट से भिन्न उसी प्रकार पिशाचादि का भी व्यवहार होगा। उसी की आशङ्का करके कहते हैं—