ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-७, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५३ पिशाचः स्यादनालोकोऽप्यालोकाभ्यन्तरे यथा । अदृश्यो भूतल्स्यान्तर्न निषेध्यः स सर्वथा ॥ ११ ॥ आलोकपुञ्जो यद्यपि पिशाचात् व्यक्तिरिक्तो यद्यपि च आलोकोऽस्ति अपिशाचात्मा इत्येतावत् सिद्धयति तथापि अत्र 'पिशाचो नास्ति' इत्येतत् अशक्यम् अध्यवसातुम्, घटो हि आलोकपूरमध्येऽपि असम्भाव्यः- अघटसंनिधौ तत्र आलोकपूरापसर्पणात्, अतश्च सिद्धयतीदम्- अत्र घटो नास्ति इति, पिशाचस्तु तादृक्स्वभावो-यो भूतलमध्येऽपि आलोकमध्येऽपि वा भवन् भूतलस्य आलोकस्य वा तां निबिडतां न प्रतिहन्ति, अतश्च आलोकमध्ये तस्य सम्भावनात् कथं व्यतिरेकेण निषेधव्यवहारः, एवं रूपमध्ये रसादेः सम्भावनात् तस्यापि अनिषेधः यद्यपि अनालोकः आलोकात् अन्यः पिशाचः तथापि असौ भूतलस्य अन्तर्मध्येऽदृश्यो भवति इति सम्भाव्यते यथा, तद्वत् एव आलोकस्याभ्यन्तरे सोऽस्ति इति सम्भाव्यत एव, ततश्च यद्यपि आलोकस्ततोऽन्यः इत्यनेन पथा निषिद्धः पिशाचः तथापि सर्वप्रकारेण न निषिद्धः इति तदभावनिबन्धनाः कथं तत्र व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ताम् इति श्लोकार्थः ॥ ११ ॥ एवं प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य तत्त्वम् उपदर्श्य प्रकृते योजयति- आलोक के रहते हुए भी पिशाच का ज्ञान नहीं होता है और आलोक के न रहने पर भी नहीं होगा; क्योंकि पिशाच भूतल में भी अदृश्य है और आलोक में भी अदृश्य है-इसलिए पिशाच का निषेध सर्वथा असम्भव है ॥ ११ ॥ यद्यपि आलोकपुञ्ज पिशाच से भिन्न है और अपिशाचरूप आलोक हैं-तो भी, यहाँ पर भूतल में 'पिशाचो नास्ति' पिशाच नहीं है-यह निश्चय करना अशक्य है; क्योंकि घट तो आलोक के बीच में भी, घटाभाव की सन्निधि में, पूरे आलोक का समर्पण नहीं होता है, इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर घट नहीं है, पिशाच तो वैसा ही स्वभाव का है जो कि भूतल के मध्य में या आलोक के मध्य में भी रहता हुआ भूतल की या आलोक की सघनता को रोक सकता है और इसीलिए आलोक के बोच में उसकी सम्भावना होने से उसके अभाव का व्यवहार कैसे हो सकता है ? इस प्रकार से रूप के बीच में रस इत्यादि की सम्भावना से उसका भी निषेध नहीं हो सकता है । पदार्थ के विषय में कह दिया गया । अब वाक्य का अर्थ कहते हैं-अनालोक आलोक से भिन्न हो है तो भी, वह भूतल से अदृश्य रह सकता है-जैसे यह सम्भव है, उसी प्रकार से आलोक के भीतर भी पिशाच है-यह सम्भव हो ही सकता है । इससे यह सिद्ध होता है कि आलोक पिशाच से भिन्न है, इसीलिए जैसे पिशाच का निषेध किया गया है-तो भी, सब प्रकार से उसका निषेध करना असम्भव है । इसलिए इसमें अभावमूलक व्यवहार कैसे प्रवर्तित होंगे, यही श्लोक का अर्थ है ॥ ११ ॥ [ सब सत्य है; क्योंकि भूतल घटादि से शून्य है इस वाक्य से धर्मोत्तर उपाध्याय के मत का अच्छी तरह निर्णय कर उसमें असत्यरूप दिखा दिया है। अब सत्यरूप की दृढता सिद्ध करने के लिए कहते हैं] इस प्रकार प्रसंग से अभाव व्यवहार के तत्त्व को बताकर उपस्थित विषय को बताते हैं। २०