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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-१, आ.-७, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५३ पिशाचः स्यादनालोकोऽप्यालोकाभ्यन्तरे यथा । अदृश्यो भूतल्स्यान्तर्न निषेध्यः स सर्वथा ॥ ११ ॥ आलोकपुञ्जो यद्यपि पिशाचात् व्यक्तिरिक्तो यद्यपि च आलोकोऽस्ति अपिशाचात्मा इत्येतावत् सिद्धयति तथापि अत्र 'पिशाचो नास्ति' इत्येतत् अशक्यम् अध्यवसातुम्, घटो हि आलोकपूरमध्येऽपि असम्भाव्यः- अघटसंनिधौ तत्र आलोकपूरापसर्पणात्, अतश्च सिद्धयतीदम्- अत्र घटो नास्ति इति, पिशाचस्तु तादृक्स्वभावो-यो भूतलमध्येऽपि आलोकमध्येऽपि वा भवन् भूतलस्य आलोकस्य वा तां निबिडतां न प्रतिहन्ति, अतश्च आलोकमध्ये तस्य सम्भावनात् कथं व्यतिरेकेण निषेधव्यवहारः, एवं रूपमध्ये रसादेः सम्भावनात् तस्यापि अनिषेधः यद्यपि अनालोकः आलोकात् अन्यः पिशाचः तथापि असौ भूतलस्य अन्तर्मध्येऽदृश्यो भवति इति सम्भाव्यते यथा, तद्वत् एव आलोकस्याभ्यन्तरे सोऽस्ति इति सम्भाव्यत एव, ततश्च यद्यपि आलोकस्ततोऽन्यः इत्यनेन पथा निषिद्धः पिशाचः तथापि सर्वप्रकारेण न निषिद्धः इति तदभावनिबन्धनाः कथं तत्र व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ताम् इति श्लोकार्थः ॥ ११ ॥ एवं प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य तत्त्वम् उपदर्श्य प्रकृते योजयति- आलोक के रहते हुए भी पिशाच का ज्ञान नहीं होता है और आलोक के न रहने पर भी नहीं होगा; क्योंकि पिशाच भूतल में भी अदृश्य है और आलोक में भी अदृश्य है-इसलिए पिशाच का निषेध सर्वथा असम्भव है ॥ ११ ॥ यद्यपि आलोकपुञ्ज पिशाच से भिन्न है और अपिशाचरूप आलोक हैं-तो भी, यहाँ पर भूतल में 'पिशाचो नास्ति' पिशाच नहीं है-यह निश्चय करना अशक्य है; क्योंकि घट तो आलोक के बीच में भी, घटाभाव की सन्निधि में, पूरे आलोक का समर्पण नहीं होता है, इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर घट नहीं है, पिशाच तो वैसा ही स्वभाव का है जो कि भूतल के मध्य में या आलोक के मध्य में भी रहता हुआ भूतल की या आलोक की सघनता को रोक सकता है और इसीलिए आलोक के बोच में उसकी सम्भावना होने से उसके अभाव का व्यवहार कैसे हो सकता है ? इस प्रकार से रूप के बीच में रस इत्यादि की सम्भावना से उसका भी निषेध नहीं हो सकता है । पदार्थ के विषय में कह दिया गया । अब वाक्य का अर्थ कहते हैं-अनालोक आलोक से भिन्न हो है तो भी, वह भूतल से अदृश्य रह सकता है-जैसे यह सम्भव है, उसी प्रकार से आलोक के भीतर भी पिशाच है-यह सम्भव हो ही सकता है । इससे यह सिद्ध होता है कि आलोक पिशाच से भिन्न है, इसीलिए जैसे पिशाच का निषेध किया गया है-तो भी, सब प्रकार से उसका निषेध करना असम्भव है । इसलिए इसमें अभावमूलक व्यवहार कैसे प्रवर्तित होंगे, यही श्लोक का अर्थ है ॥ ११ ॥ [ सब सत्य है; क्योंकि भूतल घटादि से शून्य है इस वाक्य से धर्मोत्तर उपाध्याय के मत का अच्छी तरह निर्णय कर उसमें असत्यरूप दिखा दिया है। अब सत्यरूप की दृढता सिद्ध करने के लिए कहते हैं] इस प्रकार प्रसंग से अभाव व्यवहार के तत्त्व को बताकर उपस्थित विषय को बताते हैं। २०

१५४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-७, का.-१२ एवं रूप्यविदाभावरूपा शुक्तिमतिर्भवेत् । न त्वाद्यरजतज्ञप्तेः स्यादप्रामाण्यवेदिका ॥ १२ ॥ यथा आलोको घटाभाव इति आलोके गृहीते प्राक् गृहीतस्य घटस्य न किञ्चित् आयातम् तथैव शुक्तिज्ञानं रूप्यज्ञानाभाव इति इयत् सम्भाव्यते यथा घटज्ञानं घटज्ञानप्रामाण्यसंवित् पटज्ञानाभावः पटज्ञानाभावप्रामाण्यसंवित् इयता च न पूर्वप्रवृत्तं पटज्ञानम् अप्रामाणीभवति, एषा हि तस्य घटज्ञानस्य स्वरूपचिन्ता सर्वा न ज्ञानान्तरस्य आद्यस्य किमपि अतो जातम्। एवं शुक्तिरियम् इति, न रजतम् इदम् इति च ज्ञानमेव स्वात्मना प्रकाशताम्, अहं शुक्तौ रजताभावे च प्रमाणं न तु रजते इति, तावता तु प्राक्तनस्य रजतज्ञानस्य न किञ्चित् वृत्तम्, इति तद्विषयी- कृतं रजतं कथम् असत्यं स्यात् ॥ १२ ॥ ननु इदमित्यनेन तदेव परामृश्यते—यत्र रजतज्ञानम् अभूत् तत्रैव इदानीं 'न रजतम् इति, शुक्तिः इति' च ज्ञानं प्रमाणभूतं जातं, तत् अतोऽनुमीयते—यत् 'प्राच्यं रजतज्ञानम् अप्रमाणम्' इति, नहि एतत् सम्भवति—विरुद्धविषयावगाहि ज्ञानद्वयं प्रमाणम् एकत्र विषयीभवति इति, तत् अयम् आनुमानिको बाधव्यवहारो भविष्यति ? इत्याशङ्क्याह— इस तरह रजत ज्ञान की अभावरूपी शुक्तिका बुद्धि भले ही होवे । किन्तु पहले रजत ज्ञान के अप्रामाण्य को जाननेवाली शुक्ति बुद्धि नहीं हो सकती है ॥ १२ ॥ जैसे आलोक घटाभाव है, उसी प्रकार आलोक के ग्रहण हो जाने पर पूर्व में ग्रहण किये गये घट का कुछ भी नहीं बिगड़ता, इसी प्रकार शुक्ति ज्ञान रजत ज्ञान का अभाव है—ऐसी सम्भावना की जा सकती है । जैसा कि घटज्ञान पटज्ञान की प्रामाणिकता को भी ग्रहण करता है—इसी प्रकार पटज्ञानाभाव पटज्ञानाभाव की प्रामाणिकता का ज्ञान करता है इतने से पूर्व में प्रवृत्त हुए पटज्ञान को अप्रमाण नहीं बना सकता है, यही घटज्ञान का घटसम्बन्धी ही सब प्रकार की स्वरूप चिन्ता करता है, इससे पूर्व में हुए दूसरे ज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है अर्थात् शुक्तिज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। इस प्रकार यह शुक्ति है; रजत नहीं और यह ज्ञान ही अपने आप रजतरूप से प्रकाशित होता है। मैं स्वयं शुक्तिका में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में नहीं हूँ, इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी तो नहीं बिगड़ता है। इसलिए उस ज्ञान को विषय मानता हुआ रजत कैसे असत्य हो सकेगा ? ॥ १२ ॥ [ यह जो कहा गया है कि यह शुक्ति है, रजत नहीं है—इस प्रकार अपने से हुए ज्ञान की प्रकाशरूपता है, मैं स्वयं शुक्ति में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में प्रमाणभूत नहीं हूँ— इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं; अवसर ढूँढ़कर आक्षेप करते हैं । ] 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि 'इदम्' इससे उसीका परामर्श होता है, जहाँ पर रजतज्ञान हुआ था, वहाँ पर ही इस समय रजत नहीं, किन्तु शुक्ति है—यह ज्ञान प्रमाणभूत हो गया, इससे उसका अनुमान होता है जोकि पूर्व में रजतज्ञान अप्रमाणित था, यह संभव नहीं हो सकता है कि विरुद्ध में दो विषयों का अवगाहन करनेवाला जो ज्ञान है एक जगह ज्ञानरूप होकर प्रमाणभूत हो सके, सो यह अनुमानजन्य बाध का व्यवहार होगा ? इस प्रकार आशंका कर कहते हैं—

अ.-१, आ.-७, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५५ धर्म्यसिद्धेरपि भवेद्बाधा नैवानुमानतः । स्वसंवेदनसिद्धा तु युक्ता सैकप्रमातृजा ॥ १३ ॥ न केवलं स्वसंवेदनात् न सिद्धयति बाधा, यावत् अनुमानतोऽपि न सिद्धयति—धर्मिणो- ऽसिद्धेः, अपिशब्दात् हेतोः व्याप्तेश्च, अपिः उभयत्र नेयः, इह धर्मिणि सिद्धे सिद्धेन हेतुना स्मर्यमाणव्याप्तिकेन साध्यधर्मयोगव्यवच्छेदकोऽनुमानव्यापारः इह च प्राच्ये रूप्यज्ञाने धर्मिणि अप्रामाण्यं साध्यो धर्मः तत्र शुक्तिकाज्ञानं वा, न रजतम् इति ज्ञानं वा, तज्ज्ञानविषयीकार्यत्वं वा विषयगतं हेतूक्रियते, न च एतत् युक्तम्—तत्काले प्राच्यरूप्यबोधस्य धर्मिणोऽभावात्, न चापि तस्य शुक्तिज्ञानादयो धर्माः, न च अपक्षधर्मात् साध्यसिद्धिः, अतः स्मर्यमाणं तद्धर्मि स्यात् इत्यपि असत्, अथ शुक्तिः न रजतज्ञानस्य विषय इति साध्यते शुक्तिकाज्ञानविषयत्वात् इति, तत् यदि इदानीम् तत्सिद्धसाधनम्, अथ पूर्वम् तदा तत्पूर्वस्वसंवेदनेन बाध्यविषयता केन चैवं व्याप्तिर्गृहीता—यत्र इदानीम् अन्यत् ज्ञानम् तत्र पूर्वम् अन्यत् न भवति इति, अनुमानान्तरेण इति चेत् अनवस्था, एतेन एतत् प्रत्युक्तम्—एकस्मिन् विषये कथं ज्ञानद्वयं स्यात् इति, को हि एकविषयतां द्वयोः ज्ञानयोः जानीयात्, ते हि तावत् स्वात्मनि स्वविषये च विश्राम्यत इति धर्मी की असिद्धि से भी बाधा नहीं होती है और अनुमान से भी नहीं हो सकती है, किन्तु अपने संवेदन ज्ञान से युक्त एवं प्रमाता से जन्य होकर बाधा का होना सम्भव है ॥ १३ ॥ विशुद्ध भूतल जो कह आये हैं, वहाँ पर केवल स्वसंवेदन से ही बाधा सिद्ध नहीं होती किन्तु अनुमान से भी बाध का सिद्ध होना एक प्रकार से असंभव सा ही होगा । धर्मी की असिद्धि में हेतु और व्याप्तिज्ञान दोनों ही कारण हैं। यहाँ पर ‘अपि’ शब्द दोनों स्थानों में अन्वित होता है, जो कि यहाँ पर धर्मी की सिद्धि में सिद्ध हेतु से स्मर्यमाण व्याप्तिवाला है उससे साध्यधर्म का अयोग्यव्यवच्छेदक अनुमान का व्यापार होता है। पूर्व का रजतज्ञान धर्मी में अप्रामाण्य साध्य धर्म है, उसके साध्य धर्मी में शुक्ति का ज्ञान है या रजत का ज्ञान नहीं है, इस ज्ञान का विषय बनानेवाला हेतु बनाया जा रहा है, यह उचित नहीं है—क्योंकि उस समय [शुक्तिका ज्ञान काल] में पूर्व के जो रजतज्ञान धर्मी है उसका अभाव रहता है और उस रजतज्ञान का शुक्ति ज्ञानादि धर्म नहीं है और जिस पक्ष का धर्म नहीं है उससे साध्य की सिद्धि नहीं बन सकती है। इसीलिए स्मरण किये जानेवाला रजतज्ञान का धर्मी है यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वह पक्ष का धर्म नहीं है, यदि शुक्ति रजतज्ञान का विषय नहीं है, तो यह सिद्ध नहीं हो सकता है, शुक्तिज्ञान उसका विषय है रजत नहीं है, इस शुक्तिज्ञान के अवसर में सिद्ध-साधन [ विफल ] हो जाता है, दूसरे प्रकार से अब यदि कहो कि पूर्व के ज्ञान से बाध्य-विषयता की सिद्धि होगी इसमें कौन-सी व्याप्ति है जो कि इस समय दूसरा ज्ञान हुआ है। वह पूर्व में नहीं होगा यदि दूसरे अनुमान से होगा—ऐसा मानते हो तो, अनवस्था हो जायेगी, इससे यह खण्डित हो जाता है कि एक विषय में दो ज्ञान कैसे संभव होंगे, कौन व्यक्ति दो ज्ञान की एक विषयता को मानने के लिए तैयार है, पहले तो अपने में और अपने विषय में विश्राम लेता है—यह कहा है। इसी- १. सति धर्मिणि धर्मचिन्ता । इस प्रकार धर्मी के रहने पर ही धर्म का विचार करना युक्त बैठता है।

१५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१३ उक्तम्, इति अनुमानतोऽपि न बाधा, न च तथाभूतमपि व्यवधानम् अत्र प्रतीतौ संवेद्यते— स्वसंवेदनसिद्धतया झटिति भासनात्, अत एव एतदपि अशक्यं वक्तुम्—माभूत् बाधा नाम इति । एवं परपक्षेऽनुपपत्तिं प्रदर्श्य स्वपक्षे एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभाव इति वाक्येन प्रतिज्ञातं निगमयति—युक्ता सा एकस्मात् प्रमातुः यदि जायेत इति, स एव हि तथा निर्माता इति व्याख्यातमेव, स्थिते चैवं यदि व्यवहारसिद्धयेऽन्यथानुपपत्तिरुच्यते तत् उच्यतां कामम् ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ इति ॥ १३ ॥ न केवलमेते कार्यकारणभावस्मरणबाधाव्यवहाराः सकललोकयात्रासामान्यव्यवहारभूता एकप्रमातृप्रतिष्ठा, यावत् अवान्तरव्यवहारा अपि ये क्रयविक्रयादयः समलाः, उपदेश्योपदेश- भावादयश्च निर्मलाः, तेऽपि एकप्रमातृनिष्ठा एव भवन्ति—व्यवहारो हि सर्वः समन्वयप्राणः इति उपसंहारक्रमेण दर्शयति— लिए अनुमान से भी वहाँ पर कोई बाधा नहीं होगी और वैसा व्यवधान भी इस प्रतीति में ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह स्वसंवेदन से सिद्ध होने के कारण शीघ्र ही भासित हो जाता है, इसी- लिए यह भी कहना अशक्य है कि बाधा न हो । इस प्रकार दूसरे के पक्ष में अनुपपत्ति दिखा करके अपने पक्ष में भी ‘एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभावः’ इस वाक्य से अपनी प्रतिज्ञा का उपसंहार करते हैं-यदि एक प्रमाता से बाधा होती है, तो समुचित ही है, वह चिद्रूप हो वैसा निर्माण करनेवाला है इसकी व्याख्या पूर्व में हो चुकी है, ऐसी स्थिति होने पर यदि व्यवहार की सिद्धि के लिए अन्यथा बाध्य-बाधकभाव सिद्ध करते हो तो किया करो, ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ किन्तु अब तो सब कुछ सिद्ध हो हो गया है ॥ १३ ॥ [ पूर्वोक्त अनुवादपूर्वक ही वर्तन किया जायेगा एवं अभेदात्मक ज्ञान के लिए हो होगा ] ये कार्य-कारणभाव स्मरण बाधरूप व्यवहार हैं—वे सभी लोक में सामान्य व्यवहार के कारण माने जाते हैं, इसलिए वे एक ही प्रमाता में प्रतिष्ठित रहते हैं, इसके भीतर जितने भी व्यवहार हैं—क्रय-विक्रयरूपादि, वे सब के सब मल से युक्त मायीय प्रमाताओं के और निर्मल उपदेश्य- उपदेशभाव आदि के एक प्रमातृगत ही होते हैं; क्योंकि सभी व्यवहार समन्वय जीवनवाले होते हैं उसे उपसंहार क्रम से दिखाते हैं— १. निर्मल और समल भेद से व्यवहार दो प्रकार के होते हैं । माया से अन्धे हुए सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकलों का समल व्यवहार होता है, जिसका आगम में उल्लेख किया गया है— अवस्थात्रितयेऽप्यस्मिंस्तिरोभावनलीलया । शिवशक्त्या समाक्रान्ताः प्रकुर्वन्ति विचेष्टितम् ॥ सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल इनकी तीनों अवस्था में भी छिपा देने की लीला करनेवाली शिव-शक्ति से आक्रान्त होने के कारण सारी चेष्टाएं किया करते हैं । क्रय-विक्रय विवादादि का व्यवहार समल से होता है और जिन लोगों ने अपने स्वरूप को पहचान लिया है तथा परमेश्वररूप बन गये हैं उनका व्यवहार निर्मल होता है । यद्यपि पशु आदि एवं विद्येश्वर आदि दीक्षित पर्यन्त लोगों में उपदेश, दीक्षा, नित्य-नैमित्तिकादि अनुष्ठान, ध्यान, समाधानादि व्यवहार होता है वह समल से ही होता है, उनमें भी कुछ मल शोधरूप में रह जाता है; क्योंकि माया का व्यवहार विगलित न होने से यह होता रहता है इसलिए जिस कारण से व्यवहार-

अ.-१, आ.-७, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५७ इत्थमत्यर्थभिन्नार्थावभासखचिते विभौ । समलो विमलो वापि व्यवहारोऽनुभूयते ॥ १४ ॥ 'तत्तद्विभिन्नेति' श्लोकद्वयोक्तेन अनेन उपपत्तिप्रकारेण, अन्वयव्यतिरेकात्मना, तथा श्लोकान्तरैरुक्तेन व्यवहारोदाहरणप्रकारेण इदमपि मन्तव्यम्—यत् विभौ देशकालानवच्छिन्ने, अत एव अत्यर्थभिन्नैः—मायाबलात् भेदैकप्राणितैः नीलसुखाद्याभासैः प्रतिबिम्बकल्पैः अनतिरिक्त- तया वर्तमानैः, खचिते—स्वरूपानन्यथाभावेन उपरक्ते, विश्रान्तः सर्वो व्यवहारोऽनुभूयते— अनुभव एव अत्र दृढतमं प्रमाणम् इति यावत्, अनुभूयते च सोपदेशैः अवधानधनैः—येन एषां यैव संसारसंमता व्यवहारदशा सैव प्रमातृतत्त्वप्रख्यात्मिका शिवभूमिः। यदुक्तम्—'.........सम्बन्धे सावधोनता ॥' इति अप्रत्यभिज्ञातात्मपरमार्थनां समलो व्यवहारः, अन्येषां स एव निर्मलः। इस प्रकार अत्यन्त भिन्न विषयों के अवभास से युक्त विभु में समल अथवा विमल भी व्यवहार देखा जाता है ॥ १४ ॥ 'तत्तद्विभिन्नेति' इत्यादि दो श्लोकों से उपपत्तिपूर्वक व्यवहार के उदाहरण देने से यह भी मानना होगा कि देश-काल से अनवच्छिन्न विभु में माया-शक्ति के बल से अत्यन्त भिन्न अनेक भेदों से युक्त प्रतिबिम्बतुल्य नील-सुखादि के आभासों से जो कि तद्रूप ही रहते हैं, उनसे युक्त अन्येरूप न होने के कारण रंगे हुए विभु में सभी व्यवहार विश्रान्त होकर अनुभूत होते हैं; क्योंकि अनुभव हो यहाँ पर दृढ प्रमाण है और देनेवाले लोगों से जो उपदेश के पात्र हैं उनसे अनुभव किया भी जाता है। [मूढानां झटिति तथाभिमानाभावेऽपि उक्तोपदेशपरिशीलनदिशा प्रकाशत एवार्थ इत्यर्थः ।] अर्थात् मूढप्राणियों को भी वैसा अभिमान का अभाव हो जाने पर शीघ्र ही कहे हुए उपदेश की दिशा से प्रकाश होता है। जिस कारण से इन लोगों के संसार मान्य व्यवहार दशा [अनवहित अभीष्ट ] है वही प्रमातृतत्त्व को बतानेवाली शिवभूमि [शुद्ध सर्वज्ञ सर्व- कर्तृत्वमयात्मक ] है और इस विषय में कहा भी गया है— ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥ जिन लोगों को अपने स्व-स्वरूप की पहचान नहीं है उनमें मायीय समल व्यवहार भी देखा जाता है और जिनको स्व-स्वरूप का पूर्णरूप से बोध है उनका व्यवहार निर्मल होता है। रूपता रहती है, वह तो भेद एवं अभेद प्राणित समन्वयरूप सर्वथा भेद के छिप जान पर भी मल का व्यवहार करती ही है फिर भी जिनको अपने स्वरूप का ज्ञान हो चुका है उनको अपने में और परमात्मा में मल का शोधना-समझना आदि एक ही मात्र व्यापार होने से प्रायः मुक्त ही होते हैं। १. मूढजनों में द्रुतगति से वैसा अभिमान का अभाव रहने पर भी कहे गये उपदेश का परिशीलन करने से अर्थ प्रकाशित होता है। २. समस्त शरीरधारियों के लिए ज्ञाता और ज्ञेय का ज्ञान करना सामान्यरूप से कठिन होता है, किन्तु योगियों में तो यह विशेषता देखी भी जाती है कि वह इस विषय में जाग्रत ही रहते हैं अर्थात् ज्ञेय सर्वदा ज्ञाता से सम्बद्ध रखता है। बिना ज्ञाता से सम्बद्ध रखे हुए कोई ज्ञेय माना नहीं जाता, जहाँ से ज्ञाता का उदय होता है और जिसमें ज्ञेय की विश्रान्ति होती है उसका योगी को बोध रहता है।

१५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ इति शिवम् ॥ १४ ॥ अदितः ॥ ७७ ॥ इति श्रीमन्माहेश्वराचार्यवर्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभि- नवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यव्याख्योपेतायां प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणं नाम सप्तममाह्निकम् ॥ ७ ॥ • अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे माहेश्वर्यनिरूपणाख्यं अष्टममाह्निकम् स्वसंवेदनसंसिद्धव्यवहारवशेन यः। नित्यं महेश्वरः सिद्धः सिद्धानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं ज्ञानस्मरणापोहनानि व्युत्पाद्य तेषाम् 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' इति निरूपितम् एतावता, 'न चेदन्तः कृता.........।' इत्यत्र यत् उक्तम् 'एक' इति तत् परिघटितम् । अन्तराभासमर्थनेन 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूप' इत्यपि निरूपितम् । यत् तत्रैव 'महेश्वर' इति उक्तम् तन्माहेश्वर्यं स्वातन्त्र्यरूपम् उपपादयितव्यम्, तच्च ज्ञानविषयं क्रियाविषयं च इति उभयप्रकारम्, यह कल्याणकारी भाव है ॥ १४ ॥ सप्तम आह्निक समाप्त जो महेश्वर सिद्धजनों के लिए अपने ज्ञान के संसिद्ध व्यवहार के बल से नित्य ही सिद्ध है, उस शिव का हम स्तवन करते हैं। इस प्रकार ज्ञान-शक्ति, स्मरण-शक्ति और अपोहन-शक्ति का प्रतिपादन कर, अब उन सभी का 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' अर्थात् एक आश्रय के बिना व्यवहार का होना असंभव है—इतने से यह विषय सिद्ध किया गया है । न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकचिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ इस कारिका में जो कहा गया है 'एक:' एक शब्द से उसको घटा दिया गया है । अन्तर के आभास के समर्थन से 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूपो' अपने भीतर अनन्त-असंख्य विश्वरूप भरा पड़ा है इसका भी निरूपण कर दिया गया है। वहाँ पर ही 'महेश्वरः' महेश्वर ऐसा शब्द कहा है इससे माहेश्वर्य की स्वतन्त्रता को सिद्ध करना है और वह स्वातन्त्र्य ही ज्ञान का विषय है एवं क्रिया का भी विषय है । १. कर्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्वरे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ स्वयं महेश्वर ही तो कर्ता और ज्ञाता के रूप में सिद्ध है उनकी अजडरूप में निषेध अथवा सिद्धि कौन कर सकता है ? उसका यही परम स्वातन्त्र्य है । २. शक्त्या गर्भान्तर्वर्तिन्या शक्तिगर्भं परं महः । परमेश्वर के भीतर शक्तिरूप से परम तेज रहता है । न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । न हिमस्य पृथक् शैत्यं नोष्ण्यं वह्नेः पृथग्भवेत् ॥

अ.-१, आ.-८, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५९ ततो भगवान् ज्ञाता कर्ता च, यद्यपि च प्रकाशविमर्शात्मकं चिदेकघनम् एकमेव संविद्रूपम्, तथापि व्युत्पादनाय तत्परिघटित एव अयं विभागः, तेन ज्ञानात्मकक्रियाविषयं स्वातन्त्र्यं यद्यपि क्रियाशक्तिरूपम् तथापि ज्ञानाधिकार एव निर्णेतव्यं—तद्विषयत्वात् । एवं च ज्ञातृशब्दार्थः प्रकृतिलतः प्रत्ययतश्च सम्पूर्णतया निर्णीतो भवति । तत्र ज्ञानं नाम स्वयं भेदिताभासभेदोपाश्रय- नियन्त्रणासङ्कुचितम् 'अहमिति' संवेदनम् । तत्र आभासेषु यत् स्वातन्त्र्यं, तदेव ज्ञानशक्तिविषयं स्वातन्त्र्यं सम्पद्यते इति । 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य.........।' इत्यादिना '........शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः।' इत्यन्तेन श्लोकैकादशकेन तत् निरूप्यते । तत्र आभासान्तरापेक्षी च आभासोऽन्यथा वा इति श्लोकेन उक्त्वा, स एव आभास एक इति श्लोकान्तरेण उच्यते । अर्थक्रियाभासोऽपि तथैव आभासनियत इति श्लोकद्वयेन उक्त्वा कस्मिन् आभासे सा अर्थक्रिया इति पुनः श्लोकद्वयेन । आभासान्तरविचित्रस्य भित्तिस्थानीयम् आन्तरत्वम् इति श्लोकेन । ततो बाह्यत्वं स्वरूपतो इससे सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर ही स्वयं ज्ञाता और कर्ता है और इनका स्वरूप प्रकाश विमर्शात्मक एकमात्र संविद्रूप ही है, फिर भी दूसरों को इनका बोध हो जायें, इसलिए ज्ञान और क्रियारूप में विभाग किया गया है, ज्ञानात्मक क्रिया के विषय का स्वातन्त्र्य 'आभासवैचित्र्य' यद्यपि क्रिया-शक्तिरूप होने के कारण 'क्रियाधिकार' में ही इसका प्रस्ताव करने योग्य है तथापि ज्ञानविषयक होने से भी 'ज्ञानाधिकार' में इसका विवेचन करना दोष जनक नहीं माना जाता है; क्योंकि इन दोनों का विषय एक है इस प्रकार ज्ञातृ शब्द का अर्थ होता है कि—ज्ञातृ में 'ज्ञाधातु' से 'तृच्' प्रत्यय हुआ है इसीलिए प्रकृति और प्रत्यय मिल कर पूरा का पूरा ज्ञान करनेवाला अर्थ निर्णित होता है। [ ज्ञान और क्रिया की परस्पर एकरूपता होने के कारण आचार्य हंस्ररूप होकर जल और दूध के समान विषय को भिन्नतापूर्वक ज्ञानस्वरूप के क्रिया से अलग ही विवेचन कर देते हैं ] ज्ञान क्या चीज है ? स्वयं भेद करनेवाले का आभास से भेद के आधार को नियन्त्रित करके विस्तार कर देना जिसका अहं यह परामर्श होता है । प्रकृति के अर्थ से ज्ञान के स्वरूप का भेद कर देने पर, प्रत्ययार्थ के साथ आभास होने पर, जो स्वातन्त्र्य है वही ज्ञान-शक्ति का विषयरूप स्वातन्त्र्य कहलाता है। 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य ......।' इत्यादि से लेकर '.........'शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ।' यहाँ तक ग्यारह श्लोकों से निरूपण करेंगे। जैसे आभास किसी दूसरे आभास को अपेक्षा रखता है, दूसरा कोई नहीं भी रखता है यह प्रथम श्लोक से कह कर, वही आभास एक है ऐसा दूसरे श्लोक से कहेंगे । अर्थक्रिया का आभास भी उसी प्रकार आभास में नियत रहता है, यह दो श्लोकों से कहेंगे । आभासान्तर की विचित्रता में भित्ति स्थानीय सदृश आन्तरत्व है, यह एक श्लोक से कहेंगे। उसके बाद स्वरूप से और विभाग से बाह्यत्व की सिद्धि बतायेंगे, दो श्लोकों शिव से शक्ति अलग नहीं है और शक्ति से शिव भिन्न नहीं है; क्योंकि हिम से व्यतिरिक्त शीतलता नहीं रहती एवं वह्नि से अलग ऊष्णता-दाहकता नहीं रहती है । इस युक्ति से तो एक ही प्रकाश विमर्शात्मक संविद्रूप है किन्तु यह ज्ञान और क्रिया दो क्या चीज है ? जबकि ज्ञान और क्रिया में स्वातन्त्र्य ही परमार्थतः चित्तत्त्व कहलाता है ज्ञातृ सत्ता ही क्रिया है और क्रिया स्वरूप ही ज्ञान है, दूसरों को इसका बोध हो जायें इसी वास्ते ज्ञान और क्रिया की विवक्षा की गयी है ।

१६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ विभागतश्च श्लोकयुग्मेन । ततः श्लोकेन ज्ञानादिशक्त्याश्रयस्य एकस्य उपसंहारः । श्लोकान्तरेण महेश्वरत्वम् उपसंहरता भाविनः क्रियाधिकारस्य उपक्षेप इति संक्षेपार्थ आह्निकस्य । अथ श्लोकार्थो निरूप्यते । ननु यदि परमेश्वरनिष्ठतयैव समस्तोऽयं व्यवहारः तत् अस्य स्फुटत्वास्फुटत्वप्रायप्रसिद्ध- वैचित्र्यानुपपत्तिः–येन किल अयम् अनुप्राणितः स एक एव भगवान्, न च तद्व्यतिरेकेण व्यवहारनिजं किंचन तत्त्वम् उत्पश्यामः ? इत्याशङ्क्याह— तात्कालिकाक्षसामग्र्यसापेक्षाः केवलं क्वचित् । आभासा अन्यथान्यत्र त्वन्धान्धतमसादिषु ॥ १ ॥ विशेषोऽर्थावभासस्य सत्तायां न पुनः क्वचित् । विकल्पेषु भवेद्वाविभवद्भूतार्थगामिषु ॥ २ ॥ केवलम् एतावता आभासानां भेदो, न पुनरर्थावभासस्य स्वात्मगतः क्वचिदपि भेद इति श्लोकद्वयस्य संमेलितस्य सम्बन्धः, यस्मिन् एव काले स आभास आभाति तत्काले एव भवति, यत् अक्षसामग्र्यं--बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वं नाम आभासान्तरं 'पश्यामीत्येवंरूपम् तत्सापेक्षाः —तद्व्यामित्राः क्वचित् आभासा भवन्ति, यत्र स्फुटताव्यवहारः अन्धविषयः से । पश्चात् एक श्लोक से ज्ञानादि-शक्ति के एक आश्रय का उपसंहार करेंगे । दूसरे श्लोक से महेशता का उपसंहार करते हुए आगे आनेवाले क्रियाधिकार का उपक्षेप करेंगे, यही इस आह्निक का संक्षेप अर्थ है । अनन्तर श्लोक के अर्थ का निरूपण किया जाता है । अब शङ्का करते हैं कि यदि सारा का सारा व्यवहार परमेश्वर के ही आधार से होता है—तब तो, इस [ व्यवहार ] का प्रत्यक्ष रहना और दबे रहना इत्यादि प्रसिद्ध विचित्रता कैसे बन सकती है ? जिससे यह व्यवहार जीवित होता है—वह तो, एक ही भगवान् परमेश्वर का है, और उस परमेश्वर के बिना व्यवहार का अपना निजो तत्त्व स्वरूप हम क्या नहीं देखते हैं ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— कहीं-कहीं केवल उस काल में होनेवाले इन्द्रियों की समक्षता की अपेक्षा करके आभास होते हैं। अन्यत्र तो अन्धे को अन्धकार में जैसा ज्ञान होता है वैसा ही ज्ञान अर्थात् शून्य रहता है ॥ १ ॥ पदार्थ अवभास की सत्ता में कोई विशेषता नहीं होती आगे होनेवाले अथवा वर्तमानकाल में होनेवाले या बीते हुए काल में पदार्थों के विकल्पों में कुछ ज्ञान हो तो, हो सकता है ॥ २ ॥ सापेक्ष और निरपेक्ष के कारण ही पदार्थों में केवल भेद होता है, पदार्थों के आभासों में स्वयं अपने से भेद नहीं होता है। यह सम्मिलित दोनों श्लोकों का सम्बन्ध है, जिस तात्कालिक आकांक्षा के काल में आभास भासित होता है तभी वह उस काल में रहता है, जिसको इन्द्रियों से समक्ष में बाह्य-इन्द्रियों से प्रत्यक्ष कहा जाता है, इसी से दूसरे आभास को देखता हूँ—इस १. 'आभास की विचित्रता को कहकर अपने स्वरूप में आभास की एकता बनाये रखना ही यहाँ पर विशेषता मानी गयी है ।

अ.-१, आ.-८, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६१ अन्धकारस्थप्रमातृविषयः पुनः योऽन्यो व्यवहारोऽस्फुटतामयः तत्र ते आभासा अन्यथा, तथाहि— जात्यन्धस्य बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वलक्षणम् आभासान्तरं नैव अस्ति, दृष्टवतस्तु अन्धीभूतस्य संतमस- स्थितस्य च तात्कालिकं तत् नास्ति अपि तु प्राक्तनमेव बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वम् अनुसन्धत्ते, तस्मात् अर्थावभासस्य केषुचिदपि विकल्पेषु सत्तायां—स्वरूपे विशेषोऽस्ति इति सम्भावना न कर्तव्या, ते हि विकल्पा भाविवस्तुगामिनो वा भविष्यन्निष्ठा भवन्तु वर्तमाननिष्ठा वा अतीतवस्तुविश्रान्ता वा, एतदुक्तं भवति—नीलमिदं पश्यामि, संकल्पयामि, उत्प्रेक्षे, स्मरामि, करोमि, वेद्मि इत्यादौ नीलाभासोऽसौ स्वरूपतोऽनूनाधिकः एवं पश्यामीत्येवं यः पीतादिषु ते पुनराभासाः स्वातन्त्र्येण यदा भगवता संयोज्यन्ते वियोज्यन्ते च तदा अयं स्फुटःवास्फुटत्वादि व्यवहारः, नीलमित्याभासस्य उत्प्रेक्षे इत्याद्याभासान्तरव्यवच्छेदेन पश्यामीति आभासव्यामिश्रणायां स्फुटताव्यवहारः । एवं त्रैकालिकव्यवहारवैचित्र्योपपत्तिः । परमेश्वरस्वरूपान्तर्भूतत्वे पुनराभासानां न कुतश्चित् व्यवच्छेदः —न केनचित् व्यामिश्रणा इति ॥ १-२ ॥ ननु एतत् नीलादिषु उपपद्यताम् यत्र बाह्येन्द्रियव्यापारोऽस्ति, सुखादौ तु तदभावात् कथं रूप में दूसरे आभास को अपेक्षा रखनेवाले उससे मिले हुए, आभास कहीं-कहीं हो जाते हैं, जहाँ पर स्फुटरूप से व्यवहार होता है और अन्य विषयक व्यवहार अन्धकार में रहनेवाला प्रमातृगत विषयक व्यवहार होता है, वही आभास 'मंद' अस्फुट कहलाता है; क्योंकि उसका इन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं है। जैसा कि जन्मना अन्धे व्यक्ति को बाह्येन्द्रिय से प्रत्यक्ष होनेवाला दूसरा आभास नहीं होता, जिसने कभी वस्तु को देख लिया और बाद में अन्धापन आ गया है उसका और अन्धकार में बैठे हुए व्यक्ति का तात्कालिक आभास नहीं होता है, किन्तु वह पूर्व कालिक इन्द्रियों के प्रत्यक्ष का ही अनुसन्धान [ स्मरण ] करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि किन्हीं-किन्हीं विकल्पों की सत्ता में विशेषताएँ होती हैं—ऐसी संभावना नहीं करनी चाहिए, वे विकल्प भविष्यनिष्ठ अतीत वस्तुओं में होते हैं या वर्तमान में रहते हैं या काल में विश्रान्त हो जाते हैं, यह कहा जाता है कि मैं इस नील को देखता हूँ, [ यह भाव सापेक्ष है ] मैं संकल्प करता हूँ [ यह निरपेक्ष है ] मैं उत्प्रेक्षा करता हूँ, मैं स्मरण करता हूँ, मैं जानता हूँ, [ यह बाह्य निरपेक्ष है ] मैं करता हूँ, [ यह क्रिया प्रधान है ] इत्यादि विकल्पों में नीलाभास स्वरूपतः सारा का सारा रहता ही है, इसो प्रकार से मैं देखता हूँ—ऐसा जो पीतादि पदार्थों के आभास हैं उन्हें स्वातन्त्र्यरूप से जब भगवान् संयोजन-वियोजन आदि करते हैं तभी इसमें स्फुटत्व और अस्फुटत्व का व्यवहार होता है। नील उत्प्रेक्षा में आभास का दूसरे आभास के साथ मिला देने पर स्फुटता का व्यवहार होता है—इस प्रकार तीनों कालों में भी व्यवहार की विचित्रता सिद्ध होती है, परमेश्वर के स्वरूप में अन्तर्भूत होने पर तो परमार्थ प्रमाता के आधीन होनेवाले आभासों का किसी से न व्यवच्छेद होता है और न किसी से मेल ही होता है ॥ १-२ ॥ अब शङ्का करते हैं कि नीलादि-पदाथों के आभासों में जहाँ पर बाह्येन्द्रियों के व्यापार हैं, वहाँ पर तो—यह बात घट सकती है, किन्तु सुखादि में तो, बाह्येन्द्रियों के व्यापार न होने १. यह स्फुटक्त्व और अस्फुटक्त्व आदि का व्यवहार भी सकल, प्रलयाकल आदि प्रमाताओं में विश्रान्त होता है किन्तु परमार्थ प्रमाता में नहीं होता, इसी कारण उन्हें परमेश्वर कहा जाता है। २१

१६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-३-४ वैचित्र्यम् ? इत्याशङ्क्याह— सुखादिषु च सौख्यादिहेतुष्वपि च वस्तुषु । अवभासस्य सद्भावेऽप्यतीतत्वात्तथा स्थितिः ॥ ३ ॥ गाढमुल्लिख्यमाने तु विकल्पेन सुखादिके । तथा स्थितिस्तथैव स्यात्स्फुटमस्योपलक्षणात् ॥ ४ ॥ सुखे स्रक्चन्दनादिके च तत्कारणे, दुःखे अहिकण्टकादौ च तद्धेतौ अतीतेऽनागते वा यद्यपि आभासः स एव तथापि अतीतमिदम् अनागतमिदम् इति आभासान्तरेण यतो व्यामिश्रणा अनुभवामीति आभासाच्च यतो व्यवच्छेदः तेन विद्यमानेष्वपि तेषु तस्य प्रमातुः तेन प्रकारेण स्थितिः न भवति, यथा पूर्वम् अभूत् अहम् अधुना सुखी दुःखीति समार्जिततत्तन्निमित्तसामग्रीको वा इति, यदा तु विकल्पेन तानि वस्तूनि गाढम् उल्लिखति तदा पौनःपुन्यविशिष्टसुखतद्धेतू- ल्लेखनाभिधानकारणाभासानुप्रवेशात् आभासान्तरव्यामिश्रणात्मना तेनैव अस्मदुक्तेन प्रकारेण न पुनरन्येन तथा इति सुखी अहमित्यादिकेन स्थितिः भवति इति सम्भाव्यम्, उचितमेतत्— यतस्तदानीं स्फुटत्वाभासमिश्रं सुखाभासम् उपलक्षयति असौ । अतीतग्रहणं भाविनोऽपि उपलक्षणम् ॥ ३-४ ॥ के कारण विचित्रता कैसे बन सकेगी ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— सुखादि में और सुखादि के जनक वस्तुओं में आभास की सत्ता रहने पर भी अतीत होने से,—ऐसी स्थिति होती है ॥ ३ ॥ वर्तमानकाल में तो प्रत्यक्षरूप से दृश्यमान आभास में विकल्प होने के कारण सुख- दुःखादि विकल्पों की जैसी स्थिति रहती है वैसी ही रहेगी; क्योंकि वही स्फुटता प्रत्यक्ष दीखती है॥४॥ जो साध्य सुख है उसमें और उसके कारण [ साधन माला, स्त्री चन्दनादि है उनमें और दुःख में एवं दुःख के [ साधन ] कारण सर्प, कंटकादि में यद्यपि अतीत या अनागत में सुख-दुःख का ही आभास होता है, तो भी यह अतीत है और यह अनागत है;—ऐसा दूसरे आभास से जो भेद होता है—उससे विद्यमान रहने पर भी उन अतीत-अनागत आभासों में प्रमाता का मैं अनुभव करता हूँ; इस प्रकार की स्थिति नहीं बनती है, जैसा कि मैं पूर्व में सुखी-दुःखी था। इस काल में सुखी-दुःखी हूँ या उसके कारणों को प्राप्त किया है—ऐसा होता है। दूसरे श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है—जब विकल्प के द्वारा उन वस्तुओं को बहुत सूक्ष्मता से विमर्श करता है उसी स्थिति में बारम्बार विशिष्ट सुख और दुःख अथवा उसमें हेतु के कथन के कारण आभास के प्रवेश से दूसरे आभास का मिलनारूप उसी हमारे कहे हुए प्रकार से वैसी स्थिति होती है। मैं सुखी-दुःखी हूँ, इस रूप में संभावना हो सकती है और यह उचित भी है; क्योंकि उस समय स्फुटता के आभास से मिला हुआ सुखाभास को वह प्राप्त करता है। यह अतीतकाल का ग्रहण आगामिकाल की स्थिति का भी उपलक्षण है ॥ ३-४ ॥

अ.-१, आ.-८, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १६३ ननु इयता किमुक्तम् भवति—बाह्यरूपतः स्रगादयः सुखादिहेतवो बाह्यजनिताश्च सुखादयः सुख्यहमिति अभिमानहेतवः इति, ततश्च बाह्यत्वाभावे तज्जन्यत्वाभावे च न तथा इति उक्तं स्यात्, तत्र च त एव न केचित्, ततश्च कथमुक्तम् ‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः’ इति—सत्ताया एव अभावात् ? इत्याशङ्क्याह— भावाभावावभासाना बाह्यतोपाधिरिष्यते । नात्मा सत्ता ततस्तेषामान्तराणां सतां सदा ॥ ५ ॥ इह सुखमस्ति मम, दुःखं नास्ति ममेति ये भावाभासा अभावाभासाश्च तेषां बाह्यत्वं नाम आत्मा—स्वरूपं न भवति, नहि सुखमित्यस्य स्वरूपं ‘बाह्यम्’ इति वपुषा भाति, सुखस्य हि सुखमेव स्वरूपम् केवलं बाह्यत्वं नाम आभासान्तरम् ईश्वरेण स्वातन्त्र्यबलादेव यदा तत्र सुखाभासे मिश्रतया भास्यते तदा तत् तस्य उपाधिरूपताम् उपरजकतां विशेषणत्वं गच्छति, ततश्च यथा नीलाभासाभावे उत्पलाभासस्य न किञ्चित् वृत्तं स्वरूपतो, राजाभासाभावे वा पुरुषाभासस्य, तथा बाह्यत्वाभासाभावेऽपि सुखाभासस्य दुःखाभावाभासस्य कान्ताभासस्य च न स्वरूपतः काचन म्लानता इति आन्तराणां सदैव स्थितिः एषाम् ॥ ५ ॥ अब शङ्का करते हैं कि इतने का क्या निष्कर्ष है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि बाह्यरूप जो सुखादि के हेतु स्त्री, चन्दन, माला आदि हैं और बाहर में होनेवाले सुखादि हैं जिनका विमर्श होता कि मैं सुखी हूँ, यह अभिमान का हेतु है जो कुछ होता है, उन सभी के बाह्य हेतुओं के भाव में और उससे पैदा हुए सुखादि हेतुओं के अभाव में वैसा परामर्श नहीं होगा—यही परिणाम निकलेगा । बाह्यत्व के अभाव में यही रहेगा, दूसरा कोई नहीं होगा । तब कैसे कहा आपने कि ‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः, अर्थात् अर्थविभास की सत्ता [ स्वरूप ] में कहीं भी विशेषता क्या नहीं होती ? क्योंकि सुख की सत्ता का अभाव होता है, ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— सुख या सुखाभाव के आभासों में बाह्य हेतु की ही उपाधि होती है । अपने स्वरूप की सत्ता या उसकी आन्तरिक सत्ता ही सदा भासित होती है ॥ ५ ॥ मुझे सुख है, [ यह भाव अवभास है ] और मुझे दुःख नहीं है, [ यह अभाव अवभास है ] ये सुख के भाव अवभास और दुःख के अभाव अवभास हैं। इनमें से किसी का भी बाहर में कोई स्वरूप नहीं होता है । सुख का स्वरूप ‘बाह्य’ किसी स्वरूप से नहीं भासता है, सुख का सुख ही स्वरूप है । बाहर में तो दूसरे आभास भी भूमि में होता, जब ईश्वर के द्वारा स्वातन्त्र्य बल से सुखाभास में मिश्रभाव से भासित होता है तब सुखादि को बाह्यता उपाधिरूप में मिली हुई भासती है और विशेषणता को भी प्राप्त करती है । जैसा कि नीलाभास के अभाव में उत्पलाभास का कुछ स्वरूप नहीं रहता है अथवा राजाभास के अभाव में पुरुषाभास का और बाह्यत्व आभास के अभाव में भी सुखाभास का और दुःखाभाव के आभास का और उसके हेतु कान्ता- भास के स्वरूप में कोई मलिनता नहीं आती; क्योंकि उनमें आन्तरिक सुख और दुःखाभाव की स्थिति सदैव बनी रहती है ॥ ५ ॥

१६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-६ इह अन्तःकरणे बुद्धिदर्पणात्मनि नोलादीनामवभासानाम् आन्तरत्वमप्यस्ति—अन्तःकरण- मध्येभवत्वात्, बाह्यत्वमपि ग्राह्यतारूपं—प्रमातुः विच्छेदेन अवभासात्, बाह्यत्वं च केवलं बाह्यप्रत्यक्षता, अत्र च अवस्थाद्वयेऽपि अर्थक्रियां अमी कुर्वन्त्येव, अन्ततो ज्ञानं स्वविषयम् । यत् पुनः प्रमातृतादात्म्यलक्षणम् आन्तरत्वं, तत्र अमो कस्मात् न काञ्चित् अर्थक्रियां विदधीरन् ? इत्याशङ्क्याह— आन्तरत्वात्प्रमात्रैक्ये नैषां भेदनिबन्धना । अर्थक्रियापि बाह्यत्वे सा भिन्नाभासभेदतः ॥ ६ ॥ प्रमात्रैक्य इति—तन्निमित्तकं यत् आन्तरत्वं तस्मात् हेतोः, एषाम् आभासानाम् अर्थक्रिया न काचित् अस्ति, सा हि अर्थक्रिया भेदे सति भवति, स हि नीलाभासः पीताभासात् यतो भिद्यते यतश्च प्रमातुर्भिद्यते ततः स्वसाध्यां नियतां भिन्नाम् अर्थक्रियां तस्य प्रमातुः कुर्यात्, न च एष तदा भेदोऽस्ति—प्रमात्रैक्यात्, सा हि अर्थक्रियाभासभेदनियता, तथा च कान्ताभासस्य बाह्यत्वेऽपि सति आभासान्तरस्य आलिङ्गनलक्षणस्य व्यपगमे दूरीभवति, इयम् इति च आभासान्तरस्य उपगमेऽन्यैव प्राक्तनाह्लादविपरीता दृश्यते अर्थक्रिया, अत आभासभेदाभावः — यतः प्रमात्रैक्यकृते बुद्धिरूप दर्पणात्मक अन्तःकरण में नीलादि-पदार्थों के अवभासों की आन्तरिक सत्ता भी रहती हैं—क्योंकि वे अन्तःकरण में विद्यमान रहने के कारण ही भासते हैं, बाह्यता भी इदन्ता के विभाग से ग्रहण किये जानेवाले प्रमाता के रह-रहकर भासित होने से होती है और बाह्यत्व तो केवल बाह्य-इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होने का नाम है, यहाँ पर दोनों अवस्थाओं में ये नीलादि आभास अर्थक्रिया को करते रहते ही हैं तब फिर अर्थक्रियाकारिता क्या वस्तु है ? इन आभासों का स्वविषयक ज्ञान ही तो है। जो कि प्रमाता के साथ में तादात्म्यरूप से रहना आन्तरत्व कहलाता है, वहाँ पर ये नीलादि-पदार्थ क्यों नहीं कोई अर्थक्रिया करते रहें ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— प्रमाता के ऐक्यरूप में अन्तःस्थित होने के कारण पदार्थों का भेद नहीं होता है । बाहर में अर्थक्रिया भी आभास के भेद से ही भिन्न-भिन्न रूपों में भासती है ॥ ६ ॥ ‘प्रमात्रैक्य’—इसका अर्थ यह है कि प्रमाता निमित्तक अर्थात् कारणक जो आन्तरत्व है— उसी हेतु से समझना चाहिये, इन आभासों की कोई अर्थक्रिया नहीं है; [ अर्थक्रिया का आशय यह है कि अर्थ अशुद्ध प्रयोजन उसकी जो क्रिया निष्पत्ति ] क्योंकि वह अर्थक्रिया तो भेद रहने पर ही भासती है, नीलाभास पीताभास से भिन्न है; क्योंकि वह प्रमाता से भिन्न है इसलिए वह इस प्रमाता की अर्थक्रिया को कैसे करेगा ? प्रमाता के तादात्म्यरूप आन्तरत्व में यह भेद नहीं रहता; उसमें प्रमाता की ऐक्यरूपता होने के कारण वह अर्थक्रिया आभास तो भेदमूलक ही होती है और कान्ताभास के बाहर होने पर भी आलिङ्गनरूप अन्य आभास तो हटाने से दूर हो जाता है, यह अर्थक्रिया तो दूसरे आभास के आने पर पूर्व आह्लाद से भिन्न दीखती है, १. जिसको आर्य बौद्धों ने कहा है कि अर्थ क्रियाकारित्व हो सत्त्व है, प्रमाता के रूप से पदार्थों की सत्ता मानी है, इन पदार्थों की बाह्यरूप से कोई स्थिति नहीं होती है। ये आभास प्रमाता के आभ्यन्तर में रहने से बराबर कहे गये हैं, इस समय उसमें भी दूसरी विशेषता को अपने सिद्धान्त में निरूपण करते हुए उन लोगों के प्रति आशङ्कापूर्वक कहते हैं ‘इह’ इत्यादि से ।

अ.-१, आ.-८, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६५ आन्तरत्वे तस्मात् न अर्थक्रिया इति, अर्थक्रियाभासोऽपि च आभासान्तरमेव इति अर्थक्रिया- कारित्वमपि न भावानां सत्त्वम्, येन तदभावे स्वरूपत एव अभावः स्यात् ॥ ६ ॥ ननु च बाह्याभासव्यतिभेदनकाले आन्तराभासो विरोधात् विच्छिन्न इति कथम् इदम् उक्तम् ‘आन्तराणां य आभासः स सदा’ इति ? एतत् परिहरति— चिन्मयत्वेऽवभासानामान्तरैव स्थितिः सदा । मायया भासमानानां बाह्यत्वाद्वहिरप्यसौ ॥ ७ ॥ इह अवभासानां सदैव बाह्यताभासतदभावयोः अपि अन्तरैव प्रमातृप्रकाश एव स्थितिः, यत एते चिन्मयाः, अन्यथा नैव प्रकाशेरन् इति उक्तं यतः, यदा तु मायाशक्त्या विच्छेदनाव- भासनस्वातन्त्र्यरूपया बाह्यत्वम् एषाम् आभास्यते तदा तत् अवलम्ब्य अवभासमानानाम् असौ स्थितिः बहिरपि अन्तरपि, नायम् अन्तराभासो बाह्यत्वस्य विरोधी प्रत्युत सर्वभासभित्ति- भूतोऽसौ, तत् कथं विरोधः ? इति युक्तमुक्तम्—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ इति ॥ ७ ॥ ननु बाह्यत्वे सति अर्थक्रिया, तच्च बाह्येन्द्रियगम्यत्वम्, न च विकल्पोल्लिखितानां तत् इसीलिए पूर्व आभास के भेद का अभाव रहता है—जिस हेतु से प्रमाता के आन्तर में ऐक्यरूप होने से अर्थक्रिया नहीं होती और अर्थक्रिया का आभास भी नहीं होता है किन्तु दूसरा ही आभास रहता है। इस प्रकार अर्थक्रियाकारिता भी पदार्थ-भावों की सिद्धि नहीं करती है, जबकि उसका अभाव हो जाने पर अपने आप ही दूसरे का अभाव हो जायेगा ॥ ६ ॥ अब शङ्का उठाते हैं कि बाहरी आभास के संभेदन काल में विरोध होने के कारण [ एक का ही आन्तरत्व और बाह्यत्वरूप न होने से ] आन्तराभास विच्छिन्न होता है, यह आपने कैसे कहा है ? ‘आन्तराणां य आभासः स सदा [ ......सत्ता त अस्तेषामान्तराणां सतां सदा इत्यत्र ] इसका परिहार करते हैं— आभासों के चिन्मय प्रमाता में लीन हो जाने पर निरन्तर आन्तर स्थिति बनी रहती है। माया के द्वारा भासित होने पर बाहर में आ जाने के कारण बाह्यस्थिति भी रहती है ॥ ७ ॥ अवभासों के बाहर की ओर भासना अथवा उसके अभाव का भासना ये दोनों भीतर ही प्रमाता के प्रकाश में रहते हैं, जिससे ये भाव में और अभाव में भी चिन्मय ही रहते हैं [ चिन्मय- रूप न होने से प्रकाशित नहीं हो सकता है ‘नाप्रकाशः प्रकाशते’ ] अन्यथा इनका प्रकाश ही नहीं होगा; क्योंकि हमने इस विषय में पहले ही कह दिया है, किन्तु जब माया-शक्ति के द्वारा विच्छेदन अवभास में स्वातन्त्र्यरूप से रहता है उसके माध्यम से ही इसका बाहर में भासित होना संभव है, तब उस समय बाह्यत्व का अवलम्बन करके अवभासों की स्थिति बाहर और भीतर दोनों में भी रहती है, यह अन्तराभास बाह्यत्व का विरोधी नहीं है प्रत्युत प्रमाता के प्रकाश में विश्रान्ति को पा लेने के कारण सब आभासों का मूल अन्तराभास होता है, इसलिए वह कैसे विरोध करेगा ? इसी कारण उचित ही कहा है—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ अर्थात् आन्तर आभासों की सत्ता सर्वदा बनी रहती है ॥ ७ ॥ अब शंका करते हैं कि बाह्यता का ज्ञान रहने पर ही पदार्थों की अर्थक्रिया बनती है और बाह्यत्व का ज्ञान बाह्येन्द्रियों के द्वारा ही हो सकता है, इस प्रकार विकल्पों से होनेवाले

[ १६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-८-९ संभवति, तत् कथम् अमीषाम् अर्थक्रिया स्यात्, दृश्यते च विकल्पोल्लिखितः पिशाचादिः त्रासा- दिविधायी ? इत्याशङ्क्याह— विकल्पे योऽयमुल्लेखः सोऽपि बाह्यः पृथक्प्रथः । प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यं ततो भेदो हि बाह्यता ॥ ८ ॥ विमर्शविशेषरूपे विकल्पज्ञाने य उल्लिख्यमानः कान्ताचोरादिः अर्थः सोपि बाह्यः, न केवलं बहिरवलोक्यमानः, यस्मात् सोऽपि प्रमातुः सकाशात् पृथगेव प्रथते 'अयमिति' यच्च प्रमातरि अहमित्येव विश्रान्तत्वं, तत् आन्तरत्वम्, अन्तरिति निकटम्, तच्च किंचित् अपेक्ष्य, अपेक्षणीयश्च सर्वत्र प्रमातैव अपेक्षणीयान्तराभावे, ततश्च प्रमातरि निकटं तादात्म्यं प्राप्तमेव इति, ततो यत् भिन्नं तत् बाह्यमेव इति युक्ता—उल्लेखस्यापि अर्थक्रिया ॥ ८ ॥ ननु कुम्भकारादिव्यापारेण घटादेः अस्तु बाह्यत्वम्, अन्तःकरणगोचरस्य तु किं कृतं तत् ? इत्याशङ्क्य आह— उल्लेखस्य सुखादेश्च प्रकाशो बहिरात्मना । इच्छातौ भर्तुरध्यक्षरूपोऽक्षादिभुवां यथा ॥ ९ ॥ पिशाचादि का ज्ञान संभव नहीं हो सकता है; क्योंकि बाह्येन्द्रियों से पिशाचादि का ज्ञान होना असंभव है, तब विकल्पों से होनेवाले पिशाचादि के ज्ञान से अर्थक्रिया कैसे होगी ? और विकल्पों से उठे हुए पिशाचादि त्रास आदि देनेवाले देखे जाते हैं—ऐसी आशंका कर कहते हैं— जो यह विकल्प में उल्लेख होता है, वह भी पृथक्-पृथक् फैलनेवाला बाहरी है । एक प्रमाता में होनेवाला अन्तर का ही प्रकाश होता है; क्योंकि उससे भिन्न होना ही बाहरी प्रकाश है ॥ ८ ॥ स्थूल विमर्श के विशेषरूप विकल्पज्ञान में जो कहे गये कान्ता, चोरादि पदार्थों के अर्थ [ आकार ] हैं वे भी बाहरी हैं, केवल बाहर में देखा भी नहीं जाता है; क्योंकि वह तो बाहर की चीज है, जिस कारण से वह भी प्रमाता से भिन्न ही भासता है । इसलिए 'अयमिति' ऐसा कहा जाता है इस प्रकार प्रमाता में अहं शब्द से विश्रान्त रहता है, उसे आन्तर में रहनेवाला कहा जाता है । यहाँ पर अन्तर शब्द का 'समीप' निकट अर्थ है, वह किसी को अपेक्षा करके होता है और अपेक्षणीय वस्तु-पदार्थ सर्वत्र प्रमाता ही माना जाता है; क्योंकि कोई दूसरा अपेक्षणीय नहीं रहता है, इसलिए प्रमाता के समीप तादात्म्य प्राप्त किये ही रहता है । इसलिए उससे जो भिन्न है, वह बाहरी है—यह अर्थक्रिया का उल्लेख युक्त ही है ॥ ८ ॥ अब शंका करते हैं कि कुंभकार के व्यापार के द्वारा उत्पन्न होनेवाले घटादि का बाहरी- पन भले ही हो, किन्तु अन्तःकरण में होनेवाले जो नील-सुखादि है, उसे किस हेतु द्वारा आपने बाहर में मान लिया है ? ऐसी आशंका कर कहते हैं— जो अन्तःकरण में विषय नील-सुखादि का बाहर प्रकाश आता है वह ईश्वर की इच्छा से होता है । जैसा कि चक्षु-इन्द्रियों से होनेवाले विषयों का प्रत्यक्ष प्रकाश बाहर में होता है ॥ ९ ॥ १. इच्छात्तः इसमें तसिलः सार्वविभक्तिकत्वात् तृतीयार्थे तसिः तृतीया विभक्ति में तसिल् प्रत्यय हुआ है—ऐसा अर्थ अभिव्यक्त होता है । २. अक्षादिभूवां विषयाणाम् यथा प्रकाशः । अक्षादि-इन्द्रियों के विषयों का जैसा प्रकाश होता है ।

अ.-१, आ.-८, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६७ अन्तर्विकल्पप्रतिबिम्बितस्य नीलादेः यो बहिरात्मना प्रमातृविच्छिन्नेन स्वभावेन प्रकाशः, स भर्तुः अन्तराभासान् बिभ्रतो बहिःसृष्टिं च पुष्णतः ईश्वरस्यैव इच्छया, यथैव चक्षुरादिविषय- भूतानां प्रत्यक्षज्ञानशब्दवाच्यो बाह्यात्मना प्रकाशो नीलादीनाम् । एतदुक्तं भवति—कुम्भकार- व्यापारो नाम परमार्थतः ईश्वरेच्छैव तदवभासितकायस्पन्दपर्यन्ता, न पुनरन्यः कश्चन सः, ततश्च यथा ईश्वरेच्छया प्रकाशात् अबहिर्भूता अपि नीलाद्या बाह्यकरणगोचरीभूताः कल्पितात् प्रमातुः विच्छिन्नरूपेण बाह्यत्वेन भासन्ते, तथा अन्तःकरणगोचरीभूता अपि—इति को विशेषः । सुखदुःखप्रायास्तु भरताद्युक्तरूपाः स्थायिव्यभिचारिरूपा रतिनिर्वेदादयोऽन्तःकरणैकगोचरा बहि- रात्मना भान्ति, संकल्पेषु यद्यपि क्षेत्रज्ञस्यैव स्वातन्त्र्यम् तथापि चित्परमार्थताया न्यग्भावयितुम् अशक्यत्वात् ईश्वरस्यैव तत् वस्तुतः, यथोक्तं ग्रन्थकृतैव— 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ बुद्धिरूपी भूमि में प्रतिबिम्बित नील-सुखादि का जो बाहर प्रमातृ-विच्छिन्न स्वभाव से प्रकाश होता है, वे भर्ता अर्थात् परमेश्वर की इच्छा से ही अन्तराभास पदार्थ बाहर में प्रकाशित होते रहते हैं, [ 'भर्तुः' भर्ता शब्द 'डुभृञ्' 'धारण-पोषणयोः' धातु के अर्थ में है और उससे ही निष्पत्ति हुई है ] जैसा कि चक्षु-इन्द्रिय आदि के विषय होनेवाले नील-सुखादि पदार्थ के प्रत्यक्ष-ज्ञान शब्द के वाच्य बाह्यरूप से होनेवाला प्रकाश है । यह कहा गया है कि कुंभकार का व्यापार वस्तुतः परमेश्वर की इच्छा से ही होता है । वह इच्छा कैसी होती है ? ईश्वर की इच्छा से अवभासित विशिष्ट बुद्धि-प्राण-काय इत्यादि के स्पन्दन से मृत्पिण्ड-दण्ड-चक्रादि के अवभासरूप ये सारे के सारे हैं—ऐसी ईश्वर की इच्छा है जिससे कि दण्ड, चक्रादि के व्यापार से घट की उत्पत्ति हो, इससे अतिरिक्त कोई दूसरा व्यापार वहाँ पर नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर की इच्छा के द्वारा होनेवाले प्रकाश से बाहर में नहीं जानेवाले नील-सुखादि जो बाह्येन्द्रियों के विषय हैं, मायीय कुंभकारादि से कल्पित प्रमाता से विच्छिन्न होकर बाहर में भासते हैं, इसी प्रकार अन्तः- करण के विषयरूप होकर भी भासते हैं। इन दोनों में कौन सी विशेषता है ? क्योंकि इन दोनों का भासना तो बराबर एक सा ही है। सुख-दुःखादि तो प्रायः भरतमुनि से कहे गये रति और वैराग्यादि स्थायी व्यभिचारी भावों के रूप में उत्पन्न होते हैं और वे अन्तःकरण के ही विषय होकर बाहर में भासते हैं, यद्यपि संकल्प-विकल्पों में क्षेत्रज्ञ-जीव की ही स्वतन्त्रता रहती है—तो भी, चेतन की परमार्थता को दबाने के लिए, असमर्थ होने के कारण, वस्तुतः उस ईश्वर को ही स्वतन्त्रता रहती है । जिसके विषय में ग्रन्थकार ने स्वयं कह दिया है कि—यद्यपि प्राण और पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव में पदार्थों की स्थिति रहती है । फिर भी परमात्मा में उसकी स्थिति १. धारण एवं पोषण अर्थ में 'डुभृञ्' धातु से निष्पन्न भर्तृ शब्द है इसका षष्ठी विभक्ति में भर्तुः = ईश्वरस्य रूप बनता है । २. रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा । जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः ॥ नाट्य-शास्त्र के प्रणेता भरत मुनि ने कहा है कि रति, हास्य अर्थात् मनोविनोद, शोक, क्रोध, उत्साह, साहस, घृणा और विस्मय ये सब स्थायी भाव हैं ।

३. आगम अधिकार: ३६ तत्त्व, सृष्टि-प्रलय एवं आगमिक प्रमाण-व्यवस्था

१६८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-८, का.-१०-११ तदात्मनैव तस्य स्यात्कथं प्राणेन यन्त्रणा।' इति। यत्र तु अनिच्छोरेव क्षेत्रज्ञस्य स्वरसवाहिव्या- क्षेपसारा सांकल्पिकी सृष्टिः तत्र स्फुटः ईश्वरस्यैव व्यापारः, तस्मात् सांकल्पिकानामपि बहिर्भावे परमेश्वरેચ્છैव हेतुः—इति सिद्धान्तः ॥ ९ ॥ आधुना पूर्वोक्तम् ऐक्यं माहेश्वर्यं च निगमयति— तदैक्येन विना न स्यात्संविदां लोकपद्धतिः । प्रकाशैक्यात्तदेकत्वं मातैकः स इति स्थितम् ॥ १० ॥ स एव विमृशत्त्वेन नियतेन महेश्वरः । विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ॥ ११ ॥ यत् एतत् पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन उपपादितम्, तत् इति—तस्मात् हेतोः, संविदां—ज्ञानानाम् ऐक्येन विना, लोकपद्धतिः लोकमार्गः—सर्वो व्यवहारो न संभवेत्, संभवति च अयम्, तस्मात् ऐक्यम् आसांम्। न चैतत् दुर्घटम् यतो—विषयप्रकाश एव संवित् उच्यते, केवलं विषयोपराग- महिम्ना बहिर्मुखतया नीलप्रकाशोऽन्यः, पीतप्रकाशश्चान्यः, परमार्थतस्तु प्रकाशस्य देशकालाकार- संकोचवैकल्यात् एकत्वमेव इति एक एव प्रकाशोऽन्तर्विश्रान्तः, स एव च प्रमाता उच्यते इति स्थितम् इदानीम् उपपत्तितः, न च अस्य असौ प्रकाशलक्षणः स्वात्मा नीलाद्युपरागश्च परामर्शन- बनी रहती है; क्योंकि वह जीव उसमें परमात्म-स्वरूप से ही रहता है, अन्यथा जीवों के प्राण से उसका नियन्त्रण होना असम्भव है। जहाँ पर नहीं चाहनेवाले क्षेत्रज्ञ की अपने होनेवाले विक्षेप-मूलक संकल्प जन्य सृष्टि होती है उसमें प्रत्यक्षरूप से ईश्वर का ही व्यापार रहता है, इस कारण संकल्प द्वारा होनेवाले प्रमाता से बाहरी व्यवहारों में ईश्वर की इच्छा ही हेतु होती है—यह सिद्धान्त है ॥ ९ ॥ अब पूर्वोक्त एकता का और महेश्वर की महिमा का उपसंहार करते हैं— ग्रन्थ में प्रतिपादित एकता के बिना संविद्रूप ज्ञानों का लोक-व्यवहार नहीं हो सकता है। प्रकाश को एकता से ज्ञानों को एकता है और वह एक-प्रकाश प्रमाता है—यह सिद्ध हुआ ॥१०॥ वही महेश्वर नियत विमर्श से लोकमार्ग को चलाता है; क्योंकि देव का शुद्ध ज्ञान और क्रिया ही विमर्श है ॥ ११ ॥ यह जो पूर्वोक्त ग्रन्थ से सिद्ध किया है, उसी हेतु से ज्ञानों का ऐक्य नहीं होने के कारण सब लोक-व्यवहार नहीं सम्भव हो सकता है, किन्तु यह व्यवहार होता हुआ दिखायी देता भी है, इसीलिए मानना पड़ेगा कि ज्ञानों का ऐक्यरूप है और यह ऐक्य कोई दुर्घट नहीं है, जो कि न हो सके। क्योंकि विषय प्रकाश ही संवित् कहा जाता है, केवल विषय के मिले रहने से बहिर्मुख होकर नीलप्रकाश अन्य है और पीतप्रकाश अन्य है—ऐसा बोध हुआ करता है। परमार्थरूप से तो प्रकाश का देश, काल और आकार के संकोच न होने से एक ही रूप रहता है। वही प्रकाश अन्तःकरण में विश्रान्त होने से अहं शब्द का वाच्य है, वही प्रकाश प्रमाता है—ऐसा कहा जाता है। यही उपपत्ति से इस समय दृढ़ सिद्ध हो गया, [ 'न च' इससे द्वितीय श्लोक की व्याख्या करते हैं ] प्रमाता का यह प्रकाशरूप अपना स्वरूप नीलादि से उपरक्त होकर भी परमार्थ शून्य

अ.-१, आ.-८, का.-१०-११ ] विमर्शिनीटोकोपेत [ १६९ शून्य एव आस्ते—स्फटिकमणेरिव, अपि तु सदैव विमृश्यमानरूपः, इति विमृशद्रूपत्वम्— अनवच्छिन्नविमर्शता अनन्योन्मुखत्वन् आनन्दैकघनत्वमेव अस्य माहैश्वर्यम्, स एव हि अहं- भावात्मा विमर्शो, देवस्य—क्रीडादिमयस्य, शुद्धे—पारमार्थिक्यौ ज्ञानक्रिये, प्रकाशरूपता ज्ञानं, तत्रैव स्वातन्त्र्यात्मा विमर्शः क्रिया, विमर्शश्च अन्तःकृतप्रकाशः इति विमर्श एव परावस्थायां ज्ञानक्रिये, परापरावस्थायां तु भगवत्सदाशिवभुवि इदन्तासामानाधिकरण्यापन्नाहंताविमर्शस्व- भावे, अपरावस्थायां च मायापदे इदंभावप्राधान्येन वर्तमाने इति विशेषः। सर्वथा तु विमर्श एव ज्ञानं, तेन विना हि जडभावोऽस्य स्यात् इति उक्तम् 'स एव च क्रिया' इति—भाविनः क्रियाधिकारस्य उपक्षेपं करोति इति शिवम् ॥ १०-११ ॥ आदितः ॥ ८९ ॥ इति श्रीमन्माहेश्वराचार्यवर्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां, श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यव्याख्योपेतायां माहैश्वर्यनिरूपणाख्यमष्टममाह्निकम् ॥ ८ ॥ ही रहता है [ अब वैधर्म्य से दृष्टान्त दिया जाता है ] जैसा कि स्फटिकमणि विमर्श शून्य रहती है इसलिए जडरूप मानी जाती है, अपितु यह सदैव विमृश्यमानरूप रहता है और अपने को विमर्श करता हुआ—निरन्तर अनवच्छिन्नरूप से विमर्श करने के कारण अपने स्वरूप में ही लीन रहना तथा आनन्दघन में बने रहना इसको महेश्वरता है। वही परमेश्वर का अहंभावरूप विमर्श है, जो कि क्रीडादि में निमग्न रहते हैं, उनका शुद्ध पारमार्थिक ज्ञान और क्रिया हैं प्रकाशरूप ज्ञान है, उन्हीं में विमर्शात्मक स्वातन्त्र्यरूपी क्रिया भी रहती है, तब फिर, विमर्श क्या वस्तु है ? विमर्श को ही अन्तःकरणकृत प्रकाश करते हैं और वही आगे चल कर परमशिव अवस्था में ज्ञान और क्रिया हो जाता है। शिव अवस्था एवं जीव अवस्था तो भगवान् सदाशिव की भूमि में 'इदन्ता' से मिली हुई 'अहन्ता' इन दोनों में समानरूप से एकतापूर्वक होकर रहती है और वही अपर-जीवावस्था आगे चल कर मायामय पद में 'इदन्ता' की प्रधानता को ग्रहण कर वर्तमानरूप में रहती है। यही इसकी विशेषता है। इसलिए सब प्रकार से विमर्श ही ज्ञान है, यदि वह न हो तो यह प्रकाश भी जडरूप ही हो जायेगा, इसीलिए कहा है कि 'स एव च क्रिया' वही क्रिया है—इस प्रकार आगे होनेवाले क्रियाधिकार का प्रसंग भी सूचित होता है ॥ १०-११ ॥ अष्टम आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता प्रथमज्ञानाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति प्रथमः ज्ञानाधिकारः समाप्तः २२

अथ द्वितीयः क्रियाधिकारः अथ द्वितीये क्रियाधिकारे क्रियाशक्तिनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् वितत¹विशदस्वात्मादर्शे स्वशक्तिरसोज्ज्वलां प्रकटयति यो मातृस्वांशप्रमेयतातद्वये । बहुतरभवद्भङ्गीभूमिं क्रियासरितं परां प्रकटयतु नः श्रीमान्गौरीपतिः² स ऋतं परम् ॥ १ ॥ यत्र³ विश्रान्तिमासाद्य चित्रं क्रीडाविजृम्भितम् । क्रियाशक्तिः प्रियात्यन्तं दर्शयेत्तं स्तुमः शिवम् ॥ २ ॥ अथ क्रियाशक्तिस्वरूपं वितत्य निर्णेतुम् अधिकारान्तरम् आरभ्यते, तत्र श्लोकाष्टकेन ‘अत एव………’ इत्यादिना ‘यदवभास्यते………’ इत्यन्तेन परमेश्वरे परमार्थतोऽक्रमा क्रिया, परिमितसांसारिकप्रमातृगतक्रमावभासनयोगात् सक्रमापि च, इति—उपपाद्यते, तथाहि श्लोकेन उक्तपूर्वपक्षप्रतिक्षेपः । ततः श्लोकेन सक्रमत्वाक्रमत्वविवेकः । ततः श्लोकत्रयेण क्रमस्वरूपनिरू- जो परम शक्तिरूप अम्बिका है, उसका स्वामी परमेश्वर बड़ा ही व्यापक स्वरूपवाला है; जो कि अपने आदर्शरूप दर्पण में स्वशक्तिरूपी रस से उज्ज्वल विविध प्रकार की भूमिका को प्रकट करता है, क्रियारूपी उत्कृष्ट सरिता को प्रमाता अपने ही अंश से उद्भूत प्रमेय तटों में बहाता है, वही भगवान् परमेश्वर उस सत्य को हम लोगों के प्रति प्रकट करें ॥ १ ॥ जिसमें विश्रान्ति लेकर यह क्रीडा-क्षेत्ररूप जगत् विचित्र होकर फैलता है; जिसको क्रिया- शक्ति अत्यन्त प्रिय है उसका दर्शन करावें, हम उस शिव की स्तुति करते हैं ॥ २ ॥ अब क्रिया-शक्ति के स्वरूप का विस्तारपूर्वक निर्णय करने के लिए दूसरा क्रिया अधिकार आरम्भ किया जाता है, आठ श्लोकों से ‘अत एव ……’ इत्यादि से लेकर ‘यदवभास्यते……’ यहाँ तक । परमेश्वर में वस्तुतः क्रिया अक्रमरूप से रहती है और परिमित सांसारिक प्रमाताओं में भेदतः क्रम से युक्त भी हो जाती है, इसीको सिद्ध करते हैं, देखिये—एक श्लोक से कहे हुए पूर्वपक्ष का निराकरण किया जायेगा । इसके पश्चात् एक श्लोक से सक्रमत्व का और अक्रमत्व का विचार किया जायेगा । अनन्तर तीन श्लोकों से क्रम के स्वरूप का निरूपण होगा । इसके १. ‘वितत’ इत्यादि से स्तुति के ब्याज से अधिकार्थ सूचित हो रहा है । विमर्श-शक्ति स्वातन्त्र्यरूप का रस चमत्कार के द्वारा उज्ज्वल स्वरूप है । २. वह परा-शक्तिरूप अम्बिका का ईश्वर अर्थात् पति हम लोगों के लिए परम सत्यप्रकाश [ अन्तःकरण में ] प्रकट करें । ३. यत्र = अक्रमपूर्वक क्रिया चिद्रूप में रहती है । इस श्लोक से आह्निक का अर्थ सूचित होता है ।

अ.-२, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७१ पणम् । ततः श्लोकद्वयेन सक्रमत्वाक्रमत्वयोर्विषयविभागः, विषयविभागे च सति वस्तुतः एकत्रैव तयोः विश्रान्तिः, इति श्लोकेन निरूप्यते, इति—तात्पर्यम् आह्निकस्य । श्लोकार्थस्तु निरूप्यते—तत्र पूर्वोक्ते ज्ञानशक्तिसमर्थनोपयोगिनि प्रमेये सिद्धे प्रमेयान्तरमपि अयत्नतः सिद्धम्, इति अधिकरणसिद्धान्तदिशा दर्शयति— अत एव यदप्युक्तं क्रिया नैकस्य सक्रमा । एकेत्यादि प्रतिक्षिप्तं तदेकस्य समर्थनात् ॥ १ ॥ यत् तावत् उक्तं—ज्ञानान्येव अनुभवविकल्परूपादिभिन्नानि न तेषाम् आश्रयोऽस्ति कश्चित्, संस्काराच्च स्मृतिः सिद्धा, ज्ञानं च जडं चेत् न अर्थस्य प्रकाशः, अजडं चेत् देशकाल- सङ्कोचवैकल्यात् आत्मतत्त्वात् अभिन्नमिति, तत् तावत् प्रतिक्षिप्तं—भिन्नानामनुभवादीनामनु- पपत्तेः वितत्य दर्शितत्वात् । न च संस्कारमात्रात् स्मृतिः—इत्येतदप्युक्तम्, अजडमेव च बाद दो श्लोकों से सक्रमत्व और अक्रमत्व के विषय का विभाग किया जायेगा और विषय का विभाग हो जाने पर परमार्थतः एक जगह ही दोनों की विश्रान्ति हो जाती है—यह एक श्लोक से निरूपण किया जायेगा । इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । किन्तु अब श्लोक के अर्थ का निरूपण किया जाता है—पूर्वं में कही हुई ज्ञान-शक्ति का समर्थन एवं उसमें उपयोगी प्रमेय तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर दूसरा प्रमेय भी तो बिना यत्न से ही सिद्ध हो जाता है, इस अधिकरण सिद्धान्त के अनुसार अर्थात् एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरा स्वयं सिद्ध हो जाता है । जैसा कि परमाणु का नित्यत्व, इसी बात को दिखाते हैं— इसलिए जो भी कहा गया है, इस विषय में कि एक की क्रिया क्रमवाली नहीं होती, एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरे का स्वयं सिद्ध हो जाना इत्यादि दिखाने से ॥ १ ॥ जब कि पहले कहा गया है कि अनुभव-विकल्परूप से संतानरूप ज्ञान भिन्न-भिन्न हैं उनका कोई आश्रय नहीं है । संस्कार से स्मृति की सिद्धि होती है और यदि ज्ञान को जडरूप मानोगे तो अर्थ का प्रकाश नहीं होगा, यदि अजडरूप कहते हो तो उसमें देश-काल का सङ्कोच न होने से वह आत्मतत्त्व से अभिन्न हो जाता है । पहले वह पूर्वपक्ष में आ गया है इसलिए भिन्न-भिन्न अनुभवों की उपपत्ति नहीं बैठती है, इसको विस्तारपूर्वक दिखा दिया है । इस प्रकार संस्कार मात्र से १. प्रमेय का विचार करने पर तो ज्ञान-शक्ति का समर्थन उस पति प्रमाता में अयत्न सिद्ध हो जाता है । २. एक प्रमाता में सिद्ध हो जाना । ३. जिस एक प्रमाता की पुष्टि हो जाने से ज्ञान-शक्ति का समर्थन हो जाता है और उसी से क्रिया-शक्ति की भी पुष्टि हो जाती है । ४. अधिकरण सिद्धान्त उसी का नाम है जो एक अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उसके अनुयायी दूसरे अर्थ की भी सिद्धि हो जाती है । जैसे परमाणु की सिद्धि हो जाने पर उसका नित्यत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है । ५. अनुभव विकल्परूप से सन्तानवृत्ति ज्ञानों को ही प्रकाशित करती है । ६. संस्कार से ही स्मृति की सिद्धि होती है । इससे अतिरिक्त स्मृति में कोई हेतु नहीं है । यहाँ पर ‘चकार’ शब्द का ‘एव’ अर्थ है ।

१७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-१ असंङ्कुचितरूपं ज्ञानं-तत्सवातन्त्र्यावभासितज्ञेयोपरागवशात् तु अस्य सङ्कोचावभास इत्यपि दर्शितं यतः, न केवलम् अतो हेतुकलापात् ज्ञानशक्तिचोद्यानि निवारितानि, यावत् क्रियाशक्ति- विषयाण्यपि दूषणानि, अत एव हेतुजातात् अपसारितानि, इति अपिशब्दार्थः । एका क्रिया क्रमिका कथम् आश्रयस्य एकस्वभावत्वे सति घटते ? इति यदुक्तं, तथा ‘तत्र तत्र स्थिते........’ इति, ‘द्विष्ठस्योनेकरूपत्वात् ........’ इति च यदुक्तं तदपि प्रतिक्षिप्तमेव, यत इयति पूर्वपक्षे इयदेव जीवितम्-एकमनेकस्वभावं कथं स्यात् इति । तत्र च उक्तं चित्स्वभावस्य दर्पणस्येव एकतानप- बाधनेन आभासभेदसम्भवे क इव विरोध इति, तस्मात् प्रत्यभिज्ञानबलात् एकोऽपि असौ पदार्थात्मा स्वभावभेदान् विरुद्धान् यावत् अङ्गीकुरुते तावत् ते विरोधादेव क्रमरूपतया निर्भास- मानाः तमेकं क्रियाश्रयं सम्पादयन्ति इति, ततश्च सम्बन्धादीनामपि उपपत्तिरिति ॥ १ ॥ ननु च क्रमिकत्वमेव क्रियायाः स्वरूपं, क्रमश्च कालकलनाहीने चिन्मये भगवति नास्ति; इति कथम् अस्य सा भवेत् ? इत्याशङ्कयाह— ही स्मृति नहीं हो जाती है, इसे भी हम कह आये हैं; इसीलिए ज्ञान अजड एवं असंङ्कुचितरूप है उसकी स्वतन्त्रता अवभासित होनेवाले ज्ञेय के संमिश्रित हो जाने के कारण इसके संकोच का अवभास मालूम होता है; क्योंकि यह भी दिखा दिया है, इसलिए न केवल हेतु समुदाय के द्वारा ज्ञान-शक्ति से प्रकाशित होनेवाले पदार्थों का निवारण कर दिया है, किन्तु क्रिया-शक्ति के विषयों में भी दोष दिया है, इसलिए हेतु समूह से हटा दिया गया, ‘अपि’ शब्द का यह भी अर्थ होता है । एक क्रिया क्रमवाली कैसे हो सकती है ? आश्रय की एक स्वभावता रहने पर घटती है । इस विषय में कहा गया है, ‘तत्र तत्र स्थिते·····।’ इत्यादि बाते कही हुई हैं; क्योंकि दो वस्तुओं में जो रहेगा वह अनेकरूपों में रहेगा । इसका भो खण्डन हो चुका है, पूर्वपक्ष का इतना ही जीवन है—जो एक है वह अनेक स्वभाववाला कैसे होगा ? इस प्रकार वहाँ पर हमने इसका उत्तर दे दिया है कि चेतन का स्वभाव दर्पण के तुल्य है । इसलिए एकता को बाधित न करते हुए आभासों का भेद होना सिद्ध ही है, इसमें कोई विरोध भो नहीं मालूम होता, इसीलिए प्रत्यभिज्ञान के बल से यह एक ही पदार्थांरूप स्वभावभेद जितने भी विरुद्ध-विरुद्ध स्वीकार करोगे उतने ही विरोध से क्रमरूप द्वारा निर्भासित होते हुए उस एक क्रिया के आश्रय को सम्पादन करेंगे, आश्रय एकत्व के समर्थन से सम्बन्धादि की उपपत्ति बैठा लेनी चाहिए ॥ १ ॥ अब शंका करते हैं कि क्रमिकत्व ही क्रिया का स्वरूप है, और काल की गति से शून्य भगवान् चिन्मय है उसमें तो क्रम नहीं रहता, इसलिए क्रिया का होना उसमें कैसे घट सकता है ? अर्थात् अक्रमवाले में क्रमरूप क्रिया कैसे संभव होगी ? ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं— १. सम्बन्ध तो दो वस्तुओं में रहता है एक में कैसे रहेगा ? इसका आशय यह है कि एक का स्वभाव एक ही होता है, दो नहीं हो सकते और व्यापाररूप क्रिया तो समवायी के बल से अविभक्त रूप में दिखायी देती है, लोग उसे पदार्थ का स्वभाव कहते हैं तथा क्रिया भेदवादियों की भी यही सम्मति है, यहाँ पर आभाससार वस्तुवाद में भेद प्रतीति से जो एक सम्बन्ध्ररूप एक सम्बन्धित्व को लेकर क्रिया का बोध होता है, वह तो एकता से युक्त रहता है, यदि वह पदार्थ प्रतीति को छोड़कर सैकड़ों शपथ खाने पर भी भेद से कैसे व्यवस्थापित हो सकता है ।