भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

अ.-१, आ.-७, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५५ धर्म्यसिद्धेरपि भवेद्बाधा नैवानुमानतः । स्वसंवेदनसिद्धा तु युक्ता सैकप्रमातृजा ॥ १३ ॥ न केवलं स्वसंवेदनात् न सिद्धयति बाधा, यावत् अनुमानतोऽपि न सिद्धयति—धर्मिणो- ऽसिद्धेः, अपिशब्दात् हेतोः व्याप्तेश्च, अपिः उभयत्र नेयः, इह धर्मिणि सिद्धे सिद्धेन हेतुना स्मर्यमाणव्याप्तिकेन साध्यधर्मयोगव्यवच्छेदकोऽनुमानव्यापारः इह च प्राच्ये रूप्यज्ञाने धर्मिणि अप्रामाण्यं साध्यो धर्मः तत्र शुक्तिकाज्ञानं वा, न रजतम् इति ज्ञानं वा, तज्ज्ञानविषयीकार्यत्वं वा विषयगतं हेतूक्रियते, न च एतत् युक्तम्—तत्काले प्राच्यरूप्यबोधस्य धर्मिणोऽभावात्, न चापि तस्य शुक्तिज्ञानादयो धर्माः, न च अपक्षधर्मात् साध्यसिद्धिः, अतः स्मर्यमाणं तद्धर्मि स्यात् इत्यपि असत्, अथ शुक्तिः न रजतज्ञानस्य विषय इति साध्यते शुक्तिकाज्ञानविषयत्वात् इति, तत् यदि इदानीम् तत्सिद्धसाधनम्, अथ पूर्वम् तदा तत्पूर्वस्वसंवेदनेन बाध्यविषयता केन चैवं व्याप्तिर्गृहीता—यत्र इदानीम् अन्यत् ज्ञानम् तत्र पूर्वम् अन्यत् न भवति इति, अनुमानान्तरेण इति चेत् अनवस्था, एतेन एतत् प्रत्युक्तम्—एकस्मिन् विषये कथं ज्ञानद्वयं स्यात् इति, को हि एकविषयतां द्वयोः ज्ञानयोः जानीयात्, ते हि तावत् स्वात्मनि स्वविषये च विश्राम्यत इति धर्मी की असिद्धि से भी बाधा नहीं होती है और अनुमान से भी नहीं हो सकती है, किन्तु अपने संवेदन ज्ञान से युक्त एवं प्रमाता से जन्य होकर बाधा का होना सम्भव है ॥ १३ ॥ विशुद्ध भूतल जो कह आये हैं, वहाँ पर केवल स्वसंवेदन से ही बाधा सिद्ध नहीं होती किन्तु अनुमान से भी बाध का सिद्ध होना एक प्रकार से असंभव सा ही होगा । धर्मी की असिद्धि में हेतु और व्याप्तिज्ञान दोनों ही कारण हैं। यहाँ पर ‘अपि’ शब्द दोनों स्थानों में अन्वित होता है, जो कि यहाँ पर धर्मी की सिद्धि में सिद्ध हेतु से स्मर्यमाण व्याप्तिवाला है उससे साध्यधर्म का अयोग्यव्यवच्छेदक अनुमान का व्यापार होता है। पूर्व का रजतज्ञान धर्मी में अप्रामाण्य साध्य धर्म है, उसके साध्य धर्मी में शुक्ति का ज्ञान है या रजत का ज्ञान नहीं है, इस ज्ञान का विषय बनानेवाला हेतु बनाया जा रहा है, यह उचित नहीं है—क्योंकि उस समय [शुक्तिका ज्ञान काल] में पूर्व के जो रजतज्ञान धर्मी है उसका अभाव रहता है और उस रजतज्ञान का शुक्ति ज्ञानादि धर्म नहीं है और जिस पक्ष का धर्म नहीं है उससे साध्य की सिद्धि नहीं बन सकती है। इसीलिए स्मरण किये जानेवाला रजतज्ञान का धर्मी है यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वह पक्ष का धर्म नहीं है, यदि शुक्ति रजतज्ञान का विषय नहीं है, तो यह सिद्ध नहीं हो सकता है, शुक्तिज्ञान उसका विषय है रजत नहीं है, इस शुक्तिज्ञान के अवसर में सिद्ध-साधन [ विफल ] हो जाता है, दूसरे प्रकार से अब यदि कहो कि पूर्व के ज्ञान से बाध्य-विषयता की सिद्धि होगी इसमें कौन-सी व्याप्ति है जो कि इस समय दूसरा ज्ञान हुआ है। वह पूर्व में नहीं होगा यदि दूसरे अनुमान से होगा—ऐसा मानते हो तो, अनवस्था हो जायेगी, इससे यह खण्डित हो जाता है कि एक विषय में दो ज्ञान कैसे संभव होंगे, कौन व्यक्ति दो ज्ञान की एक विषयता को मानने के लिए तैयार है, पहले तो अपने में और अपने विषय में विश्राम लेता है—यह कहा है। इसी- १. सति धर्मिणि धर्मचिन्ता । इस प्रकार धर्मी के रहने पर ही धर्म का विचार करना युक्त बैठता है।