ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१३ उक्तम्, इति अनुमानतोऽपि न बाधा, न च तथाभूतमपि व्यवधानम् अत्र प्रतीतौ संवेद्यते— स्वसंवेदनसिद्धतया झटिति भासनात्, अत एव एतदपि अशक्यं वक्तुम्—माभूत् बाधा नाम इति । एवं परपक्षेऽनुपपत्तिं प्रदर्श्य स्वपक्षे एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभाव इति वाक्येन प्रतिज्ञातं निगमयति—युक्ता सा एकस्मात् प्रमातुः यदि जायेत इति, स एव हि तथा निर्माता इति व्याख्यातमेव, स्थिते चैवं यदि व्यवहारसिद्धयेऽन्यथानुपपत्तिरुच्यते तत् उच्यतां कामम् ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ इति ॥ १३ ॥ न केवलमेते कार्यकारणभावस्मरणबाधाव्यवहाराः सकललोकयात्रासामान्यव्यवहारभूता एकप्रमातृप्रतिष्ठा, यावत् अवान्तरव्यवहारा अपि ये क्रयविक्रयादयः समलाः, उपदेश्योपदेश- भावादयश्च निर्मलाः, तेऽपि एकप्रमातृनिष्ठा एव भवन्ति—व्यवहारो हि सर्वः समन्वयप्राणः इति उपसंहारक्रमेण दर्शयति— लिए अनुमान से भी वहाँ पर कोई बाधा नहीं होगी और वैसा व्यवधान भी इस प्रतीति में ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह स्वसंवेदन से सिद्ध होने के कारण शीघ्र ही भासित हो जाता है, इसी- लिए यह भी कहना अशक्य है कि बाधा न हो । इस प्रकार दूसरे के पक्ष में अनुपपत्ति दिखा करके अपने पक्ष में भी ‘एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभावः’ इस वाक्य से अपनी प्रतिज्ञा का उपसंहार करते हैं-यदि एक प्रमाता से बाधा होती है, तो समुचित ही है, वह चिद्रूप हो वैसा निर्माण करनेवाला है इसकी व्याख्या पूर्व में हो चुकी है, ऐसी स्थिति होने पर यदि व्यवहार की सिद्धि के लिए अन्यथा बाध्य-बाधकभाव सिद्ध करते हो तो किया करो, ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ किन्तु अब तो सब कुछ सिद्ध हो हो गया है ॥ १३ ॥ [ पूर्वोक्त अनुवादपूर्वक ही वर्तन किया जायेगा एवं अभेदात्मक ज्ञान के लिए हो होगा ] ये कार्य-कारणभाव स्मरण बाधरूप व्यवहार हैं—वे सभी लोक में सामान्य व्यवहार के कारण माने जाते हैं, इसलिए वे एक ही प्रमाता में प्रतिष्ठित रहते हैं, इसके भीतर जितने भी व्यवहार हैं—क्रय-विक्रयरूपादि, वे सब के सब मल से युक्त मायीय प्रमाताओं के और निर्मल उपदेश्य- उपदेशभाव आदि के एक प्रमातृगत ही होते हैं; क्योंकि सभी व्यवहार समन्वय जीवनवाले होते हैं उसे उपसंहार क्रम से दिखाते हैं— १. निर्मल और समल भेद से व्यवहार दो प्रकार के होते हैं । माया से अन्धे हुए सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकलों का समल व्यवहार होता है, जिसका आगम में उल्लेख किया गया है— अवस्थात्रितयेऽप्यस्मिंस्तिरोभावनलीलया । शिवशक्त्या समाक्रान्ताः प्रकुर्वन्ति विचेष्टितम् ॥ सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल इनकी तीनों अवस्था में भी छिपा देने की लीला करनेवाली शिव-शक्ति से आक्रान्त होने के कारण सारी चेष्टाएं किया करते हैं । क्रय-विक्रय विवादादि का व्यवहार समल से होता है और जिन लोगों ने अपने स्वरूप को पहचान लिया है तथा परमेश्वररूप बन गये हैं उनका व्यवहार निर्मल होता है । यद्यपि पशु आदि एवं विद्येश्वर आदि दीक्षित पर्यन्त लोगों में उपदेश, दीक्षा, नित्य-नैमित्तिकादि अनुष्ठान, ध्यान, समाधानादि व्यवहार होता है वह समल से ही होता है, उनमें भी कुछ मल शोधरूप में रह जाता है; क्योंकि माया का व्यवहार विगलित न होने से यह होता रहता है इसलिए जिस कारण से व्यवहार-