ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ विभागतश्च श्लोकयुग्मेन । ततः श्लोकेन ज्ञानादिशक्त्याश्रयस्य एकस्य उपसंहारः । श्लोकान्तरेण महेश्वरत्वम् उपसंहरता भाविनः क्रियाधिकारस्य उपक्षेप इति संक्षेपार्थ आह्निकस्य । अथ श्लोकार्थो निरूप्यते । ननु यदि परमेश्वरनिष्ठतयैव समस्तोऽयं व्यवहारः तत् अस्य स्फुटत्वास्फुटत्वप्रायप्रसिद्ध- वैचित्र्यानुपपत्तिः–येन किल अयम् अनुप्राणितः स एक एव भगवान्, न च तद्व्यतिरेकेण व्यवहारनिजं किंचन तत्त्वम् उत्पश्यामः ? इत्याशङ्क्याह— तात्कालिकाक्षसामग्र्यसापेक्षाः केवलं क्वचित् । आभासा अन्यथान्यत्र त्वन्धान्धतमसादिषु ॥ १ ॥ विशेषोऽर्थावभासस्य सत्तायां न पुनः क्वचित् । विकल्पेषु भवेद्वाविभवद्भूतार्थगामिषु ॥ २ ॥ केवलम् एतावता आभासानां भेदो, न पुनरर्थावभासस्य स्वात्मगतः क्वचिदपि भेद इति श्लोकद्वयस्य संमेलितस्य सम्बन्धः, यस्मिन् एव काले स आभास आभाति तत्काले एव भवति, यत् अक्षसामग्र्यं--बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वं नाम आभासान्तरं 'पश्यामीत्येवंरूपम् तत्सापेक्षाः —तद्व्यामित्राः क्वचित् आभासा भवन्ति, यत्र स्फुटताव्यवहारः अन्धविषयः से । पश्चात् एक श्लोक से ज्ञानादि-शक्ति के एक आश्रय का उपसंहार करेंगे । दूसरे श्लोक से महेशता का उपसंहार करते हुए आगे आनेवाले क्रियाधिकार का उपक्षेप करेंगे, यही इस आह्निक का संक्षेप अर्थ है । अनन्तर श्लोक के अर्थ का निरूपण किया जाता है । अब शङ्का करते हैं कि यदि सारा का सारा व्यवहार परमेश्वर के ही आधार से होता है—तब तो, इस [ व्यवहार ] का प्रत्यक्ष रहना और दबे रहना इत्यादि प्रसिद्ध विचित्रता कैसे बन सकती है ? जिससे यह व्यवहार जीवित होता है—वह तो, एक ही भगवान् परमेश्वर का है, और उस परमेश्वर के बिना व्यवहार का अपना निजो तत्त्व स्वरूप हम क्या नहीं देखते हैं ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— कहीं-कहीं केवल उस काल में होनेवाले इन्द्रियों की समक्षता की अपेक्षा करके आभास होते हैं। अन्यत्र तो अन्धे को अन्धकार में जैसा ज्ञान होता है वैसा ही ज्ञान अर्थात् शून्य रहता है ॥ १ ॥ पदार्थ अवभास की सत्ता में कोई विशेषता नहीं होती आगे होनेवाले अथवा वर्तमानकाल में होनेवाले या बीते हुए काल में पदार्थों के विकल्पों में कुछ ज्ञान हो तो, हो सकता है ॥ २ ॥ सापेक्ष और निरपेक्ष के कारण ही पदार्थों में केवल भेद होता है, पदार्थों के आभासों में स्वयं अपने से भेद नहीं होता है। यह सम्मिलित दोनों श्लोकों का सम्बन्ध है, जिस तात्कालिक आकांक्षा के काल में आभास भासित होता है तभी वह उस काल में रहता है, जिसको इन्द्रियों से समक्ष में बाह्य-इन्द्रियों से प्रत्यक्ष कहा जाता है, इसी से दूसरे आभास को देखता हूँ—इस १. 'आभास की विचित्रता को कहकर अपने स्वरूप में आभास की एकता बनाये रखना ही यहाँ पर विशेषता मानी गयी है ।