ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-८, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५९ ततो भगवान् ज्ञाता कर्ता च, यद्यपि च प्रकाशविमर्शात्मकं चिदेकघनम् एकमेव संविद्रूपम्, तथापि व्युत्पादनाय तत्परिघटित एव अयं विभागः, तेन ज्ञानात्मकक्रियाविषयं स्वातन्त्र्यं यद्यपि क्रियाशक्तिरूपम् तथापि ज्ञानाधिकार एव निर्णेतव्यं—तद्विषयत्वात् । एवं च ज्ञातृशब्दार्थः प्रकृतिलतः प्रत्ययतश्च सम्पूर्णतया निर्णीतो भवति । तत्र ज्ञानं नाम स्वयं भेदिताभासभेदोपाश्रय- नियन्त्रणासङ्कुचितम् 'अहमिति' संवेदनम् । तत्र आभासेषु यत् स्वातन्त्र्यं, तदेव ज्ञानशक्तिविषयं स्वातन्त्र्यं सम्पद्यते इति । 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य.........।' इत्यादिना '........शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः।' इत्यन्तेन श्लोकैकादशकेन तत् निरूप्यते । तत्र आभासान्तरापेक्षी च आभासोऽन्यथा वा इति श्लोकेन उक्त्वा, स एव आभास एक इति श्लोकान्तरेण उच्यते । अर्थक्रियाभासोऽपि तथैव आभासनियत इति श्लोकद्वयेन उक्त्वा कस्मिन् आभासे सा अर्थक्रिया इति पुनः श्लोकद्वयेन । आभासान्तरविचित्रस्य भित्तिस्थानीयम् आन्तरत्वम् इति श्लोकेन । ततो बाह्यत्वं स्वरूपतो इससे सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर ही स्वयं ज्ञाता और कर्ता है और इनका स्वरूप प्रकाश विमर्शात्मक एकमात्र संविद्रूप ही है, फिर भी दूसरों को इनका बोध हो जायें, इसलिए ज्ञान और क्रियारूप में विभाग किया गया है, ज्ञानात्मक क्रिया के विषय का स्वातन्त्र्य 'आभासवैचित्र्य' यद्यपि क्रिया-शक्तिरूप होने के कारण 'क्रियाधिकार' में ही इसका प्रस्ताव करने योग्य है तथापि ज्ञानविषयक होने से भी 'ज्ञानाधिकार' में इसका विवेचन करना दोष जनक नहीं माना जाता है; क्योंकि इन दोनों का विषय एक है इस प्रकार ज्ञातृ शब्द का अर्थ होता है कि—ज्ञातृ में 'ज्ञाधातु' से 'तृच्' प्रत्यय हुआ है इसीलिए प्रकृति और प्रत्यय मिल कर पूरा का पूरा ज्ञान करनेवाला अर्थ निर्णित होता है। [ ज्ञान और क्रिया की परस्पर एकरूपता होने के कारण आचार्य हंस्ररूप होकर जल और दूध के समान विषय को भिन्नतापूर्वक ज्ञानस्वरूप के क्रिया से अलग ही विवेचन कर देते हैं ] ज्ञान क्या चीज है ? स्वयं भेद करनेवाले का आभास से भेद के आधार को नियन्त्रित करके विस्तार कर देना जिसका अहं यह परामर्श होता है । प्रकृति के अर्थ से ज्ञान के स्वरूप का भेद कर देने पर, प्रत्ययार्थ के साथ आभास होने पर, जो स्वातन्त्र्य है वही ज्ञान-शक्ति का विषयरूप स्वातन्त्र्य कहलाता है। 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य ......।' इत्यादि से लेकर '.........'शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ।' यहाँ तक ग्यारह श्लोकों से निरूपण करेंगे। जैसे आभास किसी दूसरे आभास को अपेक्षा रखता है, दूसरा कोई नहीं भी रखता है यह प्रथम श्लोक से कह कर, वही आभास एक है ऐसा दूसरे श्लोक से कहेंगे । अर्थक्रिया का आभास भी उसी प्रकार आभास में नियत रहता है, यह दो श्लोकों से कहेंगे । आभासान्तर की विचित्रता में भित्ति स्थानीय सदृश आन्तरत्व है, यह एक श्लोक से कहेंगे। उसके बाद स्वरूप से और विभाग से बाह्यत्व की सिद्धि बतायेंगे, दो श्लोकों शिव से शक्ति अलग नहीं है और शक्ति से शिव भिन्न नहीं है; क्योंकि हिम से व्यतिरिक्त शीतलता नहीं रहती एवं वह्नि से अलग ऊष्णता-दाहकता नहीं रहती है । इस युक्ति से तो एक ही प्रकाश विमर्शात्मक संविद्रूप है किन्तु यह ज्ञान और क्रिया दो क्या चीज है ? जबकि ज्ञान और क्रिया में स्वातन्त्र्य ही परमार्थतः चित्तत्त्व कहलाता है ज्ञातृ सत्ता ही क्रिया है और क्रिया स्वरूप ही ज्ञान है, दूसरों को इसका बोध हो जायें इसी वास्ते ज्ञान और क्रिया की विवक्षा की गयी है ।