ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ इति शिवम् ॥ १४ ॥ अदितः ॥ ७७ ॥ इति श्रीमन्माहेश्वराचार्यवर्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभि- नवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यव्याख्योपेतायां प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणं नाम सप्तममाह्निकम् ॥ ७ ॥ • अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे माहेश्वर्यनिरूपणाख्यं अष्टममाह्निकम् स्वसंवेदनसंसिद्धव्यवहारवशेन यः। नित्यं महेश्वरः सिद्धः सिद्धानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं ज्ञानस्मरणापोहनानि व्युत्पाद्य तेषाम् 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' इति निरूपितम् एतावता, 'न चेदन्तः कृता.........।' इत्यत्र यत् उक्तम् 'एक' इति तत् परिघटितम् । अन्तराभासमर्थनेन 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूप' इत्यपि निरूपितम् । यत् तत्रैव 'महेश्वर' इति उक्तम् तन्माहेश्वर्यं स्वातन्त्र्यरूपम् उपपादयितव्यम्, तच्च ज्ञानविषयं क्रियाविषयं च इति उभयप्रकारम्, यह कल्याणकारी भाव है ॥ १४ ॥ सप्तम आह्निक समाप्त जो महेश्वर सिद्धजनों के लिए अपने ज्ञान के संसिद्ध व्यवहार के बल से नित्य ही सिद्ध है, उस शिव का हम स्तवन करते हैं। इस प्रकार ज्ञान-शक्ति, स्मरण-शक्ति और अपोहन-शक्ति का प्रतिपादन कर, अब उन सभी का 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' अर्थात् एक आश्रय के बिना व्यवहार का होना असंभव है—इतने से यह विषय सिद्ध किया गया है । न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकचिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ इस कारिका में जो कहा गया है 'एक:' एक शब्द से उसको घटा दिया गया है । अन्तर के आभास के समर्थन से 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूपो' अपने भीतर अनन्त-असंख्य विश्वरूप भरा पड़ा है इसका भी निरूपण कर दिया गया है। वहाँ पर ही 'महेश्वरः' महेश्वर ऐसा शब्द कहा है इससे माहेश्वर्य की स्वतन्त्रता को सिद्ध करना है और वह स्वातन्त्र्य ही ज्ञान का विषय है एवं क्रिया का भी विषय है । १. कर्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्वरे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ स्वयं महेश्वर ही तो कर्ता और ज्ञाता के रूप में सिद्ध है उनकी अजडरूप में निषेध अथवा सिद्धि कौन कर सकता है ? उसका यही परम स्वातन्त्र्य है । २. शक्त्या गर्भान्तर्वर्तिन्या शक्तिगर्भं परं महः । परमेश्वर के भीतर शक्तिरूप से परम तेज रहता है । न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । न हिमस्य पृथक् शैत्यं नोष्ण्यं वह्नेः पृथग्भवेत् ॥