ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-८, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६७ अन्तर्विकल्पप्रतिबिम्बितस्य नीलादेः यो बहिरात्मना प्रमातृविच्छिन्नेन स्वभावेन प्रकाशः, स भर्तुः अन्तराभासान् बिभ्रतो बहिःसृष्टिं च पुष्णतः ईश्वरस्यैव इच्छया, यथैव चक्षुरादिविषय- भूतानां प्रत्यक्षज्ञानशब्दवाच्यो बाह्यात्मना प्रकाशो नीलादीनाम् । एतदुक्तं भवति—कुम्भकार- व्यापारो नाम परमार्थतः ईश्वरेच्छैव तदवभासितकायस्पन्दपर्यन्ता, न पुनरन्यः कश्चन सः, ततश्च यथा ईश्वरेच्छया प्रकाशात् अबहिर्भूता अपि नीलाद्या बाह्यकरणगोचरीभूताः कल्पितात् प्रमातुः विच्छिन्नरूपेण बाह्यत्वेन भासन्ते, तथा अन्तःकरणगोचरीभूता अपि—इति को विशेषः । सुखदुःखप्रायास्तु भरताद्युक्तरूपाः स्थायिव्यभिचारिरूपा रतिनिर्वेदादयोऽन्तःकरणैकगोचरा बहि- रात्मना भान्ति, संकल्पेषु यद्यपि क्षेत्रज्ञस्यैव स्वातन्त्र्यम् तथापि चित्परमार्थताया न्यग्भावयितुम् अशक्यत्वात् ईश्वरस्यैव तत् वस्तुतः, यथोक्तं ग्रन्थकृतैव— 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ बुद्धिरूपी भूमि में प्रतिबिम्बित नील-सुखादि का जो बाहर प्रमातृ-विच्छिन्न स्वभाव से प्रकाश होता है, वे भर्ता अर्थात् परमेश्वर की इच्छा से ही अन्तराभास पदार्थ बाहर में प्रकाशित होते रहते हैं, [ 'भर्तुः' भर्ता शब्द 'डुभृञ्' 'धारण-पोषणयोः' धातु के अर्थ में है और उससे ही निष्पत्ति हुई है ] जैसा कि चक्षु-इन्द्रिय आदि के विषय होनेवाले नील-सुखादि पदार्थ के प्रत्यक्ष-ज्ञान शब्द के वाच्य बाह्यरूप से होनेवाला प्रकाश है । यह कहा गया है कि कुंभकार का व्यापार वस्तुतः परमेश्वर की इच्छा से ही होता है । वह इच्छा कैसी होती है ? ईश्वर की इच्छा से अवभासित विशिष्ट बुद्धि-प्राण-काय इत्यादि के स्पन्दन से मृत्पिण्ड-दण्ड-चक्रादि के अवभासरूप ये सारे के सारे हैं—ऐसी ईश्वर की इच्छा है जिससे कि दण्ड, चक्रादि के व्यापार से घट की उत्पत्ति हो, इससे अतिरिक्त कोई दूसरा व्यापार वहाँ पर नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर की इच्छा के द्वारा होनेवाले प्रकाश से बाहर में नहीं जानेवाले नील-सुखादि जो बाह्येन्द्रियों के विषय हैं, मायीय कुंभकारादि से कल्पित प्रमाता से विच्छिन्न होकर बाहर में भासते हैं, इसी प्रकार अन्तः- करण के विषयरूप होकर भी भासते हैं। इन दोनों में कौन सी विशेषता है ? क्योंकि इन दोनों का भासना तो बराबर एक सा ही है। सुख-दुःखादि तो प्रायः भरतमुनि से कहे गये रति और वैराग्यादि स्थायी व्यभिचारी भावों के रूप में उत्पन्न होते हैं और वे अन्तःकरण के ही विषय होकर बाहर में भासते हैं, यद्यपि संकल्प-विकल्पों में क्षेत्रज्ञ-जीव की ही स्वतन्त्रता रहती है—तो भी, चेतन की परमार्थता को दबाने के लिए, असमर्थ होने के कारण, वस्तुतः उस ईश्वर को ही स्वतन्त्रता रहती है । जिसके विषय में ग्रन्थकार ने स्वयं कह दिया है कि—यद्यपि प्राण और पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव में पदार्थों की स्थिति रहती है । फिर भी परमात्मा में उसकी स्थिति १. धारण एवं पोषण अर्थ में 'डुभृञ्' धातु से निष्पन्न भर्तृ शब्द है इसका षष्ठी विभक्ति में भर्तुः = ईश्वरस्य रूप बनता है । २. रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा । जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः ॥ नाट्य-शास्त्र के प्रणेता भरत मुनि ने कहा है कि रति, हास्य अर्थात् मनोविनोद, शोक, क्रोध, उत्साह, साहस, घृणा और विस्मय ये सब स्थायी भाव हैं ।