ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-८, का.-१०-११ तदात्मनैव तस्य स्यात्कथं प्राणेन यन्त्रणा।' इति। यत्र तु अनिच्छोरेव क्षेत्रज्ञस्य स्वरसवाहिव्या- क्षेपसारा सांकल्पिकी सृष्टिः तत्र स्फुटः ईश्वरस्यैव व्यापारः, तस्मात् सांकल्पिकानामपि बहिर्भावे परमेश्वरેચ્છैव हेतुः—इति सिद्धान्तः ॥ ९ ॥ आधुना पूर्वोक्तम् ऐक्यं माहेश्वर्यं च निगमयति— तदैक्येन विना न स्यात्संविदां लोकपद्धतिः । प्रकाशैक्यात्तदेकत्वं मातैकः स इति स्थितम् ॥ १० ॥ स एव विमृशत्त्वेन नियतेन महेश्वरः । विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ॥ ११ ॥ यत् एतत् पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन उपपादितम्, तत् इति—तस्मात् हेतोः, संविदां—ज्ञानानाम् ऐक्येन विना, लोकपद्धतिः लोकमार्गः—सर्वो व्यवहारो न संभवेत्, संभवति च अयम्, तस्मात् ऐक्यम् आसांम्। न चैतत् दुर्घटम् यतो—विषयप्रकाश एव संवित् उच्यते, केवलं विषयोपराग- महिम्ना बहिर्मुखतया नीलप्रकाशोऽन्यः, पीतप्रकाशश्चान्यः, परमार्थतस्तु प्रकाशस्य देशकालाकार- संकोचवैकल्यात् एकत्वमेव इति एक एव प्रकाशोऽन्तर्विश्रान्तः, स एव च प्रमाता उच्यते इति स्थितम् इदानीम् उपपत्तितः, न च अस्य असौ प्रकाशलक्षणः स्वात्मा नीलाद्युपरागश्च परामर्शन- बनी रहती है; क्योंकि वह जीव उसमें परमात्म-स्वरूप से ही रहता है, अन्यथा जीवों के प्राण से उसका नियन्त्रण होना असम्भव है। जहाँ पर नहीं चाहनेवाले क्षेत्रज्ञ की अपने होनेवाले विक्षेप-मूलक संकल्प जन्य सृष्टि होती है उसमें प्रत्यक्षरूप से ईश्वर का ही व्यापार रहता है, इस कारण संकल्प द्वारा होनेवाले प्रमाता से बाहरी व्यवहारों में ईश्वर की इच्छा ही हेतु होती है—यह सिद्धान्त है ॥ ९ ॥ अब पूर्वोक्त एकता का और महेश्वर की महिमा का उपसंहार करते हैं— ग्रन्थ में प्रतिपादित एकता के बिना संविद्रूप ज्ञानों का लोक-व्यवहार नहीं हो सकता है। प्रकाश को एकता से ज्ञानों को एकता है और वह एक-प्रकाश प्रमाता है—यह सिद्ध हुआ ॥१०॥ वही महेश्वर नियत विमर्श से लोकमार्ग को चलाता है; क्योंकि देव का शुद्ध ज्ञान और क्रिया ही विमर्श है ॥ ११ ॥ यह जो पूर्वोक्त ग्रन्थ से सिद्ध किया है, उसी हेतु से ज्ञानों का ऐक्य नहीं होने के कारण सब लोक-व्यवहार नहीं सम्भव हो सकता है, किन्तु यह व्यवहार होता हुआ दिखायी देता भी है, इसीलिए मानना पड़ेगा कि ज्ञानों का ऐक्यरूप है और यह ऐक्य कोई दुर्घट नहीं है, जो कि न हो सके। क्योंकि विषय प्रकाश ही संवित् कहा जाता है, केवल विषय के मिले रहने से बहिर्मुख होकर नीलप्रकाश अन्य है और पीतप्रकाश अन्य है—ऐसा बोध हुआ करता है। परमार्थरूप से तो प्रकाश का देश, काल और आकार के संकोच न होने से एक ही रूप रहता है। वही प्रकाश अन्तःकरण में विश्रान्त होने से अहं शब्द का वाच्य है, वही प्रकाश प्रमाता है—ऐसा कहा जाता है। यही उपपत्ति से इस समय दृढ़ सिद्ध हो गया, [ 'न च' इससे द्वितीय श्लोक की व्याख्या करते हैं ] प्रमाता का यह प्रकाशरूप अपना स्वरूप नीलादि से उपरक्त होकर भी परमार्थ शून्य