ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-८, का.-१०-११ ] विमर्शिनीटोकोपेत [ १६९ शून्य एव आस्ते—स्फटिकमणेरिव, अपि तु सदैव विमृश्यमानरूपः, इति विमृशद्रूपत्वम्— अनवच्छिन्नविमर्शता अनन्योन्मुखत्वन् आनन्दैकघनत्वमेव अस्य माहैश्वर्यम्, स एव हि अहं- भावात्मा विमर्शो, देवस्य—क्रीडादिमयस्य, शुद्धे—पारमार्थिक्यौ ज्ञानक्रिये, प्रकाशरूपता ज्ञानं, तत्रैव स्वातन्त्र्यात्मा विमर्शः क्रिया, विमर्शश्च अन्तःकृतप्रकाशः इति विमर्श एव परावस्थायां ज्ञानक्रिये, परापरावस्थायां तु भगवत्सदाशिवभुवि इदन्तासामानाधिकरण्यापन्नाहंताविमर्शस्व- भावे, अपरावस्थायां च मायापदे इदंभावप्राधान्येन वर्तमाने इति विशेषः। सर्वथा तु विमर्श एव ज्ञानं, तेन विना हि जडभावोऽस्य स्यात् इति उक्तम् 'स एव च क्रिया' इति—भाविनः क्रियाधिकारस्य उपक्षेपं करोति इति शिवम् ॥ १०-११ ॥ आदितः ॥ ८९ ॥ इति श्रीमन्माहेश्वराचार्यवर्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां, श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यव्याख्योपेतायां माहैश्वर्यनिरूपणाख्यमष्टममाह्निकम् ॥ ८ ॥ ही रहता है [ अब वैधर्म्य से दृष्टान्त दिया जाता है ] जैसा कि स्फटिकमणि विमर्श शून्य रहती है इसलिए जडरूप मानी जाती है, अपितु यह सदैव विमृश्यमानरूप रहता है और अपने को विमर्श करता हुआ—निरन्तर अनवच्छिन्नरूप से विमर्श करने के कारण अपने स्वरूप में ही लीन रहना तथा आनन्दघन में बने रहना इसको महेश्वरता है। वही परमेश्वर का अहंभावरूप विमर्श है, जो कि क्रीडादि में निमग्न रहते हैं, उनका शुद्ध पारमार्थिक ज्ञान और क्रिया हैं प्रकाशरूप ज्ञान है, उन्हीं में विमर्शात्मक स्वातन्त्र्यरूपी क्रिया भी रहती है, तब फिर, विमर्श क्या वस्तु है ? विमर्श को ही अन्तःकरणकृत प्रकाश करते हैं और वही आगे चल कर परमशिव अवस्था में ज्ञान और क्रिया हो जाता है। शिव अवस्था एवं जीव अवस्था तो भगवान् सदाशिव की भूमि में 'इदन्ता' से मिली हुई 'अहन्ता' इन दोनों में समानरूप से एकतापूर्वक होकर रहती है और वही अपर-जीवावस्था आगे चल कर मायामय पद में 'इदन्ता' की प्रधानता को ग्रहण कर वर्तमानरूप में रहती है। यही इसकी विशेषता है। इसलिए सब प्रकार से विमर्श ही ज्ञान है, यदि वह न हो तो यह प्रकाश भी जडरूप ही हो जायेगा, इसीलिए कहा है कि 'स एव च क्रिया' वही क्रिया है—इस प्रकार आगे होनेवाले क्रियाधिकार का प्रसंग भी सूचित होता है ॥ १०-११ ॥ अष्टम आह्निक समाप्त इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता प्रथमज्ञानाधिकारहिन्दीव्याख्या शिवरञ्जनी इति प्रथमः ज्ञानाधिकारः समाप्तः २२