भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अथ द्वितीयः क्रियाधिकारः अथ द्वितीये क्रियाधिकारे क्रियाशक्तिनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् वितत¹विशदस्वात्मादर्शे स्वशक्तिरसोज्ज्वलां प्रकटयति यो मातृस्वांशप्रमेयतातद्वये । बहुतरभवद्भङ्गीभूमिं क्रियासरितं परां प्रकटयतु नः श्रीमान्गौरीपतिः² स ऋतं परम् ॥ १ ॥ यत्र³ विश्रान्तिमासाद्य चित्रं क्रीडाविजृम्भितम् । क्रियाशक्तिः प्रियात्यन्तं दर्शयेत्तं स्तुमः शिवम् ॥ २ ॥ अथ क्रियाशक्तिस्वरूपं वितत्य निर्णेतुम् अधिकारान्तरम् आरभ्यते, तत्र श्लोकाष्टकेन ‘अत एव………’ इत्यादिना ‘यदवभास्यते………’ इत्यन्तेन परमेश्वरे परमार्थतोऽक्रमा क्रिया, परिमितसांसारिकप्रमातृगतक्रमावभासनयोगात् सक्रमापि च, इति—उपपाद्यते, तथाहि श्लोकेन उक्तपूर्वपक्षप्रतिक्षेपः । ततः श्लोकेन सक्रमत्वाक्रमत्वविवेकः । ततः श्लोकत्रयेण क्रमस्वरूपनिरू- जो परम शक्तिरूप अम्बिका है, उसका स्वामी परमेश्वर बड़ा ही व्यापक स्वरूपवाला है; जो कि अपने आदर्शरूप दर्पण में स्वशक्तिरूपी रस से उज्ज्वल विविध प्रकार की भूमिका को प्रकट करता है, क्रियारूपी उत्कृष्ट सरिता को प्रमाता अपने ही अंश से उद्भूत प्रमेय तटों में बहाता है, वही भगवान् परमेश्वर उस सत्य को हम लोगों के प्रति प्रकट करें ॥ १ ॥ जिसमें विश्रान्ति लेकर यह क्रीडा-क्षेत्ररूप जगत् विचित्र होकर फैलता है; जिसको क्रिया- शक्ति अत्यन्त प्रिय है उसका दर्शन करावें, हम उस शिव की स्तुति करते हैं ॥ २ ॥ अब क्रिया-शक्ति के स्वरूप का विस्तारपूर्वक निर्णय करने के लिए दूसरा क्रिया अधिकार आरम्भ किया जाता है, आठ श्लोकों से ‘अत एव ……’ इत्यादि से लेकर ‘यदवभास्यते……’ यहाँ तक । परमेश्वर में वस्तुतः क्रिया अक्रमरूप से रहती है और परिमित सांसारिक प्रमाताओं में भेदतः क्रम से युक्त भी हो जाती है, इसीको सिद्ध करते हैं, देखिये—एक श्लोक से कहे हुए पूर्वपक्ष का निराकरण किया जायेगा । इसके पश्चात् एक श्लोक से सक्रमत्व का और अक्रमत्व का विचार किया जायेगा । अनन्तर तीन श्लोकों से क्रम के स्वरूप का निरूपण होगा । इसके १. ‘वितत’ इत्यादि से स्तुति के ब्याज से अधिकार्थ सूचित हो रहा है । विमर्श-शक्ति स्वातन्त्र्यरूप का रस चमत्कार के द्वारा उज्ज्वल स्वरूप है । २. वह परा-शक्तिरूप अम्बिका का ईश्वर अर्थात् पति हम लोगों के लिए परम सत्यप्रकाश [ अन्तःकरण में ] प्रकट करें । ३. यत्र = अक्रमपूर्वक क्रिया चिद्रूप में रहती है । इस श्लोक से आह्निक का अर्थ सूचित होता है ।