ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७१ पणम् । ततः श्लोकद्वयेन सक्रमत्वाक्रमत्वयोर्विषयविभागः, विषयविभागे च सति वस्तुतः एकत्रैव तयोः विश्रान्तिः, इति श्लोकेन निरूप्यते, इति—तात्पर्यम् आह्निकस्य । श्लोकार्थस्तु निरूप्यते—तत्र पूर्वोक्ते ज्ञानशक्तिसमर्थनोपयोगिनि प्रमेये सिद्धे प्रमेयान्तरमपि अयत्नतः सिद्धम्, इति अधिकरणसिद्धान्तदिशा दर्शयति— अत एव यदप्युक्तं क्रिया नैकस्य सक्रमा । एकेत्यादि प्रतिक्षिप्तं तदेकस्य समर्थनात् ॥ १ ॥ यत् तावत् उक्तं—ज्ञानान्येव अनुभवविकल्परूपादिभिन्नानि न तेषाम् आश्रयोऽस्ति कश्चित्, संस्काराच्च स्मृतिः सिद्धा, ज्ञानं च जडं चेत् न अर्थस्य प्रकाशः, अजडं चेत् देशकाल- सङ्कोचवैकल्यात् आत्मतत्त्वात् अभिन्नमिति, तत् तावत् प्रतिक्षिप्तं—भिन्नानामनुभवादीनामनु- पपत्तेः वितत्य दर्शितत्वात् । न च संस्कारमात्रात् स्मृतिः—इत्येतदप्युक्तम्, अजडमेव च बाद दो श्लोकों से सक्रमत्व और अक्रमत्व के विषय का विभाग किया जायेगा और विषय का विभाग हो जाने पर परमार्थतः एक जगह ही दोनों की विश्रान्ति हो जाती है—यह एक श्लोक से निरूपण किया जायेगा । इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । किन्तु अब श्लोक के अर्थ का निरूपण किया जाता है—पूर्वं में कही हुई ज्ञान-शक्ति का समर्थन एवं उसमें उपयोगी प्रमेय तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर दूसरा प्रमेय भी तो बिना यत्न से ही सिद्ध हो जाता है, इस अधिकरण सिद्धान्त के अनुसार अर्थात् एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरा स्वयं सिद्ध हो जाता है । जैसा कि परमाणु का नित्यत्व, इसी बात को दिखाते हैं— इसलिए जो भी कहा गया है, इस विषय में कि एक की क्रिया क्रमवाली नहीं होती, एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरे का स्वयं सिद्ध हो जाना इत्यादि दिखाने से ॥ १ ॥ जब कि पहले कहा गया है कि अनुभव-विकल्परूप से संतानरूप ज्ञान भिन्न-भिन्न हैं उनका कोई आश्रय नहीं है । संस्कार से स्मृति की सिद्धि होती है और यदि ज्ञान को जडरूप मानोगे तो अर्थ का प्रकाश नहीं होगा, यदि अजडरूप कहते हो तो उसमें देश-काल का सङ्कोच न होने से वह आत्मतत्त्व से अभिन्न हो जाता है । पहले वह पूर्वपक्ष में आ गया है इसलिए भिन्न-भिन्न अनुभवों की उपपत्ति नहीं बैठती है, इसको विस्तारपूर्वक दिखा दिया है । इस प्रकार संस्कार मात्र से १. प्रमेय का विचार करने पर तो ज्ञान-शक्ति का समर्थन उस पति प्रमाता में अयत्न सिद्ध हो जाता है । २. एक प्रमाता में सिद्ध हो जाना । ३. जिस एक प्रमाता की पुष्टि हो जाने से ज्ञान-शक्ति का समर्थन हो जाता है और उसी से क्रिया-शक्ति की भी पुष्टि हो जाती है । ४. अधिकरण सिद्धान्त उसी का नाम है जो एक अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उसके अनुयायी दूसरे अर्थ की भी सिद्धि हो जाती है । जैसे परमाणु की सिद्धि हो जाने पर उसका नित्यत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है । ५. अनुभव विकल्परूप से सन्तानवृत्ति ज्ञानों को ही प्रकाशित करती है । ६. संस्कार से ही स्मृति की सिद्धि होती है । इससे अतिरिक्त स्मृति में कोई हेतु नहीं है । यहाँ पर ‘चकार’ शब्द का ‘एव’ अर्थ है ।