ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-१ असंङ्कुचितरूपं ज्ञानं-तत्सवातन्त्र्यावभासितज्ञेयोपरागवशात् तु अस्य सङ्कोचावभास इत्यपि दर्शितं यतः, न केवलम् अतो हेतुकलापात् ज्ञानशक्तिचोद्यानि निवारितानि, यावत् क्रियाशक्ति- विषयाण्यपि दूषणानि, अत एव हेतुजातात् अपसारितानि, इति अपिशब्दार्थः । एका क्रिया क्रमिका कथम् आश्रयस्य एकस्वभावत्वे सति घटते ? इति यदुक्तं, तथा ‘तत्र तत्र स्थिते........’ इति, ‘द्विष्ठस्योनेकरूपत्वात् ........’ इति च यदुक्तं तदपि प्रतिक्षिप्तमेव, यत इयति पूर्वपक्षे इयदेव जीवितम्-एकमनेकस्वभावं कथं स्यात् इति । तत्र च उक्तं चित्स्वभावस्य दर्पणस्येव एकतानप- बाधनेन आभासभेदसम्भवे क इव विरोध इति, तस्मात् प्रत्यभिज्ञानबलात् एकोऽपि असौ पदार्थात्मा स्वभावभेदान् विरुद्धान् यावत् अङ्गीकुरुते तावत् ते विरोधादेव क्रमरूपतया निर्भास- मानाः तमेकं क्रियाश्रयं सम्पादयन्ति इति, ततश्च सम्बन्धादीनामपि उपपत्तिरिति ॥ १ ॥ ननु च क्रमिकत्वमेव क्रियायाः स्वरूपं, क्रमश्च कालकलनाहीने चिन्मये भगवति नास्ति; इति कथम् अस्य सा भवेत् ? इत्याशङ्कयाह— ही स्मृति नहीं हो जाती है, इसे भी हम कह आये हैं; इसीलिए ज्ञान अजड एवं असंङ्कुचितरूप है उसकी स्वतन्त्रता अवभासित होनेवाले ज्ञेय के संमिश्रित हो जाने के कारण इसके संकोच का अवभास मालूम होता है; क्योंकि यह भी दिखा दिया है, इसलिए न केवल हेतु समुदाय के द्वारा ज्ञान-शक्ति से प्रकाशित होनेवाले पदार्थों का निवारण कर दिया है, किन्तु क्रिया-शक्ति के विषयों में भी दोष दिया है, इसलिए हेतु समूह से हटा दिया गया, ‘अपि’ शब्द का यह भी अर्थ होता है । एक क्रिया क्रमवाली कैसे हो सकती है ? आश्रय की एक स्वभावता रहने पर घटती है । इस विषय में कहा गया है, ‘तत्र तत्र स्थिते·····।’ इत्यादि बाते कही हुई हैं; क्योंकि दो वस्तुओं में जो रहेगा वह अनेकरूपों में रहेगा । इसका भो खण्डन हो चुका है, पूर्वपक्ष का इतना ही जीवन है—जो एक है वह अनेक स्वभाववाला कैसे होगा ? इस प्रकार वहाँ पर हमने इसका उत्तर दे दिया है कि चेतन का स्वभाव दर्पण के तुल्य है । इसलिए एकता को बाधित न करते हुए आभासों का भेद होना सिद्ध ही है, इसमें कोई विरोध भो नहीं मालूम होता, इसीलिए प्रत्यभिज्ञान के बल से यह एक ही पदार्थांरूप स्वभावभेद जितने भी विरुद्ध-विरुद्ध स्वीकार करोगे उतने ही विरोध से क्रमरूप द्वारा निर्भासित होते हुए उस एक क्रिया के आश्रय को सम्पादन करेंगे, आश्रय एकत्व के समर्थन से सम्बन्धादि की उपपत्ति बैठा लेनी चाहिए ॥ १ ॥ अब शंका करते हैं कि क्रमिकत्व ही क्रिया का स्वरूप है, और काल की गति से शून्य भगवान् चिन्मय है उसमें तो क्रम नहीं रहता, इसलिए क्रिया का होना उसमें कैसे घट सकता है ? अर्थात् अक्रमवाले में क्रमरूप क्रिया कैसे संभव होगी ? ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं— १. सम्बन्ध तो दो वस्तुओं में रहता है एक में कैसे रहेगा ? इसका आशय यह है कि एक का स्वभाव एक ही होता है, दो नहीं हो सकते और व्यापाररूप क्रिया तो समवायी के बल से अविभक्त रूप में दिखायी देती है, लोग उसे पदार्थ का स्वभाव कहते हैं तथा क्रिया भेदवादियों की भी यही सम्मति है, यहाँ पर आभाससार वस्तुवाद में भेद प्रतीति से जो एक सम्बन्ध्ररूप एक सम्बन्धित्व को लेकर क्रिया का बोध होता है, वह तो एकता से युक्त रहता है, यदि वह पदार्थ प्रतीति को छोड़कर सैकड़ों शपथ खाने पर भी भेद से कैसे व्यवस्थापित हो सकता है ।