ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७३ सक्रमत्वं च लौकिक्याः क्रियायाः कालशक्तितः । घटते न तु शाश्वत्याः प्रभव्याः स्यात्प्रभोरिव ॥ २ ॥ उत्क्षिपति अपक्षिपति हस्तम् इति ये पूर्वोत्तरे क्षणाः ते क्रमवन्तः, तत्र येषां त एव ‘क्रिया काणादानाभिव’ तेषां सा सक्रमा प्रत्यक्षेणैव भाति । ये तु मन्यन्ते तथाभूतपरिदृश्यमानभेद- सम्पादिका या असौ काचित् अतीन्द्रिया हस्तगता शक्तिर्व्यापारोद्बोधरूपा नित्यानुमेया तस्याः केवलं पूर्वापरीभूतत्वम् अनुमीयते, इति लौकिक्याः क्रियायाः सक्रमत्वं कालशक्तेः आभास- विच्छेदनप्रदर्शनसामर्थ्यरूपात् पारमेश्वरात् शक्तिविशेषात् घटते उपपद्यते, या तु प्रभोः सम्बन्धिनी तदव्यतिरिक्ता क्रियाशक्तिः शाश्वती कालेन अस्पृष्टा तस्याः सक्रमत्वम् अस्ति, इति—सँम्भाव- नापि नास्ति, यथा प्रभोः सक्रमत्वमसम्भाव्यं तथा तस्या अपि। उक्तं हि— ‘हस्तस्य सक्रमत्वे, तद्गतापि क्रिया तथा स्यात्’ इति ॥ २ ॥ ननु कालो विशेषणभावम् उपगच्छन् भावं स्वेन रूपेण अवच्छिनत्ति, तत्र कोऽसौ कालो काल-शक्ति के द्वारा लौकिक क्रिया में ही सक्रमत्व घटता है। सदा-सर्वदा होनेवाली प्रभु की क्रिया में क्रम नहीं होता। जैसा कि प्रभु में क्रम का अभाव रहता है ॥ २ ॥ हाथ उठाता है एवं गिराता है इस प्रकार पूर्वोत्तर [ आगे-पीछे ] होनेवाले क्षणों में ही क्रमरूपता होती हैं, जिस काणाद प्रभृति के मत में तो वे क्षण ही क्रिया हैं और वह सक्रमवाली क्रिया प्रत्यक्षरूप से ही दिखायी पड़ती हैं। किन्तु कुछ लोग पूर्वोत्तर क्षणरूप संयोग-विभाग से होनेवाली क्रिया को मानते हैं वह तो कोई अतीन्द्रिय ही क्रिया है जो कि हाथ में व्यापार लाती है और वह कार्यरूप अनुमान से ही जानी जाती है उसका केवल पूर्वोत्तररूपत्व ही अनुमित किया जाता है। इस प्रकार लौकिक क्रिया का सक्रमत्व काल-शक्ति के आभास विच्छेदन के सामर्थ्य का प्रदर्शन ही परमेश्वर की शक्ति विशेष से मात्र कर सकती है। किन्तु प्रभु से सम्बन्ध रखनेवाली अभिन्नरूप शाश्वत क्रिया-शक्ति को काल स्पर्श भी नहीं करता, उसका सक्रमत्व होता है, ऐसी संभावना भी नहीं करनी चाहिए। जैसे प्रभु में सक्रमत्व का होना संभव नहीं होता, वैसे उसकी क्रिया में भी नहीं होता; क्योंकि इस विषय में कहा गया भी है— जब हाथ क्रमवाला है तो हस्तगत क्रिया भो सक्रमरूप ही होगी; प्रभु तो काल से अनवच्छिन्न स्वरूपवाले होने से उसकी क्रिया भी काल से अनवच्छिन्नरूप ही होतो है; क्योंकि वह प्रभु की जैसी शाश्वत् होती है ॥ २ ॥ अब शंका करते हैं कि काल विशेषणरूप होता हुआ पदार्थों में अपने रूप से भेद करता १. क्रिया को प्रत्यक्ष प्रमाण से ग्राह्य काणाद आदि लोग मानते हैं। २. सयोग और विभाग करने में निमित्तभूत पूर्वोत्तरक्षणरूप हस्तगत भेद का सम्पादन करनेवाली ‘उत्क्षिपति’ क्रिया कहलाती है। ३. नीलादि-पदार्थों में भेद दिखलानेवाली काल-शक्ति है जिस शक्ति विशेष के द्वारा आभास भेद दिखायी देता हो वही शक्ति-विशेष काल कहलाता है। ४. जो क्रिया प्रभु-परमात्मा में रहनेवाली है, वह क्रिया तो काल से अनवच्छिन्न होती है।