भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 343 में से

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पृष्ठ 197

१७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-३ नाम ? इत्याशङ्क्याह— कालः सूर्यादिसञ्चारस्तत्तत्पुष्पादिजन्म वा । शीतोष्णे वाथ तल्लक्ष्यः क्रम एव स तत्त्वतः ॥ ३ ॥ ये इयत्तया परिनिष्ठिता आभासाः सिद्धा, तद्यथा चन्द्रसूर्यादीनां सहकारमल्लिका कुटजादीनां शीतोष्णादेः परभृतमदविलासादेः त एव ‘कालः’ यतोऽपरिनिष्ठितं गमनपठनादि तैरियतया परिनिष्ठीयते परिवर्तकैरिव कनकं, स एव च सूर्यादीनां स्वभावविशेषस्तत्त्वतः परमार्थतः क्रमो, न अन्यः कश्चित् क्रमो नाम, क्रम एव च कालो, न अन्योऽसौ कश्चित्, इति एवकारो भिन्नाभिन्नक्रमो योज्यः, यौगपद्यमपि आभासयोः अपराभासापेक्षया क्रम एव, चिरक्षिप्ररादिधीरपि विततान्यत्ववशात् आभासभेदे क्रमरूप एव, परत्वापरत्वबुद्धिरपि स्फुटत्वादिनि तत्रैव, इति तेन तेन प्रतिमानवर्तकतुल्येन सूर्यसञ्चारादिना सह मीयमानो हेमस्थानीयो देवदत्ताभासस्य वैचित्र्य- भेद इत्थम् उच्यते—‘दिवसं गच्छति’ इति ॥ ३ ॥ है, ऐसी स्थिति में काल किसको कहा जाय ? इस शंका का उत्तर देते हैं— सूर्यादि ग्रहों की गति ही काल है अथवा उन-उन पुष्प-लतादि की उत्पत्ति ही काल है। सूर्यादि ग्रहों के द्वारा शीत-ऊष्ण होता है, वस्तुतः वही क्रम कहलाता है ॥ ३ ॥ ये ही मात्र परिमित सिद्ध आभास हैं सूर्यादि ग्रहों का आम्र, जूही, कुटजादि पुष्पों की उत्पत्ति और शीत, ऊष्णादि का होना तथा कोकिलों के मद-विलासादि का जो ज्ञान होता है वही तो काल है; क्योंकि अपरिमित का ज्ञान गमन-पठनादि के द्वारा ही सीमित ज्ञान होता है। जैसा कि स्वर्णकार स्वर्ण का परिमित भिन्न-भिन्न नाम एवं रूपवाले आभूषण गहने बना देता है और वही परमार्थतः सूर्यादि के स्वभाव की विशेषता है। उसी का नाम क्रम है, उससे भिन्न कोई क्रम नहीं है, क्रम ही काल है, दूसरा यह कोई नहीं है। इस प्रकार भिन्न-अभिन्न क्रम लगा लेना चाहिए, अर्थात् काल ही क्रम है एवं क्रम ही काल है। इसीको भेद एवं अभेद भी कहा जाता है, आभासों का एकी साथ होना दूसरे आभासों की अपेक्षा से वही क्रम है। विलम्ब से होना और शीघ्रता से होना यह बुद्धि भी विस्तारवाली दूसरी बुद्धि की अपेक्षा से वही आभास भेद हो जाने पर क्रमरूप हो जाती है, छोटेपन और बड़ेपन की बुद्धि भी स्पष्टरूप से उसी में भासती है, इसलिए उस-उस नाप में आनेवाले सूर्य संचारादि का साथ में अनुमान किया हुआ हेम स्थानीय देवदत्त के आभास का विचित्ररूप से भेद हो जाता है। जैसे ‘दिवसं गच्छति’ इस प्रकार से कहा जाता है ॥३॥ १. आदि शब्द से अन्य ग्रहों को ग्रहण करना होगा । जैसे—मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इत्यादि । २. वैशेषिकों का आत्मा से भिन्न काल द्रव्यरूप है। सांख्यों का कारण स्वभाववाला है। वैयाकरणों का काल नित्य ‘शब्दादि’ रूप में रहता हुआ अनाश्रित प्रवृत्ति स्वभाववाला है। बौद्धों का काल क्षणों की धारावाला होने के कारण परमार्थरूप है वस्तुतः वह कभी भी क्रमरूपता का अतिक्रमण नहीं करता, क्रम ही बाहर में कालरूप से व्यक्त होता है। ३. क्रम ही विशिष्ट है, परत्व एवं अपरत्वरूप नूतन स्थिति को दिखानेवाला, पुरातन क्रम सतत होनेवाले परत्व और अपरत्व के द्वारा बड़ी देरतक व्यवहार होते रहना, नहीं तो, बहुत शीघ्र व्यवहार के स्वरूप से, क्रम स्थिति को दूसरे पदार्थ के आभास से, अनेकरूप में परिच्छेद के द्वारा मूर्तिकृत दूरत्व एवं अदूरत्व से होनेवाले परत्व और अपरत्व इन दोनों का संकीर्ण होकर पदार्थों में अवस्थित रहना ही काल कहलाता है।

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