ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७५ ननु एवं कालो नाम भावस्वभावभूत एव अस्तु, का असौ कालशक्तिः ? इत्याशङ्क्याह— क्रमो भेदाश्रयो भेदोऽप्याभाससदसत्त्वतः । आभाससदसत्त्वे तु चित्राभासकृतः प्रभोः ॥ ४ ॥ इह स्वभावभेदमात्रं यदि क्रमात्मा कालः, तदङ्गुलीचतुष्टयं भिन्नस्वभावम् इति भिन्नकालं भवेत्, तस्मात् अरुणाभासस्य सद्भावः स्फुटप्रभापुञ्जस्य च असद्भावः—इत्येवंभूतो यो भेद आभाससद्भावासद्भावाभ्यामनुप्राणितः तत्कृतः क्रमः कालात्मा, तौ च आभासानां भावाभावौ न बाह्यहेतुकृतौ, इति—विस्तार्य उपपादितम्, इति य एव संवित्स्वभाव आत्मा स्वप्नसंकल्पादौ अच्छा तो, काल पदार्थों का स्वभावरूप भले ही हो, यह काल-शक्ति क्या चीज है ? ऐसी आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— भेद के आश्रय से क्रम रहता है और भेद भी आभास के सत् एवं असत् भाव से होता है । किन्तु आभास की सत्ता एवं असत्ता में प्रभु का विचित्राभास ही कारण है ॥ ४ ॥ यदि क्रमरूप काल को शक्ति का स्वभाव भेद मात्र ही माना जाय, तब तो चारों अङ्गुलियां भिन्न-भिन्न स्वभाववाली होने से भिन्न कालवाली ही हो जायेगी, इसलिए अरुणाभास का होना और स्फुटप्रभा-पुञ्ज का अभाव होना—इस प्रकार इन दोनों सत्त्व एवं असत्त्व भावों से अनुप्राणित कालरूप ही क्रम हो जाता है । ये दोनों आभासों में भाव एवं अभावरूप से रहते हैं, वे बाह्य- नीलादि हेतु के द्वारा नहीं होते, यह मैंने बाह्यार्थवाद निरास में विस्तारपूर्वक दिखा दिया है । इससे यह सिद्ध होता है कि जो संवित् स्वभाववाले परमात्मा हैं वही स्वप्न-संकल्पादि में, आभास की विचित्रता के निर्माण में पूर्ण समर्थ हैं; संवित् स्वभाववाले से ही ये दोनों सत्त्व और १. यदि स्वभाव भेद ही केवल काल का स्वरूप है, तो सभी अंगुलियों में भी काल का भेद मानना पड़ेगा । इसलिए आभास एवं अनाभास के द्वारा जो भेद प्रतीत होता है वह तो कालरूप का ही वैसा भेद क्रम है, इसमें भेद की कोई कारणता नहीं रहती, आभास के सद्भाव और असद्भाव से विचित्र भेद भासते हैं, वे दोनों स्वप्न-संकल्पादि में क्रम के उत्थापन सामर्थ्य से ही होते हैं । जबकि आपके द्वारा कहा गया है—एकस्यैव तु सा शक्तिर्यदेव भासते········ ।' एक चिद्रूप की ही तो वह शक्ति है जिससे यह सारा का सारा बाह्य-विषय भासित होता है । इस प्रकार प्रसङ्ग में भी कहा है— तमस्य लोकयन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते । प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विभज्यते ॥ यदि न प्रतिबध्नीयात्प्रतिबन्धाच्च नोत्सृजेत् । अवस्था व्यतिकीर्येरन्पौर्वापर्यविनाकृताः ॥ इस संसाररूपी यन्त्र का भगवान् चिदात्मा देव ही सूत्रधार कहा जाता है । इसलिए प्रतिबन्ध और अभ्यनुज्ञा [ सृष्टि-प्रलय आदि ] के द्वारा विश्व विभक्त हो जाता है यदि प्रतिबन्ध न करे एव प्रतिबन्ध करके अर्थात् उसे न छोड़ दे तो व्यवस्था विशीर्ण नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगी, पूर्वोत्तर क्रम के बिना व्यवस्था व्यवस्थित नहीं हो सकती है; क्योंकि भगवान् ही विचित्ररूप से पदार्थों को आभासित करते हैं ।