भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-५ आभासवैचित्र्यनिर्माणे प्रभुः प्रविष्णुः इति स्वसंविदितस्त एव तौ भवतः, स हि आत्मनि नीलादीन् आभासान् आभासयन् चित्रतया अपरिमेयया भासयति, तथाहि-लोहिताभासं घटा- भासम् उन्नताभासं दृढाभासं च सामानाधिकरण्येन घटाभासं पटाभासं च पृथक्त्वाभासेन अन्योन्यत्र आभासाभावेन, स्वात्मनि तु एकरसेन आभासेन, इयति च न क्रमस्य उदयः, यदा तु शरदाभासं हेमन्ताभासेन च सर्वथैव शून्यम् आभासयति हेमन्ताभासं च शरदाभासेन तदा कालात्मा क्रम उत्तिष्ठति, इति सेयम् इत्थंभूताभासवैचित्र्यप्रथनशक्तिः भगवतः 'कालशक्तिः' इत्युच्यते ॥ ४ ॥ चित्राभासकृत्त्वमेव स्फुटयति- मूर्तिवैचित्र्यतो देशक्रममाभासयत्यसौ । क्रियावैचित्र्यनिर्भासात्कालक्रममपीश्वरः ॥ ५ ॥ पदार्थस्य स्वं रूपं मूर्तिः, तस्या यत् वैचित्र्यं विभेदः तद्यथा गृहमिति अन्यत् स्वरूपं, असत्त्व होते हैं; क्योंकि वे ही अपने में नीलादि-आभास पदार्थों को आभासित करते हुए विचित्र- चित्ररूप से, अपरिमेय-असंख्य प्रकार से आभासित करते हैं तथा जगत् को भी आभासित करते- रहते हैं। जैसे लोहिताभास, घटाभास, उन्नताभास और दृढाभास इन सबों के साथ घटाभास और पटाभास अलग-अलग आभासों से तथा परस्पर आभासों के अभावों से, अपने स्वरूप में तो एकरस के आभास से आभासित होते हैं, और इतने तक क्रम का कोई उदय नहीं होता, किन्तु जब शरदाभास को हेमन्ताभास से शून्य प्रकाशित करते हैं और हेमन्ताभास को शरदाभास से शून्य प्रकाशित करते हैं तभी कालरूप क्रम उपस्थित होता है, इस प्रकार चित्र-विचित्ररूप से आभासों को फैलानेवाली जो प्रभु की शक्ति है, वही 'काल-शक्ति' कही जाती है ॥ ४ ॥ इस प्रकार विचित्राभास के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं- महेश्वर मूर्ति की विचित्रता से देशक्रम को आभासित करते हैं तथा क्रिया की विचित्रता के आभास से कालक्रम को भो आभासित करते हैं ॥ ५ ॥ पदार्थ का अपना स्वरूप ही मूर्ति है [ 'स्वरूपमात्रमन्योन्यभेदेनावभासमानमर्थानां मूर्तिः' अर्थात् मूर्ति उसी का नाम है जो परस्पर भिन्न-भिन्नरूपों से अवभासन होनेवाले पदार्थों का स्वरूपमात्र हो ] उसको विचित्ररूप से भिन्नता दिखायी पड़ती है । जैसे गृह भिन्न स्वरूपवाला है, १. संवेद्यरूप मूर्त्त पदार्थों का जो वैचित्र्यभाव है । जैसे गृह, प्राङ्गण, बाजार, मन्दिर उद्यान, अरण्य इत्यादि भेद, इन्हीं भेदों से विचित्रतापूर्वक प्रकाश करते हुए परमेश्वर देशक्रम अर्थात् दूरत्व-समीपत्व और विस्तृत-संकुचितरूप से अवभासित करते हैं, किन्तु एक की प्रत्यभिज्ञा के सामर्थ्य से जो स्वरूप का अभिन्न हस्तादि भेद है जिसका आगे चल कर प्रतिपादन करेंगे 'विमर्शक्येनातिरोहितता भिन्नद्रव्यात्मनः ।' उसका भिन्न-भिन्न देशत्व, भिन्न-भिन्न धर्मत्व है । इससे स्वरूप की एकता का ज्ञान हो जाता है, गच्छति चैत्रः पच्यते फलमिति' इस प्रकार क्रिया वैचित्र्यभाव को निर्भासित करने के कारण ईश्वर विरोध और अविरोध को अपनी स्वतन्त्रता से निर्भासित करते हुए कालरूप क्रम एक में विरुद्ध होने के कारण अनुचित होता हुआ भी भासित करते हैं । यही सूत्र का आशय है ।