भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-२, आ.-१, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७७ प्राङ्गणमिति अन्यत्, विपणिरिति अन्यत्, देवकुलमिति अपरम्, उद्यानमिति अन्यत्, अरण्यमिति तदितरत्, तस्मात् वैचित्र्यात् आभास्यमानात् देशरूपो दूरादूरविततत्वाविततत्वादिः क्रमो भगवता अवभास्यते, तदा तु गाढप्रत्यभिज्ञाप्रकाशबलात् तदेव इदं हस्तस्वरूपम् इति प्रतिपत्तौ मूर्तेर्न भेदः, अथ च अन्यान्यरूपत्वं भाति तदा एकस्मिन् स्वरूपे यदन्यत् अन्यत् रूपं तद्विरोध- वशात् असहभवत्क्रिया इति उच्यते, तस्या यत् वैचित्र्यं परिमितापरिमितरूपतात्मकं तदेकानु- सन्धानेन फलसिद्ध्यादिनिबन्धनवशात् यथारुचि चर्चित्रेन निर्भासयन् कालरूपं क्रममेव भासयति, न चैतत् वाच्यम्—एकस्वरूपस्य कथम् अन्यत् अन्यद्रूपमिति ? यतो—न असौ कश्चित् भावो य एवं विकल्प्यते, संविदेव हि तथा भाति, तथाभासनमेव च अस्या ऐश्वर्यम्, नहि भासने विरोधः कश्चित् प्रभवति, स हि सुखदुःखादेर्भासनकृत एव, तथा भासनाभाव एव हि विरोधतत्त्वम्, एतत् अपिशब्देन ईश्वरशब्देन च दर्शितम् ॥ ५ ॥ ननु एवम् आभासविषयाभ्यामेव देशकालक्रमाभ्यां भवितव्यम्, अनाभासश्च प्रमाता, स प्राङ्गण दूसरा स्वरूप है, बाजार उससे भिन्न है, देवस्थान का दूसरा ही स्वरूप है, उद्यान यह दूसरा स्वरूप है, जंगल यह उससे भिन्न ही है, इसलिए इन विचित्र-चित्र रूपों में आभासित होनेवाले आभासों से देशरूप दूर-समीप, विस्तृत-संकुचित इत्यादि क्रम को भगवान् आभासित करते हैं, जब तो गाढ प्रत्यभिज्ञा प्रकाश के बल से वही यह हाथ का स्वरूप है—ऐसी प्रतिपत्ति हो जाने पर मूर्ति का भेद नहीं भासता अर्थात् स्वरूप से अभिन्नता भासने लगती है और भिन्न-भिन्नरूपता भासती है तब तो एक ही स्वरूप में भिन्न-भिन्न रूप दिखायी पड़ता है। वह उसके विरोध के कारण उसके साथ न होनेवाली क्रिया कही जाती है, उस क्रिया की जो विचित्रता है वह तो परिमित होना तथा अपरिमित होना है, ठीक उसके एकत्व का अनुसन्धान करने पर [ जैसा कि चैत्र जाता है, फल पकता है । ] फल सिद्धि के कारण यथारुचि समझ-बूझकर भासित करते हुए कालरूप क्रम को ही भासित करते हैं, यह मत कहो—एक ही स्वरूप का भिन्न-भिन्नरूप कैसे हो सकता है ? क्योंकि वह कोई पदार्थ नहीं है जो ऐसा भिन्न-भिन्न विकल्पित हो जाय, संविद्रूप ज्ञान ही [ ‘आभासान्योऽन्यत्वेन’ अर्थात् अन्योन्यरूप से आभास ] वैसा भासता है इसी प्रकार भासना ही इसका परम ऐश्वर्य माना जाता है। उसके ऐसा भासित होने में कोई विरोध भी नहीं होता, वह तो सुख-दुःखादि के आभास से ही बना हुआ है; क्योंकि उसी प्रकार भासित न होना ही तो उसका विरोध है, यह ‘अपि’ शब्द से एवं ईश्वर शब्द से द्योतित होता है ॥ ५ ॥ अब शंका करते हैं कि आभास का विषय तो देश और काल का क्रम ही होता है और वह किसी से न भासित होनेवाला प्रमाता है, वह किसी का आभास नहीं है; क्योंकि उससे ही सब १. अनेक वस्तु में देशक्रम तो गृह और प्राङ्गण के जैसा होता है और कालक्रम आम्र-मञ्जरी के समान; एक वस्तु में न तो देशक्रम ही रहता है और न कालक्रम ही रहता है; क्योंकि उसमें दूरत्वादि का भेद नहीं होता और विस्तार भी नहीं होता । अंशो के एकरूप हो रहने के कारण परिपाकरूप से आम्र एवं फल के समान हो जाता है । वेद्यांश में ही कालक्रम की स्थिति रहती है संविद्रूप ज्ञान में नहीं रहती, ज्ञान में वेद्यांश काल कहा जाता है । ज्ञान के अंश में नहीं होता और न तो विमर्श अंश में ही रहता है । २. ईश्वर ही कालक्रम को अवभासित करता है । वह स्वयं अपने से नहीं अपितु कालक्रम से भासता है । २३