भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-६ हि न कस्यचित् आभासते—तस्य सर्वम् आभाति यतः, ततश्च तौ प्रमातरि कथं दृश्येते च ‘अभवम् अहं भवामि भवितास्मि, इति, ‘गृहे तिष्ठामि अरण्ये देवगृहे’ इति च, किं च स्वयं देशकालक्रमशून्यस्य किं दूरं किम् अन्तिकं किं वर्तमानं किम् अतीतं किं भावि, इति—प्रमात्राश्रयो भावेष्वपि क्रमो न युक्तः१, न चे प्रमातृनिरपेक्षेष्वपि तेषु स्वात्मनि दूरत्वादि भूतत्वादि वा ? तदेतत् समर्थयितुम् आह— सर्वत्राभासभेदोऽपि भवेत्कालक्रमाकरः । विच्छिन्नाभासः शून्यादेर्मातृभातस्य नो सङ्केत् ॥ ६ ॥ आभासित होते हैं, इसलिए देशक्रम और कालक्रम प्रमाता में कैसे हो सकते हैं ? किन्तु देखा तो जाता है कि मैं अभी हूँ, पहले था और आगे भी होऊँगा, यह सब आभास प्रमाता में दिख रहा है इसीका नाम कालक्रम है, गृह में स्थित हूँ; अरण्य में रहता हूँ; देवस्थान में रहता हूँ; यह सब देशक्रम माना जाता है, भगवान् तो स्वयं देश और काल के क्रम से शून्य है, इसलिए उसके लिए क्या दूरत्व है एवं क्या समीपत्व है, क्या वर्तमान है, क्या अतीत हुआ और क्या भविष्य ही होगा ? प्रमाता का आश्रय क्रम भाव-पदार्थों में भी नहीं होना चाहिए और प्रमाता से निरपेक्ष भी उन पदार्थों में अपने आप दूरत्वादि अथवा वर्तमानादि रहें, यह कहो, तो ऐसा होना कैसे संभव होगा ? इस बात का समर्थन करने के लिए कहते हैं— सर्वत्र आभासों का भेद तो कालक्रम से होता है। जो विच्छिन्नाभास है, वह स्वयं भासित शून्यादि प्रमाता के बिना नहीं हो सकता है ॥ ६ ॥ १. देश-काल का क्रम पदार्थों में ही रहे, प्रमाता में नहीं; क्योंकि यह प्रमाता तो निराभास है, उसीसे सब कुछ आभासित होता है किन्तु वह प्रमाता किसी से भी नहीं भासित होता है और न किसी को आभासित करता है, इन दोनों को अनाभास का हेतु बताया है इसलिए ये दोनों सतत प्रकाश स्वभाव- वाले कैसे हो सकते हैं ? कोई कारण इसमें नहीं मिलता है, अतः इनका अभाव ही है यही कहना युक्तियुक्त है, किन्तु दोनों प्रतीत तो होते हैं, मैं था, मैं वर्तमान अवस्था में हूँ और आगे भी होऊँगा, इस प्रकार गृह, ग्राम, और अरण्यादि में रहता हूँ एवं भवन पर से मंच पर रह रहा हूँ, और प्रमाता में हूँ एवं उसके अभाव में रहता हूँ, अपने से, भूतादिकों से, दूरत्वादि से भी हमारा योग नहीं रहता है, इस प्रकार अनुभव की आलोचना के द्वारा दिन की अपेक्षा से ही दोनों पदार्थों में निरूपित किये जाते हैं । ये दोनों ग्राह्य में कैसे रहेंगे, इस प्रकार कहाँ ये दोनों बद्ध या प्रविष्ट होंगे ऐसा जो मुग्ध होगा, वह दोनों सूत्रों से प्रतीत होता है । २. जो एक बार यह भासित होता है बारम्बार नहीं होता, इस ब्रह्मवेत्ता की युक्ति से निरन्तर अनवच्छिन्न प्रकाश स्वभाववाले परमार्थ प्रमाता सिद्ध हो जाता है । उसमें कभी-भी आभास का भाव एवं अभाव नहीं होता, इसलिए काल का भी स्पर्श नहीं होता है, वह पदार्थों में भी नहीं रहता है, अपितु पदार्थ इसमें रहते हैं ।