भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

अ.-२, आ.-१, का.-६-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७९ देशक्रमोऽपि भावेषु भाति मातुर्मितात्मनः । स्वात्मैव स्वात्मना पूर्णा भावा भान्त्यमितस्य तु ॥ ७ ॥ सर्वेषु वस्तुषु एकानेकरूपेषु यः कालात्मा क्रमः तस्य य आकरः-उत्पत्तिनिबन्धनम्, इति व्याख्यात आभासस्य भावाभावकृतो भेदः स शून्यप्राणबुद्धिदेहादेः भवति, इति संभाव्यते, यतः स शून्यादिः विच्छिन्नभाः, नहि तस्य भासनं स्वरूपं—नीलादिवत् जडत्वात्, अपि तु संवित्स्फुरण- मस्य भासनं, तत् यदा अस्य नास्ति, यथा सुप्ते देहस्य संसारयात्रा पतितत्वे शून्यस्य प्राणादेः तदा अस्य भासनं विच्छिद्यते, इति—आभाससद्भावासद्भावकृतः कालक्रमोऽस्ति 'अतीतोऽहं बालदेहा- भासरूपो भवामि युवदेहाभासरूप' इति, स च यतः प्रमाता अहंभावसमावेशनात् अपरिपूर्णात् अत एव उद्रिक्तकालक्रमत्वात् भावेष्वपि कालक्रमम् आभासयति, 'योऽहं बालोऽभवं तत्सहभावी घटाभासोऽपि अभवत्' इति, न तु यः सकृत् विभात इति अनया वाचोयुक्त्या अविच्छिन्नभासनः पदार्थ-भावों में देशक्रम भी परिमित प्रमाता के द्वारा ही भासित होता है। जैसे आत्मा अपने आप में ही परिपूर्ण है, इसी प्रकार परमेश्वररूप अपरिमित आत्मा से पदार्थवर्ग भी तो परिपूर्ण है ॥ ७ ॥ जो एक या अनेक रूपवाली सभी वस्तुओं में कालरूप क्रम रहता है वह उसकी उत्पत्ति में कारण है, उसकी तो व्याख्या कर दी है। आभास का भाव और अभाव के द्वारा भेद प्रतीत होता है वह शून्य, प्राण, बुद्धि और देहादि प्रमातृत्ता को लेकर ही होता है, ऐसी संभावना भी हैं; क्योंकि वे शून्यादि प्रमाता भिन्न-भिन्न रूपों में हैं, उनका स्वयं भासित होना स्वरूप नहीं है— नीलादि-पदार्थों के समान; क्योंकि वह तो जडरूप है, वस्तुतः इसका संविद्रूप से स्फुरित होना ही भासन है, इसलिए इसका ज्ञान नहीं होता है। जैसे सुप्तदशा में देह की संसारयात्रा छूट जाने पर [ मूर्च्छादि में ] शून्य प्राणादि का भासन होना सर्वथा बंद हो जाता है, इसलिए प्रमाता का भाव और अभाव के द्वारा किया हुआ कालक्रम होता है। जैसा कि मैं अतीतकाल में बाल्यावस्था के रूप में भासित होता रहा, सम्प्रति युवावस्था के रूप में भासित हो रहा हूँ; क्योंकि प्रमाता में अहंभाव का समावेश रहता है एवं अपरिपूर्ण दशा हो जाती है इसीलिए कालक्रम के उच्छिन्न हो जाने से पदार्थ-भावों में भी कालक्रम आभासित रहता है। जब मैं बालक था, तब मेरे साथ में होनेवाला घटाभास भी हो रहा था, जब कि वह सर्वदा भासित १. जब एक ही स्वरूप में ऐक्य के अनुसंधान से एकता का बोध होने लगता है तब तो मूर्त्ति में भी अभेद की प्रतिक्षण भिन्न-भिन्नरूपता आ जाती है और वह सब कालकृत ही होती है देखो—कार्यात्मक सभी वस्तुओं में छः प्रकार से पदार्थों के विकार उत्पन्न होते हैं, यह सब क्रमपूर्वक ही होता है। जैसे घट- पटादि पदार्थों का उत्पन्न होना, यह जन्म क्रिया का अवभास है, बदलना [ परिणाम ] होना, अभिवृद्धि होना, क्षीणता को प्राप्त होना एवं नाश होना; यही सत्ता क्रियाओं का प्रकाश है और उन्हीं में एक-एक का जन्म-परिणाम इत्यादि भिन्न-भिन्न अवभास है। उसी प्रकार आगे होनेवाले फल इत्यादि में हरापन-पीतपन का होना भी तो परिणाम क्रिया का आभास है। यही एकता एवं अनेकता कालरूप में रहती है।