ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-८ प्रमाता संविद्रूपः तस्य स्वात्मनि कालक्रमः, नापि तदपेक्षया वेद्ये भावजाते, तद्धि तत्र अभेदेन भाति इति । एवं देशक्रमोऽपि मितात्मनः परिच्छिन्नस्वरूपस्य शून्यादेः देहान्तस्य स्वात्मनि भाति ‘इह तिष्ठामि’ इति स्वापेक्षया च, भावेष्वपि यत् मम-संयोगपारिमित्येन वर्तते तदन्तिकम् इतरत् दूरम् इति, अमितस्य स्वरूपेयत्ता, शून्यस्य तु संवित्तत्त्वस्य भावाः स्वात्मना अहम्भावेन यतो भान्ति ततः पूर्णा—अपरिच्छिन्नस्वरूपेयत्ताकाः, यतः स्वात्मा तस्य तथाभूत एव इति समुच्चयो- पमा, तदुक्तं ‘अपूर्वापरं हि इदं मूर्तितः क्रियातश्च सर्वं सर्वतः पूर्णम्’ इति क्रियाप्रसङ्गात् इह कालक्रमः प्राकरणिको दृष्टान्तत्वेन एतत्प्रसङ्गात् देशक्रमो निरूपितः, दृष्टान्तश्च पूर्वं वाच्य, इति वैचित्र्यनिरूपणावसरे देशक्रमस्य आदौ अभिधानं न्याय्यम्, उपसंहारे तु प्राकरणिकस्य कालक्रम- स्यैव आदौ निर्देशः, पश्चात्तु प्रासङ्गिकस्य देशक्रमस्य इति ॥ ६-७ ॥ ननु एवं सत्ये प्रमातरि भगवति नास्त्येव क्रिया, इति आयातं—कालक्रमाभावात्, क्रमा- श्रयेण च तस्या अवस्थानात् ? इत्याशङ्क्याह— होनेवाला आभास नहीं था, इस वाचिक-युक्ति से अविच्छिन्न आभासवाला प्रमाता ज्ञानरूप है उसके अपने स्वरूप में कालक्रम रहता है और न तो उसकी अपेक्षा से वेद्य भाव-समूह में जाता है, उसमें तो वह अभेदभाव से भासता है । [ ‘अथ द्वितीयश्लोकव्याख्या एवमिति देशक्रम- स्यापि एषैव सरणिरित्यर्थः’ ] अब द्वितीय श्लोक की व्याख्या की जाती है—इस प्रकार देशक्रम का भी यही मार्ग है । इसी प्रकार से देशक्रम भी सङ्कुचित-परिच्छिन्नरूप शून्यादि से लेकर देह पर्यन्त अपने में भासता है ‘इह तिष्ठामि’ अर्थात् यहाँ पर बैठा हूँ और यह अपनी स्वयं की अपेक्षा से होता है, पदार्थों में भी जो मेरे संयोग से मिला रहता है वह उससे निकटवर्ती कहलाता है और इससे भिन्न रहता है, वह दूर कहलाता है, इतना ही अपरिच्छिन्नता का स्वरूप माना जाता है, शून्य संवित्तत्त्व में तो सम्पूर्ण पदार्थ अहम्भाव से भासते हैं इसी से ये सभी पूर्ण हैं और अपरिच्छिन्न स्वभाववाले हैं; क्योंकि उसका अपना स्वरूप वैसा ही है । ‘अपरिच्छिन्नस्वरूपेयत्ताकाः एव’ अर्थात् अपरिच्छिन्न स्वरूपवाले ही हैं, इस प्रकार यह समुच्चय उपमा अलङ्कार है, इस विषय में कहा भी गया है—‘मूर्ति में तो दूरत्व-समीपत्वादि एवं पूर्वोत्तर-रूपत्व रहता है और क्रिया में भूत-भविष्यदि काल रहता है । किन्तु यह तो सब से परिपूर्ण है इसमें न तो दूर-समीपत्व, पूर्वोत्तरत्व है और न तो भूत-भविष्यदि ही हैं । इन सबों से रहित है । इसलिए यह चारों ओर से पूर्ण है । इस प्रकार क्रिया के प्रसंग को लेकर कालक्रम प्रकरण के अनुसार दृष्टान्त द्वारा निरूपण किया गया है । इसी कालक्रम के प्रसंग से देशक्रम का भी निरूपण हो गया और दृष्टान्त को पहले देना चाहिए, मूर्ति की विचित्रता के निरूपण काल में ही सर्वप्रथम देशक्रम का अभिधान करना समुचित माना जाता है, उपसंहार काल में तो ‘सर्वत्राभासभेदोऽपि’ प्राकरणिक इस कालक्रम को लेकर प्रारम्भ में ही निर्देश कर दिया है, किन्तु पश्चात् तो प्रसंग से आनेवाले देशक्रम का ही निरूपण हुआ है ॥ ६-७ ॥ अब शङ्का करते हैं कि इस प्रकार परमार्थ प्रकाशरूप भगवान् में क्रिया ही नहीं रहती है, यह तो स्वयं प्राप्त है—कालक्रम का अभाव होने से और क्रम का आश्रय लेकर ही क्रिया रहती है । इस आशङ्का का उत्तर देते हैं—