ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
१४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-५ स्मृतौ यैव स्वसंवित्तिः प्रमाणं स्वात्मसंभवे । पूर्वानुभवसद्भावे साधनं सैव नापरम् ॥ ५ ॥ इह अनुभूतो विषयः प्रकाशते स्मृतौ, तत्र विषयस्य सा स्मृतिः न नूतनः प्रकाशः अपि तु अस्य स प्राच्य एव अनुभवप्रकाशः, चानुभवो ज्ञानरूपत्वेन ज्ञेयरूपत्वाभावात् न ज्ञानान्तरसंवेद्यः अपि तु स्वप्रकाशः, स च स्मृतिकाले यदि असन् तत् कथं प्रकाशताम्, भवतु वा असौ तथापि स्मृतिप्रकाशोऽनुभवप्रकाश इति अन्योन्यभिन्नं युगलम् इति न कदाचित् स्मृतिः स्यात्, तस्मात् एतत् एवमुपपद्यते, यदेव स्मृतिस्वसंवेदनम् तदेव अनुभवस्य स्वसंवेदनम्, न तु अपरं स्वसंवेदन- व्यतिरिक्तं प्रत्यक्षम् अनुमानादिकं वा तत्र क्रमते, ततश्च तावत्कालव्यापि अविच्छिन्नमेकं यत् स्वसंवेदनं तदेव 'प्रमातृतत्त्वम्' इति सिद्धम् । अन्यत्र अनुभवितरि स्मर्त्ता अन्यो न उपपद्यते, इति अनया च्छायाया स्मृत्या प्रमातृसिद्धिः पूर्वमुक्ता, इदानीं तु स्वसंवेदनैकीभावेन भङ्ग्यन्तरेण इति विशेषः ॥ ५ ॥ ननु अनुभवातिरिक्तेऽपि अर्थे सन्तु विकल्पाः प्रमाणम्, अप्रामाण्यं हि बाधबलात् भवति, बाधाभावे तत् कथं स्यात् ? इति आशङ्क्य, सोऽपि अयं बाध्यबाधकभावः सत्यासत्यप्रविभाजनाय विश्वेषां व्यवहाराणां जीवितभूतो, न एकेन प्रमातृतत्त्वेन बिना घटत इति वितत्य दर्शयति— स्मृति में अपना संवित्तिज्ञान है—वही अपनी सत्ता में प्रमाणित होता है। पूर्व के अनुभव की सत्ता में भी वही संवित्ति-साधन होती है, दूसरा कोई भी नहीं बन सकता ॥ ५ ॥ अनुभव किये हुए विषय का ही स्मृति में प्रकाश होता है और उसमें विषय की जो स्मृति है उसका कोई नूतन प्रकाश नहीं है किन्तु वही स्मृति का प्रकाश ही है—जिसका पूर्व में अनुभव प्रकाश हुआ था और वह ज्ञानरूप होने से ज्ञेयरूप का उसमें अभाव मिलेगा । इसीलिए वह दूसरे ज्ञान से वेद्य नहीं हो सकता । अपितु स्वयं प्रकाशरूप है और यदि वह अनुभव स्मरण काल में नहीं है तो कैसे प्रकाशित होगा ? यदि मान लो कि उसका प्रकाश है तो भी स्मृतिप्रकाश और अनुभवप्रकाश ये दोनों भिन्न-भिन्न [ संवेदन द्वय ] ज्ञान हैं, इस प्रकार स्मृति कभी भी नहीं हो सकेगी । इसलिए यह सिद्ध होता है कि—जो स्मृति का संवेदन है—वही अनुभव का भी संवेदन है, वहाँ पर कोई दूसरा स्वसंवेदन से अतिरिक्त प्रत्यक्ष या अनुमान नहीं आ सकता और इससे सिद्ध हुआ कि उस काल पर्यन्त रहनेवाला अविच्छिन्न एकसंवेदन ही प्रमातृतत्त्व है । दूसरे अनुभव करनेवाले में दूसरा स्मरण करनेवाला नहीं होता है, इस छायारूपी स्मृति से प्रमाता की सिद्धि का पूर्व में प्रतिपादन किया गया है, उसी को इस समय स्वसंवेदनात्मक एकीभावरूप दूसरे प्रकार से ही कहा जाता है—यही इसकी विशेषता है ॥ ५ ॥ अब शंका करते हैं कि अनुभव से अतिरिक्त कार्य-कारणभाव आदि अर्थ में विकल्प भले ही प्रमाण हो; क्योंकि अप्रामाण्य तो बाध के बल से ही होता है जब बाध नहीं है—तो, अप्रामाण्य कैसे बन सकेगा ? ऐसी आशंका कर, उत्तर देते हैं कि वह बाध्य-बाधकभाव भी जब कि सत्य और असत्य के विभाग करने के लिए सभी व्यवहारों का जीवन है, वह प्रमाता के बिना नहीं घट सकता है—इसी को विस्तारपूर्वक दिखाते हैं—
अ.-१, आ.-७, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४७ बाध्यबाधकभावोऽपि स्वात्मनिष्ठाविरोधिनाम् । ज्ञानानामुदियादेकप्रमातृपरिनिष्ठितेः ॥ ६ ॥ ‘बाधाभावे प्रामाण्यम्’ इत्येतदर्थम् अवश्यसमर्थ्यो यो बाधव्यवहारः सोऽपि कथम् इति अपि-शब्दस्यार्थः, इह शुक्त्या तावत् रजतस्य न काचित् बाधा नाम क्रियमाणा दृश्यते, शुक्तिज्ञानेन रजतज्ञानं बाध्यते इत्यपि न युक्तम्—स्वस्मिन् विषये आत्मनि च स्वरूपे द्वयोः ज्ञानयोः परि- निष्ठितयोः विश्रान्तयोः अन्योन्यं विरोधस्य अभावात् । अथ अयमेव विरोधः परस्परपरिहाररूपः र्तार्ह सर्वेषां ज्ञानानां विरोधात् बाध्यबाधकभावस्य परिनिष्ठैव न लभ्या—इति सुतरां विघटेत सत्येतरप्रविभागः । नञ्पि अत्र तन्त्रेण व्याख्येयः । एतदुक्तं भवति—यदि ज्ञानं स्वयं नश्यति तदा किं ज्ञानान्तरेण अस्य कृतं, न हि तेन तत्कालेऽसंभवता तस्य विषयापहारः कर्तुं शक्यः, न रजतम् इत्यपि ज्ञानं स्वं रजताभावं विषयोकुर्वन् न विषयम् अवहरेत् रजतज्ञानस्य । अथापि ज्ञानं ज्ञाना- न्तरेण नाश्यते इत्यपि पक्षः, तत्रापि सर्वेषां ज्ञानानाम् इयमेव सरणिः—इति किंचिदेव बाध्यम् इति कथं स्यात् ? यदा तु रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानं च एकत्र स्वसंवेदने विश्राम्यतः तदा एतत् उपपद्यते । तथाहि—एकत्रापि प्रमातृतत्त्वे विश्राम्यतां ज्ञानानां नैकप्रकारैव विश्रान्तिः अपि तु विचित्रतयैव सा संवेद्यते, तथाहि—नोलम् इति उत्पलम् इति ज्ञाने प्रमातरि विश्राम्यन्ती परस्पर- बाध्य-बाधकभाव भो एकमात्र प्रमाता में परिनिष्ठित होने से अपने में रहनेवाले अविरोधी ज्ञानों का उदय होता है ॥ ६ ॥ ‘बाध्यभावे प्रामाण्यम्’ बाध का नहीं रहना यह अवश्य समर्थन करनेयोग्य बाध व्यवहार है—वह भी कैसे होगा, यह ‘अपि’ शब्द का अर्थ है, पहले शुक्तिका से रजत का कोई बाध किया जाता हो—ऐसा नहीं देखने में आता है, शुक्तिज्ञान से रजतज्ञान बाधित होता हो यह भी बात नहीं है; क्योंकि अपने विषय में तथा आत्मा और अपने स्वरूप में ये दोनों ज्ञान परिनिष्ठित रहने के कारण विश्रान्त रहते हैं, इन दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है। यदि अब कहो कि यह विरोध परस्पर परिहाररूप है—तब तो, सभी ज्ञानों के विरोध से बाध्य-बाधकभाव को सत्ता हो नहीं मिलेगी; क्योंकि मिथ्या बुद्धि ही सत्य बुद्धि का तिरस्कार कर देगी। यहाँ ‘नञ्’ शब्द का भी तन्त्र से व्याख्यान करना होगा अर्थात् यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान अपने से विनष्ट हो जाता है—तो, दूसरा ज्ञान उसका क्या कर सकता हैं; क्योंकि वह दूसरा ज्ञान तो उस समय नहीं है। अतः उसके विषय [ रजत ] का अपहार कर सकें, रजतज्ञान रजत के अभावज्ञान को विषय नहीं कर सकता है और रजतज्ञान के विषय को भी अपहरण नहीं कर सकता। यदि मान लो कि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से विनष्ट किया जाता है, यह पक्ष है—तो, वहाँ पर भी ज्ञानों का यही बाध्य-बाधकभाव प्रकार है, यही एक मार्ग सभी ज्ञानों का है। तब फिर कुछ ज्ञान ही बाधित होता है—यह कैसे बनेगा ? जब कि एक ही संवेदन में रजतज्ञान और शुक्तिज्ञान विश्राम लेते हैं—तब तो, किञ्चित् बाधित हो सकता है, जैसे एक ही प्रमाता में विश्राम लेनेवाले ज्ञानों के एक प्रकार से विश्रान्ति सब स्थलों में नहीं होती है किन्तु विचित्ररूप से ही उनका ज्ञान होता है, जैसा कि यह नील है और यह उत्पल है—ये दोनों ज्ञान प्रमाता में विश्राम लेते हुए परस्पर
१४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-६ रोपरागाभासेन विश्राम्यतः । घट इति पट इति परस्परानाश्लेषेण शुक्तिका इति न रजतम् इति वा ज्ञानं रजतम् इति ज्ञानस्य उन्मूलन तदीयविमर्शात्मकप्रमारूपव्यापारानुवर्तनविध्वंसं कुर्वत् प्रमातरि प्रतिष्ठां भजते । एवं कार्यकारणभावादौ विश्रान्तिवैचित्र्यं प्रमेयासंभवि प्रमात्रा स्वात- न्त्र्येण निर्मितं तत एव अस्य प्रमास्वतन्त्रतादायि वाच्यम् । एवमेकत्र प्रमातरि पूर्वज्ञानस्य परिवर्जनेन यतो निश्चिता स्थितिः, अतो बाध्यबाधकव्यवहार उपपन्नः, नीलादिवत् किल तानपि व्यवहारान् स एव परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् आभासयति तत् तेऽपि सत्या एवेति ॥ ६ ॥ विशेषण और विशेष्यभाव से विश्रान्त हो जाते हैं। यह घट है और यह पट है—यह ज्ञान परस्पर पृथक् ही होता है; यह शुक्ति है, रजत नहीं है यह ज्ञान रजतज्ञान का उन्मूलन करता हुआ, उसके विमर्शरूप प्रमाव्यापार को भी विध्वंस करता हुआ प्रमाता में स्थिर होकर रहता है । इसी ढंग से कार्य-कारणभाव आदि में भी विश्रान्ति की विचित्रता, प्रमेय की असंभवता, प्रमाता की स्वतन्त्रता से निर्मित होता है, इसीलिए यह ज्ञान प्रमा को स्वातन्त्र्य देनेवाला कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि एक प्रमाता में रजतज्ञान को हटाकर शुक्तिज्ञान की निश्चित स्थिति हो जाती है, अतः बाध्य-बाधक व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है, नीलादि पदार्थों के समान उन रजत द्विचन्द्रादि के व्यवहार को परमेश्वर अपनी स्वतन्त्रता से भासित करते हैं; इसलिए वे असत्य होते हुए भी सत्य ही भासित होते हैं ॥ ६ ॥ १. जो ये असत्यरूप से कहे गये रजत, द्विचन्द्रादि के व्यवहार आभासित हो रहे हैं वे सभी परमेश्वर चिद्रूप की स्वातन्त्र्य-शक्ति से ही प्रतिभासित होते हैं और वे सभी सत्य ही हैं । इसलिए सत्यरूप ही कहे हुए हैं उनमें मिथ्यात्व थोड़ा भी नहीं होगा— या सैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूषिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ यह जो संविद्रूप प्रतिभा-शक्ति भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रम से अनुरंजित है वह क्रम से शून्य [ देश-कालादि के स्पर्श से रहित ] अनन्त चिद्रूप प्रमाता महेश्वर ही है । और इस विषय में पूर्व गुरुजनों के द्वारा भी कहा गया है । तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः । एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ॥ तथा यत्र सदित्येवं प्रतीतिस्तदसत्कथम् । यत्सत्तत्परमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः ॥ सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थतः । मिथ्याज्ञानविकल्पानां सत्त्वं चिद्व्यक्ति व्यक्तिता ॥ विद्यते तत्तदत्रापि शिवत्वं केन वार्यते । इति चेदेषु सत्यत्वं स्थितमेव चिदुद्गमात् ॥ तथा शिवोदयादेव भेदो मिथ्यादिकः कथम् । व्यवहाराय सत्यत्वं न च वा व्यावहारिकम् ॥ इत्यादि अनेक स्वभाव वाली शक्तियों के द्वारा व्यवहार करते हुए भी उस-उस शक्ति के अभेदभाव से शक्तिमान् होने के कारण उस-उस प्रकार से शिवत्व की स्थिति रहने से एक शिव ही सर्वत्र रहता है ।
अ.-१, आ.-७, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४९ अत्र परकीयं मतम् आशङ्कते—दूषयिष्यामीति— विविक्तभूतलज्ञानं घटाभावमतिर्यथा । तथा चेच्छुक्तिकाज्ञानं रूप्यज्ञानाप्रमात्ववित् ॥ ७ ॥ इह शुक्तिकाज्ञानं स्वात्मानं संविदत् स्वात्माभिन्नं प्रमाणं बुध्यते, 'तत्परिच्छिनत्ति' इति न्यायात्, तत्परिच्छेदानान्तरीयकतश्च अन्यव्यवच्छेद इत्यशुक्तिज्ञानरूपस्य रजतज्ञानस्याप्रमाणत्व- वेदनं तदेव उच्यते—यत् एतत् शुक्तिकासंवेदनाभिन्नप्रमाणत्ववेदनम्, न च एतत् अपूर्वं—यत् वस्त्वन्तरज्ञानमेव वस्त्वराभावज्ञानम् इति, शुद्धभूभागग्रहणमेव हि घटाभावज्ञानम् इति प्रसिद्ध- मेतत् । एवम् अप्रमाणतासंवेदनमेव रजतज्ञानस्य बाध्यत्वम् उच्यते, अतश्च बाध्यबाधकत्वम् एवं सिद्धम्, इति चेत् अस्माभिः उच्यते—तत् किं प्रमात्रैक्येनेति ॥ ७ ॥ अत्र प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य सिद्धौ तत्त्वमुपपादयिष्यन् दृष्टान्तमेव तावत् परदर्शने दूषयति— अब बाध्य-बाधकभाव में दूसरे के मत की आशंका करते हुए उसका खण्डन करेंगे— घटादि के अभावरूप शुद्ध भूतल में जैसे घटाभाव बुद्धि होती है उसी प्रकार रजतज्ञान के अप्रमाज्ञान में शुक्तिका का ज्ञान होता है ॥ ७ ॥ भूतल में शुक्तिका सम्बन्धी ज्ञान होता है उस शुक्तिका ज्ञान को अपने स्वरूप से अभिन्न जानता हुआ परिच्छिन्न अर्थात् स्वस्वरूप प्रमाण मानता हुआ जिसको जानता है उससे जो भिन्न है—उसे दूर कर देता है, 'तत्परिच्छिनत्ति' इस युक्ति द्वारा और उससे भिन्न का परिच्छेद करना आवश्यक होता है इसलिए यहाँ अन्यव्यवच्छेद [ रूप्य व्यवच्छेद ] इस अशुक्ति ज्ञानरूप रजतज्ञान की अप्रमाणता का ज्ञान करना इसी को कहा जाता है जो यह शुक्तिज्ञान का अभेदरूप प्रमाण जानता है और यह कोई नयी बात नहीं है, जो कि दूसरी वस्तु का ज्ञान ही उससे भिन्न वस्तु के अभाव का ज्ञान कराता हो, जैसा कि शुद्ध भूतल का ज्ञान करना ही घटाभाव ज्ञान है—यह प्रसिद्ध है। इस प्रकार अप्रमाणरूप ज्ञान ही रजतज्ञान को बाधित करता है, इसलिए ऐसा बाध्य- बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि बाध्य-बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि दूसरे लोग कहते हो तो हमने भी कहा है कि प्रमाता के ऐक्य ज्ञान से क्या लाभ होगा ? ॥ ७ ॥ इस प्रसंग से अभाव व्यवहार सिद्ध हो जाने पर यथार्थता सिद्ध करते हुए दूसरों के दर्शन में दृष्टान्त [ विविक्त भूतल ज्ञान ] को ही दूषित करते हैं— इस प्रकार मिथ्या ज्ञानों के विकल्परूप जो रजत-सर्पादि हैं उनका व्यवहार नीलादि पदार्थों के समान होता है और इन सबों में चिद्रूप की प्रकाश मानता विद्यमान रहती है, वही उनका परमार्थत्व माना जाता है; क्योंकि वह चिद्रूप की अभिव्यक्ति है इसलिए यह फैलाव-विस्तार उस-उस रूप से शिव का ही है ठीक-ठीक रूप से तो मात्र मिथ्यात्व का भेद ही व्यवहार का प्रयोजक होता है जिससे घट ज्ञान और रजत ज्ञान इन दोनों में भेद देखा जाता है किन्तु परमार्थतः नहीं के बराबर है और व्यवहार की सत्यता से परमार्थ की सत्यता बाधित भी नहीं होती, सर्वत्र व्यवहार वैसा ही होता है।
१५० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-८-९ नैवं शुद्धस्थलज्ञानात्सिद्ध्येत्तस्याघटात्मता । न तूपलब्धियोग्यस्याप्यत्राभावो घटात्मनः ॥ ८ ॥ यो दृष्टान्त उक्तः स एव न, कुतः ? इति चेत् उच्यते—इह भूतलं न घट इति तादात्म्येन अभावो व्यवहर्तव्यः कदाचित्, कदाचित् व्यतिरेकेण ‘इह भूतले घटो न’ इति । तत्र शुद्धभूतल- ज्ञानात् आद्योऽयं व्यवहारः सिध्यति, यत्र दृश्यत्वं न उपयोगि, उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरपि हि यस्य नास्ति पिशाचादेः—स्वभावबलात्, यस्य वा शब्दादेः तद्ग्राहक श्रोत्रादिसामग्रीसाकल्यस्य, तत्र एकज्ञानसंसर्गिवस्त्वन्तरप्रतिपत्त्यभावेनापि निश्चयात् तस्यापि तादात्म्येन अभावो व्यवहार्यः— भूतलं न पिशाचो न शब्दः इति, यत्र तु दृश्यत्वं विशेषणम् अवश्यम् उपयोगि तत्र व्यतिरेकेण अभावे व्यवहर्तव्ये न एषोऽभ्युपायः ॥ ८ ॥ कुतः ? इति चेत्—अतिप्रसङ्गात् इति ब्रूमः, तमेव दर्शयति— विविक्तं भूतलं शश्वद्भावानां स्वात्मनिष्ठितेः । तत्कथं जातु तज्ज्ञानं भिन्नस्याभावसाधनम् ॥ ९ ॥ विद्यमानेऽपि घटे भूतलं शुद्धमेव, नहि भावा मिश्रीभवन्ति ततश्च तदापि शुद्धभूतलज्ञानम् अस्ति, इति सत्यपि घटे कथम् अभावो व्यतिरेकेण न व्यवह्रियेत—अत्र भूतले घटो नास्ति इति, शुद्ध भूतल ज्ञान से उसका घटाभावरूप नहीं सिद्ध हो सकता। वहाँ पर घटरूप योग्य प्रतियोगी की उपलब्धि का भी अभाव है ॥ ८ ॥ जहाँ पर घटाभाव रहता है वही अधिकरणरूप ही घटाभाव माना जाता है, इसमें दृष्टान्त दिया है सो नहीं हो सकता ? क्योंकि यहाँ भूतल है, घट नहीं है, घटाभाव को भूतलरूप ही समझो, भूतल में घटाभाव है तो वह भूतलरूप है। जैसा कि वृक्ष में पिशाचाभाव है तो वृक्षरूप ही है ‘इह भूतले घटो न’ अर्थात् यहाँ पर भूतल में घट नहीं है। शुद्ध भूतल ज्ञान होने से तादात्म्य का ही व्यवहार सिद्ध होता है, जहाँ पर प्रतियोगी की दृश्यता उपयोगी नहीं है, वहाँ पर उसकी प्राप्ति भी तो नहीं हो सकती हैं; क्योंकि उसका वैसा स्वभाव ही है, जैसा कि शब्दादि को ग्रहण करने में श्रोत्रादि सामग्री की सफलता होती है, उस [शब्दादि] में एक ज्ञान के सम्बन्धि दूसरी वस्तु की सफलता रहती है, एकज्ञान संसर्गी दूसरी वस्तु में ज्ञान का अभाव रहने से भी निश्चय उस [पिशाच शब्दादि] को भी रूप से अभाव व्यवहृत होता है—जैसे भूतल न तो पिशाच है और न शब्द है, जहाँ पर दृश्यत्व विशेषण होगा वहाँ पर ही इसका उपयोग घट सकता है। यदि वहाँ व्यतिरेक से व्यवहार करना हो तो, यह उपाय नहीं हो सकता है ॥ ८ ॥ किस से ? यह यदि कहो तो, अत्यन्त आसक्तिपूर्वक हम कहते हुए उसी को दिखाते हैं— पदार्थों का स्वरूप अपने में परिनिष्ठित होने से भूतल तो सर्वदा शुद्ध ही रहता है। कभी भी शुद्ध भूतल का ज्ञान घट से भिन्न अभाव का साधन घट के रहते हुए नहीं हो सकता है ॥ ९ ॥ घट के विद्यमान रहने पर भी भूतल शुद्ध ही रहता है, भाव-पदार्थ किसी में मिलकर नहीं रहते हैं—तो फिर, घट के रहने के समय में भी शुद्ध भूतल का ही ज्ञान रहता है, इस प्रकार
अ.-१, आ.-७, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५१ 'तज्ज्ञानमिति' विविक्तभूतलभागज्ञानं 'जातु इति' कस्यांचिदेव दशायां घटासंनिधानरूपायां, भिन्नस्य घटस्य अभावं साधयति न तु सर्वदा-इति केन प्रकारेण भवेत्, एतेन अत्र भूतले पिशाचो नास्ति इत्यपि स्यात् - इति आपतितं मन्तव्यम् ॥ ९ ॥ ननु एव व्यतिरेकाभावनिष्ठो व्यवहारो लोके तावत् अविगीतः कस्यांचित् एव दशायां दृष्टः, तत्र का गतिः ? इत्याशङ्क्य चिरन्तनैरपरिदृष्टं तत्सिद्धिप्रकारं दर्शयति- किं त्वालोकचयोऽन्धस्य स्पर्शो वोष्णादिको मृदुः । तत्रास्ति साधयेत्तस्य स्वज्ञानमघटात्मताम् ॥ १० ॥ इह भाव एव भावान्तरस्य 'अभाव' इति व्यवहर्तव्यः इति अयं तावत् अपरित्यज्यः प्रातीतिकः पन्थाः, तत्र भावस्य भावान्तरेण य आधाराधेयिभावः स एव भावतदभावयोः, ततश्च भूतले घटव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं शिलादिकम् आलोकपुञ्जादिकं वा यत् चाक्षुषे ज्ञाने भाति तदेव व्यवह्रियते- भूतले घटाभावो भूतले घटो नास्ति इति वा, यत्रापि नास्ति चक्षुर्व्यापारो नेत्र- निमीलनसंतमसादौ तत्रापि भूतले घटोचितकठिनस्पर्शविविक्तं मृदुम् उष्णं शीतम् अनुष्णाशीतं वा गृह्णन् तमेव अत्र घटाभाव इति व्यवहरति-वायुस्पर्शस्य सर्वगस्य अवश्यं भावात्, इति वाक्यार्थः । घट के रहने पर भी व्यतिरेक बुद्धि से अभाव का व्यवहार क्यों नहीं होता है ? ऐसा व्यवहार क्यों नहीं बनता है कि भूतल में घट नहीं है, 'तज्ज्ञानमिति' शुद्ध भूतल का ज्ञान 'जातु' किसी भी अवस्था में घट के असंनिधान दशा में, घट के रहने की दशा में ही घट से भिन्न अभाव को साधते हैं, सर्वदा नहीं-इसलिए 'जातु' शब्द का प्रयोग किया गया है, किस प्रकार से होगा, इस व्यतिरेक अभाव से भूतल में पिशाच नहीं है-यह भी ज्ञान हो सकता है, ऐसा मानना पड़ेगा ॥ ९ ॥ अब शंका करते हैं कि व्यतिरेक अभाव से होनेवाला व्यवहार लोक में प्रसिद्ध है, किसी- किसी घट के असंनिधान दशा में देखा जाता है-सर्वदा नहीं, वहाँ पर फिर क्या करोगे ? ऐसी आशंका करके पूर्व के लोगों द्वारा नहीं देखा गया अभाव व्यवहार की सिद्धि के प्रकार को दिखाते हैं- अन्धे व्यक्ति को आलोकपुंज का अनुभव नहीं होता है, किन्तु शीत-उष्ण के स्पर्श का भान मृदु-कठिन के रूप में अवश्य होता है । इसी प्रकार भूतल में आलोकादि के समान घटाभाव का अज्ञान सिद्ध करता है ॥ १० ॥ इस प्रस्तुत भाव-शीलादि में भाव ही दूसरे भाव का 'अभाव' ऐसा व्यवहार कराता है, यह स्वाभाविक मार्ग अपरित्यज्य है, एक भाव का दूसरे भाव से आधार-आधेयभाव सम्बन्ध होता है-वही भाव अभाव का भी सम्बन्ध रखता है और इससे भूतल में घट से भिन्न कोई दूसरी वस्तु शिलादि घटरूप स्पर्श विलक्षण का आलोक पुञ्जादि जो चाक्षुष ज्ञान में भासित होता है-उसी का व्यवहार होता है । जैसा कि भूतल में घट विद्यमान है अथवा नहीं है इत्यादि । जहाँ पर चाक्षुष व्यापार नहीं होता है जैसा कि नेत्र के बंद कर लेने पर अथवा गाढे अन्धकार में वहाँ पर भी भूतल में घटादिकों का मृदु-कठिन, शीत-उष्ण अथवा अनुष्ण-शीत ग्रहण करते हुए इसमें घटाभाव का व्यवहार होता है, जैसा कि वायु का स्पर्श सर्वत्र व्याप्त रहता ही है उसी प्रकार अन्धे व्यक्ति भी अपना सब व्यवहार किसी-न-किसी प्रकार सम्पादन कर ही लेते हैं ।
१५२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१०
पदार्थस्तु—‘किं तु’ इति स्वमतोपक्षेपाय प्रतिभाप्रश्नपरामर्शः, किं पुनरत्र न्याय्यमिति तत्राह ‘तत्र’ भूतले ‘आलोकचयः’ तावत् अस्ति ज्ञेयः ‘अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्श’ अस्ति ‘तस्य’ आलोकचयस्य स्पर्शस्य वा यत् ‘स्वज्ञानम्’ अन्यघटादिविविक्तेन स्वेन रूपेण ज्ञानं, तत् कर्तृ, ‘तस्य’ आलोकादेः अघटरूपतां घटाभावरूपतां ‘तत्र’ भूतले साधयति इति शक्योऽयमर्थः । ‘शकि लिङ् च’ ( पा० सू० ३-३-१७२ ) इति लिङ् । आन्तरप्राणस्पन्दनजनितसूक्ष्मशब्दाकर्णनाच्च श्रोत्रादिसाकल्यं सम्भावयमानः तमेव शब्दम् एकज्ञानसंसर्गिणं शृण्वन् शब्दान्तरं निषेधयति ‘न इह अन्यः शब्द’ इति । तत् सूक्ष्मशब्दाभावमपि सूक्ष्मतमान्तर्नादावहितश्रोत्रो वेदयते, रसगन्ध- स्पर्शाभावोऽपि दन्तोदकरसं त्रिपुटिकागन्धं कायीयं च स्पर्शं संवेदयमानेनैव संवेद्यः, नहि एकज्ञान- संसर्गयोग्यवस्त्वन्तरोपलब्भेन विना उपलब्धिकारणसाकल्यनिश्चयोऽस्ति, इति एकान्त एषः अचिरप्रवृत्तितत्तद्विषयानुभवकल्पितस्य तदैव ध्वंसानाशङ्कनात् करणस्य कारणसाकल्यनिश्चयः किम् एकज्ञानसंसर्गतया ? इति चेत् न—तत्तदभावोपलिप्सुः हि प्रयत्नेन तत्तदिन्द्रियाधिष्ठानं व्यापारयन् एव लक्ष्यते ॥ १० ॥ ननु एवम् अदृश्यस्यापि पिशाचादेः निषेधव्यवहारो व्यतिरेकेणापि प्राप्नोति, स हि आलोकपुञ्जो यथा घटात् अन्यः तद्वत् पिशाचादेरपि ? तदेतत् आशङ्क्याह—
अब पद के अर्थ को कहते हैं—'किन्तु' इससे अपने मत का उपक्षेप करने के लिए प्रतिभा अर्थात् तीक्ष्ण बुद्धिरूपी प्रश्न का परामर्श करती है, यहाँ पर न्याय करना चाहिए, इसके लिए कहते हैं—'तत्र' भूतल में 'आलोकचयः' प्रकाशपुञ्ज ज्ञेयरूप है 'अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्शः' अर्थात् उष्णादि का स्पर्श अन्धे व्यक्ति को होता है 'तस्य' उस प्रकाशपुञ्ज के स्पर्श का तो ज्ञान अन्य घटादि के ज्ञान से भिन्न अपने स्वरूप में होता है। वह ज्ञान तो किसी कर्ता के माध्यम से हो सकता है, 'तस्य' उस आलोकादि का तो अघटरूप हो अथवा घटाभावरूप हो 'तत्र' उस भूतल में जाना जा सकता है। यहाँ 'शकि लिङ् च' पाणिनीय सूत्र ( ३-३-१७२ ) से शक्त अर्थ में लिङ् लकार हुआ है। शरीर के भीतर स्पन्दन से उत्पन्न हुआ सूक्ष्म शब्दों के सुनने से श्रोत्रादि- इन्द्रियों की सफलता संभाव्य है, वही शब्द किसी एक ज्ञान से संपर्क करके सुनाते हुए दूसरे शब्द का निषेध करते हैं 'न इह अन्यः शब्दः' यहाँ पर कोई अन्य शब्द नहीं है। इसी प्रकार से सूक्ष्म-सूक्ष्मतर शब्दों को भी श्रोत्र-इन्द्रिय व्यक्त करती हैं, इस प्रकार रस-गन्ध-स्पर्श और उनके अभाव को भी रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, और स्पर्श के लिए त्वगिन्द्रिय से संविदित होता है, एक ज्ञान के संसर्ग के योग्य दूसरी वस्तु के ज्ञान बिना उपलब्धि का निश्चय नहीं होता है—यही एकान्त निश्चय है, एक कारण के साथ दूसरे कारण का ज्ञान संसर्ग के बिना नहीं होता है, इसलिए उन-उन अभावों का भी ज्ञान उन-उन इन्द्रियों के अधिष्ठान के व्यापार से ही उपलक्षित होता है ॥ १० ॥ अब शंका करते हैं कि अदृश्य [ इह भूतले पिशाचो नास्ति तादात्म्याभावस्तु स्वसिद्ध एव इत्यपि शब्दस्य अर्थः ] जो इस भूतल में पिशाच नहीं है—ऐसा तादात्म्य अभाव तो 'स्वतः' अपने से ही सिद्ध है और निषेध व्यवहार 'अभाव व्यवहार' व्यतिरेक से भी तो प्राप्त होता है, वही प्रकाशपुञ्ज है। जैसा कि घटाभावरूप व्यवहार अर्थात् घट से भिन्न उसी प्रकार पिशाचादि का भी व्यवहार होगा। उसी की आशङ्का करके कहते हैं—
अ.-१, आ.-७, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५३ पिशाचः स्यादनालोकोऽप्यालोकाभ्यन्तरे यथा । अदृश्यो भूतल्स्यान्तर्न निषेध्यः स सर्वथा ॥ ११ ॥ आलोकपुञ्जो यद्यपि पिशाचात् व्यक्तिरिक्तो यद्यपि च आलोकोऽस्ति अपिशाचात्मा इत्येतावत् सिद्धयति तथापि अत्र 'पिशाचो नास्ति' इत्येतत् अशक्यम् अध्यवसातुम्, घटो हि आलोकपूरमध्येऽपि असम्भाव्यः- अघटसंनिधौ तत्र आलोकपूरापसर्पणात्, अतश्च सिद्धयतीदम्- अत्र घटो नास्ति इति, पिशाचस्तु तादृक्स्वभावो-यो भूतलमध्येऽपि आलोकमध्येऽपि वा भवन् भूतलस्य आलोकस्य वा तां निबिडतां न प्रतिहन्ति, अतश्च आलोकमध्ये तस्य सम्भावनात् कथं व्यतिरेकेण निषेधव्यवहारः, एवं रूपमध्ये रसादेः सम्भावनात् तस्यापि अनिषेधः यद्यपि अनालोकः आलोकात् अन्यः पिशाचः तथापि असौ भूतलस्य अन्तर्मध्येऽदृश्यो भवति इति सम्भाव्यते यथा, तद्वत् एव आलोकस्याभ्यन्तरे सोऽस्ति इति सम्भाव्यत एव, ततश्च यद्यपि आलोकस्ततोऽन्यः इत्यनेन पथा निषिद्धः पिशाचः तथापि सर्वप्रकारेण न निषिद्धः इति तदभावनिबन्धनाः कथं तत्र व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ताम् इति श्लोकार्थः ॥ ११ ॥ एवं प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य तत्त्वम् उपदर्श्य प्रकृते योजयति- आलोक के रहते हुए भी पिशाच का ज्ञान नहीं होता है और आलोक के न रहने पर भी नहीं होगा; क्योंकि पिशाच भूतल में भी अदृश्य है और आलोक में भी अदृश्य है-इसलिए पिशाच का निषेध सर्वथा असम्भव है ॥ ११ ॥ यद्यपि आलोकपुञ्ज पिशाच से भिन्न है और अपिशाचरूप आलोक हैं-तो भी, यहाँ पर भूतल में 'पिशाचो नास्ति' पिशाच नहीं है-यह निश्चय करना अशक्य है; क्योंकि घट तो आलोक के बीच में भी, घटाभाव की सन्निधि में, पूरे आलोक का समर्पण नहीं होता है, इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर घट नहीं है, पिशाच तो वैसा ही स्वभाव का है जो कि भूतल के मध्य में या आलोक के मध्य में भी रहता हुआ भूतल की या आलोक की सघनता को रोक सकता है और इसीलिए आलोक के बोच में उसकी सम्भावना होने से उसके अभाव का व्यवहार कैसे हो सकता है ? इस प्रकार से रूप के बीच में रस इत्यादि की सम्भावना से उसका भी निषेध नहीं हो सकता है । पदार्थ के विषय में कह दिया गया । अब वाक्य का अर्थ कहते हैं-अनालोक आलोक से भिन्न हो है तो भी, वह भूतल से अदृश्य रह सकता है-जैसे यह सम्भव है, उसी प्रकार से आलोक के भीतर भी पिशाच है-यह सम्भव हो ही सकता है । इससे यह सिद्ध होता है कि आलोक पिशाच से भिन्न है, इसीलिए जैसे पिशाच का निषेध किया गया है-तो भी, सब प्रकार से उसका निषेध करना असम्भव है । इसलिए इसमें अभावमूलक व्यवहार कैसे प्रवर्तित होंगे, यही श्लोक का अर्थ है ॥ ११ ॥ [ सब सत्य है; क्योंकि भूतल घटादि से शून्य है इस वाक्य से धर्मोत्तर उपाध्याय के मत का अच्छी तरह निर्णय कर उसमें असत्यरूप दिखा दिया है। अब सत्यरूप की दृढता सिद्ध करने के लिए कहते हैं] इस प्रकार प्रसंग से अभाव व्यवहार के तत्त्व को बताकर उपस्थित विषय को बताते हैं। २०
१५४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-७, का.-१२ एवं रूप्यविदाभावरूपा शुक्तिमतिर्भवेत् । न त्वाद्यरजतज्ञप्तेः स्यादप्रामाण्यवेदिका ॥ १२ ॥ यथा आलोको घटाभाव इति आलोके गृहीते प्राक् गृहीतस्य घटस्य न किञ्चित् आयातम् तथैव शुक्तिज्ञानं रूप्यज्ञानाभाव इति इयत् सम्भाव्यते यथा घटज्ञानं घटज्ञानप्रामाण्यसंवित् पटज्ञानाभावः पटज्ञानाभावप्रामाण्यसंवित् इयता च न पूर्वप्रवृत्तं पटज्ञानम् अप्रामाणीभवति, एषा हि तस्य घटज्ञानस्य स्वरूपचिन्ता सर्वा न ज्ञानान्तरस्य आद्यस्य किमपि अतो जातम्। एवं शुक्तिरियम् इति, न रजतम् इदम् इति च ज्ञानमेव स्वात्मना प्रकाशताम्, अहं शुक्तौ रजताभावे च प्रमाणं न तु रजते इति, तावता तु प्राक्तनस्य रजतज्ञानस्य न किञ्चित् वृत्तम्, इति तद्विषयी- कृतं रजतं कथम् असत्यं स्यात् ॥ १२ ॥ ननु इदमित्यनेन तदेव परामृश्यते—यत्र रजतज्ञानम् अभूत् तत्रैव इदानीं 'न रजतम् इति, शुक्तिः इति' च ज्ञानं प्रमाणभूतं जातं, तत् अतोऽनुमीयते—यत् 'प्राच्यं रजतज्ञानम् अप्रमाणम्' इति, नहि एतत् सम्भवति—विरुद्धविषयावगाहि ज्ञानद्वयं प्रमाणम् एकत्र विषयीभवति इति, तत् अयम् आनुमानिको बाधव्यवहारो भविष्यति ? इत्याशङ्क्याह— इस तरह रजत ज्ञान की अभावरूपी शुक्तिका बुद्धि भले ही होवे । किन्तु पहले रजत ज्ञान के अप्रामाण्य को जाननेवाली शुक्ति बुद्धि नहीं हो सकती है ॥ १२ ॥ जैसे आलोक घटाभाव है, उसी प्रकार आलोक के ग्रहण हो जाने पर पूर्व में ग्रहण किये गये घट का कुछ भी नहीं बिगड़ता, इसी प्रकार शुक्ति ज्ञान रजत ज्ञान का अभाव है—ऐसी सम्भावना की जा सकती है । जैसा कि घटज्ञान पटज्ञान की प्रामाणिकता को भी ग्रहण करता है—इसी प्रकार पटज्ञानाभाव पटज्ञानाभाव की प्रामाणिकता का ज्ञान करता है इतने से पूर्व में प्रवृत्त हुए पटज्ञान को अप्रमाण नहीं बना सकता है, यही घटज्ञान का घटसम्बन्धी ही सब प्रकार की स्वरूप चिन्ता करता है, इससे पूर्व में हुए दूसरे ज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है अर्थात् शुक्तिज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। इस प्रकार यह शुक्ति है; रजत नहीं और यह ज्ञान ही अपने आप रजतरूप से प्रकाशित होता है। मैं स्वयं शुक्तिका में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में नहीं हूँ, इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी तो नहीं बिगड़ता है। इसलिए उस ज्ञान को विषय मानता हुआ रजत कैसे असत्य हो सकेगा ? ॥ १२ ॥ [ यह जो कहा गया है कि यह शुक्ति है, रजत नहीं है—इस प्रकार अपने से हुए ज्ञान की प्रकाशरूपता है, मैं स्वयं शुक्ति में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में प्रमाणभूत नहीं हूँ— इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं; अवसर ढूँढ़कर आक्षेप करते हैं । ] 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि 'इदम्' इससे उसीका परामर्श होता है, जहाँ पर रजतज्ञान हुआ था, वहाँ पर ही इस समय रजत नहीं, किन्तु शुक्ति है—यह ज्ञान प्रमाणभूत हो गया, इससे उसका अनुमान होता है जोकि पूर्व में रजतज्ञान अप्रमाणित था, यह संभव नहीं हो सकता है कि विरुद्ध में दो विषयों का अवगाहन करनेवाला जो ज्ञान है एक जगह ज्ञानरूप होकर प्रमाणभूत हो सके, सो यह अनुमानजन्य बाध का व्यवहार होगा ? इस प्रकार आशंका कर कहते हैं—
अ.-१, आ.-७, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५५ धर्म्यसिद्धेरपि भवेद्बाधा नैवानुमानतः । स्वसंवेदनसिद्धा तु युक्ता सैकप्रमातृजा ॥ १३ ॥ न केवलं स्वसंवेदनात् न सिद्धयति बाधा, यावत् अनुमानतोऽपि न सिद्धयति—धर्मिणो- ऽसिद्धेः, अपिशब्दात् हेतोः व्याप्तेश्च, अपिः उभयत्र नेयः, इह धर्मिणि सिद्धे सिद्धेन हेतुना स्मर्यमाणव्याप्तिकेन साध्यधर्मयोगव्यवच्छेदकोऽनुमानव्यापारः इह च प्राच्ये रूप्यज्ञाने धर्मिणि अप्रामाण्यं साध्यो धर्मः तत्र शुक्तिकाज्ञानं वा, न रजतम् इति ज्ञानं वा, तज्ज्ञानविषयीकार्यत्वं वा विषयगतं हेतूक्रियते, न च एतत् युक्तम्—तत्काले प्राच्यरूप्यबोधस्य धर्मिणोऽभावात्, न चापि तस्य शुक्तिज्ञानादयो धर्माः, न च अपक्षधर्मात् साध्यसिद्धिः, अतः स्मर्यमाणं तद्धर्मि स्यात् इत्यपि असत्, अथ शुक्तिः न रजतज्ञानस्य विषय इति साध्यते शुक्तिकाज्ञानविषयत्वात् इति, तत् यदि इदानीम् तत्सिद्धसाधनम्, अथ पूर्वम् तदा तत्पूर्वस्वसंवेदनेन बाध्यविषयता केन चैवं व्याप्तिर्गृहीता—यत्र इदानीम् अन्यत् ज्ञानम् तत्र पूर्वम् अन्यत् न भवति इति, अनुमानान्तरेण इति चेत् अनवस्था, एतेन एतत् प्रत्युक्तम्—एकस्मिन् विषये कथं ज्ञानद्वयं स्यात् इति, को हि एकविषयतां द्वयोः ज्ञानयोः जानीयात्, ते हि तावत् स्वात्मनि स्वविषये च विश्राम्यत इति धर्मी की असिद्धि से भी बाधा नहीं होती है और अनुमान से भी नहीं हो सकती है, किन्तु अपने संवेदन ज्ञान से युक्त एवं प्रमाता से जन्य होकर बाधा का होना सम्भव है ॥ १३ ॥ विशुद्ध भूतल जो कह आये हैं, वहाँ पर केवल स्वसंवेदन से ही बाधा सिद्ध नहीं होती किन्तु अनुमान से भी बाध का सिद्ध होना एक प्रकार से असंभव सा ही होगा । धर्मी की असिद्धि में हेतु और व्याप्तिज्ञान दोनों ही कारण हैं। यहाँ पर ‘अपि’ शब्द दोनों स्थानों में अन्वित होता है, जो कि यहाँ पर धर्मी की सिद्धि में सिद्ध हेतु से स्मर्यमाण व्याप्तिवाला है उससे साध्यधर्म का अयोग्यव्यवच्छेदक अनुमान का व्यापार होता है। पूर्व का रजतज्ञान धर्मी में अप्रामाण्य साध्य धर्म है, उसके साध्य धर्मी में शुक्ति का ज्ञान है या रजत का ज्ञान नहीं है, इस ज्ञान का विषय बनानेवाला हेतु बनाया जा रहा है, यह उचित नहीं है—क्योंकि उस समय [शुक्तिका ज्ञान काल] में पूर्व के जो रजतज्ञान धर्मी है उसका अभाव रहता है और उस रजतज्ञान का शुक्ति ज्ञानादि धर्म नहीं है और जिस पक्ष का धर्म नहीं है उससे साध्य की सिद्धि नहीं बन सकती है। इसीलिए स्मरण किये जानेवाला रजतज्ञान का धर्मी है यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वह पक्ष का धर्म नहीं है, यदि शुक्ति रजतज्ञान का विषय नहीं है, तो यह सिद्ध नहीं हो सकता है, शुक्तिज्ञान उसका विषय है रजत नहीं है, इस शुक्तिज्ञान के अवसर में सिद्ध-साधन [ विफल ] हो जाता है, दूसरे प्रकार से अब यदि कहो कि पूर्व के ज्ञान से बाध्य-विषयता की सिद्धि होगी इसमें कौन-सी व्याप्ति है जो कि इस समय दूसरा ज्ञान हुआ है। वह पूर्व में नहीं होगा यदि दूसरे अनुमान से होगा—ऐसा मानते हो तो, अनवस्था हो जायेगी, इससे यह खण्डित हो जाता है कि एक विषय में दो ज्ञान कैसे संभव होंगे, कौन व्यक्ति दो ज्ञान की एक विषयता को मानने के लिए तैयार है, पहले तो अपने में और अपने विषय में विश्राम लेता है—यह कहा है। इसी- १. सति धर्मिणि धर्मचिन्ता । इस प्रकार धर्मी के रहने पर ही धर्म का विचार करना युक्त बैठता है।
१५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१३ उक्तम्, इति अनुमानतोऽपि न बाधा, न च तथाभूतमपि व्यवधानम् अत्र प्रतीतौ संवेद्यते— स्वसंवेदनसिद्धतया झटिति भासनात्, अत एव एतदपि अशक्यं वक्तुम्—माभूत् बाधा नाम इति । एवं परपक्षेऽनुपपत्तिं प्रदर्श्य स्वपक्षे एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभाव इति वाक्येन प्रतिज्ञातं निगमयति—युक्ता सा एकस्मात् प्रमातुः यदि जायेत इति, स एव हि तथा निर्माता इति व्याख्यातमेव, स्थिते चैवं यदि व्यवहारसिद्धयेऽन्यथानुपपत्तिरुच्यते तत् उच्यतां कामम् ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ इति ॥ १३ ॥ न केवलमेते कार्यकारणभावस्मरणबाधाव्यवहाराः सकललोकयात्रासामान्यव्यवहारभूता एकप्रमातृप्रतिष्ठा, यावत् अवान्तरव्यवहारा अपि ये क्रयविक्रयादयः समलाः, उपदेश्योपदेश- भावादयश्च निर्मलाः, तेऽपि एकप्रमातृनिष्ठा एव भवन्ति—व्यवहारो हि सर्वः समन्वयप्राणः इति उपसंहारक्रमेण दर्शयति— लिए अनुमान से भी वहाँ पर कोई बाधा नहीं होगी और वैसा व्यवधान भी इस प्रतीति में ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह स्वसंवेदन से सिद्ध होने के कारण शीघ्र ही भासित हो जाता है, इसी- लिए यह भी कहना अशक्य है कि बाधा न हो । इस प्रकार दूसरे के पक्ष में अनुपपत्ति दिखा करके अपने पक्ष में भी ‘एकप्रमातृपरिनिष्ठितेः उदियात् बाध्यबाधकभावः’ इस वाक्य से अपनी प्रतिज्ञा का उपसंहार करते हैं-यदि एक प्रमाता से बाधा होती है, तो समुचित ही है, वह चिद्रूप हो वैसा निर्माण करनेवाला है इसकी व्याख्या पूर्व में हो चुकी है, ऐसी स्थिति होने पर यदि व्यवहार की सिद्धि के लिए अन्यथा बाध्य-बाधकभाव सिद्ध करते हो तो किया करो, ‘अधुना सर्वं सिद्धयति’ किन्तु अब तो सब कुछ सिद्ध हो हो गया है ॥ १३ ॥ [ पूर्वोक्त अनुवादपूर्वक ही वर्तन किया जायेगा एवं अभेदात्मक ज्ञान के लिए हो होगा ] ये कार्य-कारणभाव स्मरण बाधरूप व्यवहार हैं—वे सभी लोक में सामान्य व्यवहार के कारण माने जाते हैं, इसलिए वे एक ही प्रमाता में प्रतिष्ठित रहते हैं, इसके भीतर जितने भी व्यवहार हैं—क्रय-विक्रयरूपादि, वे सब के सब मल से युक्त मायीय प्रमाताओं के और निर्मल उपदेश्य- उपदेशभाव आदि के एक प्रमातृगत ही होते हैं; क्योंकि सभी व्यवहार समन्वय जीवनवाले होते हैं उसे उपसंहार क्रम से दिखाते हैं— १. निर्मल और समल भेद से व्यवहार दो प्रकार के होते हैं । माया से अन्धे हुए सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकलों का समल व्यवहार होता है, जिसका आगम में उल्लेख किया गया है— अवस्थात्रितयेऽप्यस्मिंस्तिरोभावनलीलया । शिवशक्त्या समाक्रान्ताः प्रकुर्वन्ति विचेष्टितम् ॥ सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल इनकी तीनों अवस्था में भी छिपा देने की लीला करनेवाली शिव-शक्ति से आक्रान्त होने के कारण सारी चेष्टाएं किया करते हैं । क्रय-विक्रय विवादादि का व्यवहार समल से होता है और जिन लोगों ने अपने स्वरूप को पहचान लिया है तथा परमेश्वररूप बन गये हैं उनका व्यवहार निर्मल होता है । यद्यपि पशु आदि एवं विद्येश्वर आदि दीक्षित पर्यन्त लोगों में उपदेश, दीक्षा, नित्य-नैमित्तिकादि अनुष्ठान, ध्यान, समाधानादि व्यवहार होता है वह समल से ही होता है, उनमें भी कुछ मल शोधरूप में रह जाता है; क्योंकि माया का व्यवहार विगलित न होने से यह होता रहता है इसलिए जिस कारण से व्यवहार-
अ.-१, आ.-७, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५७ इत्थमत्यर्थभिन्नार्थावभासखचिते विभौ । समलो विमलो वापि व्यवहारोऽनुभूयते ॥ १४ ॥ 'तत्तद्विभिन्नेति' श्लोकद्वयोक्तेन अनेन उपपत्तिप्रकारेण, अन्वयव्यतिरेकात्मना, तथा श्लोकान्तरैरुक्तेन व्यवहारोदाहरणप्रकारेण इदमपि मन्तव्यम्—यत् विभौ देशकालानवच्छिन्ने, अत एव अत्यर्थभिन्नैः—मायाबलात् भेदैकप्राणितैः नीलसुखाद्याभासैः प्रतिबिम्बकल्पैः अनतिरिक्त- तया वर्तमानैः, खचिते—स्वरूपानन्यथाभावेन उपरक्ते, विश्रान्तः सर्वो व्यवहारोऽनुभूयते— अनुभव एव अत्र दृढतमं प्रमाणम् इति यावत्, अनुभूयते च सोपदेशैः अवधानधनैः—येन एषां यैव संसारसंमता व्यवहारदशा सैव प्रमातृतत्त्वप्रख्यात्मिका शिवभूमिः। यदुक्तम्—'.........सम्बन्धे सावधोनता ॥' इति अप्रत्यभिज्ञातात्मपरमार्थनां समलो व्यवहारः, अन्येषां स एव निर्मलः। इस प्रकार अत्यन्त भिन्न विषयों के अवभास से युक्त विभु में समल अथवा विमल भी व्यवहार देखा जाता है ॥ १४ ॥ 'तत्तद्विभिन्नेति' इत्यादि दो श्लोकों से उपपत्तिपूर्वक व्यवहार के उदाहरण देने से यह भी मानना होगा कि देश-काल से अनवच्छिन्न विभु में माया-शक्ति के बल से अत्यन्त भिन्न अनेक भेदों से युक्त प्रतिबिम्बतुल्य नील-सुखादि के आभासों से जो कि तद्रूप ही रहते हैं, उनसे युक्त अन्येरूप न होने के कारण रंगे हुए विभु में सभी व्यवहार विश्रान्त होकर अनुभूत होते हैं; क्योंकि अनुभव हो यहाँ पर दृढ प्रमाण है और देनेवाले लोगों से जो उपदेश के पात्र हैं उनसे अनुभव किया भी जाता है। [मूढानां झटिति तथाभिमानाभावेऽपि उक्तोपदेशपरिशीलनदिशा प्रकाशत एवार्थ इत्यर्थः ।] अर्थात् मूढप्राणियों को भी वैसा अभिमान का अभाव हो जाने पर शीघ्र ही कहे हुए उपदेश की दिशा से प्रकाश होता है। जिस कारण से इन लोगों के संसार मान्य व्यवहार दशा [अनवहित अभीष्ट ] है वही प्रमातृतत्त्व को बतानेवाली शिवभूमि [शुद्ध सर्वज्ञ सर्व- कर्तृत्वमयात्मक ] है और इस विषय में कहा भी गया है— ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥ जिन लोगों को अपने स्व-स्वरूप की पहचान नहीं है उनमें मायीय समल व्यवहार भी देखा जाता है और जिनको स्व-स्वरूप का पूर्णरूप से बोध है उनका व्यवहार निर्मल होता है। रूपता रहती है, वह तो भेद एवं अभेद प्राणित समन्वयरूप सर्वथा भेद के छिप जान पर भी मल का व्यवहार करती ही है फिर भी जिनको अपने स्वरूप का ज्ञान हो चुका है उनको अपने में और परमात्मा में मल का शोधना-समझना आदि एक ही मात्र व्यापार होने से प्रायः मुक्त ही होते हैं। १. मूढजनों में द्रुतगति से वैसा अभिमान का अभाव रहने पर भी कहे गये उपदेश का परिशीलन करने से अर्थ प्रकाशित होता है। २. समस्त शरीरधारियों के लिए ज्ञाता और ज्ञेय का ज्ञान करना सामान्यरूप से कठिन होता है, किन्तु योगियों में तो यह विशेषता देखी भी जाती है कि वह इस विषय में जाग्रत ही रहते हैं अर्थात् ज्ञेय सर्वदा ज्ञाता से सम्बद्ध रखता है। बिना ज्ञाता से सम्बद्ध रखे हुए कोई ज्ञेय माना नहीं जाता, जहाँ से ज्ञाता का उदय होता है और जिसमें ज्ञेय की विश्रान्ति होती है उसका योगी को बोध रहता है।
१५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ इति शिवम् ॥ १४ ॥ अदितः ॥ ७७ ॥ इति श्रीमन्माहेश्वराचार्यवर्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभि- नवगुप्तकृतविमर्शिन्याख्यव्याख्योपेतायां प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणं नाम सप्तममाह्निकम् ॥ ७ ॥ • अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे माहेश्वर्यनिरूपणाख्यं अष्टममाह्निकम् स्वसंवेदनसंसिद्धव्यवहारवशेन यः। नित्यं महेश्वरः सिद्धः सिद्धानां तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं ज्ञानस्मरणापोहनानि व्युत्पाद्य तेषाम् 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' इति निरूपितम् एतावता, 'न चेदन्तः कृता.........।' इत्यत्र यत् उक्तम् 'एक' इति तत् परिघटितम् । अन्तराभासमर्थनेन 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूप' इत्यपि निरूपितम् । यत् तत्रैव 'महेश्वर' इति उक्तम् तन्माहेश्वर्यं स्वातन्त्र्यरूपम् उपपादयितव्यम्, तच्च ज्ञानविषयं क्रियाविषयं च इति उभयप्रकारम्, यह कल्याणकारी भाव है ॥ १४ ॥ सप्तम आह्निक समाप्त जो महेश्वर सिद्धजनों के लिए अपने ज्ञान के संसिद्ध व्यवहार के बल से नित्य ही सिद्ध है, उस शिव का हम स्तवन करते हैं। इस प्रकार ज्ञान-शक्ति, स्मरण-शक्ति और अपोहन-शक्ति का प्रतिपादन कर, अब उन सभी का 'एकमाश्रयं विना व्यवहारो न युक्तः' अर्थात् एक आश्रय के बिना व्यवहार का होना असंभव है—इतने से यह विषय सिद्ध किया गया है । न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकचिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ इस कारिका में जो कहा गया है 'एक:' एक शब्द से उसको घटा दिया गया है । अन्तर के आभास के समर्थन से 'अन्तःकृतानन्तविश्वरूपो' अपने भीतर अनन्त-असंख्य विश्वरूप भरा पड़ा है इसका भी निरूपण कर दिया गया है। वहाँ पर ही 'महेश्वरः' महेश्वर ऐसा शब्द कहा है इससे माहेश्वर्य की स्वतन्त्रता को सिद्ध करना है और वह स्वातन्त्र्य ही ज्ञान का विषय है एवं क्रिया का भी विषय है । १. कर्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्वरे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ स्वयं महेश्वर ही तो कर्ता और ज्ञाता के रूप में सिद्ध है उनकी अजडरूप में निषेध अथवा सिद्धि कौन कर सकता है ? उसका यही परम स्वातन्त्र्य है । २. शक्त्या गर्भान्तर्वर्तिन्या शक्तिगर्भं परं महः । परमेश्वर के भीतर शक्तिरूप से परम तेज रहता है । न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । न हिमस्य पृथक् शैत्यं नोष्ण्यं वह्नेः पृथग्भवेत् ॥
अ.-१, आ.-८, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५९ ततो भगवान् ज्ञाता कर्ता च, यद्यपि च प्रकाशविमर्शात्मकं चिदेकघनम् एकमेव संविद्रूपम्, तथापि व्युत्पादनाय तत्परिघटित एव अयं विभागः, तेन ज्ञानात्मकक्रियाविषयं स्वातन्त्र्यं यद्यपि क्रियाशक्तिरूपम् तथापि ज्ञानाधिकार एव निर्णेतव्यं—तद्विषयत्वात् । एवं च ज्ञातृशब्दार्थः प्रकृतिलतः प्रत्ययतश्च सम्पूर्णतया निर्णीतो भवति । तत्र ज्ञानं नाम स्वयं भेदिताभासभेदोपाश्रय- नियन्त्रणासङ्कुचितम् 'अहमिति' संवेदनम् । तत्र आभासेषु यत् स्वातन्त्र्यं, तदेव ज्ञानशक्तिविषयं स्वातन्त्र्यं सम्पद्यते इति । 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य.........।' इत्यादिना '........शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः।' इत्यन्तेन श्लोकैकादशकेन तत् निरूप्यते । तत्र आभासान्तरापेक्षी च आभासोऽन्यथा वा इति श्लोकेन उक्त्वा, स एव आभास एक इति श्लोकान्तरेण उच्यते । अर्थक्रियाभासोऽपि तथैव आभासनियत इति श्लोकद्वयेन उक्त्वा कस्मिन् आभासे सा अर्थक्रिया इति पुनः श्लोकद्वयेन । आभासान्तरविचित्रस्य भित्तिस्थानीयम् आन्तरत्वम् इति श्लोकेन । ततो बाह्यत्वं स्वरूपतो इससे सिद्ध होता है कि भगवान् महेश्वर ही स्वयं ज्ञाता और कर्ता है और इनका स्वरूप प्रकाश विमर्शात्मक एकमात्र संविद्रूप ही है, फिर भी दूसरों को इनका बोध हो जायें, इसलिए ज्ञान और क्रियारूप में विभाग किया गया है, ज्ञानात्मक क्रिया के विषय का स्वातन्त्र्य 'आभासवैचित्र्य' यद्यपि क्रिया-शक्तिरूप होने के कारण 'क्रियाधिकार' में ही इसका प्रस्ताव करने योग्य है तथापि ज्ञानविषयक होने से भी 'ज्ञानाधिकार' में इसका विवेचन करना दोष जनक नहीं माना जाता है; क्योंकि इन दोनों का विषय एक है इस प्रकार ज्ञातृ शब्द का अर्थ होता है कि—ज्ञातृ में 'ज्ञाधातु' से 'तृच्' प्रत्यय हुआ है इसीलिए प्रकृति और प्रत्यय मिल कर पूरा का पूरा ज्ञान करनेवाला अर्थ निर्णित होता है। [ ज्ञान और क्रिया की परस्पर एकरूपता होने के कारण आचार्य हंस्ररूप होकर जल और दूध के समान विषय को भिन्नतापूर्वक ज्ञानस्वरूप के क्रिया से अलग ही विवेचन कर देते हैं ] ज्ञान क्या चीज है ? स्वयं भेद करनेवाले का आभास से भेद के आधार को नियन्त्रित करके विस्तार कर देना जिसका अहं यह परामर्श होता है । प्रकृति के अर्थ से ज्ञान के स्वरूप का भेद कर देने पर, प्रत्ययार्थ के साथ आभास होने पर, जो स्वातन्त्र्य है वही ज्ञान-शक्ति का विषयरूप स्वातन्त्र्य कहलाता है। 'तात्कालिकाक्षसामक्ष्य ......।' इत्यादि से लेकर '.........'शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ।' यहाँ तक ग्यारह श्लोकों से निरूपण करेंगे। जैसे आभास किसी दूसरे आभास को अपेक्षा रखता है, दूसरा कोई नहीं भी रखता है यह प्रथम श्लोक से कह कर, वही आभास एक है ऐसा दूसरे श्लोक से कहेंगे । अर्थक्रिया का आभास भी उसी प्रकार आभास में नियत रहता है, यह दो श्लोकों से कहेंगे । आभासान्तर की विचित्रता में भित्ति स्थानीय सदृश आन्तरत्व है, यह एक श्लोक से कहेंगे। उसके बाद स्वरूप से और विभाग से बाह्यत्व की सिद्धि बतायेंगे, दो श्लोकों शिव से शक्ति अलग नहीं है और शक्ति से शिव भिन्न नहीं है; क्योंकि हिम से व्यतिरिक्त शीतलता नहीं रहती एवं वह्नि से अलग ऊष्णता-दाहकता नहीं रहती है । इस युक्ति से तो एक ही प्रकाश विमर्शात्मक संविद्रूप है किन्तु यह ज्ञान और क्रिया दो क्या चीज है ? जबकि ज्ञान और क्रिया में स्वातन्त्र्य ही परमार्थतः चित्तत्त्व कहलाता है ज्ञातृ सत्ता ही क्रिया है और क्रिया स्वरूप ही ज्ञान है, दूसरों को इसका बोध हो जायें इसी वास्ते ज्ञान और क्रिया की विवक्षा की गयी है ।
१६० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-१-२ विभागतश्च श्लोकयुग्मेन । ततः श्लोकेन ज्ञानादिशक्त्याश्रयस्य एकस्य उपसंहारः । श्लोकान्तरेण महेश्वरत्वम् उपसंहरता भाविनः क्रियाधिकारस्य उपक्षेप इति संक्षेपार्थ आह्निकस्य । अथ श्लोकार्थो निरूप्यते । ननु यदि परमेश्वरनिष्ठतयैव समस्तोऽयं व्यवहारः तत् अस्य स्फुटत्वास्फुटत्वप्रायप्रसिद्ध- वैचित्र्यानुपपत्तिः–येन किल अयम् अनुप्राणितः स एक एव भगवान्, न च तद्व्यतिरेकेण व्यवहारनिजं किंचन तत्त्वम् उत्पश्यामः ? इत्याशङ्क्याह— तात्कालिकाक्षसामग्र्यसापेक्षाः केवलं क्वचित् । आभासा अन्यथान्यत्र त्वन्धान्धतमसादिषु ॥ १ ॥ विशेषोऽर्थावभासस्य सत्तायां न पुनः क्वचित् । विकल्पेषु भवेद्वाविभवद्भूतार्थगामिषु ॥ २ ॥ केवलम् एतावता आभासानां भेदो, न पुनरर्थावभासस्य स्वात्मगतः क्वचिदपि भेद इति श्लोकद्वयस्य संमेलितस्य सम्बन्धः, यस्मिन् एव काले स आभास आभाति तत्काले एव भवति, यत् अक्षसामग्र्यं--बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वं नाम आभासान्तरं 'पश्यामीत्येवंरूपम् तत्सापेक्षाः —तद्व्यामित्राः क्वचित् आभासा भवन्ति, यत्र स्फुटताव्यवहारः अन्धविषयः से । पश्चात् एक श्लोक से ज्ञानादि-शक्ति के एक आश्रय का उपसंहार करेंगे । दूसरे श्लोक से महेशता का उपसंहार करते हुए आगे आनेवाले क्रियाधिकार का उपक्षेप करेंगे, यही इस आह्निक का संक्षेप अर्थ है । अनन्तर श्लोक के अर्थ का निरूपण किया जाता है । अब शङ्का करते हैं कि यदि सारा का सारा व्यवहार परमेश्वर के ही आधार से होता है—तब तो, इस [ व्यवहार ] का प्रत्यक्ष रहना और दबे रहना इत्यादि प्रसिद्ध विचित्रता कैसे बन सकती है ? जिससे यह व्यवहार जीवित होता है—वह तो, एक ही भगवान् परमेश्वर का है, और उस परमेश्वर के बिना व्यवहार का अपना निजो तत्त्व स्वरूप हम क्या नहीं देखते हैं ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— कहीं-कहीं केवल उस काल में होनेवाले इन्द्रियों की समक्षता की अपेक्षा करके आभास होते हैं। अन्यत्र तो अन्धे को अन्धकार में जैसा ज्ञान होता है वैसा ही ज्ञान अर्थात् शून्य रहता है ॥ १ ॥ पदार्थ अवभास की सत्ता में कोई विशेषता नहीं होती आगे होनेवाले अथवा वर्तमानकाल में होनेवाले या बीते हुए काल में पदार्थों के विकल्पों में कुछ ज्ञान हो तो, हो सकता है ॥ २ ॥ सापेक्ष और निरपेक्ष के कारण ही पदार्थों में केवल भेद होता है, पदार्थों के आभासों में स्वयं अपने से भेद नहीं होता है। यह सम्मिलित दोनों श्लोकों का सम्बन्ध है, जिस तात्कालिक आकांक्षा के काल में आभास भासित होता है तभी वह उस काल में रहता है, जिसको इन्द्रियों से समक्ष में बाह्य-इन्द्रियों से प्रत्यक्ष कहा जाता है, इसी से दूसरे आभास को देखता हूँ—इस १. 'आभास की विचित्रता को कहकर अपने स्वरूप में आभास की एकता बनाये रखना ही यहाँ पर विशेषता मानी गयी है ।
अ.-१, आ.-८, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६१ अन्धकारस्थप्रमातृविषयः पुनः योऽन्यो व्यवहारोऽस्फुटतामयः तत्र ते आभासा अन्यथा, तथाहि— जात्यन्धस्य बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वलक्षणम् आभासान्तरं नैव अस्ति, दृष्टवतस्तु अन्धीभूतस्य संतमस- स्थितस्य च तात्कालिकं तत् नास्ति अपि तु प्राक्तनमेव बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वम् अनुसन्धत्ते, तस्मात् अर्थावभासस्य केषुचिदपि विकल्पेषु सत्तायां—स्वरूपे विशेषोऽस्ति इति सम्भावना न कर्तव्या, ते हि विकल्पा भाविवस्तुगामिनो वा भविष्यन्निष्ठा भवन्तु वर्तमाननिष्ठा वा अतीतवस्तुविश्रान्ता वा, एतदुक्तं भवति—नीलमिदं पश्यामि, संकल्पयामि, उत्प्रेक्षे, स्मरामि, करोमि, वेद्मि इत्यादौ नीलाभासोऽसौ स्वरूपतोऽनूनाधिकः एवं पश्यामीत्येवं यः पीतादिषु ते पुनराभासाः स्वातन्त्र्येण यदा भगवता संयोज्यन्ते वियोज्यन्ते च तदा अयं स्फुटःवास्फुटत्वादि व्यवहारः, नीलमित्याभासस्य उत्प्रेक्षे इत्याद्याभासान्तरव्यवच्छेदेन पश्यामीति आभासव्यामिश्रणायां स्फुटताव्यवहारः । एवं त्रैकालिकव्यवहारवैचित्र्योपपत्तिः । परमेश्वरस्वरूपान्तर्भूतत्वे पुनराभासानां न कुतश्चित् व्यवच्छेदः —न केनचित् व्यामिश्रणा इति ॥ १-२ ॥ ननु एतत् नीलादिषु उपपद्यताम् यत्र बाह्येन्द्रियव्यापारोऽस्ति, सुखादौ तु तदभावात् कथं रूप में दूसरे आभास को अपेक्षा रखनेवाले उससे मिले हुए, आभास कहीं-कहीं हो जाते हैं, जहाँ पर स्फुटरूप से व्यवहार होता है और अन्य विषयक व्यवहार अन्धकार में रहनेवाला प्रमातृगत विषयक व्यवहार होता है, वही आभास 'मंद' अस्फुट कहलाता है; क्योंकि उसका इन्द्रियों से सम्बन्ध नहीं है। जैसा कि जन्मना अन्धे व्यक्ति को बाह्येन्द्रिय से प्रत्यक्ष होनेवाला दूसरा आभास नहीं होता, जिसने कभी वस्तु को देख लिया और बाद में अन्धापन आ गया है उसका और अन्धकार में बैठे हुए व्यक्ति का तात्कालिक आभास नहीं होता है, किन्तु वह पूर्व कालिक इन्द्रियों के प्रत्यक्ष का ही अनुसन्धान [ स्मरण ] करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि किन्हीं-किन्हीं विकल्पों की सत्ता में विशेषताएँ होती हैं—ऐसी संभावना नहीं करनी चाहिए, वे विकल्प भविष्यनिष्ठ अतीत वस्तुओं में होते हैं या वर्तमान में रहते हैं या काल में विश्रान्त हो जाते हैं, यह कहा जाता है कि मैं इस नील को देखता हूँ, [ यह भाव सापेक्ष है ] मैं संकल्प करता हूँ [ यह निरपेक्ष है ] मैं उत्प्रेक्षा करता हूँ, मैं स्मरण करता हूँ, मैं जानता हूँ, [ यह बाह्य निरपेक्ष है ] मैं करता हूँ, [ यह क्रिया प्रधान है ] इत्यादि विकल्पों में नीलाभास स्वरूपतः सारा का सारा रहता ही है, इसो प्रकार से मैं देखता हूँ—ऐसा जो पीतादि पदार्थों के आभास हैं उन्हें स्वातन्त्र्यरूप से जब भगवान् संयोजन-वियोजन आदि करते हैं तभी इसमें स्फुटत्व और अस्फुटत्व का व्यवहार होता है। नील उत्प्रेक्षा में आभास का दूसरे आभास के साथ मिला देने पर स्फुटता का व्यवहार होता है—इस प्रकार तीनों कालों में भी व्यवहार की विचित्रता सिद्ध होती है, परमेश्वर के स्वरूप में अन्तर्भूत होने पर तो परमार्थ प्रमाता के आधीन होनेवाले आभासों का किसी से न व्यवच्छेद होता है और न किसी से मेल ही होता है ॥ १-२ ॥ अब शङ्का करते हैं कि नीलादि-पदाथों के आभासों में जहाँ पर बाह्येन्द्रियों के व्यापार हैं, वहाँ पर तो—यह बात घट सकती है, किन्तु सुखादि में तो, बाह्येन्द्रियों के व्यापार न होने १. यह स्फुटक्त्व और अस्फुटक्त्व आदि का व्यवहार भी सकल, प्रलयाकल आदि प्रमाताओं में विश्रान्त होता है किन्तु परमार्थ प्रमाता में नहीं होता, इसी कारण उन्हें परमेश्वर कहा जाता है। २१
१६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-३-४ वैचित्र्यम् ? इत्याशङ्क्याह— सुखादिषु च सौख्यादिहेतुष्वपि च वस्तुषु । अवभासस्य सद्भावेऽप्यतीतत्वात्तथा स्थितिः ॥ ३ ॥ गाढमुल्लिख्यमाने तु विकल्पेन सुखादिके । तथा स्थितिस्तथैव स्यात्स्फुटमस्योपलक्षणात् ॥ ४ ॥ सुखे स्रक्चन्दनादिके च तत्कारणे, दुःखे अहिकण्टकादौ च तद्धेतौ अतीतेऽनागते वा यद्यपि आभासः स एव तथापि अतीतमिदम् अनागतमिदम् इति आभासान्तरेण यतो व्यामिश्रणा अनुभवामीति आभासाच्च यतो व्यवच्छेदः तेन विद्यमानेष्वपि तेषु तस्य प्रमातुः तेन प्रकारेण स्थितिः न भवति, यथा पूर्वम् अभूत् अहम् अधुना सुखी दुःखीति समार्जिततत्तन्निमित्तसामग्रीको वा इति, यदा तु विकल्पेन तानि वस्तूनि गाढम् उल्लिखति तदा पौनःपुन्यविशिष्टसुखतद्धेतू- ल्लेखनाभिधानकारणाभासानुप्रवेशात् आभासान्तरव्यामिश्रणात्मना तेनैव अस्मदुक्तेन प्रकारेण न पुनरन्येन तथा इति सुखी अहमित्यादिकेन स्थितिः भवति इति सम्भाव्यम्, उचितमेतत्— यतस्तदानीं स्फुटत्वाभासमिश्रं सुखाभासम् उपलक्षयति असौ । अतीतग्रहणं भाविनोऽपि उपलक्षणम् ॥ ३-४ ॥ के कारण विचित्रता कैसे बन सकेगी ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— सुखादि में और सुखादि के जनक वस्तुओं में आभास की सत्ता रहने पर भी अतीत होने से,—ऐसी स्थिति होती है ॥ ३ ॥ वर्तमानकाल में तो प्रत्यक्षरूप से दृश्यमान आभास में विकल्प होने के कारण सुख- दुःखादि विकल्पों की जैसी स्थिति रहती है वैसी ही रहेगी; क्योंकि वही स्फुटता प्रत्यक्ष दीखती है॥४॥ जो साध्य सुख है उसमें और उसके कारण [ साधन माला, स्त्री चन्दनादि है उनमें और दुःख में एवं दुःख के [ साधन ] कारण सर्प, कंटकादि में यद्यपि अतीत या अनागत में सुख-दुःख का ही आभास होता है, तो भी यह अतीत है और यह अनागत है;—ऐसा दूसरे आभास से जो भेद होता है—उससे विद्यमान रहने पर भी उन अतीत-अनागत आभासों में प्रमाता का मैं अनुभव करता हूँ; इस प्रकार की स्थिति नहीं बनती है, जैसा कि मैं पूर्व में सुखी-दुःखी था। इस काल में सुखी-दुःखी हूँ या उसके कारणों को प्राप्त किया है—ऐसा होता है। दूसरे श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है—जब विकल्प के द्वारा उन वस्तुओं को बहुत सूक्ष्मता से विमर्श करता है उसी स्थिति में बारम्बार विशिष्ट सुख और दुःख अथवा उसमें हेतु के कथन के कारण आभास के प्रवेश से दूसरे आभास का मिलनारूप उसी हमारे कहे हुए प्रकार से वैसी स्थिति होती है। मैं सुखी-दुःखी हूँ, इस रूप में संभावना हो सकती है और यह उचित भी है; क्योंकि उस समय स्फुटता के आभास से मिला हुआ सुखाभास को वह प्राप्त करता है। यह अतीतकाल का ग्रहण आगामिकाल की स्थिति का भी उपलक्षण है ॥ ३-४ ॥
अ.-१, आ.-८, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १६३ ननु इयता किमुक्तम् भवति—बाह्यरूपतः स्रगादयः सुखादिहेतवो बाह्यजनिताश्च सुखादयः सुख्यहमिति अभिमानहेतवः इति, ततश्च बाह्यत्वाभावे तज्जन्यत्वाभावे च न तथा इति उक्तं स्यात्, तत्र च त एव न केचित्, ततश्च कथमुक्तम् ‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः’ इति—सत्ताया एव अभावात् ? इत्याशङ्क्याह— भावाभावावभासाना बाह्यतोपाधिरिष्यते । नात्मा सत्ता ततस्तेषामान्तराणां सतां सदा ॥ ५ ॥ इह सुखमस्ति मम, दुःखं नास्ति ममेति ये भावाभासा अभावाभासाश्च तेषां बाह्यत्वं नाम आत्मा—स्वरूपं न भवति, नहि सुखमित्यस्य स्वरूपं ‘बाह्यम्’ इति वपुषा भाति, सुखस्य हि सुखमेव स्वरूपम् केवलं बाह्यत्वं नाम आभासान्तरम् ईश्वरेण स्वातन्त्र्यबलादेव यदा तत्र सुखाभासे मिश्रतया भास्यते तदा तत् तस्य उपाधिरूपताम् उपरजकतां विशेषणत्वं गच्छति, ततश्च यथा नीलाभासाभावे उत्पलाभासस्य न किञ्चित् वृत्तं स्वरूपतो, राजाभासाभावे वा पुरुषाभासस्य, तथा बाह्यत्वाभासाभावेऽपि सुखाभासस्य दुःखाभावाभासस्य कान्ताभासस्य च न स्वरूपतः काचन म्लानता इति आन्तराणां सदैव स्थितिः एषाम् ॥ ५ ॥ अब शङ्का करते हैं कि इतने का क्या निष्कर्ष है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि बाह्यरूप जो सुखादि के हेतु स्त्री, चन्दन, माला आदि हैं और बाहर में होनेवाले सुखादि हैं जिनका विमर्श होता कि मैं सुखी हूँ, यह अभिमान का हेतु है जो कुछ होता है, उन सभी के बाह्य हेतुओं के भाव में और उससे पैदा हुए सुखादि हेतुओं के अभाव में वैसा परामर्श नहीं होगा—यही परिणाम निकलेगा । बाह्यत्व के अभाव में यही रहेगा, दूसरा कोई नहीं होगा । तब कैसे कहा आपने कि ‘अर्थविभासस्य सत्तायां न क्वापि विशेषः, अर्थात् अर्थविभास की सत्ता [ स्वरूप ] में कहीं भी विशेषता क्या नहीं होती ? क्योंकि सुख की सत्ता का अभाव होता है, ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— सुख या सुखाभाव के आभासों में बाह्य हेतु की ही उपाधि होती है । अपने स्वरूप की सत्ता या उसकी आन्तरिक सत्ता ही सदा भासित होती है ॥ ५ ॥ मुझे सुख है, [ यह भाव अवभास है ] और मुझे दुःख नहीं है, [ यह अभाव अवभास है ] ये सुख के भाव अवभास और दुःख के अभाव अवभास हैं। इनमें से किसी का भी बाहर में कोई स्वरूप नहीं होता है । सुख का स्वरूप ‘बाह्य’ किसी स्वरूप से नहीं भासता है, सुख का सुख ही स्वरूप है । बाहर में तो दूसरे आभास भी भूमि में होता, जब ईश्वर के द्वारा स्वातन्त्र्य बल से सुखाभास में मिश्रभाव से भासित होता है तब सुखादि को बाह्यता उपाधिरूप में मिली हुई भासती है और विशेषणता को भी प्राप्त करती है । जैसा कि नीलाभास के अभाव में उत्पलाभास का कुछ स्वरूप नहीं रहता है अथवा राजाभास के अभाव में पुरुषाभास का और बाह्यत्व आभास के अभाव में भी सुखाभास का और दुःखाभाव के आभास का और उसके हेतु कान्ता- भास के स्वरूप में कोई मलिनता नहीं आती; क्योंकि उनमें आन्तरिक सुख और दुःखाभाव की स्थिति सदैव बनी रहती है ॥ ५ ॥
१६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-८, का.-६ इह अन्तःकरणे बुद्धिदर्पणात्मनि नोलादीनामवभासानाम् आन्तरत्वमप्यस्ति—अन्तःकरण- मध्येभवत्वात्, बाह्यत्वमपि ग्राह्यतारूपं—प्रमातुः विच्छेदेन अवभासात्, बाह्यत्वं च केवलं बाह्यप्रत्यक्षता, अत्र च अवस्थाद्वयेऽपि अर्थक्रियां अमी कुर्वन्त्येव, अन्ततो ज्ञानं स्वविषयम् । यत् पुनः प्रमातृतादात्म्यलक्षणम् आन्तरत्वं, तत्र अमो कस्मात् न काञ्चित् अर्थक्रियां विदधीरन् ? इत्याशङ्क्याह— आन्तरत्वात्प्रमात्रैक्ये नैषां भेदनिबन्धना । अर्थक्रियापि बाह्यत्वे सा भिन्नाभासभेदतः ॥ ६ ॥ प्रमात्रैक्य इति—तन्निमित्तकं यत् आन्तरत्वं तस्मात् हेतोः, एषाम् आभासानाम् अर्थक्रिया न काचित् अस्ति, सा हि अर्थक्रिया भेदे सति भवति, स हि नीलाभासः पीताभासात् यतो भिद्यते यतश्च प्रमातुर्भिद्यते ततः स्वसाध्यां नियतां भिन्नाम् अर्थक्रियां तस्य प्रमातुः कुर्यात्, न च एष तदा भेदोऽस्ति—प्रमात्रैक्यात्, सा हि अर्थक्रियाभासभेदनियता, तथा च कान्ताभासस्य बाह्यत्वेऽपि सति आभासान्तरस्य आलिङ्गनलक्षणस्य व्यपगमे दूरीभवति, इयम् इति च आभासान्तरस्य उपगमेऽन्यैव प्राक्तनाह्लादविपरीता दृश्यते अर्थक्रिया, अत आभासभेदाभावः — यतः प्रमात्रैक्यकृते बुद्धिरूप दर्पणात्मक अन्तःकरण में नीलादि-पदार्थों के अवभासों की आन्तरिक सत्ता भी रहती हैं—क्योंकि वे अन्तःकरण में विद्यमान रहने के कारण ही भासते हैं, बाह्यता भी इदन्ता के विभाग से ग्रहण किये जानेवाले प्रमाता के रह-रहकर भासित होने से होती है और बाह्यत्व तो केवल बाह्य-इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होने का नाम है, यहाँ पर दोनों अवस्थाओं में ये नीलादि आभास अर्थक्रिया को करते रहते ही हैं तब फिर अर्थक्रियाकारिता क्या वस्तु है ? इन आभासों का स्वविषयक ज्ञान ही तो है। जो कि प्रमाता के साथ में तादात्म्यरूप से रहना आन्तरत्व कहलाता है, वहाँ पर ये नीलादि-पदार्थ क्यों नहीं कोई अर्थक्रिया करते रहें ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं— प्रमाता के ऐक्यरूप में अन्तःस्थित होने के कारण पदार्थों का भेद नहीं होता है । बाहर में अर्थक्रिया भी आभास के भेद से ही भिन्न-भिन्न रूपों में भासती है ॥ ६ ॥ ‘प्रमात्रैक्य’—इसका अर्थ यह है कि प्रमाता निमित्तक अर्थात् कारणक जो आन्तरत्व है— उसी हेतु से समझना चाहिये, इन आभासों की कोई अर्थक्रिया नहीं है; [ अर्थक्रिया का आशय यह है कि अर्थ अशुद्ध प्रयोजन उसकी जो क्रिया निष्पत्ति ] क्योंकि वह अर्थक्रिया तो भेद रहने पर ही भासती है, नीलाभास पीताभास से भिन्न है; क्योंकि वह प्रमाता से भिन्न है इसलिए वह इस प्रमाता की अर्थक्रिया को कैसे करेगा ? प्रमाता के तादात्म्यरूप आन्तरत्व में यह भेद नहीं रहता; उसमें प्रमाता की ऐक्यरूपता होने के कारण वह अर्थक्रिया आभास तो भेदमूलक ही होती है और कान्ताभास के बाहर होने पर भी आलिङ्गनरूप अन्य आभास तो हटाने से दूर हो जाता है, यह अर्थक्रिया तो दूसरे आभास के आने पर पूर्व आह्लाद से भिन्न दीखती है, १. जिसको आर्य बौद्धों ने कहा है कि अर्थ क्रियाकारित्व हो सत्त्व है, प्रमाता के रूप से पदार्थों की सत्ता मानी है, इन पदार्थों की बाह्यरूप से कोई स्थिति नहीं होती है। ये आभास प्रमाता के आभ्यन्तर में रहने से बराबर कहे गये हैं, इस समय उसमें भी दूसरी विशेषता को अपने सिद्धान्त में निरूपण करते हुए उन लोगों के प्रति आशङ्कापूर्वक कहते हैं ‘इह’ इत्यादि से ।
अ.-१, आ.-८, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६५ आन्तरत्वे तस्मात् न अर्थक्रिया इति, अर्थक्रियाभासोऽपि च आभासान्तरमेव इति अर्थक्रिया- कारित्वमपि न भावानां सत्त्वम्, येन तदभावे स्वरूपत एव अभावः स्यात् ॥ ६ ॥ ननु च बाह्याभासव्यतिभेदनकाले आन्तराभासो विरोधात् विच्छिन्न इति कथम् इदम् उक्तम् ‘आन्तराणां य आभासः स सदा’ इति ? एतत् परिहरति— चिन्मयत्वेऽवभासानामान्तरैव स्थितिः सदा । मायया भासमानानां बाह्यत्वाद्वहिरप्यसौ ॥ ७ ॥ इह अवभासानां सदैव बाह्यताभासतदभावयोः अपि अन्तरैव प्रमातृप्रकाश एव स्थितिः, यत एते चिन्मयाः, अन्यथा नैव प्रकाशेरन् इति उक्तं यतः, यदा तु मायाशक्त्या विच्छेदनाव- भासनस्वातन्त्र्यरूपया बाह्यत्वम् एषाम् आभास्यते तदा तत् अवलम्ब्य अवभासमानानाम् असौ स्थितिः बहिरपि अन्तरपि, नायम् अन्तराभासो बाह्यत्वस्य विरोधी प्रत्युत सर्वभासभित्ति- भूतोऽसौ, तत् कथं विरोधः ? इति युक्तमुक्तम्—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ इति ॥ ७ ॥ ननु बाह्यत्वे सति अर्थक्रिया, तच्च बाह्येन्द्रियगम्यत्वम्, न च विकल्पोल्लिखितानां तत् इसीलिए पूर्व आभास के भेद का अभाव रहता है—जिस हेतु से प्रमाता के आन्तर में ऐक्यरूप होने से अर्थक्रिया नहीं होती और अर्थक्रिया का आभास भी नहीं होता है किन्तु दूसरा ही आभास रहता है। इस प्रकार अर्थक्रियाकारिता भी पदार्थ-भावों की सिद्धि नहीं करती है, जबकि उसका अभाव हो जाने पर अपने आप ही दूसरे का अभाव हो जायेगा ॥ ६ ॥ अब शङ्का उठाते हैं कि बाहरी आभास के संभेदन काल में विरोध होने के कारण [ एक का ही आन्तरत्व और बाह्यत्वरूप न होने से ] आन्तराभास विच्छिन्न होता है, यह आपने कैसे कहा है ? ‘आन्तराणां य आभासः स सदा [ ......सत्ता त अस्तेषामान्तराणां सतां सदा इत्यत्र ] इसका परिहार करते हैं— आभासों के चिन्मय प्रमाता में लीन हो जाने पर निरन्तर आन्तर स्थिति बनी रहती है। माया के द्वारा भासित होने पर बाहर में आ जाने के कारण बाह्यस्थिति भी रहती है ॥ ७ ॥ अवभासों के बाहर की ओर भासना अथवा उसके अभाव का भासना ये दोनों भीतर ही प्रमाता के प्रकाश में रहते हैं, जिससे ये भाव में और अभाव में भी चिन्मय ही रहते हैं [ चिन्मय- रूप न होने से प्रकाशित नहीं हो सकता है ‘नाप्रकाशः प्रकाशते’ ] अन्यथा इनका प्रकाश ही नहीं होगा; क्योंकि हमने इस विषय में पहले ही कह दिया है, किन्तु जब माया-शक्ति के द्वारा विच्छेदन अवभास में स्वातन्त्र्यरूप से रहता है उसके माध्यम से ही इसका बाहर में भासित होना संभव है, तब उस समय बाह्यत्व का अवलम्बन करके अवभासों की स्थिति बाहर और भीतर दोनों में भी रहती है, यह अन्तराभास बाह्यत्व का विरोधी नहीं है प्रत्युत प्रमाता के प्रकाश में विश्रान्ति को पा लेने के कारण सब आभासों का मूल अन्तराभास होता है, इसलिए वह कैसे विरोध करेगा ? इसी कारण उचित ही कहा है—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ अर्थात् आन्तर आभासों की सत्ता सर्वदा बनी रहती है ॥ ७ ॥ अब शंका करते हैं कि बाह्यता का ज्ञान रहने पर ही पदार्थों की अर्थक्रिया बनती है और बाह्यत्व का ज्ञान बाह्येन्द्रियों के द्वारा ही हो सकता है, इस प्रकार विकल्पों से होनेवाले