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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-१, आ.-६, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [१३५ पूर्णस्वरूपनिमोलनात् तिरोभाव आधीयते, तावति आभासे ऐक्यावभासनपूर्णत्ववितरणात् अनुग्रहः क्रियते, तेन न केवलं महासृष्टिषु महास्थितिषु महाप्रलयेषु प्रकोपतिरोधानेषु दीक्षाज्ञानाद्यनु- ग्रहेषु भगवतः कृत्यपञ्चकयोगः यावत् सततमेव व्यवहारेऽपि । यदुक्तम् - सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥' इति । 'प्रतिक्षणमविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥' इत्यादि च । तथा '.......प्राकाम्य- मात्मनि यदा प्रकटीकरोषि । व्यक्तीः...........॥' इति च ॥ ७ ॥ देता है, उतने आभास में ऐक्य अवभासन को परिपूर्णता कर देने के कारण अनुग्रह करता है, इसीसे केवल महासृष्टि में, महास्थिति में, महाप्रलय में, क्रोध के रोक देने में, दीक्षा ज्ञानादिरूप अनुग्रह करने में भगवान् के कृत्य पञ्चक का योग नहीं होता है, ऐसी बात नहीं है अपितु सर्वदा व्यवहार काल में भी होता है। जबकि आचार्य ने इस विषय में कहा है—सर्वदा विनोद के लिए ही मात्र सृष्टि करनेवाले, सदा सुख-आनन्द के लिए ही स्थिति-पालन करनेवाले और सदैव अपने स्वरूप में तीनों लोकों को लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे प्रत्यक्षरूप स्वामी को नमस्कार हो । सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की प्रतिक्षण-प्रतिपल कल्पना करते हुए भी, कोई एक अजन्मा निर्विकल्प की जय हो । तथा '...... प्राकाम्यमात्मनि यदा प्रकटीकरोषि ।' व्यक्तीः.........। [ स्वामी के भीतर ही ये भाव-पदार्थ रहते हैं वह प्रत्यक्ष घटित होता है, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में उनकी इच्छा से ही अन्तर में अवस्थित पदार्थ-राशि बाहर में भासित होती है-ऐसा कहा गया है ] ॥ ७ ॥ १. इस प्रकार स्वामी अपने में रहनेवाले अर्थ समूह का आभास करते हैं—ऐसा जो कहा गया है, उसीको घटाते हैं, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में अपनी इच्छा से ही अपने में रहे हुए पदार्थ वर्ग को बाहर प्रकट करते हैं। जिसका विवेचन श्री सोमानन्दपाद ने किया है— कुत्सिते कुत्सितस्य स्यात्कथमुन्मुखतेति चेत् । रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ पञ्चप्रकारकृत्योक्तिश्शिवत्वान्निजकर्मणे । प्रवृत्तस्य निमित्तानामपरेषां क्व मार्गणम् ॥ चेतन वही है जो प्रसरणशील है रूप प्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभास- मान है और विश्व भी विथ्या या गर्हित नहीं है; क्योंकि ऊपर से नीचे अगल-बगल चारों ओर से ठसा-ठस शिवरूप ही भरा पड़ा है, सर्वत्र शिव की सत्ता होने के कारण इसके कुत्सित-गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। गर्हित तो उसी को कहते हैं जो भेद दृष्टि से शिवरूप में देखता है। भगवान् परमेश्वर के सर्ग, स्थिति, प्रलय, अनुग्रह और तिरोधान ये पाँच प्रकार के कृत्य हैं अपने निज तत्त्वादिरूप प्रसरणार्थ ही प्रसर होता है। उसमें दूसरे निमित्त कहाँ ढूँढोगे। किन्तु कोई तो कहते हैं कि 'ईश्वरः स्वातन्त्र्यवास-सर्वकामः' ये तो अपने में पूर्ण हैं फिर इनको सृष्ट्यादि से क्या फल मिलने- वाला है ? 'क्योंकि जो कोई भी कार्य में प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है वह कुछ न कुछ प्रयोजन को लेकर ही प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है।' प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते । अर्थात् मतिमूढ भी उद्देश्य को आगे रखकर ही कार्य में प्रवृत्त होता है। भगवान् में तो यह संभव नहीं होता। लोक अनुग्रहार्थ ही प्रवृत्त होते हैं।

१३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-८ इह अन्तरर्थावभासः स्थित एव, तत् किं तत्र कारणान्तरचिन्तया इति प्रकृतं प्रमेयम्, तत्सिद्धये उपपत्तिः उक्ता, तेन विना इच्छारूपः प्रत्यवमर्शो न स्यात् इति, तत्प्रसङ्गात् प्रत्यवमर्श- विकल्पादिस্বরূপम् उपपादितम्, इति शिष्याणां धियं समाधातुं प्रकृतं प्रमेयम् उपपादयन् उपसंहरति— एवं स्मृतौ विकल्पे वाप्यपोह्नपरायणे । ज्ञाने वाप्यन्तराभासः स्थित एवेति निश्चितम् ॥ ८ ॥ प्रकाशात्मा परमेश्वर एव यतो देहादिप्रमातृताभिमानदशायामपि वस्तुतः प्रमाता, एवम् इति अतो हेतोः इदं सिद्धं भवति—स्मरणे अपोहनजीविते च विकल्पे अनुभवज्ञाने च अन्तराभासः प्रकाशविश्रान्तः स्थित एव, नात्र संशयः कश्चित्, यदि हि देहादिरेव परमार्थप्रमाता स्यात् तत् शरीरस्य प्राणस्य धियः शून्यस्य वा अन्तर्घटादि इति न किंचित् एतत्—घटादिपरि- हारेण देहादेः स्थितत्वात् । परमार्थप्रकाशस्तु सर्वसहः इति तत्रान्तर्विश्वम्, इति अनायास- सिद्धमेतत् ॥ ८ ॥ अपने स्वरूप में अर्थ का अवभास स्वसंवित् साक्षिरूप से रहता ही है, उसमें फिर दूसरे बाह्यार्थ वासना इत्यादि कारणों को खोजना व्यर्थ है । इसलिए प्रस्तुत प्रमेयरूप साध्य की सिद्धि के लिये युक्ति दे दी गई हैं, इसी कारण इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं हो सकता है, भीतर अर्थ का अवभास अवश्य ही रहता है, इसका समर्थन के प्रसङ्ग से प्रत्यवमर्श के विकल्पादि स्वरूप को युक्ति द्वारा सिद्ध किया है; इस प्रकार शिष्यों की बुद्धि के समाधानार्थ भीतर अर्थों के अवभासतत्त्व का निगम रीति से उपपादन करते हुए उपसंहार करते हैं— इस तरह स्मृति और विकल्प में अथवा अपोहन प्रधान ज्ञान में या भीतर में भी पदार्थों का अवभास अवस्थित ही होता है—यह तो निश्चित है ॥ ८ ॥ जबकि देह, बुद्धि, प्राणादि प्रमातृगत अभिमान अवस्था में भी वस्तुतः प्रकाशात्मा परमेश्वर ही प्रमाता रहते हैं। इस हेतु से सिद्ध हो जाता है कि [ प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ही सब का जीवन है ] स्मरण और अपोहन प्रधान विकल्प में अनुभव ज्ञान में, अन्तर में पदार्थों का अवभास प्रकाशरूप से ही रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं होता है, यदि देहादिरूप की सत्य- प्रमाता होता तो शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्यादि का अन्तःकरण में रहनेवाले घटादि पदार्थ किससे मेल करेगा, क्योंकि घटादि को छोड़कर देहादिरूपों में ही विद्यमान रहता है । परमार्थ प्रकाशरूप परमेश्वर तो सब कुछ रहनेवाले होते हैं इसलिए उनमें सारे विश्व की अन्तर्लीनता हो सकती है, यह बात तो अनायास ही सिद्ध है ॥ ८ ॥ १. उन दोनों का भी स्वरूप वैसा ही होने के कारण । क्योंकि अन्तःस्थित रहनेवाले का ही सर्वथा समर्थन करना होगा—उसके बिना बाहर में इच्छा-विमर्श नहीं हो सकता है और वह शुद्ध प्रकाश प्रमाता में अन्तर्लीनभाव हुए बिना थोड़ा सा भी नहीं घटता है । यद्यपि स्मृति इत्यादि देहादि प्रमाता के विषय हैं तथापि उन परमेश्वर-प्रकाश से ही प्रमातृरूपता होने के कारण उनमें ही तादात्म्यरूप से अवस्थित भाव-पदार्थ रहते हैं ।

अ.-१, आ.-६, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १३७ ननु अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनं यदि सर्वत्रास्ति कस्तर्हि स्मरणादौ आभासभेदः, न च असौ न संवेद्यते—स्फुटास्फुटतादिप्रस्फुरणस्य अनपह्ववनीयत्वात् ? इत्याशङ्क्याह— किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभासनात्मनि । पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ॥ ९ ॥ अनुभवज्ञानस्य ‘इदं नीलम्’ इति अन्तराभासं बहिराभासयतः सोऽन्तर्भावाभासो नैसर्गिको—निसृष्टेः स्वातन्त्र्यात् आयातो,न तु स्मरणादेरिव अन्यज्ञानकृतवासनादिबलात्, स्मरणे उत्प्रेक्षणे प्रत्यक्षपृष्ठभाविनि अध्यवसाये च योऽन्तर्नीलाद्यवभासो बाह्यतया अवभासयितव्यः नासौ स्वात्मकीयः अपि तु पूर्वानुभवसंस्कारजोऽसौ, तत्र संस्कारो नाम अनुभवस्य कालान्तरेऽपि अब प्रश्न किया जाता है कि यदि अन्तर में अवभासमान पदार्थ-समूह का सर्वत्र बाहर में आभास होता है, तो स्मरणादि में अन्तर के आभास का भेद कैसे होगा ? किन्तु यह [ भेद ] नहीं जाना जा सकता है यह बात नहीं है, अवश्य जाना जाता है—स्फुटरूप से अथवा अस्फुटरूप से इसका स्फुरण अवश्य कुछ न कुछ रहता है । इसको छिपा नहीं सकते हैं ? इस पर आशंका कर कहते हैं— बाहर की तरफ आभासमान होनेवाले ज्ञान में अन्तराभास स्वाभाविक रहता है । वह स्मरणादि में पूर्व के अनुभवरूप से रहता है ॥ ९ ॥ ‘इदं नीलम्’ यह नील है, वह निर्विकल्परूप अनुभवज्ञान का अन्तर में होनेवाला आभास है जोकि बाहर में भासित करता है वह आभास स्वाभाविक होता है, अपने अवभास से स्वतन्त्र होने के कारण आया हुआ रहता है; स्मरणादि के जैसा अन्य ज्ञान से किये गये वासनादि के बल से नहीं होता है, स्मरण, उत्प्रेक्षा, प्रत्यक्ष के अनन्तर अध्यवसाय में होनेवाले जो भीतर नीलादि का अवभास है वह बाह्यरूप से भासित होना चाहिए, वह अपना स्मरणकालीन नहीं है अपितु अनुभवपूर्वक है उसके संस्कार से उत्पन्न हुआ होता है, उसमें संस्कार क्या चीज है ? इसका समाधान करते हैं कि उसका आगे बने रहना यही संस्कार का स्वरूप है अर्थात् कालान्तर में भी उसका बना रहना ही संस्कार कहा जाता है वह जो आता हुआ अनुभव है १. यदि अन्तराभास पदार्थों का बाहर में आभासन ज्ञान, स्मृति और विकल्प में होता है तो कौन स्मरणादि में अन्तराभास का सर्वसाधारण भाव होने के कारण भेद विभाजन करेगा ? २. आभास भेद का स्फुरण ज्ञान में तो स्फुटरूप से रहता है और स्मृति आदि में अस्फुटरूप से रहता है । ३. क्योंकि दूरत्व और समीपत्व को लेकर प्रत्यक्ष के संस्कार से उत्पन्न होनेवाली दोनों स्मृति में भी पूर्व का अनुभूत ही अर्थ अन्तर में अवस्थित होकर संस्कार शब्द का वाच्य होता है इसीको क्षेत्रज्ञ अपनी इच्छा के द्वारा पूर्व काल से अवच्छिन्न करता हुआ मनोयोगपूर्वक देखता है इसमें कुछ अपूर्व सर्जन नहीं करता है । ४. पूर्व अनुभूत आभास का पृथक्-करण करना ही स्मृति का नया व्यापार नहीं है । किन्तु भिन्न किये हुए को ही अन्धकार से वह आवृत्त करने के बराबर है उसमें तो संस्काररूप से अवस्थित उस काल में भी रहता है । प्रतिबोधक अनुसन्धान दशामें आवरण के हट जाने से वही प्रकाशित होता है इसीका नाम अप्रमुषित [ न छोड़ना रूप है ] अत एव अनुभूत विषय का असंप्रमोष होना ही स्मृति है यह कुछ भी अपूर्व वस्तु की सृष्टि नहीं करती है अर्थात् इससे कोई अपूर्व पदार्थ का निर्माण नहीं होता है । १८

१३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-१० अनुवर्तमानता, अतोऽसावनुवर्तमानोऽनुभवो यतो नीलाद्याभाससंभिन्नः ततः तत्तादात्म्यापन्नं स्मरणाद्यपि तथा निर्भासते, तत एव स्मरणकालासम्भावी आभासः तदनुभवपूर्वककालकलित एव, इति स्वयं स्मरणादेर्निर्विषयत्वं गृहीतग्राहित्वं च उद्घोष्यते । एतदेव अस्फुटत्वम्, इति सिद्धोऽनु- भवस्मरणादौ आभासभेदः, अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनम् अव्यवधानेन स्फुटता, व्यवधानेन तु तात्कालिकत्वाभावात् अस्फुटता इति ॥ ९ ॥ ननु अनुभवज्ञानात् ऐन्द्रियकात् अन्यत् सर्वं ज्ञानं व्यवधानेन बहिराभासनरूपं प्राप्तम् ? इत्याशङ्क्य प्रविभागमाह— स नैसर्गिक एवास्ति विकल्पे स्वैरचारिणि । यथाभिमतसंस्थानाभासनाद्बुद्धिगोचरे ॥१०॥ यः प्रत्यक्षव्यापारम् अनुपजीवन् विक्षेपसारतया मनोराज्यसंकल्पादिविकल्पः स स्वैरं कृत्वा—स्वप्रेरणेन परप्रेरणनैरपेक्ष्येण स्वातन्त्र्येण चरति उदेति व्ययते च, तत्र यो बहिरवभासो नीलादेः अन्तराभासमग्रस्य स नैसर्गिक एव, तथाहि अपरिदृष्टपूर्वमपि श्वेतं दशनशतकलितकर- जिस कारण नीलादि आभास से भिन्न है इसलिए उस नीलादि से तादात्म्यभाव को प्राप्त स्मरणादि भी वैसा ही भासित होता है, इसी से स्मरणकाल में न होनेवाला स्मर्यमाण संस्कार से उत्पन्न आभास उसके पूर्वकालीन अनुभव से ही मिला रहता है, इसीलिए स्मरणादि का निर्विषयत्व और गृहीत-ग्राहित्व को ऊँचे स्वर से घोषित किया जाता है। इसीको अस्फुटत्व अर्थात् मन्दपना कहा जाता है, इसीलिए अनुभव-स्मरणादि में आभास भेद सिद्ध होता है, अन्तर के आभासवर्ग का बाहर में अव्यवधानरूप से स्फुटतापूर्वक भासना है, व्यवधान हो जाने पर तो उसके काल में न रहने के कारण अस्फुटता प्रकट होतो है ॥ ९ ॥ अब शंका करते हैं कि इन्द्रिय से उत्पन्न अनुभवरूप ज्ञान से भिन्न सब ज्ञान व्यवधान के कारण बाहर में अवभासरूप को प्राप्त करता है ? ऐसी आशंका कर स्मरण ज्ञान का और अनुभव ज्ञान का विभाग बताते हैं [ यदि कहो कि अव्यवधान से स्फुटता और व्यवधान से अस्फुटता तथा अनुभव से व्यतिरिक्त सब ज्ञान विकल्पादिरूप अस्फुटता के कारण हो आया हुआ है ? यह कहना सत्य है, किन्तु यह बात ऐसी है कि ‘किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभास- नात्मनि ।’ इससे ही सिद्ध है । पुनः उत्तरार्ध से बताते हैं ‘पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ।’ पूर्वं का अनुभव ही तो स्मरणादि में स्थिर रहता है । ] जो अन्तर का आभास है वह किसी दूसरे की अपेक्षा न रखनेवाला स्वभावसिद्ध स्वैरचारी विकल्प में भी रहता है, जैसे बुद्धि से होनेवाले ज्ञान में अपने अभीष्ट ज्ञान का आभास होता है ॥ १० ॥ जो मनोराज्य संकल्पादि विकल्प है वह प्रत्यक्ष व्यापार का आधार लेकर मन के विक्षेप से दूसरे की प्रेरणा की आकांक्षा न रखता हुआ अपनी स्वतन्त्र प्रेरणा से चलाता है, उदित होता है और समाप्त होता है, उसमें जो बाहर की ओर नीलादि का आभास हो रहा है, वह अन्तर में होनेवाल स्वाभाविक ही आभास है, जैसा कि पूर्व में नहीं देखा हुआ भी असंख्य दाँतों-

अ०-१, आ०-६, का०-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३९ युगलयुक्तं दन्तिनम् अन्तः प्रमातृभूमौ स्थितं बहिः अन्तःकरणभूमौ स्वच्छधीदर्पणात्मिकायां स विकल्पः तात्कालिकमेव आभासयति ॥ १० ॥ अस्माच्च अन्तराभाससम्भवसमर्थनप्रसङ्गगतात् आभासभेदविचारात् शास्त्रे यत् प्रयोजनं मुख्यतया अभिसंहितं स्वात्मनि ईश्वरप्रत्यभिज्ञानरूपं तदधिकरणसिद्धान्तनीत्या अनायाससिद्धम्, इति दर्शयति— अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् । ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥११॥ यत् इदं यथाभीष्टस्य बहिरसत्त्वात् अननुभूतस्यापि सम्यक् उल्लेखनम्, अवभासनं च विकल्पस्य प्रसङ्गात् दर्शितम् अस्मादेव हेतोः इदमपि सिद्ध्यति—यः कश्चित् कीटो वा ब्रह्मा वाला और दो सूँड से युक्त हाथी को देखता है, इस प्रकार प्रमाता के अन्तर में विद्यमान था वही बाहर की ओर अन्तःकरण भूमि में आकर स्वच्छ बुद्धिरूपो दर्पण में प्रतिबिम्बित होकर विकल्प के रूप में उसी काल पर्यन्त भासित होता है ॥ १० ॥ यह अन्तर के आभास का समर्थन है उसी के प्रसङ्ग से आभासभेद के विचार से शास्त्र में जो मुख्यरूप से प्रयोजन कहा गया है वह अपनी आत्मा में ईश्वर प्रत्यभिज्ञारूप से अधिकरण सिद्धान्त की नीति के द्वारा अनायास ही सिद्ध हो जाता है, इसे बताते हैं— अन्तःस्थित आभास को ही बाहर की ओर निकालते हैं इसलिए सभी जीवों में ज्ञान और क्रिया स्पष्ट सिद्ध हो जाती हैं ॥ ११ ॥ यह अपने अभीष्ट के लिए बाहर में न रहने पर भी नहीं अनुभव हुए का भी सम्यक् उल्लेख करना और अवभासन विकल्प के प्रसंग से दिखाया गया है, इसी हेतु से यह भी सिद्ध होता है कि जो कोई कीट-पतंग, प्राणी अथवा ब्रह्मादि देव जब तक जीवित रहते हैं उनमें अवभासनरूप ज्ञान-शक्ति और उल्लेखनरूप क्रिया-शक्ति स्वाभाविक ही रहती हैं, इसीसे मनोराज्य, १. ईश्वर की पहचान शक्ति के द्वारा आविष्कार करने पर ही होती है और वह शक्ति ज्ञानरूप एवं क्रियारूप ही है । इस प्रकार ज्ञानरूप और क्रियारूप शक्ति से आविष्कार होने पर अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा सिद्ध हो जाती है । जिस अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उनके अनुयायी दूसरे अर्थों की भी सिद्धि हो जाती है, इसीको अधिकरण सिद्धान्त कहते हैं। जैसे कि न्याय दर्शनमें बताया है—'दर्शन स्पर्शनाभ्यामेकार्थ ग्रहणादिति ।' नेत्रेन्द्रिय से देखने एवं त्वगिन्द्रिय से स्पर्श करने से इन्द्रियों से भिन्न एक आत्मरूप पदार्थ का ज्ञान न होने के कारण । जिस वस्तु को मैंने आँखों से देखा था, उसी वस्तु को त्वगिन्द्रिय से स्पर्श भी करता हूँ । इस प्रकार जिसका नेत्रेन्द्रिय से ग्रहण होता है, उसी को—त्वगिन्द्रिय से भी ग्रहण होता है और जिसका मैंने त्वचा से स्पर्श किया था उसी को देखता भी हूँ । एक ही पदार्थ के रूप तथा स्पर्श गुणों को ग्रहण करने वाले दोनों ज्ञानों का एक ही उन इन्द्रियों से कर्ता है— जो ऐसा प्रतिसंधान करता है उन दोनों इन्द्रिय जन्य ज्ञानों का अनुसन्धान करनेवाले अथवा शरीरादिकों के समुदाय हैं, इन्द्रिय वर्ग नहीं है । इसलिए जो चक्षु से एवं त्वचा से एक ही पदार्थ को ग्रहण करता है वह इन्द्रियों से व्यतिरिक्त आत्मा है । जिससे अनेक नेत्र, त्वचा आदि इन्द्रियों रूप कारणोंवाला एवं रूपादि अनेक विषयों को देखनेवाला कोई संविद्रूप चेतन है ।

१४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१ वा जीवनक्रियाविष्टः तस्य अवभासनरूपा ज्ञानशक्तिः उल्लेखनरूपा च क्रियाशक्तिः नैसर्गिकी, ततः तस्यां भूमौ व्यतिरिक्तेश्वरोपकल्पितपूर्वसिद्धसृष्ट्युपजीवनसम्भावनापि नास्ति, इति स्वमेव ऐश्वर्यं स्फुटं प्रत्यभिज्ञेयं जानाति करोति च—इति ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्यलक्षणम् एकवचनेन सर्वस्य जीवजातस्य वस्तुत एकैश्वररूपतां सूचयति । इति शिवम् ॥ ११ ॥ आदितः ॥ ६३ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम षष्ठमाह्निकम् ॥ ६ ॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणाख्यं सप्तममाह्निकम् अनन्तशक्तिरत्नानां यदेकाश्रयसंश्रयात् । विचित्रचन्द्रिकोल्लाससंसिद्धिस्तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्मृत्यादिशक्तीनां वितत्य स्वरूपमियता दर्शितम्, यत्तु अत्र प्रमातुरपि स्वरूपम् उन्मीलितम् तत्तासामेव शक्तित्वं समर्थयितुम् 'न हि स्वतन्त्रं शक्तिस्वरूपं भवितुमर्हति' इति, अधुना तु तासां शक्तीनाम् एक आश्रयः, स च तच्छक्तिसंयोजनवियोजनादिस्वाच्छन्द्ययोगात् महेश्वरः न तु जडस्वरूपवह्न्यादिवत् दाहकपाचकादिशक्त्याश्रयमात्रम्—इति यत् उभयम् सङ्कल्पादि भूमि में अपने से भिन्न उपर्युक्त ईश्वर द्वारा कल्पित सृष्टि होने की संभावना भी नहीं है, इससे सिद्ध होता है कि अपना ही ऐश्वर्य स्फुटरूप से पहचान करने योग्य है, इसी को जानता है और करता भी है, यही ज्ञान क्रिया की स्वतन्त्रता है 'जीवतः' इसमें जो एकवचन दिया है वह सारे जीव समुदाय की वस्तुतः एक ईश्वररूपता सूचित करता है ॥ ११ ॥ षष्ठ आह्निक समाप्त जो अनन्त शक्तिरूपी रत्नों के एकमात्र आश्रय का स्थान होने के कारण, विचित्र-चित्ररूप से चन्द्रिका के उल्लास की सिद्धि देते हैं, उस शिव का हम स्तवन करते हैं। [ यह सारा का सारा संसार उस परमेश्वर ही शक्ति से अवस्थित है जैसे हिम से अलग शीतलता नहीं रहती और अग्नि से अलग उष्णता नहीं होती, इसी न्याय से, शक्तिमान् से शक्ति कहीं भिन्न उसे छोड़कर नहीं रहती है, धर्मी को धर्म से नहीं पुकारा जाता है। जैसा कि कहा भी गया है शिव शक्ति को रखने के कारण ही शक्त कहा जाता है, इसलिए शिव शक्ति से अभिन्न ही है 'शिवः शक्तस्तथा भावानिच्छया कर्तुमीहते।' शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नम्' यह युक्ति है। वस्तुतस्तु भगवान् शिवरूप ही यह सब है 'यदेकाश्रयेत्यादिना' इसलिए कहा गया है कि स्वतन्त्र- शक्ति नहीं होती है और न तो उसका स्वरूप ही हो सकता है।] इस प्रकार स्मृति आदि शक्तियों के स्वरूप को इतने ग्रन्थांश से विस्तारपूर्वक बता दिया है किन्तु जिस शक्ति निरूपण में प्रमाता का स्वरूप उन्मीलित था, वह उन्हीं शक्तियों का ही शक्तित्वरूप है, इसी के समर्थन के लिए कह रहे हैं—'शक्ति का स्वरूप भिन्न स्वतन्त्र नहीं होता है।' इस समय तो उन शक्तियों के एक मात्र आश्रय शक्तिमान् को ही दिखाना है और वह महेश्वर उन शक्तियों के संयोजन-वियोजन करने में स्वतन्त्र होने से जड स्वरूप वह्नि आदि के

अ.-१, आ.-७, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४१ उपक्षिप्तम् ‘न चेत् अन्तःकृतानन्तविश्वरूप ॰॰॰।’ इत्यत्र सूत्रे, तत् वितत्य निर्णेतव्यम्। तत्र एक- माश्रयं निर्णेतुम् ‘या चैषा प्रतिभा॰॰॰।’ इत्यादि ‘॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते ।।’ इत्यन्तं चतुर्दशभिः श्लोकैः आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र श्लोकेन एक आश्रयः स्वरूपत उपक्षिप्यते। ततोऽपि द्वयेन— व्यवहारः सर्वः सति एकस्मिन् आश्रये युज्यते न असति, इति अन्वयव्यतिरेकात्मा युक्तिः उच्यते। ततो व्यवहारस्वरूपं कार्यकारणभावतः, स्मरणतः, सत्यासत्यप्रविभागतश्च इति संक्षिप्य श्लोकेन श्लोकाष्टकेन च प्रतिपाद्यते। ततः श्लोकेन सर्वोऽर्थो निगम्यते, इति—आह्निकार्थसंक्षेपः। अथ श्लोकार्थो व्याख्यायते यदुक्तम्—‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवत’ इति तत् कथम् ? यावता ज्ञानादिव्यतिरिक्तः कोऽसौ अन्यो ? यस्य ते स्याताम्, काणाददिशा हि दूषितः तदाश्रयः ‘ततो भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰।’ इत्यादिना ? तत् एतत् आशङ्क्य स्वदर्शनदिशा तमेकं स्वरूपत उपक्षिपति— या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ १ ॥ ‘प्रतिभाति घट’ इति यद्यपि विषयोपश्लिष्टमेव प्रतिभानं भाति तथापि न तद्विषयस्य स्वकं वपुः, अपि तु संवेदनमेव तत् तथा चकास्ति ‘मां प्रति भाति’ इति प्रमातृलग्नत्वात् । तथा च वेदः — समान दाहक, पाचक आदि शक्तिभाग का आश्रय नहीं है—अपितु शक्ति और शक्तिमान् इन दोनों को कह दिया। ‘नहीं तो, अपने में अनन्त विश्व को कैसे रख पायेगा।’ इस बात का सूत्र में विस्तारपूर्वक निर्णय करना है। वहाँ पर एक आश्रय का निर्णय करने के लिए—‘या चैषा प्रतिभा ॰॰॰।’ इत्यादि से लेकर ‘॰॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते।’ तक चौदह श्लोकों से एक आश्रय रहने पर ही समस्त व्यवहार हो सकता है, एवं न रहने पर नहीं हो सकता; यह अन्वय-व्यतिरेक- भाव द्वारा युक्ति दिखायेंगे। उसके अनन्तर कार्य-कारणभाव से, स्मरण से सत्य और असत्य के विभाग से, संक्षेपीकरण करके एक श्लोक से और आठ श्लोकों से भी प्रतिपादन करेंगे। तब फिर एक श्लोक से समस्त अर्थों का शास्त्रीय पद्धति से व्यवस्थापन करेंगे, इतना ही इस आह्निक का संक्षेप में अर्थ है। अब श्लोक के अर्थ का व्याख्यान करते हैं—जिसके विषय में कहा गया था कि ‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवतः, अर्थात् ‘सब जीवों के लिए ज्ञान और क्रिया सिद्ध हैं’ यह कैसे हो सकता है ? जबकि ज्ञानादि से भिन्न दूसरा कौन है ? जिसके वे होंगे, क्योंकि काणादादि के सिद्धान्त से उसका आश्रय दूषित है ‘ततो भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰॰।’ इत्यादि श्लोक से कहा है ? इसकी आशङ्का करके अपने दर्शन की दृष्टि से उस के आश्रय के स्वरूप का उपदेश करते हैं— उन-उन पदार्थों में क्रम से यह जो घटादि की प्रतिभा मिली हुई है। वह अनन्त अक्रमरूप चिदात्मा महेश्वर ही प्रमाता हैं ॥ १ ॥ ‘घटः प्रतिभाति’ अर्थात् घट का बोध होता है। यद्यपि यह विषय से मिला हुआ आभास झलकता है, तो भी, वह विषय का अपना स्वरूप नहीं है, अपितु इसका ज्ञान ही वैसा भासित होता है, ‘मां प्रति भाति’ मुझे यह भासता है—ऐसा प्रमाता भी कहता है। इस प्रकार प्रमाता में मिला हुआ स्पष्ट मालूम होता है और उसी प्रकार वेद भी कहता है—

१४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१ 'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' इति। शत्रा अविरतस्फुरणत्वं, कर्मप्रवचनीयेन तदीयस्वातन्त्र्योपकल्पितनिर्माणक्रियाजनितो वेद्यवेदकभावरूपो लक्षणात्मा सम्बन्धो द्योतितः, केवलं विषयोल्लेखनबलात् बहिः क्रमावभासः समर्थितः, स—सक्रमयौगपद्यादिविचित्ररूपो, यः—पदार्थनां वक्ष्यमाणेश्वरस्वातन्त्र्यरूपदेशकालशक्त्युपकल्पितः, क्रमः—देशकालपरिपाटी, तेन रूषिता—प्रतिबिम्बकल्पतया उपरक्ता या प्रतिभा उक्ता—'केवलं भिन्नसंवेद्य....' इत्यादिना। एषा इति च—सर्वस्य स्वप्रकाशरूपा, परमार्थतश्च अन्तर्मुखत्वेन प्रकाशमात्रपरमार्थतया भेदा- भावात् अक्रमा, सैव महेश्वरः, अविद्यमानोन्तः—परिच्छेदो देशतः कालतः स्वरूपतश्च यस्याः चितः संविदः तदेव रूपं यस्य इति, अत एव बहिर्मुखप्रकाशात्मकविज्ञानस्वभावस्य प्रमाणवर्गस्य योऽन्तः प्रत्याभासम् 'इदम् इदम्' इति अनन्तो विकल्पमयो विमर्शात्मा प्रमासमूहः, तत्र संयोजनवियोजनविश्रमणाद्यनेकप्रकारस्वातन्त्र्यपरिपूर्णः शुद्धः 'अहंप्रत्यवमर्शमयः प्रमाता' स भण्यते, अतश्च बहिर्घटप्रकाशः 'अयं घट' इति अन्तर्विकल्पः स्वीकृतपूर्वरूपः 'अहमिति' तदुभय- उस प्रकाशरूप को न सूर्य प्रकाशित करता है और न तो चन्द्र एवं नक्षत्र गण, न तो विद्युत ही प्रकाशित करती है—यह अग्नि कैसे कर सकेगी ? उस पूर्ण ब्रह्म के प्रकाश से यह सारा का सारा संसार भासित होता है। शतृ प्रत्यय से निरन्तर भासना सूचित होता है, जो कर्मप्रवचनीय 'भान्तं' द्वितीया विभक्ति है, उसके स्वातन्त्र्य से, प्रकल्पित निर्माण क्रिया से उत्पन्न वेद्य-वेद्यकभावरूप सम्बन्ध झलकता है और केवल विषय के उल्लेखन वशात् बाहर में क्रमपूर्वक आभास का समर्थन हुआ है, वह सक्रम एकबार ही होना, विचित्ररूप पदार्थों के लिए कहे जानेवाले ईश्वर के देश-कालरूप शक्ति से उपस्थापित है, देश-काल की परिपाटी ही क्रम कहलाती है, इसलिए मिली हुई प्रति- बिम्बतुल्य प्रतिभा कही गयी है 'केवलं भिन्नसंवेद्य .....' इत्यादि पद से। इस प्रकार 'एषा' शब्द से सब का अपना ही प्रकाशरूप है और परमार्थरूप से अन्तर्मुख होने के कारण यथार्थ प्रकाश भाग से भेदभाव न रहने के कारण वह अक्रमरूप भी है, वही महेश्वर है, जिसका विनाश कभी न होता हो अपरिच्छिन्न निरन्तर रहनेवाले देश-काल के स्वरूप से शून्य संविद्रूप ही वस्तुतः स्वरूप माना गया है, इसलिए वह पदार्थ क्रम भी दो प्रकार का है, एक बाह्यरूप और दूसरा आन्तररूप है, उसमें बाहरो प्रकाशात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाणवर्ग का प्रमाता में प्रत्याभास 'इदम्-इदम्' इसरूप में अनन्त विकल्पमय प्रकाशरूप प्रमासमूह होता है। संयोजन- वियोजन आदि में अक्रमरूप स्वतन्त्र प्रमाता क्रमिकरूप में बाहरी पदार्थ से युक्त रहता है, बाहर में विमर्शात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाता में 'इदम्-इदम्' ऐसा प्रत्याभास प्रमाणवर्ग का होता हैं, अन्तर्मुख में विकल्प युक्त विमर्शात्मा का प्रमासमूह क्रमपूर्वक ही होता है और उसमें वह 'अहंप्रत्यवमर्शमय प्रमाता' 'संयोजन-वियोजन के विश्रान्तिरूप आदि अनेक प्रकार के स्वातन्त्र्य से पूर्ण शुद्धप्रमाता ही कहा जाता है और इसलिए बाहर में 'अयं घट:' इस प्रकार जो घट का १. बाह्य और आभ्यन्तररूप से पदार्थ क्रम दो प्रकार के हैं। इदम्, इदम्, यह प्रमाणवर्ग बहिर्मुखी प्रकाश है। प्रभा समूह विमर्शरूप अन्तर्मुखी है और क्रमिक है, संयोजन एवं वियोजन आदि में स्वतन्त्र प्रमाता का अक्रम ही रहता है ओर बाह्य पदार्थवाला तो क्रमिक ही होता है।

अ.-१, आ.-७, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४३ विश्रान्तिस्थानम्, इति—इयत् पूर्णं प्रकाशस्य स्वरूपम् ॥ १ ॥ अत्रैव उपपत्तिं प्रदर्शयितुमन्वयं तावदाह— तत्तद्विभिन्नसंवित्तिमुखैरेकप्रमातरि । प्रतितिष्ठत्सु भावेषु ज्ञातेयमुपपद्यते ॥ २ ॥ 'संवित्निष्ठा हि विषयव्यवस्थितयः' इति यत् उच्यते तत् न भिन्नरूपप्रमात्मकसंविन्मात्र- विश्रान्त्या सिद्ध्यति, अपि तु तास्ता विभिन्नाः संविदो निश्चयरूपाः प्रमात्मानो याः तानि एव मुखानि द्वाराणि उपाया मार्गाः तैः मुखैः नदीस्रोतः स्थानीयैः यदि अमी भाव नीलसुखादय उह्यमाना एकस्मिन् 'अहमिति' प्रमातृरूपे महासंवित्समुद्रे प्रतितिष्ठन्ति—आभिमुख्येन विश्रान्तिं भजन्ते, तत एषु परस्परं समन्वयरूपं यत् ज्ञातेयं तत् उपपत्त्या घटते, ज्ञातीनां भावः तच्छब्द- प्रवृत्तिनिमित्तं परस्परं जानीयुः इति, कर्म च अन्योन्ययोगक्षेमोद्वहनात्मकं ज्ञातेयम्, तच्च समन्वयाभिप्रायेण इह दर्शितम्—न जडानां स्वतः समन्वयः कदाचिदपि, इति प्रतिपादयितुम् ॥२॥ प्रकाश है—वह क्रमिक ही होता है एवं अन्तर में भी तो पहले स्वीकार किये हुए 'अहम्' का ही क्रमिक बाहर में आभास होता है । बाह्यरूप और आन्तररूप ये दोनों ही प्रमाताओं की विश्रान्ति का स्थान हैं इतना प्रकाश का पूर्णस्वरूप है ॥ १ ॥ 'अत्रैव' अनन्त-शक्तिवाले स्वरूप में जो 'अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः' चिद्रूप महेश्वर प्रमाता है उसी में उपपत्ति बताने के लिए सर्वप्रथम अन्वय कहते हैं— एक ही प्रमाता में उन-उन विभिन्न प्रधान ज्ञानों से प्रतिष्ठित होनेवाले पदार्थ-भावों में यही संवित् ज्ञात होती है ॥ २ ॥ 'सारे के सारे विषयों की स्थिति संवित् में ही रहती है'—जो यह कहा जाता है वह भिन्नरूप प्रमातावाले संविद्रूप मात्र में विश्रान्त होने से नहीं सिद्ध हो सकती, किन्तु उन-उन विभिन्न संविद्रूप का जो निश्चय प्रमाणरूप है उन्हीं को उपाय बनाकर नदी के प्रवाह के समान ये नील-सुखादिभाव यदि बहाये जायें और एक अहम् प्रमातारूप महासागर में बैठा दिये जायें और उसीसे इन नील-सुखादि भावों में परस्पर समन्वयरूप ज्ञान उन-उन उपपत्तियों से घट सकता है, अर्थात् ज्ञातियों के भाव उन-उन शब्द के निमित्त से परस्पर जाने जा सकेंगे और यहाँ पर कर्म अन्योऽन्य क्षेमरूप निबाहना ज्ञातेय है उन्हीं दोनों को समन्वयरूप से बताया गया है। जड- पदार्थों का स्वतः समन्वय कभी भी नहीं हो सकता, इस बात को दिखाने के लिए ही यह प्रयोग किया जाता है ॥ २ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सभी समन्वय कार्य-कारणभाव में विश्रान्त होकर समास भी हो जाते हैं, जैसा कि बीज से अङ्कुर और अग्नि से धूमादि भिन्न-भिन्न कार्य-कारणभाव, इस पर शङ्का करके, पूर्व अग्नि और बाद में होनेवाले जो धूमादि का सम्बन्ध है, इन सभी का एक साथ अवभास किसी प्रकार भी देश-काल से भिन्न होनेवाले का एक में आभास नहीं होगा, एक बार १. अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः । यह चिद्रूप प्रतिभा जो भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रमशः प्रकाशित हो रही है, वह अक्रम [ देश कालादि से शून्य ] अनन्त प्रमाता महेश्वर है ।

१४४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-३-४ तथा च व्यतिरेकमुखेन एतदेवाह— देशकालक्रमजुषामर्थानां स्वसमापिनाम् । सकृदाभाससाध्योऽसावन्यथा कः समन्वयः ॥ ३ ॥ अर्थानां जडानां, तज्ज्ञानानां तद्विकल्पानां तन्निश्चयानां च देशक्रमं कालक्रमं च अत्यजतां, स्वसमापिनां—स्वरूपमात्रप्रतिष्ठानां, कः समन्वयः—न कश्चित् इत्यर्थः, यतो हि असौ समन्वयः सकृदाभासेन देशकालाकारमिश्रीकरणात्मना योजनाभासेन साधयितुं शक्यः नान्यथा, न हि पृथक्पृथक् परिक्षीणेषु स्रोतःसु तदुह्यमानाः तृणोलपादयाः समन्वयं कञ्चित् यान्ति इति । अनेकत्वेन देशादिभेद इत्याशयेन सकृच्छब्दः तन्निषेधतात्पर्यण प्रयुक्तः ॥ ३ ॥ तत्र कोऽसौ समन्वयः ? इत्याशङ्क्य, बहुतरव्यापकं कार्यकारणभावं तावत् दर्शयति— प्रत्यक्षानुपलम्भानां तत्तद्भिन्नांशपातिनाम् । कार्यकारणतासिद्धिर्हेतुतैकप्रमातृजा ॥ ४ ॥ इह अग्नौ प्रत्यक्षे धूमं न उपलभते, ततो धूमं प्रत्यक्षेण पश्यति, अग्निं तु यदि न उपलभते धूममपि न उपलभते—इति प्रत्यक्षाभ्याम् अनुपलम्भैश्च इति पञ्चकात् 'कार्यकारणभावो मिलकर भासित होने से एक ही प्रमातावाले हो जायेंगे—तब तो, इनका स्वरूप ही नहीं रहेगा इसी कारण 'तथा च' अर्थात् व्यतिरेकरूप से व्याप्ति कहते हैं— देश, काल और क्रम को रखनेवाले भाव-पदार्थ अपने [ देश-काल ] में मिलकर रहनेवाले, एक प्रमाता में ही विश्रान्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो फिर समन्वय क्या कहलायेगा ? ॥ ३ ॥ नील-सुखादि जड-पदार्थों का, उनके ज्ञानों का, उनके विकल्पों का और उनके निश्चयों का, देशक्रम और कालक्रम नहीं छोड़नेवाले अपने स्वरूप में रहनेवाले, उन पदार्थ-भावों का क्या समन्वय हो सकेगा ? अर्थात् कुछ भी समन्वय नहीं बैठ सकता है। क्योंकि वह समन्वय एक बार आभासित हो जाने से देश, काल और आकारों के आपस में मिल जाने पर योजना के आभास से साध्य बन सकता है, अन्य प्रकार से नहीं हो सकता अर्थात् एक आभास में मिलाये बिना नहीं हो सकता है जैसा कि अलग-अलग जल के प्रवाहों में बहते हुए तृण-उपलादि कोई क्या आपस में समन्वित हो सकते हैं? जैसे वे आपस में समन्वित नहीं होते हैं—वैसे ही ये भी नहीं होते हैं। इसलिए 'सकृत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है; क्योंकि अनेकत्व से देशादि का भेद हो जाता है ॥ ३ ॥ नहीं तो, समन्वय हो नहीं सकता है 'अन्यथा कः समन्वयः !' कौन सा वह समन्वय है ? इस पर आशङ्का कर बहुत प्रकार से व्याप्त कार्य-कारणभाव को ही सर्वप्रथम दिखाते हैं— प्रत्यक्ष से नहीं उपलब्ध होनेवाले; उन-उन भिन्न-भिन्न अंशों में रहनेवाले; कार्य-कारणभाव की सिद्धि के लिए एक ही प्रमाता से उत्पन्न हेतु साधक होगा ॥ ४ ॥ जिस समय अग्नि प्रत्यक्ष होती है, उस समय धूम का प्रत्यक्ष नहीं होता है। उसके बाद धूम को प्रत्यक्ष प्रमाण से देखा जाता है, यदि अग्नि प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होती तो फिर धूम का भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। इस प्रकार धूम और अग्नि इन दोनों के प्रत्यक्ष होने से और न होने से

अ.-१, आ.-७, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४५ धूमाग्न्योः सिद्धयति' इति यत् उक्तं तत् कथम् ? अग्निप्रत्यक्षेण हि धूमेन किञ्चित् उद्गृहीतम्— अग्निलक्षणे धूमात् भिन्ने अंशे तस्य अवगमहेतुत्वात्, स्वस्वभावरूपे भिन्ने अंशे विश्रान्तत्वाच्च, परविषयानवगाहनात् ज्ञानान्तरस्वरूपानावेशाच्च इति । पातिः ज्ञापनवाची पतिश्च विश्रान्तिवाची प्रयुक्तस्तन्त्रेण । एवं धूमानुपलम्भादौ चतुष्टये वाच्यम् । ततश्च अग्निः, धूम, अग्न्यभावो, धूमा- भावः इति एतानि वस्तूनि यथा पृथक् प्रमातृसंवेद्यानि धूमाग्न्योः कार्यकारणतां न गमयन्ति तथा एकप्रमातृवेद्यान्यपि, विकल्पोऽपि अनुभवातिरिक्तं ज्ञापयन् न प्रमाणमेव । यदा तु प्रत्यक्षानुपलम्भस्रोतःपञ्चकेन तानि पञ्च वस्तूनि एकसंवित्समुद्रविश्रान्तानि कृतानि तदा एकीभूतानि प्रमात्रा स्वतन्त्रतया अन्योन्यसापेक्षाणि न तु घटपटादिवत् भास्यन्ते, स एव एक आभासः कार्यकारणभावावभास इति न किञ्चत् अवद्यम् ॥ ४ ॥ ननु प्रत्यक्षानुपलम्भैः यत् कृतं तत् स्मरणबलात् एकीकरिष्यति, उक्तं तावत् अत्र— स्मृतिरपि अनुभूतातिरिक्तेऽर्थे न व्याप्रियते, सापि च विज्ञानसमन्वयरूपा एकप्रमातृसद्भावं विना कथं स्यात् ? इति दर्शयति— धूम और अग्नि का कार्य-कारणभाव सिद्ध होता है, यह जो पहले कहा है वह कैसे सम्भव होगा ? अग्नि के प्रत्यक्ष से धूम ने कौन सा उपकार कर दिया—अग्नि तो धूम से भिन्न है, अग्नि तो प्रत्यक्षरूप से धूम से भिन्न भी दिखाई देती है और इसकी प्राप्ति का हेतु भी भिन्न ही है एवं अपने- अपने भिन्न अंश में दोनों ही विश्रान्त है, एक-दूसरे के विषय को नहीं पा सकेगा और दूसरे के ज्ञान का स्वरूप भी उसमें नहीं प्रविष्ट होगा । 'तत्तद्भिन्नांशपातिनाम्' इसमें 'ण्यन्त' जो पाति है वह ज्ञानवाची है और पाति केवल विश्रान्तवाची है इसलिए दोनों का स्वतन्त्ररूप से प्रयोग है अर्थात् एक ही से दोनों का अर्थ निकलता है इस ढङ्ग से अग्नि और धूम का एवं बीज और अङ्कुर का कार्य-कारणभाव समझना चाहिए । अग्नि है तो अवश्य धूम है, अन्यथा अग्नि का अभाव है इन सभी वस्तुओं के अलग-अलग प्रमाताओं से ज्ञान होने पर धूम और अग्नि का कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता है उसी प्रकार कार्य-कारणभाव एक प्रमाता से वेद्य होने के कारण विकल्प भी अनुभव से अतिरिक्त जनाता हुआ प्रमाण नहीं बन सकता । जब वेद्य होने पर प्रत्यक्ष से नहीं उपलब्ध होनेवाले पाँचो प्रवाह [ अग्नि-धूम और बीज-अङ्कुर एवं उनके अभाव ] एक संविद्रूपी समुद्र में जाकर एकरूप से भासित होते हैं, तब वे घट-पटादि के समान भिन्न नहीं भासित होते हैं, वही सागर में जाकर एक हुआ आभास कार्य-कारणभाव का अवभास कहलाता है, इस प्रकार इसमें कोई विरोध नहीं है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि प्रत्यक्ष से जिसकी उपलब्धि नहीं हो सकती है उसका स्मरण के बल से एकीकरण हो जायेगा ? इस प्रश्न का तो उत्तर दे दिया है कि अनुभव से अतिरिक्त अर्थ में स्मृति का व्यापार नहीं बन सकता; क्योंकि वह भी तो ज्ञान के समन्वयरूप होती है एक प्रमाता के सद्भाव के बिना कैसे हो सकती है ? उसे दिखाया जाता है— १. इसलिए भास्यमानता ही कार्यता और कारणता है, और वैसा भासना ही कार्य-कारणभाव का अवभास कहलाता है । १९

१४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-५ स्मृतौ यैव स्वसंवित्तिः प्रमाणं स्वात्मसंभवे । पूर्वानुभवसद्भावे साधनं सैव नापरम् ॥ ५ ॥ इह अनुभूतो विषयः प्रकाशते स्मृतौ, तत्र विषयस्य सा स्मृतिः न नूतनः प्रकाशः अपि तु अस्य स प्राच्य एव अनुभवप्रकाशः, चानुभवो ज्ञानरूपत्वेन ज्ञेयरूपत्वाभावात् न ज्ञानान्तरसंवेद्यः अपि तु स्वप्रकाशः, स च स्मृतिकाले यदि असन् तत् कथं प्रकाशताम्, भवतु वा असौ तथापि स्मृतिप्रकाशोऽनुभवप्रकाश इति अन्योन्यभिन्नं युगलम् इति न कदाचित् स्मृतिः स्यात्, तस्मात् एतत् एवमुपपद्यते, यदेव स्मृतिस्वसंवेदनम् तदेव अनुभवस्य स्वसंवेदनम्, न तु अपरं स्वसंवेदन- व्यतिरिक्तं प्रत्यक्षम् अनुमानादिकं वा तत्र क्रमते, ततश्च तावत्कालव्यापि अविच्छिन्नमेकं यत् स्वसंवेदनं तदेव 'प्रमातृतत्त्वम्' इति सिद्धम् । अन्यत्र अनुभवितरि स्मर्त्ता अन्यो न उपपद्यते, इति अनया च्छायाया स्मृत्या प्रमातृसिद्धिः पूर्वमुक्ता, इदानीं तु स्वसंवेदनैकीभावेन भङ्ग्यन्तरेण इति विशेषः ॥ ५ ॥ ननु अनुभवातिरिक्तेऽपि अर्थे सन्तु विकल्पाः प्रमाणम्, अप्रामाण्यं हि बाधबलात् भवति, बाधाभावे तत् कथं स्यात् ? इति आशङ्क्य, सोऽपि अयं बाध्यबाधकभावः सत्यासत्यप्रविभाजनाय विश्वेषां व्यवहाराणां जीवितभूतो, न एकेन प्रमातृतत्त्वेन बिना घटत इति वितत्य दर्शयति— स्मृति में अपना संवित्तिज्ञान है—वही अपनी सत्ता में प्रमाणित होता है। पूर्व के अनुभव की सत्ता में भी वही संवित्ति-साधन होती है, दूसरा कोई भी नहीं बन सकता ॥ ५ ॥ अनुभव किये हुए विषय का ही स्मृति में प्रकाश होता है और उसमें विषय की जो स्मृति है उसका कोई नूतन प्रकाश नहीं है किन्तु वही स्मृति का प्रकाश ही है—जिसका पूर्व में अनुभव प्रकाश हुआ था और वह ज्ञानरूप होने से ज्ञेयरूप का उसमें अभाव मिलेगा । इसीलिए वह दूसरे ज्ञान से वेद्य नहीं हो सकता । अपितु स्वयं प्रकाशरूप है और यदि वह अनुभव स्मरण काल में नहीं है तो कैसे प्रकाशित होगा ? यदि मान लो कि उसका प्रकाश है तो भी स्मृतिप्रकाश और अनुभवप्रकाश ये दोनों भिन्न-भिन्न [ संवेदन द्वय ] ज्ञान हैं, इस प्रकार स्मृति कभी भी नहीं हो सकेगी । इसलिए यह सिद्ध होता है कि—जो स्मृति का संवेदन है—वही अनुभव का भी संवेदन है, वहाँ पर कोई दूसरा स्वसंवेदन से अतिरिक्त प्रत्यक्ष या अनुमान नहीं आ सकता और इससे सिद्ध हुआ कि उस काल पर्यन्त रहनेवाला अविच्छिन्न एकसंवेदन ही प्रमातृतत्त्व है । दूसरे अनुभव करनेवाले में दूसरा स्मरण करनेवाला नहीं होता है, इस छायारूपी स्मृति से प्रमाता की सिद्धि का पूर्व में प्रतिपादन किया गया है, उसी को इस समय स्वसंवेदनात्मक एकीभावरूप दूसरे प्रकार से ही कहा जाता है—यही इसकी विशेषता है ॥ ५ ॥ अब शंका करते हैं कि अनुभव से अतिरिक्त कार्य-कारणभाव आदि अर्थ में विकल्प भले ही प्रमाण हो; क्योंकि अप्रामाण्य तो बाध के बल से ही होता है जब बाध नहीं है—तो, अप्रामाण्य कैसे बन सकेगा ? ऐसी आशंका कर, उत्तर देते हैं कि वह बाध्य-बाधकभाव भी जब कि सत्य और असत्य के विभाग करने के लिए सभी व्यवहारों का जीवन है, वह प्रमाता के बिना नहीं घट सकता है—इसी को विस्तारपूर्वक दिखाते हैं—

अ.-१, आ.-७, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४७ बाध्यबाधकभावोऽपि स्वात्मनिष्ठाविरोधिनाम् । ज्ञानानामुदियादेकप्रमातृपरिनिष्ठितेः ॥ ६ ॥ ‘बाधाभावे प्रामाण्यम्’ इत्येतदर्थम् अवश्यसमर्थ्यो यो बाधव्यवहारः सोऽपि कथम् इति अपि-शब्दस्यार्थः, इह शुक्त्या तावत् रजतस्य न काचित् बाधा नाम क्रियमाणा दृश्यते, शुक्तिज्ञानेन रजतज्ञानं बाध्यते इत्यपि न युक्तम्—स्वस्मिन् विषये आत्मनि च स्वरूपे द्वयोः ज्ञानयोः परि- निष्ठितयोः विश्रान्तयोः अन्योन्यं विरोधस्य अभावात् । अथ अयमेव विरोधः परस्परपरिहाररूपः र्तार्ह सर्वेषां ज्ञानानां विरोधात् बाध्यबाधकभावस्य परिनिष्ठैव न लभ्या—इति सुतरां विघटेत सत्येतरप्रविभागः । नञ्पि अत्र तन्त्रेण व्याख्येयः । एतदुक्तं भवति—यदि ज्ञानं स्वयं नश्यति तदा किं ज्ञानान्तरेण अस्य कृतं, न हि तेन तत्कालेऽसंभवता तस्य विषयापहारः कर्तुं शक्यः, न रजतम् इत्यपि ज्ञानं स्वं रजताभावं विषयोकुर्वन् न विषयम् अवहरेत् रजतज्ञानस्य । अथापि ज्ञानं ज्ञाना- न्तरेण नाश्यते इत्यपि पक्षः, तत्रापि सर्वेषां ज्ञानानाम् इयमेव सरणिः—इति किंचिदेव बाध्यम् इति कथं स्यात् ? यदा तु रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानं च एकत्र स्वसंवेदने विश्राम्यतः तदा एतत् उपपद्यते । तथाहि—एकत्रापि प्रमातृतत्त्वे विश्राम्यतां ज्ञानानां नैकप्रकारैव विश्रान्तिः अपि तु विचित्रतयैव सा संवेद्यते, तथाहि—नोलम् इति उत्पलम् इति ज्ञाने प्रमातरि विश्राम्यन्ती परस्पर- बाध्य-बाधकभाव भो एकमात्र प्रमाता में परिनिष्ठित होने से अपने में रहनेवाले अविरोधी ज्ञानों का उदय होता है ॥ ६ ॥ ‘बाध्यभावे प्रामाण्यम्’ बाध का नहीं रहना यह अवश्य समर्थन करनेयोग्य बाध व्यवहार है—वह भी कैसे होगा, यह ‘अपि’ शब्द का अर्थ है, पहले शुक्तिका से रजत का कोई बाध किया जाता हो—ऐसा नहीं देखने में आता है, शुक्तिज्ञान से रजतज्ञान बाधित होता हो यह भी बात नहीं है; क्योंकि अपने विषय में तथा आत्मा और अपने स्वरूप में ये दोनों ज्ञान परिनिष्ठित रहने के कारण विश्रान्त रहते हैं, इन दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है। यदि अब कहो कि यह विरोध परस्पर परिहाररूप है—तब तो, सभी ज्ञानों के विरोध से बाध्य-बाधकभाव को सत्ता हो नहीं मिलेगी; क्योंकि मिथ्या बुद्धि ही सत्य बुद्धि का तिरस्कार कर देगी। यहाँ ‘नञ्’ शब्द का भी तन्त्र से व्याख्यान करना होगा अर्थात् यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान अपने से विनष्ट हो जाता है—तो, दूसरा ज्ञान उसका क्या कर सकता हैं; क्योंकि वह दूसरा ज्ञान तो उस समय नहीं है। अतः उसके विषय [ रजत ] का अपहार कर सकें, रजतज्ञान रजत के अभावज्ञान को विषय नहीं कर सकता है और रजतज्ञान के विषय को भी अपहरण नहीं कर सकता। यदि मान लो कि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से विनष्ट किया जाता है, यह पक्ष है—तो, वहाँ पर भी ज्ञानों का यही बाध्य-बाधकभाव प्रकार है, यही एक मार्ग सभी ज्ञानों का है। तब फिर कुछ ज्ञान ही बाधित होता है—यह कैसे बनेगा ? जब कि एक ही संवेदन में रजतज्ञान और शुक्तिज्ञान विश्राम लेते हैं—तब तो, किञ्चित् बाधित हो सकता है, जैसे एक ही प्रमाता में विश्राम लेनेवाले ज्ञानों के एक प्रकार से विश्रान्ति सब स्थलों में नहीं होती है किन्तु विचित्ररूप से ही उनका ज्ञान होता है, जैसा कि यह नील है और यह उत्पल है—ये दोनों ज्ञान प्रमाता में विश्राम लेते हुए परस्पर

१४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-६ रोपरागाभासेन विश्राम्यतः । घट इति पट इति परस्परानाश्लेषेण शुक्तिका इति न रजतम् इति वा ज्ञानं रजतम् इति ज्ञानस्य उन्मूलन तदीयविमर्शात्मकप्रमारूपव्यापारानुवर्तनविध्वंसं कुर्वत् प्रमातरि प्रतिष्ठां भजते । एवं कार्यकारणभावादौ विश्रान्तिवैचित्र्यं प्रमेयासंभवि प्रमात्रा स्वात- न्त्र्येण निर्मितं तत एव अस्य प्रमास्वतन्त्रतादायि वाच्यम् । एवमेकत्र प्रमातरि पूर्वज्ञानस्य परिवर्जनेन यतो निश्चिता स्थितिः, अतो बाध्यबाधकव्यवहार उपपन्नः, नीलादिवत् किल तानपि व्यवहारान् स एव परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् आभासयति तत् तेऽपि सत्या एवेति ॥ ६ ॥ विशेषण और विशेष्यभाव से विश्रान्त हो जाते हैं। यह घट है और यह पट है—यह ज्ञान परस्पर पृथक् ही होता है; यह शुक्ति है, रजत नहीं है यह ज्ञान रजतज्ञान का उन्मूलन करता हुआ, उसके विमर्शरूप प्रमाव्यापार को भी विध्वंस करता हुआ प्रमाता में स्थिर होकर रहता है । इसी ढंग से कार्य-कारणभाव आदि में भी विश्रान्ति की विचित्रता, प्रमेय की असंभवता, प्रमाता की स्वतन्त्रता से निर्मित होता है, इसीलिए यह ज्ञान प्रमा को स्वातन्त्र्य देनेवाला कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि एक प्रमाता में रजतज्ञान को हटाकर शुक्तिज्ञान की निश्चित स्थिति हो जाती है, अतः बाध्य-बाधक व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है, नीलादि पदार्थों के समान उन रजत द्विचन्द्रादि के व्यवहार को परमेश्वर अपनी स्वतन्त्रता से भासित करते हैं; इसलिए वे असत्य होते हुए भी सत्य ही भासित होते हैं ॥ ६ ॥ १. जो ये असत्यरूप से कहे गये रजत, द्विचन्द्रादि के व्यवहार आभासित हो रहे हैं वे सभी परमेश्वर चिद्रूप की स्वातन्त्र्य-शक्ति से ही प्रतिभासित होते हैं और वे सभी सत्य ही हैं । इसलिए सत्यरूप ही कहे हुए हैं उनमें मिथ्यात्व थोड़ा भी नहीं होगा— या सैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूषिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ यह जो संविद्रूप प्रतिभा-शक्ति भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रम से अनुरंजित है वह क्रम से शून्य [ देश-कालादि के स्पर्श से रहित ] अनन्त चिद्रूप प्रमाता महेश्वर ही है । और इस विषय में पूर्व गुरुजनों के द्वारा भी कहा गया है । तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः । एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ॥ तथा यत्र सदित्येवं प्रतीतिस्तदसत्कथम् । यत्सत्तत्परमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः ॥ सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थतः । मिथ्याज्ञानविकल्पानां सत्त्वं चिद्व्यक्ति व्यक्तिता ॥ विद्यते तत्तदत्रापि शिवत्वं केन वार्यते । इति चेदेषु सत्यत्वं स्थितमेव चिदुद्गमात् ॥ तथा शिवोदयादेव भेदो मिथ्यादिकः कथम् । व्यवहाराय सत्यत्वं न च वा व्यावहारिकम् ॥ इत्यादि अनेक स्वभाव वाली शक्तियों के द्वारा व्यवहार करते हुए भी उस-उस शक्ति के अभेदभाव से शक्तिमान् होने के कारण उस-उस प्रकार से शिवत्व की स्थिति रहने से एक शिव ही सर्वत्र रहता है ।

अ.-१, आ.-७, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४९ अत्र परकीयं मतम् आशङ्कते—दूषयिष्यामीति— विविक्तभूतलज्ञानं घटाभावमतिर्यथा । तथा चेच्छुक्तिकाज्ञानं रूप्यज्ञानाप्रमात्ववित् ॥ ७ ॥ इह शुक्तिकाज्ञानं स्वात्मानं संविदत् स्वात्माभिन्नं प्रमाणं बुध्यते, 'तत्परिच्छिनत्ति' इति न्यायात्, तत्परिच्छेदानान्तरीयकतश्च अन्यव्यवच्छेद इत्यशुक्तिज्ञानरूपस्य रजतज्ञानस्याप्रमाणत्व- वेदनं तदेव उच्यते—यत् एतत् शुक्तिकासंवेदनाभिन्नप्रमाणत्ववेदनम्, न च एतत् अपूर्वं—यत् वस्त्वन्तरज्ञानमेव वस्त्वराभावज्ञानम् इति, शुद्धभूभागग्रहणमेव हि घटाभावज्ञानम् इति प्रसिद्ध- मेतत् । एवम् अप्रमाणतासंवेदनमेव रजतज्ञानस्य बाध्यत्वम् उच्यते, अतश्च बाध्यबाधकत्वम् एवं सिद्धम्, इति चेत् अस्माभिः उच्यते—तत् किं प्रमात्रैक्येनेति ॥ ७ ॥ अत्र प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य सिद्धौ तत्त्वमुपपादयिष्यन् दृष्टान्तमेव तावत् परदर्शने दूषयति— अब बाध्य-बाधकभाव में दूसरे के मत की आशंका करते हुए उसका खण्डन करेंगे— घटादि के अभावरूप शुद्ध भूतल में जैसे घटाभाव बुद्धि होती है उसी प्रकार रजतज्ञान के अप्रमाज्ञान में शुक्तिका का ज्ञान होता है ॥ ७ ॥ भूतल में शुक्तिका सम्बन्धी ज्ञान होता है उस शुक्तिका ज्ञान को अपने स्वरूप से अभिन्न जानता हुआ परिच्छिन्न अर्थात् स्वस्वरूप प्रमाण मानता हुआ जिसको जानता है उससे जो भिन्न है—उसे दूर कर देता है, 'तत्परिच्छिनत्ति' इस युक्ति द्वारा और उससे भिन्न का परिच्छेद करना आवश्यक होता है इसलिए यहाँ अन्यव्यवच्छेद [ रूप्य व्यवच्छेद ] इस अशुक्ति ज्ञानरूप रजतज्ञान की अप्रमाणता का ज्ञान करना इसी को कहा जाता है जो यह शुक्तिज्ञान का अभेदरूप प्रमाण जानता है और यह कोई नयी बात नहीं है, जो कि दूसरी वस्तु का ज्ञान ही उससे भिन्न वस्तु के अभाव का ज्ञान कराता हो, जैसा कि शुद्ध भूतल का ज्ञान करना ही घटाभाव ज्ञान है—यह प्रसिद्ध है। इस प्रकार अप्रमाणरूप ज्ञान ही रजतज्ञान को बाधित करता है, इसलिए ऐसा बाध्य- बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि बाध्य-बाधकभाव भी सिद्ध हो जाता है, यदि दूसरे लोग कहते हो तो हमने भी कहा है कि प्रमाता के ऐक्य ज्ञान से क्या लाभ होगा ? ॥ ७ ॥ इस प्रसंग से अभाव व्यवहार सिद्ध हो जाने पर यथार्थता सिद्ध करते हुए दूसरों के दर्शन में दृष्टान्त [ विविक्त भूतल ज्ञान ] को ही दूषित करते हैं— इस प्रकार मिथ्या ज्ञानों के विकल्परूप जो रजत-सर्पादि हैं उनका व्यवहार नीलादि पदार्थों के समान होता है और इन सबों में चिद्रूप की प्रकाश मानता विद्यमान रहती है, वही उनका परमार्थत्व माना जाता है; क्योंकि वह चिद्रूप की अभिव्यक्ति है इसलिए यह फैलाव-विस्तार उस-उस रूप से शिव का ही है ठीक-ठीक रूप से तो मात्र मिथ्यात्व का भेद ही व्यवहार का प्रयोजक होता है जिससे घट ज्ञान और रजत ज्ञान इन दोनों में भेद देखा जाता है किन्तु परमार्थतः नहीं के बराबर है और व्यवहार की सत्यता से परमार्थ की सत्यता बाधित भी नहीं होती, सर्वत्र व्यवहार वैसा ही होता है।

१५० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-८-९ नैवं शुद्धस्थलज्ञानात्सिद्ध्येत्तस्याघटात्मता । न तूपलब्धियोग्यस्याप्यत्राभावो घटात्मनः ॥ ८ ॥ यो दृष्टान्त उक्तः स एव न, कुतः ? इति चेत् उच्यते—इह भूतलं न घट इति तादात्म्येन अभावो व्यवहर्तव्यः कदाचित्, कदाचित् व्यतिरेकेण ‘इह भूतले घटो न’ इति । तत्र शुद्धभूतल- ज्ञानात् आद्योऽयं व्यवहारः सिध्यति, यत्र दृश्यत्वं न उपयोगि, उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरपि हि यस्य नास्ति पिशाचादेः—स्वभावबलात्, यस्य वा शब्दादेः तद्ग्राहक श्रोत्रादिसामग्रीसाकल्यस्य, तत्र एकज्ञानसंसर्गिवस्त्वन्तरप्रतिपत्त्यभावेनापि निश्चयात् तस्यापि तादात्म्येन अभावो व्यवहार्यः— भूतलं न पिशाचो न शब्दः इति, यत्र तु दृश्यत्वं विशेषणम् अवश्यम् उपयोगि तत्र व्यतिरेकेण अभावे व्यवहर्तव्ये न एषोऽभ्युपायः ॥ ८ ॥ कुतः ? इति चेत्—अतिप्रसङ्गात् इति ब्रूमः, तमेव दर्शयति— विविक्तं भूतलं शश्वद्भावानां स्वात्मनिष्ठितेः । तत्कथं जातु तज्ज्ञानं भिन्नस्याभावसाधनम् ॥ ९ ॥ विद्यमानेऽपि घटे भूतलं शुद्धमेव, नहि भावा मिश्रीभवन्ति ततश्च तदापि शुद्धभूतलज्ञानम् अस्ति, इति सत्यपि घटे कथम् अभावो व्यतिरेकेण न व्यवह्रियेत—अत्र भूतले घटो नास्ति इति, शुद्ध भूतल ज्ञान से उसका घटाभावरूप नहीं सिद्ध हो सकता। वहाँ पर घटरूप योग्य प्रतियोगी की उपलब्धि का भी अभाव है ॥ ८ ॥ जहाँ पर घटाभाव रहता है वही अधिकरणरूप ही घटाभाव माना जाता है, इसमें दृष्टान्त दिया है सो नहीं हो सकता ? क्योंकि यहाँ भूतल है, घट नहीं है, घटाभाव को भूतलरूप ही समझो, भूतल में घटाभाव है तो वह भूतलरूप है। जैसा कि वृक्ष में पिशाचाभाव है तो वृक्षरूप ही है ‘इह भूतले घटो न’ अर्थात् यहाँ पर भूतल में घट नहीं है। शुद्ध भूतल ज्ञान होने से तादात्म्य का ही व्यवहार सिद्ध होता है, जहाँ पर प्रतियोगी की दृश्यता उपयोगी नहीं है, वहाँ पर उसकी प्राप्ति भी तो नहीं हो सकती हैं; क्योंकि उसका वैसा स्वभाव ही है, जैसा कि शब्दादि को ग्रहण करने में श्रोत्रादि सामग्री की सफलता होती है, उस [शब्दादि] में एक ज्ञान के सम्बन्धि दूसरी वस्तु की सफलता रहती है, एकज्ञान संसर्गी दूसरी वस्तु में ज्ञान का अभाव रहने से भी निश्चय उस [पिशाच शब्दादि] को भी रूप से अभाव व्यवहृत होता है—जैसे भूतल न तो पिशाच है और न शब्द है, जहाँ पर दृश्यत्व विशेषण होगा वहाँ पर ही इसका उपयोग घट सकता है। यदि वहाँ व्यतिरेक से व्यवहार करना हो तो, यह उपाय नहीं हो सकता है ॥ ८ ॥ किस से ? यह यदि कहो तो, अत्यन्त आसक्तिपूर्वक हम कहते हुए उसी को दिखाते हैं— पदार्थों का स्वरूप अपने में परिनिष्ठित होने से भूतल तो सर्वदा शुद्ध ही रहता है। कभी भी शुद्ध भूतल का ज्ञान घट से भिन्न अभाव का साधन घट के रहते हुए नहीं हो सकता है ॥ ९ ॥ घट के विद्यमान रहने पर भी भूतल शुद्ध ही रहता है, भाव-पदार्थ किसी में मिलकर नहीं रहते हैं—तो फिर, घट के रहने के समय में भी शुद्ध भूतल का ही ज्ञान रहता है, इस प्रकार

अ.-१, आ.-७, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १५१ 'तज्ज्ञानमिति' विविक्तभूतलभागज्ञानं 'जातु इति' कस्यांचिदेव दशायां घटासंनिधानरूपायां, भिन्नस्य घटस्य अभावं साधयति न तु सर्वदा-इति केन प्रकारेण भवेत्, एतेन अत्र भूतले पिशाचो नास्ति इत्यपि स्यात् - इति आपतितं मन्तव्यम् ॥ ९ ॥ ननु एव व्यतिरेकाभावनिष्ठो व्यवहारो लोके तावत् अविगीतः कस्यांचित् एव दशायां दृष्टः, तत्र का गतिः ? इत्याशङ्क्य चिरन्तनैरपरिदृष्टं तत्सिद्धिप्रकारं दर्शयति- किं त्वालोकचयोऽन्धस्य स्पर्शो वोष्णादिको मृदुः । तत्रास्ति साधयेत्तस्य स्वज्ञानमघटात्मताम् ॥ १० ॥ इह भाव एव भावान्तरस्य 'अभाव' इति व्यवहर्तव्यः इति अयं तावत् अपरित्यज्यः प्रातीतिकः पन्थाः, तत्र भावस्य भावान्तरेण य आधाराधेयिभावः स एव भावतदभावयोः, ततश्च भूतले घटव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं शिलादिकम् आलोकपुञ्जादिकं वा यत् चाक्षुषे ज्ञाने भाति तदेव व्यवह्रियते- भूतले घटाभावो भूतले घटो नास्ति इति वा, यत्रापि नास्ति चक्षुर्व्यापारो नेत्र- निमीलनसंतमसादौ तत्रापि भूतले घटोचितकठिनस्पर्शविविक्तं मृदुम् उष्णं शीतम् अनुष्णाशीतं वा गृह्णन् तमेव अत्र घटाभाव इति व्यवहरति-वायुस्पर्शस्य सर्वगस्य अवश्यं भावात्, इति वाक्यार्थः । घट के रहने पर भी व्यतिरेक बुद्धि से अभाव का व्यवहार क्यों नहीं होता है ? ऐसा व्यवहार क्यों नहीं बनता है कि भूतल में घट नहीं है, 'तज्ज्ञानमिति' शुद्ध भूतल का ज्ञान 'जातु' किसी भी अवस्था में घट के असंनिधान दशा में, घट के रहने की दशा में ही घट से भिन्न अभाव को साधते हैं, सर्वदा नहीं-इसलिए 'जातु' शब्द का प्रयोग किया गया है, किस प्रकार से होगा, इस व्यतिरेक अभाव से भूतल में पिशाच नहीं है-यह भी ज्ञान हो सकता है, ऐसा मानना पड़ेगा ॥ ९ ॥ अब शंका करते हैं कि व्यतिरेक अभाव से होनेवाला व्यवहार लोक में प्रसिद्ध है, किसी- किसी घट के असंनिधान दशा में देखा जाता है-सर्वदा नहीं, वहाँ पर फिर क्या करोगे ? ऐसी आशंका करके पूर्व के लोगों द्वारा नहीं देखा गया अभाव व्यवहार की सिद्धि के प्रकार को दिखाते हैं- अन्धे व्यक्ति को आलोकपुंज का अनुभव नहीं होता है, किन्तु शीत-उष्ण के स्पर्श का भान मृदु-कठिन के रूप में अवश्य होता है । इसी प्रकार भूतल में आलोकादि के समान घटाभाव का अज्ञान सिद्ध करता है ॥ १० ॥ इस प्रस्तुत भाव-शीलादि में भाव ही दूसरे भाव का 'अभाव' ऐसा व्यवहार कराता है, यह स्वाभाविक मार्ग अपरित्यज्य है, एक भाव का दूसरे भाव से आधार-आधेयभाव सम्बन्ध होता है-वही भाव अभाव का भी सम्बन्ध रखता है और इससे भूतल में घट से भिन्न कोई दूसरी वस्तु शिलादि घटरूप स्पर्श विलक्षण का आलोक पुञ्जादि जो चाक्षुष ज्ञान में भासित होता है-उसी का व्यवहार होता है । जैसा कि भूतल में घट विद्यमान है अथवा नहीं है इत्यादि । जहाँ पर चाक्षुष व्यापार नहीं होता है जैसा कि नेत्र के बंद कर लेने पर अथवा गाढे अन्धकार में वहाँ पर भी भूतल में घटादिकों का मृदु-कठिन, शीत-उष्ण अथवा अनुष्ण-शीत ग्रहण करते हुए इसमें घटाभाव का व्यवहार होता है, जैसा कि वायु का स्पर्श सर्वत्र व्याप्त रहता ही है उसी प्रकार अन्धे व्यक्ति भी अपना सब व्यवहार किसी-न-किसी प्रकार सम्पादन कर ही लेते हैं ।

१५२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१०

पदार्थस्तु—‘किं तु’ इति स्वमतोपक्षेपाय प्रतिभाप्रश्नपरामर्शः, किं पुनरत्र न्याय्यमिति तत्राह ‘तत्र’ भूतले ‘आलोकचयः’ तावत् अस्ति ज्ञेयः ‘अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्श’ अस्ति ‘तस्य’ आलोकचयस्य स्पर्शस्य वा यत् ‘स्वज्ञानम्’ अन्यघटादिविविक्तेन स्वेन रूपेण ज्ञानं, तत् कर्तृ, ‘तस्य’ आलोकादेः अघटरूपतां घटाभावरूपतां ‘तत्र’ भूतले साधयति इति शक्योऽयमर्थः । ‘शकि लिङ् च’ ( पा० सू० ३-३-१७२ ) इति लिङ् । आन्तरप्राणस्पन्दनजनितसूक्ष्मशब्दाकर्णनाच्च श्रोत्रादिसाकल्यं सम्भावयमानः तमेव शब्दम् एकज्ञानसंसर्गिणं शृण्वन् शब्दान्तरं निषेधयति ‘न इह अन्यः शब्द’ इति । तत् सूक्ष्मशब्दाभावमपि सूक्ष्मतमान्तर्नादावहितश्रोत्रो वेदयते, रसगन्ध- स्पर्शाभावोऽपि दन्तोदकरसं त्रिपुटिकागन्धं कायीयं च स्पर्शं संवेदयमानेनैव संवेद्यः, नहि एकज्ञान- संसर्गयोग्यवस्त्वन्तरोपलब्भेन विना उपलब्धिकारणसाकल्यनिश्चयोऽस्ति, इति एकान्त एषः अचिरप्रवृत्तितत्तद्विषयानुभवकल्पितस्य तदैव ध्वंसानाशङ्कनात् करणस्य कारणसाकल्यनिश्चयः किम् एकज्ञानसंसर्गतया ? इति चेत् न—तत्तदभावोपलिप्सुः हि प्रयत्नेन तत्तदिन्द्रियाधिष्ठानं व्यापारयन् एव लक्ष्यते ॥ १० ॥ ननु एवम् अदृश्यस्यापि पिशाचादेः निषेधव्यवहारो व्यतिरेकेणापि प्राप्नोति, स हि आलोकपुञ्जो यथा घटात् अन्यः तद्वत् पिशाचादेरपि ? तदेतत् आशङ्क्याह—

अब पद के अर्थ को कहते हैं—'किन्तु' इससे अपने मत का उपक्षेप करने के लिए प्रतिभा अर्थात् तीक्ष्ण बुद्धिरूपी प्रश्न का परामर्श करती है, यहाँ पर न्याय करना चाहिए, इसके लिए कहते हैं—'तत्र' भूतल में 'आलोकचयः' प्रकाशपुञ्ज ज्ञेयरूप है 'अन्धस्य उष्णादिकः स्पर्शः' अर्थात् उष्णादि का स्पर्श अन्धे व्यक्ति को होता है 'तस्य' उस प्रकाशपुञ्ज के स्पर्श का तो ज्ञान अन्य घटादि के ज्ञान से भिन्न अपने स्वरूप में होता है। वह ज्ञान तो किसी कर्ता के माध्यम से हो सकता है, 'तस्य' उस आलोकादि का तो अघटरूप हो अथवा घटाभावरूप हो 'तत्र' उस भूतल में जाना जा सकता है। यहाँ 'शकि लिङ् च' पाणिनीय सूत्र ( ३-३-१७२ ) से शक्त अर्थ में लिङ् लकार हुआ है। शरीर के भीतर स्पन्दन से उत्पन्न हुआ सूक्ष्म शब्दों के सुनने से श्रोत्रादि- इन्द्रियों की सफलता संभाव्य है, वही शब्द किसी एक ज्ञान से संपर्क करके सुनाते हुए दूसरे शब्द का निषेध करते हैं 'न इह अन्यः शब्दः' यहाँ पर कोई अन्य शब्द नहीं है। इसी प्रकार से सूक्ष्म-सूक्ष्मतर शब्दों को भी श्रोत्र-इन्द्रिय व्यक्त करती हैं, इस प्रकार रस-गन्ध-स्पर्श और उनके अभाव को भी रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, और स्पर्श के लिए त्वगिन्द्रिय से संविदित होता है, एक ज्ञान के संसर्ग के योग्य दूसरी वस्तु के ज्ञान बिना उपलब्धि का निश्चय नहीं होता है—यही एकान्त निश्चय है, एक कारण के साथ दूसरे कारण का ज्ञान संसर्ग के बिना नहीं होता है, इसलिए उन-उन अभावों का भी ज्ञान उन-उन इन्द्रियों के अधिष्ठान के व्यापार से ही उपलक्षित होता है ॥ १० ॥ अब शंका करते हैं कि अदृश्य [ इह भूतले पिशाचो नास्ति तादात्म्याभावस्तु स्वसिद्ध एव इत्यपि शब्दस्य अर्थः ] जो इस भूतल में पिशाच नहीं है—ऐसा तादात्म्य अभाव तो 'स्वतः' अपने से ही सिद्ध है और निषेध व्यवहार 'अभाव व्यवहार' व्यतिरेक से भी तो प्राप्त होता है, वही प्रकाशपुञ्ज है। जैसा कि घटाभावरूप व्यवहार अर्थात् घट से भिन्न उसी प्रकार पिशाचादि का भी व्यवहार होगा। उसी की आशङ्का करके कहते हैं—

अ.-१, आ.-७, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५३ पिशाचः स्यादनालोकोऽप्यालोकाभ्यन्तरे यथा । अदृश्यो भूतल्स्यान्तर्न निषेध्यः स सर्वथा ॥ ११ ॥ आलोकपुञ्जो यद्यपि पिशाचात् व्यक्तिरिक्तो यद्यपि च आलोकोऽस्ति अपिशाचात्मा इत्येतावत् सिद्धयति तथापि अत्र 'पिशाचो नास्ति' इत्येतत् अशक्यम् अध्यवसातुम्, घटो हि आलोकपूरमध्येऽपि असम्भाव्यः- अघटसंनिधौ तत्र आलोकपूरापसर्पणात्, अतश्च सिद्धयतीदम्- अत्र घटो नास्ति इति, पिशाचस्तु तादृक्स्वभावो-यो भूतलमध्येऽपि आलोकमध्येऽपि वा भवन् भूतलस्य आलोकस्य वा तां निबिडतां न प्रतिहन्ति, अतश्च आलोकमध्ये तस्य सम्भावनात् कथं व्यतिरेकेण निषेधव्यवहारः, एवं रूपमध्ये रसादेः सम्भावनात् तस्यापि अनिषेधः यद्यपि अनालोकः आलोकात् अन्यः पिशाचः तथापि असौ भूतलस्य अन्तर्मध्येऽदृश्यो भवति इति सम्भाव्यते यथा, तद्वत् एव आलोकस्याभ्यन्तरे सोऽस्ति इति सम्भाव्यत एव, ततश्च यद्यपि आलोकस्ततोऽन्यः इत्यनेन पथा निषिद्धः पिशाचः तथापि सर्वप्रकारेण न निषिद्धः इति तदभावनिबन्धनाः कथं तत्र व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ताम् इति श्लोकार्थः ॥ ११ ॥ एवं प्रसङ्गात् अभावव्यवहारस्य तत्त्वम् उपदर्श्य प्रकृते योजयति- आलोक के रहते हुए भी पिशाच का ज्ञान नहीं होता है और आलोक के न रहने पर भी नहीं होगा; क्योंकि पिशाच भूतल में भी अदृश्य है और आलोक में भी अदृश्य है-इसलिए पिशाच का निषेध सर्वथा असम्भव है ॥ ११ ॥ यद्यपि आलोकपुञ्ज पिशाच से भिन्न है और अपिशाचरूप आलोक हैं-तो भी, यहाँ पर भूतल में 'पिशाचो नास्ति' पिशाच नहीं है-यह निश्चय करना अशक्य है; क्योंकि घट तो आलोक के बीच में भी, घटाभाव की सन्निधि में, पूरे आलोक का समर्पण नहीं होता है, इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर घट नहीं है, पिशाच तो वैसा ही स्वभाव का है जो कि भूतल के मध्य में या आलोक के मध्य में भी रहता हुआ भूतल की या आलोक की सघनता को रोक सकता है और इसीलिए आलोक के बोच में उसकी सम्भावना होने से उसके अभाव का व्यवहार कैसे हो सकता है ? इस प्रकार से रूप के बीच में रस इत्यादि की सम्भावना से उसका भी निषेध नहीं हो सकता है । पदार्थ के विषय में कह दिया गया । अब वाक्य का अर्थ कहते हैं-अनालोक आलोक से भिन्न हो है तो भी, वह भूतल से अदृश्य रह सकता है-जैसे यह सम्भव है, उसी प्रकार से आलोक के भीतर भी पिशाच है-यह सम्भव हो ही सकता है । इससे यह सिद्ध होता है कि आलोक पिशाच से भिन्न है, इसीलिए जैसे पिशाच का निषेध किया गया है-तो भी, सब प्रकार से उसका निषेध करना असम्भव है । इसलिए इसमें अभावमूलक व्यवहार कैसे प्रवर्तित होंगे, यही श्लोक का अर्थ है ॥ ११ ॥ [ सब सत्य है; क्योंकि भूतल घटादि से शून्य है इस वाक्य से धर्मोत्तर उपाध्याय के मत का अच्छी तरह निर्णय कर उसमें असत्यरूप दिखा दिया है। अब सत्यरूप की दृढता सिद्ध करने के लिए कहते हैं] इस प्रकार प्रसंग से अभाव व्यवहार के तत्त्व को बताकर उपस्थित विषय को बताते हैं। २०

१५४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-७, का.-१२ एवं रूप्यविदाभावरूपा शुक्तिमतिर्भवेत् । न त्वाद्यरजतज्ञप्तेः स्यादप्रामाण्यवेदिका ॥ १२ ॥ यथा आलोको घटाभाव इति आलोके गृहीते प्राक् गृहीतस्य घटस्य न किञ्चित् आयातम् तथैव शुक्तिज्ञानं रूप्यज्ञानाभाव इति इयत् सम्भाव्यते यथा घटज्ञानं घटज्ञानप्रामाण्यसंवित् पटज्ञानाभावः पटज्ञानाभावप्रामाण्यसंवित् इयता च न पूर्वप्रवृत्तं पटज्ञानम् अप्रामाणीभवति, एषा हि तस्य घटज्ञानस्य स्वरूपचिन्ता सर्वा न ज्ञानान्तरस्य आद्यस्य किमपि अतो जातम्। एवं शुक्तिरियम् इति, न रजतम् इदम् इति च ज्ञानमेव स्वात्मना प्रकाशताम्, अहं शुक्तौ रजताभावे च प्रमाणं न तु रजते इति, तावता तु प्राक्तनस्य रजतज्ञानस्य न किञ्चित् वृत्तम्, इति तद्विषयी- कृतं रजतं कथम् असत्यं स्यात् ॥ १२ ॥ ननु इदमित्यनेन तदेव परामृश्यते—यत्र रजतज्ञानम् अभूत् तत्रैव इदानीं 'न रजतम् इति, शुक्तिः इति' च ज्ञानं प्रमाणभूतं जातं, तत् अतोऽनुमीयते—यत् 'प्राच्यं रजतज्ञानम् अप्रमाणम्' इति, नहि एतत् सम्भवति—विरुद्धविषयावगाहि ज्ञानद्वयं प्रमाणम् एकत्र विषयीभवति इति, तत् अयम् आनुमानिको बाधव्यवहारो भविष्यति ? इत्याशङ्क्याह— इस तरह रजत ज्ञान की अभावरूपी शुक्तिका बुद्धि भले ही होवे । किन्तु पहले रजत ज्ञान के अप्रामाण्य को जाननेवाली शुक्ति बुद्धि नहीं हो सकती है ॥ १२ ॥ जैसे आलोक घटाभाव है, उसी प्रकार आलोक के ग्रहण हो जाने पर पूर्व में ग्रहण किये गये घट का कुछ भी नहीं बिगड़ता, इसी प्रकार शुक्ति ज्ञान रजत ज्ञान का अभाव है—ऐसी सम्भावना की जा सकती है । जैसा कि घटज्ञान पटज्ञान की प्रामाणिकता को भी ग्रहण करता है—इसी प्रकार पटज्ञानाभाव पटज्ञानाभाव की प्रामाणिकता का ज्ञान करता है इतने से पूर्व में प्रवृत्त हुए पटज्ञान को अप्रमाण नहीं बना सकता है, यही घटज्ञान का घटसम्बन्धी ही सब प्रकार की स्वरूप चिन्ता करता है, इससे पूर्व में हुए दूसरे ज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है अर्थात् शुक्तिज्ञान का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। इस प्रकार यह शुक्ति है; रजत नहीं और यह ज्ञान ही अपने आप रजतरूप से प्रकाशित होता है। मैं स्वयं शुक्तिका में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में नहीं हूँ, इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी तो नहीं बिगड़ता है। इसलिए उस ज्ञान को विषय मानता हुआ रजत कैसे असत्य हो सकेगा ? ॥ १२ ॥ [ यह जो कहा गया है कि यह शुक्ति है, रजत नहीं है—इस प्रकार अपने से हुए ज्ञान की प्रकाशरूपता है, मैं स्वयं शुक्ति में और रजताभाव में प्रमाण हूँ, रजत में प्रमाणभूत नहीं हूँ— इतने से पूर्व में हुए रजतज्ञान का कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं; अवसर ढूँढ़कर आक्षेप करते हैं । ] 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि 'इदम्' इससे उसीका परामर्श होता है, जहाँ पर रजतज्ञान हुआ था, वहाँ पर ही इस समय रजत नहीं, किन्तु शुक्ति है—यह ज्ञान प्रमाणभूत हो गया, इससे उसका अनुमान होता है जोकि पूर्व में रजतज्ञान अप्रमाणित था, यह संभव नहीं हो सकता है कि विरुद्ध में दो विषयों का अवगाहन करनेवाला जो ज्ञान है एक जगह ज्ञानरूप होकर प्रमाणभूत हो सके, सो यह अनुमानजन्य बाध का व्यवहार होगा ? इस प्रकार आशंका कर कहते हैं—