ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
११८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ इह तावत् चैतन्यस्य आत्मभूतोऽङ्गुलिनिर्देशादिप्रख्योऽभिलापयोगः, अन्यथा बालस्य प्रथमं व्यवहारे दृश्यमाने व्युत्पत्तिरेव न स्यात् । निर्विकल्पविज्ञानपरम्परया हि तं शब्दं शृणोति, तमर्थं पुरः पश्यति, पुनः तद्विविक्तं भूमलं पश्यति इति, घटम् आनय—नय—इति व्यवहारात् कथम् अस्य अयम् अर्थो हृदि परिस्फुरेत्, घट इति, इदमानय इति, इदं नय इति, इदमिति योजनाप्राणो हि अयमर्थः, योजना च विकल्पव्यापारः । अथ बालस्य प्राग्जन्मानुभूतसंकेत- स्मृतेः एवम्, तथापि संकेतकाले स शब्दो विषयत्वेन इदं भावेन अप्रत्यवमृश्यमानत्वात् भेदात् प्रच्युत्य निर्भासमानो विज्ञानशरीरविश्रान्तौकृतो वाचक इति भवति, तत् विज्ञानस्य स्वरूपं चेत् भाति, तत् अभिलापमयमेव इति, यथा विषयस्य सुखरूपत्वाभावेऽपि ज्ञानं सुखात्मकं भाति तथा मा भूत् अभिलापात्मा रूपादिः विषयः, तथापि विज्ञानं तदात्मकं अवभासिष्यते । अत्र तु दर्शने विषयस्यापि विमर्शमयत्वात् अभिलापमयत्वमेव वस्तुतः, स्तैमित्याद्यवस्थापि यदि न परामर्शमयी तर्हि अस्यां विकल्पात्मकप्रमातृव्यापारानुल्लासात् सम्भवः शपथपरमार्थ एव, निश्चित मायाजन्य विमर्श में चैतन्य का स्वरूपभूत अङ्गुलिनिर्देश के समान अभिलाप- योग रहता है, नहीं तो बालक को प्रथम व्यवहारदृष्टि में व्युत्पत्ति [ शक्तिग्रह ] ही नहीं होगी । क्योंकि बालक निर्विकल्प विज्ञान परम्परा से ही शब्द को सुनता हुआ, उस अर्थ को आगे की ओर सामने देखता है, फिर अर्थशून्य भूतल को देखता है, इसके बाद घट लावो और घट ले जावो—इस व्यवहार से बालक को इसका अर्थ हृदय में प्रतिफलित नहीं होगा, घट का ज्ञान और उसका ले आना फिर उसका ले जाना इत्यादि योजना में मिले रहना ही उसका अर्थ है और योजना ही विकल्प का व्यापार कहलाती है। यदि यह कहें कि बालक को पूर्वजन्म की स्मृति से ऐसा होता है—तो भी संकेत काल में विषयरूप से या इदंभाव से प्रत्यवमर्शन नहीं होने के कारण भेद से हटकर भासित होता हुआ विज्ञान शरीर में विश्राम लेकर यह शब्द वाचक होता है वही विज्ञान का स्वरूप है ऐसा यदि कहो, तो वह अभिलाप ही हो गया, [ जैसे माला-चन्दन-वनिता आदि विषयक सुख साधन के सुखरूपता का अभाव रहने पर भी ज्ञान तो सुखरूप से भासता है उसी प्रकार अभिलापभूत रूपादि विषयक न हो तो भी ज्ञान उस रूपत्त्व का भासित होगा ] इस प्रकार शब्द को आरोपित करता है जैसे विषय का सूक्ष्मरूप न होने पर भी ज्ञान सूक्ष्म होता है वैसा अभिलापरूपादि विषय सुखरूप नहीं है तब भी अभिला- पात्मक विज्ञान को तो अवभासित ही करेगा। हमारे स्वतन्त्र शैवाद्वैत दर्शन में तो विषय भी विमर्शमय होने के कारण वस्तुतः अभिलापमय ही होते हैं, सकल विकल्पों के क्षोभ से शून्य रहना आदि अवस्था भी परामर्शमयी नहीं रहती, तो इस अवस्था में विकल्परूप प्रमाता का १. सकल विकल्प के क्षोभ से रहित हो जाना ही स्तिमित कहलाता है । बाह्य ओर आन्तर से प्रसार का रुक जाना स्तैमित्य अर्थात् चांचल्य का अभाव हो जाना है । २. प्रत्यक्ष विषय के साधन में इन्द्रियाँ कल्पना से रहित हो जाती है — संहृत्य सर्वतश्चिन्तां स्तिमितेनान्तरात्मना । स्थितोऽपि चक्षुषा रूपमीक्षते साक्षजा मतिः ॥ पुनर्विकल्पयन्किंचिदासीन्मे कल्पनेदृशी । इति वेत्ति न पूर्वोक्तावस्थायामिन्द्रियाद्गतौ ॥
अ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११९ स्मरणं च न स्यात्, रूपविषयाध्यवसायी हि यदि विकल्प उदियात् किमन्यत्, सर्वचिन्तासंहरणेन स्तैमित्यं नाम न स्यात् इति, तत्रापि अस्ति अन्तः परामर्शः सकलेन च शब्दग्रामेण, शब्दनं हि सहन्ते वस्तूनि । तत्र च नियतशब्दयोजनं क्रियते । तथाहि—बालस्य पुरतः पिण्डे सहजो यः परामर्शः, अहम् इत्यविच्छेदेन इदम् इति विच्छेदेन वा तत्पृष्ठे एव गौर इति गौः इति वा शब्द आरोप्यते, सोऽपि अभ्यासात् प्रमातृमयी- भवति, तत्पृष्ठे च अन्यः शुक्ल इति बलीवर्द इति, एवमन्यत् इति संकेततत्त्वम् । तस्मात् अस्ति साक्षात्कारे प्रत्यवमर्शः । अपिशब्दस्य अयमाशयः—इह साक्षात्कारो वस्तुतः 'पश्यामि' इत्येवं- भूतविकल्पनव्यापारपर्यन्त एव । विकल्पो हि प्रत्यक्षस्य व्यापार, इति परोऽपि मन्यते । न च व्यापारः तद्वतो भिन्नो युक्तः, तत्स्वरूपभूतो हि सः । भवतु वा क्षणमात्रस्वभावः साक्षात्कारः तत्रापि अस्ति विमर्शः, अवश्यं चैतत्—अन्यथा इति यदि स न स्यात् एकाभिसंधानेन जवात् गच्छन् त्वरितं, च वर्णान् पठन्, द्रुतं च मन्त्रपुस्तकं वाचयन्, न अभिमतमेव गच्छेत्, उच्चारयेत्, व्यापार न होने से किसी की कल्पना भी नहीं हो सकती है और स्मरण भी नहीं हो सकता है, रूपविषयक ज्ञान ही यदि विकल्परूप से उदित हो तो फिर क्या कहना है, सब प्रकार की चिन्ता का संहार करके शान्त चुप-चाप बैठे रहना भी तो नहीं बनता है; क्योंकि वहाँ पर भी अन्तःकरण में परामर्श रहता ही है और सम्पूर्ण शब्दसमूह से विमर्श करते रहना सभी वस्तु-पदार्थ सह लेते हैं अब उसमें नियत शब्दों की योजना बनाते हैं, इसीको दिखाते हैं—जैसे कि बालक की अभिमुख अवस्थित वस्तु में सहज जो परामर्श होता है 'अहम्' इस अनवच्छिन्न प्रकाशरूप से, 'इदम्' इस परिच्छेद-परिमितरूप से भासता है अथवा उसी के पश्चात् ही 'अहम्' इस रूप में प्रकाशित होता है, गौ 'इदम्' इस रूप में भासता है—ऐसा शब्द का आरोप होता है, वह भी अभ्यास द्वारा प्रमाता से युक्त होकर होता है और उसी के पश्चात् दूसरा शुक्ल है, यह बैल है, इस प्रकार दूसरा ऐसा संकेततत्त्व है। इसलिए साक्षात्कार होने पर प्रत्यवमर्श ज्ञान होता है। 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि यहाँ पर साक्षात्कार परमार्थतः 'पश्यामि' मैं देखता हूँ—ऐसा विकल्प करनेवाले का व्यापार पर्यन्त ही रहता है। क्योंकि विकल्प ही प्रत्यक्ष का व्यापार माना जाता है, ऐसा सौगतादि का मानना है । व्यापार कोई व्यापारवाले से भिन्न नहीं होता और ऐसा मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वह तो उसका स्वरूपभूत होकर रहता है। भले ही क्षणभर रहे, क्षणमात्र स्वभाववाला साक्षात्कार होकर रहे किन्तु उसमें भी विमर्श ज्ञान रहता है और यह आवश्यक भी है—यदि वह उसमें नहीं रहेगा, तो एक अनुसन्धान से वेगपूर्वक गमन करते हुए, त्वरित गति से वर्णों को पढ़ते हुए, शीघ्रता से मन्त्र-पुस्तक को बाँचते हुए, अपने अभीष्ट वस्तु को भी नहीं नित्य-स्तिमित अन्तरात्मा के माध्यम से चारो ओर से चिन्ता को समेट कर स्थिर रहता हुआ भी चक्षु-इन्द्रिय के द्वारा रूप ग्रहण कर लेता है। वही प्रत्यक्ष बुद्धि कही जाती है। मेरी कुछ ऐसी ही कल्पना थी फिर ऐसा विकल्प करता हुआ, जो जानता है उसकी पूर्वोक्त अवस्था में इन्द्रियों की गति नहीं देखी जाती । १. मैं अपने में स्थिर हो गया हूँ। इस स्थिति में संकल्प, विकल्प एवं स्मरण इत्यादि का अपने आप अवरोध हो जाता है।
१२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ वाचयेत् वा । तथाहि—तस्मिन् देशे ज्ञानम् आचिक्रमिषा-आक्रमणम्-आक्रान्तता-ज्ञानं-प्रयोजना- न्तरानुसंधानम्-तित्यक्षा-देशान्तरानुसंधिः, तत्रापि आचिक्रमिषा इत्यादिना संयोजनवियोजनरूपेण परामर्शेन विना अभिमतदेशावाप्तिः कथं भवेत् । एवं त्वरितोद्ग्रहणवाचनादौ मन्तव्यम् । तत्र विशेषतः स्थानकरणाक्रमणादियोगः । अत्र च यतः पश्चाद्भाविस्थूलविकल्पकल्पना न संवेद्यते, तत एव त्वरितत्वम् इति सूक्ष्मेण प्रत्यवमर्शेन संवर्तितशब्दभावनामयेन भाव्यमेव । संवर्तिता हि शब्दभावना प्रसारणेन विवर्त्यमाना—स्थूलो विकल्पः यथा इदमित्यस्य प्रसारणा घटः शुक्ल इत्यादिः, तस्यापि पृथुबुध्नोदराकारः शुक्लत्वजातियुक्तगुणसमवायी इत्यादिः । धावु गतिशुद्धौ इति पाठात् धाविस्त्वरितगतौ स्वशक्तिवशात् वर्तत इति ॥ १९ ॥ भवतु एवं सूक्ष्मो विमर्शः प्रकाशशरीरावेशी, यत्र तु स्थूलत्वेन विकल्परूपता स्फुटा, तत्र शब्दो नीलादिवत् एव पृथक् प्रतिभासते—नीलम् इदम् इति, स कथं प्रकाशस्वरूपात् अपृथग्भूतः प्राप्त कर सकेगा, अथवा उच्चारण एवं बाँच भी नहीं पायेंगे । देखिये—उस देश में ज्ञान है आक्रमण करने की इच्छा का नया आक्रमण, आक्रान्त का ज्ञान होना दूसरे प्रयोजन का अनु- सन्धान करना है, त्याग करने की इच्छा देशान्तर की इच्छा का अनुसन्धान करना है, उसमें भी 'आचिक्रमिषा' इत्यादि वाक्यों से संयोजन-वियोजनरूप परामर्श बिना अभिमत देश की प्राप्ति कैसे होगी। इस प्रकार शीघ्रगति में ग्रहण करने और बाँचने इत्यादि में मानना होगा। यहाँ पर विशेष- रूप से स्थान-मूर्ध, ताल्वादि, करण, आक्रमण आदि का योग रहता है । [ यदि सर्वत्र नीलादि ] ज्ञान में शब्द है तो किञ्चित भी निर्विकल्पक सिद्ध हुआ, वैसा ही क्यों अवतरिका में दिया है ? [ या तु निर्विकल्पक रूपा ] इत्यादि वाक्य से जो यह निर्विकल्परूप है इत्यादि कहा जाता है, वह तो दूसरे का ही ज्ञान है, उसके न रहने पर भी हमारा कुछ भी अनिष्ट होनेवाला नहीं होगा देखिये—इसीको मैं अब भली भाँति जानता हूँ एवं मैं करता हूँ, इसका यही संकुचित स्वरूप है जबकि नियति, काल, राग, अशुद्ध विद्या, कला, माया उन छः कंचुकों से भरा हुआ, प्रकाश स्वभाव उस पुरुष नाम धारी माया प्रमाता का है । 'सब कुछ देखता हूँ इस प्रकार का बुद्धि- इन्द्रिय विशेष व्यापार वर्ग में जो अनुयायी है' मैं जानता हूँ, व्यापाररूप उसमें जो करण सामान्य रूप अशुद्ध विद्यातत्त्व है वह किञ्चित् भी स्वतन्त्र नहीं है अपि तु वह तो परमेश्वर की ही शक्ति है । जब कि उसके पीछे होनेवाली भावी स्थूल विकल्प की कल्पना ज्ञात नहीं होती है, इसलिए त्वरितत्त्व यह सूक्ष्म विमर्श से संवर्तित शब्द भावना से युक्त होना चाहिए । वह संवर्तिता ही शब्दता है जब कि प्रसारण = फैलने से स्थूल-विकल्प बन जाती है, जैसे 'इदम्' इसका फैलाव घट शुक्ल है इत्यादि रूपों में हो जाता है, उस घटादि का भी फैलाव पृथुबुध्नोदर आकार शुक्लत्व जाति से युक्त होकर गुण-समवायरूप हो जाना इत्यादि । यहाँ पर धावु-धातु गति की शक्ति अर्थ में पढ़ी गयी है । इसलिए धावु धातु त्वरित गति में अपनी शक्ति सामर्थ्य से प्रवृत्त होती है ॥ १९ ॥ ठीक है, इस प्रकार सूक्ष्म विमर्श प्रकाश शरीर में आविष्ट होकर रहता है । जहाँ पर स्थूल [अध्यवसाय] रूप से विकल्परूपता प्रस्फुट होती है वहाँ पर शब्द नीलादि पदार्थ की भाँति ही भिन्नरूप में प्रतिभासित होने लगता है—जैसा कि यह नील है, वह प्रकाश स्वरूप से अभिन्नरूप १. मूर्ध, ताल्वादि स्थान और जिह्वाग्रादि भाग करणेन्द्रिय इन दोनों के परस्पर संस्पर्श हो जाने पर ही वर्णों की निष्पत्ति होती है ।
अ.-१, आ.-५, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२१ स्यात्, शब्दात्मा च विमर्शः, स च तत्र मायात्मके भेदपदेऽपि प्रकाशापृथग्भूतो भवद्भिः इष्टः, तत् एतत् कथं प्रतिपत्तव्यम् ?, इत्याशङ्कयाह— घटोऽयमित्यध्यवसा नामरूपातिरेकिणी । परेशशक्तिरात्मैव भासते न त्विदन्तया ॥ २० ॥ केन एतत् उक्तम्—घट इति यः स्थूलः शब्दः स प्रकाशजीवितस्वभावो विमर्श इति । सोऽपि हि स्थूलः शब्दोऽर्थवत् पृथग्भूत एव भाति । तौ नामरूपलक्षणौ शब्दार्थौ एकरूपतया ‘सोऽयम्’ इत्येवंरूपत्वेन परामृशन्ती अध्यवसायशक्तिः या, सा परमेश्वरशक्तिः विमर्शरूपा आत्मवत् एव अहमित्यनवच्छिन्नत्वेन भाति, न तु कदाचित् इदन्तया—विच्छिन्नत्वेन भाति, विच्छिन्नत्वेन अवभासे परप्रतिष्ठत्वात् पुनर्विमर्शान्तरेण भाव्यम्, तत्रापि एवम् इति अनवस्था, अतो नीलस्य प्रकाशनमेव न स्यात्—प्रतिष्ठालाभाभावात् । तस्मात् ‘सर्व एव विमर्शः प्रकाशात् अविच्छिन्न एव’ इति। अध्यवसा इति, ‘आतश्चोपसर्गे ( पा० अ० ३-३-१६ ) इत्यङन्तः स्त्रियाम् ॥ २० ॥ में कैसे भासित होगा, और वह शब्द विमर्शंरूप में भासता है तो इसका मायात्मक भेदवाले संसार में भी प्रकाश से अभिन्नरूप में होकर भासना आपको भी अभीष्ट है, इसको कैसे जानना चाहिए ? इस प्रकार आशंका कर उत्तर देते हैं— वही यह घट है ऐसा जो अध्यवसाय [ज्ञान] नाम [घट] एवं रूप [पृथुबुध्नोदर आकार] से व्यतिरिक्त है। वही परमेश्वरकी शक्ति आत्मा के समान ‘अहम्’ इस अनवच्छिन्नरूप से भासती है ‘इदम्’ परिच्छिन्नरूप से नहीं भासती ॥ २० ॥ यह किसने कहा है—जो यह ‘घट’ स्थूल शब्द है वह प्रकाश जीवित स्वभाववाला विमर्श है। वह भी स्थूल शब्द के अर्थ की भाँति भिन्नरूप से ही भासता है उन नाम एवं रूप लक्षणवाले शब्दार्थ को जो एक [सोऽयम्] रूप से परामर्श न करनेवाली अध्यवसाय-शक्ति है, वह विमर्शरूप परमेश्वर की शक्ति आत्मा की जैसी अभेदभावपूर्वक ‘अहम्’ अनवच्छिन्नरूप से भासती है, वह कभी भी ‘इदन्तया’ अर्थात् विच्छिन्नरूप से नहीं भासती है। विच्छिन्नरूप से आभासित होनेपर तो अन्य प्रकाश की अपेक्षा रखनी पड़ती है दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला अप्रतिष्ठित कहलाता है, विच्छिन्न स्वतः प्रकाशित न होने के कारण अप्रतिष्ठित है, विमर्शं के बिना होना असम्भव ही है वह भी किसी अन्य से, इस प्रकार अनवस्था हो जायेगी, इसलिए नील का प्रकाशन ही नहीं होगा, क्योंकि प्रतिष्ठान = सभी संवेदन ज्ञानों को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नील में नहीं है। इसी कारण सब विमर्श प्रकाश से अविच्छिन्न ही है। ‘अध्यवसा’ यह प्रयोग ‘आतश्चोपसर्गे’ [३-३-१०६] इस पाणिनीय सूत्र के द्वारा ‘अङ’ स्त्रीलिङ की विवक्षा में ‘टाप्’ होकर निष्पन्न हुआ है ॥ २० ॥ १. अध्यवसायरूप ज्ञान ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकाशमान होनेवाले [ घटादि ] नाम एवं रूपादि से व्यतिरिक्त चिति-शक्ति ही आत्मरूप में अभिन्न होकर भासती है। १६
१२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-२१ ननु एवं सर्वस्यैव ज्ञानकलापस्य अहमित्येव प्रतिष्ठाने वेद्यभूमिसंस्पर्शो नास्ति वेद्यभुवि च देशकालयोगः न तु वेदकांशे देशकालयोगाभावे च यत् इदं ज्ञानानां स्वांशापेक्षया ज्ञानान्तरापेक्षया च सक्रमत्वं लक्ष्यते तत् कथं स्यात्, क्रमाभावे च एकत्वमेव वस्तुतो भवेत्, ततश्च 'ज्ञानस्मृत्यादि- शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' इति यत् उक्तं तत् कथं निर्वहेत् ? इत्याशङ्कां शमयन् पूर्वोक्तमुप- संहरति— केवलं भिन्नसंवेद्यदेशकालानुरोधतः । ज्ञानस्मृत्यवसायादि सक्रमं प्रतिभासते ॥ २१ ॥ सत्यम् एवम्—अक्रममेव संवित्तत्त्वम्, किन्तु स्वशक्तिवशात् भिन्नत्वेन भासितानि यानि वेद्यानि तेषां मूर्तिभेदकृतो यो दूरादूरवैतत्यावैतत्यादिः देशः, क्रियाभेदकृतश्च चिरशीघ्रक्रमादिरूपः कालः, तौ अनुरुध्य—च्छायामात्रेण अवलम्ब्य, ज्ञान-स्मरणायध्यवसायानां स्वांशा इव भान्ति, निरंशानामपि तद्भासमानांशकृतश्च सक्रमत्वावभासः परस्परापेक्षया स्वांशापेक्षया च, यद्यपि अब प्रश्न करते हैं कि सब ज्ञान का यह 'अहम्' परामर्शन ही जीवन है और जब वेद्य- भूमि से उस परामर्श का स्पर्श ही नहीं है एवं देश-काल का योग वेद्यभूमि में रहता है, इस प्रकार वेदक के अंश में देश-काल का योग न रहने से तो ज्ञानों का अपने अंश की अपेक्षा से अथवा अन्य ज्ञानों की अपेक्षा से सक्रमता दीख पड़ती है वह कैसे बैठेगी ? क्रम के अभाव में वस्तुतः एकत्व ही रहेगा। 'ज्ञान स्मृत्यादि शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' अर्थात् ज्ञान, स्मृति आदि शक्तियों से युक्त परमेश्वर कैसे होगा ? इस शंका का समाधान करते हुए पूर्वमें कहे गये का ही उपसंहार करते हैं— केवल भिन्न-भिन्न देश एवं काल के संवेद्य के अनुरोध से ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि क्रम से प्रतिभासित होते हैं ॥ २१ ॥ ठीक ही है, संवित् तत्त्व अक्रम ही रहता है, किन्तु अपनी माया-शक्ति के बल से भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होनेवाले जितने भी वेद्य पदार्थ हैं उनके मूर्ति भेदकृत् जो दूर-समीप और संकुचित-विस्तृत-विशाल इत्यादि देश भेद और क्रिया भेद से होनेवाले शीघ्र-विलम्ब इत्यादि जो काल-भेदादि इन्हीं दोनों भेदों को छायामात्र मान लेने पर ज्ञान, स्मृति एवं अध्यवसाय इनके अपने-अपने अंश मालूम होते हैं, निरंशों में भी आभास अंश से सक्रमत्व का अवभास परस्पर १. चिद्रूप की माया-शक्ति के द्वारा घटादि संवेद्य विषय उस-उस देश-कालादि से भिन्न होकर प्रकाशित होते हैं। जिसका अभेद से आक्रान्त होने पर विभिन्न देश कालादिरूप से ज्ञान, स्मृति-शक्ति इत्यादि अवभासित होने लगती है । २. चिति-शक्ति से वेद्य विषय भिन्नरूप में भासते हैं। देश-काल को लेकर उपलक्षण कहा गया है । स्फुट और अस्फुटरूप से सम्बन्ध का ज्ञान, स्मरण, संकल्पादि भेद अन्तरंग कहलाते हैं उसमें भी नील ज्ञान, पीत ज्ञान यह उस से भी अन्तरंगतर है, नील ज्ञान में भी सुख, दुःख, संवेदन इत्यादि का भेद अन्तरंगतर है । यह चिरकालीन ज्ञान एवं त्वरित ज्ञान यह बहिरंग है। यह पूर्व में ज्ञान हुआ, यह बाद में ज्ञान हुआ यह बहिरंगतर है, मच्छर का ज्ञान सूक्ष्म है हाथी का ज्ञान स्थूल होता है, यह बहिरंगतर भेद कहलाता है । अतः प्रधान वस्तु के कारण ज्ञान का भेद हो जाता है ।
अ.-१, आ.-६, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२३ कालक्रम एव स्फुटो विज्ञानेषु भाति न देशक्रमः, तथापि विमूढस्य पर्वतसंवेदनं विततमिव बदरसंवेदनं च सूक्ष्ममिव भाति—इति देशक्रमोऽपि दर्शितः, तेन वेद्यगतक्रमस्वीकाराभासात् सक्रमत्वम् आभासमानमपि न अपारमार्थिकम्—आभासमानस्य परमार्थत्वात्, ततश्च युक्तमुक्तम् ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तय’ इति । ‘मायाशक्त्या विभोः’ । इति श्लोकेन स्वरूपवैचित्र्यं ज्ञानानां दर्शितम् । अनेन तु देशकालवैचित्र्यम्—इति विशेषः । इति शिवम् ॥ २१ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम पञ्चममाह्निकम् ।
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणाख्यं षष्ठमाह्निकम् स्वात्माभेदधनान्भावांस्तदपोहनटङ्कतः । छिन्दन्त्यः स्वेच्छया चित्ररूपकृतं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्मृतिशक्तिर्ज्ञानशक्तिश्च निरूपिता । अथ तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिर्वितत्य श्लोकैकादशकेन ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मा’ इत्यादिना ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ इत्यन्तेन निर्णीयते । तत्र श्लोकेन ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेष’ इति सूच्यते । ततः श्लोकेन । ‘शुद्धेऽहं- प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारासंभव’ उच्यते । ततः ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’ इति श्लोकेन । ततोऽपि अपेक्षा से और अपने अंश की अपेक्षा से होते हैं, यद्यपि कालक्रम ही स्पष्टरूप से विज्ञानों में भासता है, देशक्रम नहीं भासता, फिर भी विमूढ लोगों को पर्वत का संवेदन-ज्ञान विस्तृत = विशाल सा लगता है और बेर-फल का ज्ञान सूक्ष्म-छोटा सा लगता है, इस प्रकार देशक्रम भी बता दिया, इसलिए वेद्यगत क्रम के स्वीकार के अभ्यास से सक्रमत्व होता है, आभासित होने- वाले पदार्थ भी अपारमार्थिक नहीं है किन्तु आभासमान का स्वरूप पारमार्थिक ही है, इसीलिए सत्य ही कहा है कि ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तयः’ अर्थात् ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि भगवान् की ही शक्तियाँ है । ‘मायाशक्त्या विभोः ।’ प्रभु की माया-शक्ति से भेद होता है इस प्रकार श्लोक से ज्ञान, स्मृति, संकल्प, अध्यवसायादि के स्वरूप वैचित्र्य दिखा दिये और इससे देश-काल का वैचित्र्य भी ज्ञात हो जाता है ॥ २१ ॥ पञ्चम आह्निक समाप्त जो अपने आत्मा में अभिन्नरूप से रहनेवाले पदार्थ-भावों को लुप्त होने से रोकते हुए अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा चित्र-विचित्ररूप बनाते हैं, ऐसे शिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार स्मृति-शक्ति और ज्ञान-शक्ति का निरूपण कर दिया गया । अब उन दोनों पर अनुग्रह करनेवाली अपोहन-शक्ति का विस्तारपूर्वक ग्यारह श्लोकों से ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रका- शात्मा’ इत्यादि से लेकर ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ यहाँ तक निर्णय करते हैं । प्रथम श्लोक से ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेषः’ प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है यही विशेषता सूचित होती है । उसके पश्चात् ‘शुद्धेऽहं प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारसम्भवः’ अर्थात् ‘अहम्’ इस शुद्धप्रत्यवमर्श में व्यापार का होना संभव नहीं है यह कहा जाता है । अनन्तर एक श्लोक से ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’
१२४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-६, का.-१ द्वयेन । 'अशुद्धस्याहमित्येवमर्शस्य विकल्परूपता' । ततः श्लोकेन 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' । एवं 'भूतानुसंधानादिरूपमेव परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वम्' इति श्लोकेन । ततः 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थाव- भासस्य सत्तोपसंह्रियते' श्लोकेन । ततो द्वयेन 'तस्यैवार्थावभासस्यानुभवस्मरणादौ वैचित्र्यमु- च्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' इति श्लोकेन । इत्याह्निकस्य तात्पर्यार्थः । अथ ग्रन्थार्थो व्याख्यायते—उक्तमिदं 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं........' इति, तत्र विमर्शोऽभिलापात्मना शब्देन योजित एव, तद्योजनाकृतं च विकल्परूपत्वं शुद्धेऽपि परमेश्वरे प्राप्तं, न चैतदिष्टं—तस्य संसारपदे मायात्मन्युपपत्तेः—इत्याशङ्क्योचाह— अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मापि वाग्वपुः । नासौ विकल्पः स ह्युक्तो द्वयाक्षेपी विनिश्चयः ॥ १ ॥ प्रकाशस्य विशुद्धसंविद्रूपस्य देहादिसंस्पर्शर्नाबिलीभूतस्य यः आत्मा जीवितभूतः सारस्व- भावो विच्छेदशून्योऽन्तरभ्युपगमकल्पोऽनन्यमुखप्रेक्षित्त्वस्वात्मविश्रान्तिरूपः 'अहमिति' प्रत्यव- मर्शः असौ विकल्पो न भवति, विकल्पत्वाशङ्कायां बीजं दर्शयति—वाग्वपुरपीति । विषयरूपात् कहेंगे । फिर दो श्लोकों से 'अशुद्धस्याहमित्यवमर्शस्य विकल्परूपता' अपने दर्शन का सिद्धान्त स्थिर करेंगे । तब एक श्लोक से 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' एवंभूतानुसंधानरूपमेव परमेश्वरस्य सृष्टृत्वम्' यह कहेंगे कि तरह-तरह के अनुसन्धान करना—यही परमेश्वर की सृष्टि है । उसके बाद 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थावभासस्य सत्तोपसंह्रियते' इसी प्रसंग के अन्तर्गत चिदात्मा में अर्थाव- भास की सत्ता का उपसंहार करेंगे । तब दो श्लोकों से 'तस्यैवार्थावभासानुभव स्मरणादौ वैचित्र्य- मुच्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' उसीका अर्थ अवभास के अनुभव, स्मरण आदि में विचित्रता बतायेंगे और प्रसंग से प्राप्त अपनी ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा में उसकी उक्ति का उपयोग होता है—यह श्लोक से कहेंगे । यही इस आह्निक का अभिप्राय है । अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं—यह कहा गया है कि 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं.....।' अर्थात् विमर्श को अभिलापरूप शब्द से जोड़ दिया गया है, उस योजना से प्राप्त विकल्परूप शुद्ध परमेश्वर में भी मिलता है किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मायामय संसार में उसकी उपपत्ति बैठती है, इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— जो अहं प्रत्यवमर्श प्रकाशरूप वाणी का स्वरूप है । वह विकल्प नहीं है, वह तो द्वित्व की अपेक्षा रखनेवाला आत्मसाररूप निश्चय है ॥ १ ॥ जो विशुद्ध संविद्रूप प्रकाश है उसका देहादि संस्पर्श-सम्पर्क से नहीं बिगड़नेवाला जीवन है; आत्मा के सारस्वभाव, विच्छेदशून्य, भीतरी प्राप्ति के समान, किसी अन्य की अपेक्षा न रखने- वाला, अपने में विश्रान्ति लेनेवाला अहं इस रूप का परामर्श है—वह विकल्पित नहीं होता है, अर्थात् अहं प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है; विकल्परूप की शङ्का में बीज का अभाव दिखाते हैं—'वाग्वपुरिति' । क्योंकि श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होनेवाला शब्दरूप विषय से दूसरा ही अन्तः-
अ.-१, आ.-६, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२५ श्रोत्रग्राह्यात् शब्दादन्य एव अन्तरवभासमानः संविद्रूपावेशी शब्दनात्माभिलापोवागित्युनेनोक्तः- वक्ति अर्थं स्वाध्यासेन सोऽयमित्यभिसम्बन्धेन, यदि वाग्वपुः-कस्मान्न विकल्पः ? आह-नह्यस्य विकल्पलक्षणमस्ति, तथाहि-विविधा कल्पना विविधत्वेन च शङ्कितस्य कल्पोऽन्यव्यवच्छेदं विकल्पः, विविधत्वं च वह्नाववह्निसंभावनासमारोपनिरासे सति भवत्, द्वयं वह्न्यवह्विरूपमा- क्षिपति, तेन विकल्पेऽवश्यं तच्च निश्चेतव्यम्-अतश्च व्यपोहितव्यं भवति ॥ १ ॥ तथा च- भिन्नयोरवभासो हि स्याद्घटाघटयोर्द्वयोः । प्रकाशस्येव नान्यस्य भेदनस्त्ववभासनम् ॥ २ ॥ घटे हि दृष्टे घटस्थान एवाघटोऽपि योग्यदेशाभिमतस्थानाक्रमणशीलो विज्ञानजनकः स्व- कारणोपनीतः संभाव्यते पटादिस्वभावः, अतो घटाघटयोर्द्वयोरवभासस्य संभावनात् समारोपः सावकाशोभवति, अघटस्य सत्यारोपे निषेधलक्षणोऽपोहनव्यापारः-इति तदनुप्राणिता विकल्प- रूता घट इत्येतस्य निश्चियस्य, 'लिङ् संभावनायाम्' । यस्त्वयं प्रकाशो नाम तस्य स्थाने यः संभाव्यते स तावदप्रकाशरूपो न भवति-तुल्यकक्ष्यस्य हि संभावनं भवति, न च यत्प्रकाशेन कर्तव्यं तदप्रकाशस्य कदाचित् दृष्टं-संभावनारोपणादिबलादेव च अस्याप्रकाशरूपत्वं विघटेट, करण में भासता हुआ, संविद्रूप में बैठा हुआ शब्दनास्वरूप अभिलाप वाणी शब्द से कहा गया है अपने अध्यास से वही यह है-इस सम्बन्ध से यदि वचन = वाणी का स्वरूप है तो क्यों नहीं विकल्प होगा ? उत्तर देते हैं-इसका विकल्परूप नहीं है, क्योंकि अनेकरूप से अनेक प्रकार की कल्पना और शङ्का से युक्त कल्पना मान लेने पर दूसरे से व्यवच्छेद करना विकल्प कहलाता है, और विविधता क्या वस्तु है ? उसे कहते हैं-अग्नि में यह अग्नि नहीं है, इस सन्देह को दूर कर देने पर वह्नि-अवह्निरूप द्वित्व को आक्षेप करना और उस हेतु से विकल्प में द्वित्वरूप का निश्चय करना होगा । इससे क्या जोड़ेंगे और क्या विभक्त करेंगे एवं क्या हटायेंगे और क्या शङ्का करेंगे-यही कहना पड़ेगा । विकल्प में द्वित्व का समर्थन करता है ॥ १ ॥ जब घट और घट से भिन्न इन दो भिन्न पदार्थों का अवभास होता है। तब प्रकाश के जैसा अन्य भेद करनेवाले पदार्थ का अवभासन नहीं होता है ॥ २ ॥ जबकि घट के दर्शन होने पर उसी की जगह घट से भिन्न योग्य देश के अभिमत स्थान को आक्रमण करनेवाला विज्ञानजनक अपने कारण से प्राप्त किया गया पटादि स्वभावक आलोक भी सम्भव रहता है, इसलिए घट और अघट दोनों के अवभास की सम्भावना घट में घटभिन्न के आरोप की सम्भावना उपस्थित हो जाती है, घट से भिन्न का आरोप होने पर निषेधरूप अपोहन व्यापार होता है इस प्रकार अपोहन व्यापार से अनुप्राणित होकर घट की विकल्परूपता का निश्चय हो जाता है, 'स्यात्' इस वाक्य में जो 'लिङ्' लकार किया है वह सम्भावना अर्थ में है । किन्तु जिसको आप प्रकाश करते हैं उसके स्थान पर जिसकी सम्भावना की जाती है, वह अप्रकाश नहीं हो सकता; क्योंकि समान स्वरूपवाले की ही सम्भावना होती है, प्रकाश जिस कार्य को करता है वह अप्रकाश भी करे ऐसा कहीं देखा गया है ? सम्भावना के आरोपण के बल से ही इस अप्रकाश का विघटन हो सकता है, इसलिए प्रकाश के तुल्य अप्रकाशरूप उसी के सदृश
१२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-३ अतः प्रकाशनुल्यस्यान्यस्य। प्रकाशरूपस्य भेदिनस्तत्तुल्यकक्ष्यस्यापोहनात्मकभेदनव्यापारासहिष्णो- रवभासनमेव नास्ति, तदभावे कस्यापोहनम् ? अवभाससंभवेऽपि प्रकाशरूपत्वमेव । न च प्रका- शस्य स्वरूपदेशकालभेदो—येन द्वितीयः प्रकाश कस्मादपोद्यतेति, हीति—यस्मात् एवं, ततो द्वयाभावादपोहासंभवे विकल्परूपत्वाभावात् चिन्मात्रे परामर्शात्मनि अहमिति प्रत्यवमर्श एव, न तु विकल्पः ॥ २ ॥ ननु घटे परिनिष्ठितरूपे दृष्टे तद्दर्शनमुपजीवता विकल्पेन कथमघटस्य निषेधनं क्रियते, न ह्यघटस्य केनचिन्नामापि गृहीतम्, अघटवासनापि घंटे दृष्टे कथंकारं प्रबुध्यताम् ? सत्यम्—एवं शाक्यः पर्यनुयोज्यो, न सु वयम्, यतः — तदतत्प्रतिभाभाजा मात्रैवातद्व्यपोहनात् । तन्निश्चयनमुक्तो हि विकल्पो घट इत्ययम् ॥ ३ ॥ इह प्रमाता नाम प्रमाणादतिरिक्तः प्रमासु स्वतन्त्रः संयोजनवियोजनाद्याधारवशात् कर्ता दर्शितः, तस्य च प्रमातुरन्तः सर्वार्थावभासः, चिन्मात्रशरीरोऽपि तत्सामानाधिकरण्यवृत्तिरपि दर्पणनगरन्यायेनास्ति—इत्यपि उक्तम् । एवं च तत्प्रतिभां घटाभासम्, अतत्प्रतिभां च अघटाभासं प्रमाता भजते—सेवते तावत्, तद्विकल्पदशायां चित्स्वभावोऽसौ घटः चिद्देव विश्वशरीरः पूर्णः, भेद करनेवाला अपोहनरूप भेदन व्यापार को नहीं सहनेवाले का अवभासन नहीं होता है, उसके अभाव में किस का अपोहन होगा ? अवभास की सम्भावना होने पर भी प्रकाशरूपता ही रहती है और प्रकाश के स्वरूप में कोई देश-काल का भेद नहीं रहता है जिससे दूसरा प्रकाश एक से हटाया जा सके, ‘हि’ शब्द का अर्थ है कि जिससे ऐसा हो रहा है इसी कारण द्वित्व के अभाव से अपोहन की असम्भावना में विकल्परूप के अभाव से चिन्मात्र परामर्श में ‘अहम्’ यही परामर्श होता है, विकल्परूप से नहीं होता ॥ २ ॥ अब शङ्का करते हैं कि परिनिष्ठित, संकुचितरूप निर्विकल्प घट दशा के देखने पर उसके उपजीवित विकल्प के दर्शन से घट से भिन्न की निषेधता किस प्रकार करते हैं किसी ने अघट का नाम भी तो नहीं लिया है, घट से भिन्न की वासना के देखने पर कैसे प्रबुद्ध होगी ? ठीक है—इस विषय में बौद्धलोगों से ही पूछना चाहिए; हमसे मत प्रश्न करो, क्योंकि— उसकी प्रतिभा को नहीं प्राप्त करनेवाले, प्रमाता के द्वारा ही उससे भिन्न को ओझल कर देने पर उससे निश्चय छूटा हुआ ‘घटोऽयम्’ ऐसा कहना ही विकल्प है ॥ ३ ॥ यहाँ पर प्रमाण से अतिरिक्त विषयों में जो स्वतन्त्र रहता है उसी को प्रमाता शब्द से कहा जाता है जो कि संयोजन-वियोजनादि के आधारभूत होने से कर्ता भी कहा गया है और उस प्रमाता के भीतर सम्पूर्ण अर्थ का अवभास होता रहता है, चेतन शरीरवाला होता हुआ भी दर्पण में प्रतिबिम्बित होनेवाली नगरी के समान चेतन आत्मा में सभी पदार्थ प्रतिबिम्बित रहते हैं—इस विषय में विचार हो गया है और ऐसी परिस्थिति में उसकी प्रतिभा घटाभास है और जिसमें उसकी प्रतिभा नहीं है उस अघटाभास को प्रमाता प्राप्त करता है अर्थात् घटाभास और घट से भिन्न पटादि के आभास को प्रमाता प्राप्त कर लेता है, आभास की अविकल्प दशा में १. सदृश आदि की वासना ही कारण होती है ।
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२७ न च तेन केचिद्व्यवहाराः, तत् मायाव्यापारमुल्लासयन्पूर्णमपि खण्डयति भावं, तेनाघटस्यात्मनः पटादेश्चापोहनं क्रियते निषेधनरूपं, तदेव व्यपोहनमाश्रित्य तस्य घटस्य निश्चयनमुच्यते ‘घट एव’ इति—एवार्थस्य संभाव्यमानापरवस्तुनिषेधरूपत्वात्, एष एव परितश्छेदात्तत्क्षणकल्पात् परिच्छेदः, हीति—यत एवं, तस्मात् युक्तं ‘द्वयापेक्षी विकल्प’ इति पूर्वश्लोकोक्ते वस्तुद्वये श्लोकद्वयेन हेतू क्रमेणोक्तौ, यस्मादेवं विकल्पः ततोऽहमिति शुद्धो विमर्शः न विकल्पः—इति श्लोकत्रयेण महा- वाक्यार्थः । शाक्यैरपि प्रमातुरेवायं व्यापार उक्तः ‘एकप्रत्यवमर्शाख्य’ इत्यत्र ‘प्रपत्तेति स्वयमिति’ च वदद्भिः, स त्वेतैः कथं समर्थ्यः—इत्यास्तामेतत् ॥ ३ ॥ नन्वेवमहमित्यपि प्रत्यवमर्शोऽनहंरूपस्य घटादेः प्रतियोगिनोऽपोहनीयस्यापोहे विकल्परूपता कथं न स्यात् ? इत्याशयेनाह— चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः । देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ ४ ॥ प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् । विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ ५ ॥ चित्स्वभाववाले चिदात्मा के जैसा विश्वशरीरूप होता हुआ भी पूर्ण रूप में रहता है और उसके विकल्परूप होने के कारण कोई भी व्यवहार नहीं होते हैं इसी कारण मायाव्यापार को उद्बुद्ध करते हुए विश्वशरीर भी प्रमाता पदार्थ को खण्डित कर देते हैं, अघट का जो स्वरूप पटादि है उसका अपोहन अर्थात् निषेध कर देना, उसी निषेधरूप पट को आश्रय करके घट का ‘घट एव’ शब्द से निश्चयन कहा जाता है। यही अपट वस्तु का निषेधरूप होने से ‘एवं’ अर्थ की सम्भाव्यमानता कही जाती है, चारों तरफ से हटा देने के कारण परिच्छेद कहा जाता है, ‘हि’ शब्द हेतु अर्थ में है, इसलिए पूर्व श्लोक से प्रत्यवमर्श विकल्परूप में कहा गया है ‘द्वयापेक्षी विकल्पः’ दो वस्तुओं की अपेक्षा रखनेवाला विकल्प होता है। दो श्लोकों के क्रम से दो हेतु कहे गये हैं, क्योंकि ऐसा विकल्प है इसलिए अहं यह विमर्श है, विकल्प नहीं है—तीन श्लोकों से महावाक्यार्थ लक्षित होता है। बौद्धों द्वारा भी यही कहा गया है कि यह प्रमाता का ही व्यवहार है ‘एकप्रत्यवमर्शाख्यः’ [ एक प्रत्यवमर्शाख्ये ज्ञाने एकत्र हि स्थितः । प्रपत्ता तदतद्धेतून् भावान् विभजते स्वयम् ॥ आचार्य धर्म कीर्ति का कथन है कि “एक परामर्श संज्ञक ज्ञान में एक जगह ही स्थित हुआ प्रमाता उस हेतु के और उससे भिन्न पदार्थ भावों को स्वयं विभक्त करता है।” ] उसका ये लोग कैसे समर्थन करेंगे इसलिए इसे छोड़ दो, अप्रासङ्गिक है ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि अहं इस परामर्श में अनहंरूप घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है इसके अपोहन में विकल्परूपता क्यों नहीं होगी ? इस अभिप्राय से कहते हैं— माया-शक्ति के द्वारा चित्तत्त्व को छिपा करके जो भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि और प्राण में आकाश के समान कल्पित होते हैं ॥ ४ ॥ ऐसा होने पर दूसरों को हटाने के कारण प्रमातारूप से अहं यह विमर्श अन्यप्रति रोगी के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही है ॥ ५ ॥
१२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५ अहंत्यवमर्शो द्विधा—शुद्धो मायोयश्च, तत्र शुद्धो यः संविन्मात्रे विश्वाभिन्ने विश्रवच्छा- याच्छुरितस्वच्छात्मनि वा। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ। तत्र शुद्धेऽहं-प्रत्यवमर्शे प्रतियोगी न कश्चिदपोहितव्यः संभवति—घटादेरपि प्रकाशसारत्वेनाप्रतियोगित्वेनानपोह्यत्वात्, इत्यपोह्यात्वा- भावे कथं तत्र विकल्परूपता। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ अन्यस्माद् देहादेर्घटादेश्च व्यवच्छेदेन भवन् विकल्प एव-इति वाक्यार्थः। अक्षरार्थस्तु—चित्तत्त्वं प्रकाशमात्ररूपं हित्वा सदप्यपहस्तनया अप्रधानीकृत्य भिन्ने देहादावहमेव देहादिः नीलादौ प्रमेये प्रमाता—इत्यभिमानेन 'योऽहं स्थूल' इत्यादिविमर्शः स विकल्प एव, न तु शुद्धं प्रत्यवमर्शमात्रम्। अत्र हेतुः —परो द्वितीयो देहादि- र्घटादिश्च यः प्रतियोगी तुल्यकक्षयोऽन्योन्यपरिहाराच्च विरुद्धस्तस्य योऽवभासः – समारोपणलक्षणः, तस्माद्यतोऽसौ तन्निषेधानुप्रणितोऽहमित्यवमर्शो जातः 'अहं स्थूलो, न कृशो, न घटादिः' इति शुद्धप्रकाशरूपस्य अपहस्तनमेव देहादेर्भेद हेतुः, तदपहस्तने तु परमेश्वरस्य स्वात्मप्रच्छादनेच्छारू- पाभेदाप्रकाशनं भ्रान्तिरूपं प्रति स्वातन्त्र्यरूपाम शक्तिर्हेतुः, चिद्रूपस्य चापहस्तनं देहादेरेव अत्यक्तवेद्यभावस्य भिन्नस्यैव उपपत्तिशून्यतयैव प्रमोतृताभिमानः। अहम् विमर्श दो प्रकार का है—एक तो शुद्ध है दूसरा मायीय है, इसमें शुद्ध विमर्श यह है कि जिस ज्ञानरूप चिन्मात्र में अभिन्न एकरूप से सारा विश्व प्रतिफलित होता है अथवा स्वच्छ सदाशिव चिदात्मा की दशा में झलकता रहता है। अशुद्ध मायीय विमर्श वेद्यरूप शरीरादि में रहता है। जो शुद्ध अहम् विमर्श है उसमें तो कुछ हटाने योग्य नहीं रहता है और घटादि के प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं रहता, जब अपोह्य ही नहीं रहेगा तो विकल्परूपता कैसे बनेगी ? किन्तु अशुद्ध मायीय वेद्यरूप देहादि में तो परस्पर एक दूसरे से भिन्न होने के कारण विकल्पता बनी ही रहती है। यह तो वाक्यार्थ हुआ अब अक्षरार्थ बतलाते हैं—जो प्रकाश मात्ररूप चित्तत्त्व है उसे छोड़कर प्राणादि पुर्यष्टक में रखता हुआ अपने को अप्रधान बनाकर अपने से भिन्न देह, बुद्धि और प्राणादि में, 'मैं' ही देहादि एवं नीलादि विषय का प्रमाता हूँ इस प्रकार अभिमान करता हुआ, स्थूलरूप में मेरा ही रूप है, इस प्रकार का विमर्श ही विकल्प कहलाता है, शुद्ध परामर्श में ऐसा नहीं होता है। क्यों नहीं है ? इसमें हेतु बताते हैं—दूसरा देहादि एवं घटादि बराबर के प्रतियोगी आपस में एक-दूसरे का परिहार करने से विरुद्ध है उसका जो अवभास समारोपरूप है, उससे जो भिन्न निषेध करनेवाला अहंविमर्श उत्पन्न होता है। जिसका शुद्ध स्वरूप है कि मैं स्थूल हूँ, मैं कृश नहीं हूँ, मैं घटादि भी नहीं हूँ इत्यादि, शुद्ध प्रकाशरूप का हटा देना ही देहादि के भेद में हेतु है, उससे हटा देने में तो अपने स्वरूप को छिपाने की इच्छा होने से अभेद का प्रकाशन नहीं करने देने में भ्रान्ति- वाले पदार्थों के विषय में तो भगवान् की अपनी स्वातन्त्र्यरूप माया-शक्ति ही मुख्य कारण है, चिद्रूप को छिपाना एवं देहादि अत्यक्त वेद्यभाव के भिन्न को उपपत्ति की शून्यतारूप से प्रमातृता का अभिमान करना है। १. देहादि की वासना की अपेक्षा से प्राण श्रेष्ठ होता है, संकल्प-विकल्प करना अन्तःकरण का धर्म है, जिसके अनुग्रह से चित्तत्व की प्राप्ति हो जाती है, उसका प्राण अधिष्ठेय बन जाता है, उसी प्रकार संविततत्त्व अधिष्ठित प्राण के द्वारा बुद्धिरूप पुर्यष्टक के सहारे शरीर अधिष्ठित रहता है। इसलिए चेतना स्वातन्त्र्य-शक्ति ही इसकी अधिष्ठातृ है, इस विषय में कहा भी है—
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२९ तथा च—देहाभिमानभूमिकायां स्थिताश्चार्वाकाः ‘चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' इति कायमेव प्राधान्येनाहुः—स्त्रीबालमूर्खाणां तथाभिमानात् । ततोऽपि विवेकवन्तः पाकजोत्पत्ति- परिणामादिबलादस्थिरं शरीरं मन्वानाः प्राणशक्तिसमधिष्ठानेन च विना विकारशतावशं जैसा कि—चार्वाकादि नास्तिक लोग देहाभिमान भूमिका में रहते हैं। अलग-अलग मदिरा सम्बन्धी द्रव्य जबतक एक दूसरे से नहीं मिलते हैं तबतक उसमें मद-शक्ति नहीं आती है मिलते ही मदिरा में मद-शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार अलग-अलग भूत चैतन्य से रहित हैं वे जब आपस में एक दूसरे से मिल जाते हैं तब स्वाभाविक उसमें हलन-चलन करने की शक्ति आ जाती है, इसलिए चैतन्य की कल्पना केवल भ्रान्ति ही है। 'चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' यही चार्वाकों का सिद्धान्त है। शरीर को ही प्रधानता देते हैं। स्त्री, बालक और मूर्ख लोगों का भी वैसा ही अभिमान होता है। कुछ वेदान्ती लोग शरीर का उत्पन्न होना, बढ़ना-घटना एवं विनष्ट हो जानेवाले दोषों से शरीर का अस्थिर मानते हुए तथा प्राण-शक्ति के न रहने के प्रकाशरूपो भगवान्प्राणाधिष्ठान उच्यते । प्राण एवाधरो धर्मो हंसश्चेति त्रिवाहनः ॥ भगवान् प्रकाशात्मा ही प्राण का अधिष्ठान है—ऐसा कहा जाता है। अधिष्ठान का अधिष्ठेय प्राण ही आत्मा का धर्म है अर्थात् अधिष्ठान और अधिष्ठेय तथा इन दोनों का जो ज्ञान है वही त्रिवाहन है। अत एव गीता में भी भगवान् ने इसका उल्लेख किया है— शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ जैसे वायु सूक्ष्म गन्ध के परमाणु-रेणुको गन्ध के स्थान से ग्रहण कर ले जाता है, उसी प्रकार शरीर धारियों का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को पहले त्यागता है, उससे मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके दूसरे नये शरीर में ले जाता है। संविद्रूप ईश्वर प्राण-पुर्यष्टक के अधिष्ठान द्वारा शरीर को धारण किये रखते हैं—यह बात स्पन्दशास्त्र में भी श्री गुरुवर्यने कही है— यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् । .......................................प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥ लभते...............................................। इत्यत्र संहान्तरेण चक्रेणेति............................। जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य जड इन्द्रियों को भी चेतन की जैसी शक्ति सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति और संहारादि करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि उसकी यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इसलिए देहाभाव के भस्मीभूत हो जानेपर, स्वप्न अवस्था को जैसा निद्रा में डुबे हुए मोह- आवरण की स्थिति रहने पर भी चेतन में अधिष्ठित प्राण को अपनी गोद में रखनेवाले पुर्यष्टक की वैसी स्थिति परलोक में भी रहती है। फिर दूसरे देह के अधिष्ठान से भोगों को भोगने में कोई १७
१३० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५ शरीरस्य पश्यन्तो बुभुक्षापिपासायोगयोग्यं प्राणमेवात्मानं केचन श्रुत्यन्तविदो मन्यन्ते । ततोऽपि समधिकविवेकभाजः प्राणस्यापि अनित्यत्वादनुसंधानयोग्यतामपश्यन्तो ज्ञानसुखाद्याश्रयभूतां बुद्धिमेव काणादप्रभृतय आत्मानमाहुः । अपरे तु तस्या अपि योगिदशायां वेद्यभावादपरत्वं मन्यमानाः असंवेद्यपर्वरूपं यन्न किंचिद्रूपं सकलवेद्यराशिविनिर्मुक्तं शून्यत्वान्नाभस्तुल्यं न तु महाभूताकाशस्वभावं प्रमातृतत्त्वं शून्यब्रह्मवादिनः सांख्यप्रभृतय आहुः । तस्मिन्नपि वेद्ये शून्यान्तरं तत्रापि शून्यान्तरम्—इति यावद्द्वैदः तावत्कल्पना न त्रुट्यति, तदर्थमाह ‘कल्पिते’ इति । न चानवस्था परमार्थप्रकाशबलेन यतः सर्वस्य प्रकाशो न तु देहादिवशात्, तथात्वा- कारण असंख्य प्रकार से शरीर का विनाश देखते हुए प्राण को ही बुभुक्षा-पिपासा से सम्बन्धि होने से आत्मा मानते हैं । उससे भी अधिक विचार-विमर्श करनेवाले प्राण को भी अनित्य समझकर अनु- सन्धान की योग्यता न देखते हुए ज्ञान-सुखादि के आश्रयभूत बुद्धि को ही काणादादि लोग आत्मा समझते हैं । दूसरे सांख्य सिद्धान्ती उसको भी योगी दशा में वेद्यरूप न होने के कारण असंवेद्य ग्रन्थिरूप जिसका कि कोई स्वरूप नहीं है; सम्पूर्ण वेद्यराशि से भिन्न होने के कारण महाभूत जो आकाश है उसके बराबर नहीं, बल्कि शून्य ब्रह्म को प्रमाता मानते हैं । उस वेद्य में भी शून्यता एवं उसमें दूसरी शून्यता, इस प्रकार कभी भी समाप्ति नहीं होती है, इसलिए कहा है कि ‘कल्पिते’ कल्पना करने पर इत्यादि । वहाँ अनवस्था भी नहीं होती है; क्योंकि परमार्थ प्रकाश के बल से सभी का प्रकाश होता है वहाँ पर देहादि की कल्पना नहीं होती है, देहादि को प्रमाता मानना दुस्तरता नहीं पड़ती और बहुत प्रकार से देखा भी जाता है कि योगिनी अपने ही शरीररूप गृह में अवस्थित होकर स्वतन्त्ररूप से, प्राण को भेजना और वापस बुला लेनारूप क्रिया से दूसरे शरीर में जाकर वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर लेती है, और स्वतन्त्रीकरण में हमने युक्तियों को बता ही दिया है । जिसका उल्लेख शिवसूत्र के माध्यम से हुआ है— ब्रह्मपदे कमलशरीरस्तदुत्थप्राणिरूपेण सर्वत्र विचारी । ब्रह्मपद में जो कमल शरीर है उससे उठकर प्राणी सर्वत्र विचरण करता है सर्वथा देह और प्राण की तो स्थिति भिन्न-भिन्न ही है । इस विषय में मुनि ने कहा है । सहवर्धितयोर्नास्ति सम्बन्धः प्राण काययोः । इति एक साथ में संवर्धित होनेवाले देह और प्राण का कोई सम्बन्ध ही नहीं बैठता है । सम्बन्ध तो उसी का नाम है जो अत्यन्त अवियोग रखता हो । उसी प्रकार कक्ष्या स्तोत्र कहता है— भग्नो भ्रमोऽयं भवता विचित्रां स्वप्ने विदेहादिगतिं प्रदर्श्य । देहे गते भस्ममये परत्र कीदृक्........................ ॥ इति विचित्र देहादि नश्वर वस्तुओं की गति-स्थिति है उसे आपने स्वप्न अवस्था में बताकर मेरे भ्रम को दूर कर दिया, देह के भस्मीभूत हो जाने पर दूसरे में कैसा होगा ।
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३१ भिमानमात्रं—देहादिः प्रमातेति, संकोचमात्ररूपं चित्तत्त्वं शून्यं भूतलं, यथा घटाभावः, संकोचः- अपरवेद्यांशच्छायाच्छुरितं तु चित्तत्त्वमेव बुद्धिप्राणदेहादि इति । अमी एव भूमिकाविशेषा उत्तरोत्तरमारोहतां योगिनां जाग्रदादितया पिण्डस्थादितया चागमेषु भण्यन्ते, अपहस्तनं च व्याख्यास्यते 'कलोद्वलितमेतच्च चित्तत्त्वं कर्तृतामयम् । अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया स्थितम् ।।' इति, तत्स्थितम्—अशुद्धः 'अहम्' इत्यवमर्शो विकल्प एव ।। ४-५ ।। अभिमान मात्र है, संकोचमात्र चिदात्मरूप तो शून्य भूतल है। जैसे घट का अभाव भूतलरूप होता है, दूसरे वेद्य अंश की छाया से मिलता हुआ चित्तत्त्व ही तो बुद्धि, प्राण, देहादि है। यही भूमिका विशेष ऊपर-ऊपर चढनेवाले योगी लोगों के जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था होने से पिण्ड शरीर में रहने के कारण भी आगमों में कहा गया है, अब अभाव की व्याख्या करते हैं—'चेतन- रूपी कला से उद्बुद्ध चित्तत्त्व कर्तृता से युक्त होकर अचिद्रूपशून्यादि के गुणरूप से परिमित परिच्छिन्नभाव को प्राप्त करके रहता है।' इससे यह सिद्ध हुआ कि अशुद्ध अहंविमर्श विकल्प ही रहता है ॥ ५ ॥ १. शनैःशनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ क्रम-क्रम से अभ्यासयोग करता हुआ उपरामता को प्राप्त करें तथा धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा मन को स्वरूप आत्मा में स्थिर करके परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी चिन्तन न करे। 'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत् ।' तब तक अभाव को ही देखे जब तक तन्मयता को न प्राप्त होवे और भी 'यद्यत्संवेद्यते किंचिन्न च तद्रूपमिष्यते । जो-जो जानता है उसमें तो थोड़ा सा भी इसका स्वरूप नहीं है। २. आगमशास्त्र में आचार्य अभिनवगुप्त ने जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्तादि अवस्थाओं के उल्लेख किये हैं। इन चारों अवस्थाओं का पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत शब्दों से योगीलोग व्यवहार करते हैं— भूततत्त्वाभिधानानां योंऽशोऽधिष्ठेय उच्यते । पिण्डस्थ इति तं प्राहुः पदस्थमपरं विदुः ॥ मन्त्रास्तत्पतयः सैषारूपस्थमिति कीर्त्यते । रूपातीता पराशक्तिः स व्यापाराप्यनामया ॥ निष्प्रपञ्चो निराभासः शुद्धः स्वात्मन्यवस्थितः । सर्वातीतो शिवो ज्ञेयो यं विदित्वा विमुच्यते ॥ इति पिण्डे मुक्ताः पदेः मुक्ता रूपे मुक्ताः षडानन । रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्ता नात्र संशयः ॥ इति तत्त्वसंग्रहे । पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः । रूपं चिद्विन्दुरित्युक्तो रूपातीततः परः शिवः ॥ भूत तत्त्व के अभिधानों में जो अंश अधिष्ठेय कहा जाता है उसे कोई लोग पिण्ड कहते हैं । अन्य को पद शब्द से समझते हैं । मन्त्र, मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर को रूप शब्द से कहा जाता है । जो परा-शक्ति है वह तो विमर्श व्यापार क्रिया का सम्पादन करती हुई भी अनामय संविद्रूप ही रहती है इसलिए परा-शक्ति रूपातीता कही जाती है। अपने आप में अवस्थित रहनेवाले जो शुद्ध, निराभास, निष्प्रपञ्च सब से अतीत शिवरूप ज्ञेय है, उसे जानकर विमुक्त हो जाते हैं ।
१३२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-६ द्विविधोऽपि चायम् 'अहं-प्रत्ययो' द्विधा—अनुभवमात्ररूपश्चानुसंधानात्मा च, शिवात्मनि 'अहमिति' सदाशिवात्मनि 'अहमिदमिति' शुद्धो द्विधा। अशुद्धोऽपि 'अहं स्थूल' इति, योऽहं स्थूलोऽभवं, सोऽहं कृशो, बालो, युवा, स्थविरः, स एव 'अहम्' इति च अशुद्धो द्विविधः। तत्र शुद्धे विकल्परूपत्वमप्रतिष्ठमेव इत्युक्तम्, अशुद्धे तु अनुभवरूपे विकल्पत्वमुपपादितम्, अशुद्धेऽपि तु अनुसंधानात्मकतया अभेदस्य प्रस्फुरणात् कश्चिदविकल्पकत्वं शङ्केत तस्य व्यामोहं व्यपोहयितुमाह— कादाचित्कावभासे या पूर्वाभासादियोजना। संस्कारात्कल्पना प्रोक्ता सापि भिन्नावभासिनी ॥ ६ ॥ देह इत्यादि वर्तते, कादाचित्कः कदाचिद्भवोऽनियतदेशकालाकारोऽवभासो यस्य देहादेः स्वलक्षणरूपस्य, तत्र या पूर्वाभासेन बालादि-शरीरावभासेन योजना 'योऽहं बालः' स एवाद्य 'युवा' इत्यनुसंधानम्, आदिग्रहणादुत्तरेण भाविना आभासेन सह योजना 'स्थविरो भवितास्मि' शुद्ध और अशुद्धरूप से यह अहंप्रत्यय दो प्रकार का है—एक अनुभवमात्ररूप से है दूसरा अनुसन्धानरूप से है, अनुभव स्वभाववाला तो शिवरूप में 'अहं' इस प्रकार से रहता है और सदाशिवरूप [ अनुसन्धिरूप ] में 'अहमिदम्' मैं यह हूँ इस रूप से रहता है, इस प्रकार 'अहम्' और 'अहमिदम्' के भेद से दो प्रकार के शुद्ध अहंप्रत्यय हुए। 'अहं स्थूलः' मैं स्थूल हूँ, इस अनुभव स्वभाववाले प्रत्यय में तो अशुद्ध रहता है, जो मैं स्थूल था, वही मैं कृश हो रहा हूँ, मैं बालक हूँ, मैं युवक हूँ और मैं वृद्ध हूँ, वही मैं हूँ, ये ही दो प्रकार के अशुद्ध प्रत्यय होते हैं। शुद्ध अहं में विकल्परूपता अप्रतिष्ठित रहती है, यह हम कह आये हैं, किन्तु अशुद्ध अनुभवरूपवाले 'अहं स्थूलः' इत्यादि में विकल्परूपत्व को हमने सिद्ध कर बता दिया है, अशुद्ध में भी अनुसन्धान करने से अभेदभाव के जग जाने पर कोई अविकल्प की शङ्का कर सकता है, अतः उसके व्यामोह को दूर करने के लिए कहते हैं— जो अशुद्ध अहं की भावना में भी कभी अभेद अवभास हो जाने पर शुद्ध अहं की योजना लगा देना संस्कार से वह कल्पना कही जाती है, उसमें भी भेद रहता ही है ॥ ६ ॥ [ देहादि अनुभव से युक्त ही अहं विमर्श विकल्पमात्र नहीं है, किन्तु अनुसन्धिवाला भी विमर्श होता है, यह श्लोक में दिया गया 'अपि' शब्द द्योतित करता है ] देह इत्यादि यह पूर्वसूत्र की अनुवृत्ति आती है, कभी-कभी होनेवाला अनियत देश-काल के आकारवाला जो देहादि का अपना अनुभव है, उसमें जो पहले होनेवाला बालक आदि शरीर की मिलावट जैसा 'योऽहं बालः' मैं कभी बालक था, वही मैं आज 'युवा' युवावस्था में स्थित हूँ, ऐसा अनुसन्धान करता है और आदि शब्द से आगे होनेवाले आभास के साथ योजना कर लेना। जैसा कि 'स्थविरो भविताऽस्मि' मैं वृद्ध होऊँगा, ये सभी योजनाएँ विकल्परूप हैं, शुद्ध अहं हे षडानन ! जो लोग पिण्ड से, पद से और रूपातीत से मुक्त हैं, वे ही सचमुच मुक्त गिने जाते हैं इसमें सन्देह करने की कोई बात नहीं। तत्त्व संग्रह में भी कहा गया है—पिण्ड को कुण्डलिनी- शक्ति, पद को आत्मा और रूप को चेतन चिद्रूप-शक्ति कहा गया है तथा परम शिव रूपातीत है।
इति सा योजना सर्वा कल्पना-विकल्प एव, न तु शुद्धः प्रत्यवमर्शः । अत्र देहादेर्विशेषणं हेतुत्वा- शयेन—यतो भिन्नावभासितत्वमेव देहादेस्तदानीमपि अविच्छिन्नं, यदि हि तस्य देहादेः सर्वतः पूर्णत्वम्—अवच्छेदहीनत्वं पश्यन् अनुसंधानम्—'अहमिदम्' इति विदध्यात् तदियं सदाशिवभूः केन विकल्पास्पदत्वेन भण्यते—द्यावता विच्छिन्ने एव सोऽनुसंधिः, भिन्ने हि कथमनुसंधानम् ? इति चेदाह 'संस्कारात्'—प्राक्तनानुभवकृतवासनाप्रबोधजस्मृतिवशात् इति यावत्, प्राणे बलाबल- वशादनुसंधिः, बुद्धौ ज्ञानसुखादितारतम्यात्, शून्ये वैतथ्यावैतथ्ययोगात्, अयमपि विकल्प एव, एवं 'स एवायं घट' इति घटाद्यनुसंधानेऽपि विकल्पत्वं मन्तव्यं, किन्तु एतासु अनुसंधानभूमिषु विद्या- शक्तिराधिक्येन अचिरद्युतिवदुद्दीप्यते इति तासां परमपदपरिशीलनप्रथमकल्पाभ्युपायत्वमभ्युपागमन् गुरवः ॥ ६ ॥
न च देहादीनां पूर्वपूर्वप्रमातृवेद्यता—येन प्रमातृप्रकाशे प्रमेयं न भाति तत्प्रकाशश्च न पूर्वप्रकाशं विना, सोऽपि न प्रमात्रन्तरप्रकाशं विना—इत्यनवस्था स्यात्, अपि तु विशुद्ध-प्रकाश एव विश्वस्य प्रकाश, इति निरूपयन् उक्तयुक्त्या सदैव सृष्ट्यादिशक्तिवियोगोऽपि भगवत उक्तो भवति, इति दर्शयति—
प्रत्यवमर्शरूप नहीं हैं। इसमें देहादि का विशेषण हेतुरूप आशय से कहा है—क्योंकि भिन्नरूप से अवभासित होनेवाले देहादि योजना के काल [ अनुसंधि ] में भी अविच्छिन्न पूर्णभाव से रहता है, यदि उन देहादि में सर्वतः अर्थात् परिपूर्णरूपता से [ चिद्रूपविश्रान्तत्व ] अविच्छेद शून्यत्व को देखते हुए 'अहमिदम्' का अनुसन्धान करना ही सदाशिव भूमि है, इसी कारण इसको विकल्प का आधार कहा जाता है—विच्छिन्न में ही 'योऽहं बालः' ऐसा अनुसन्धान होता है, इस प्रकार भिन्न में कैसे अनुसन्धान होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि—'संस्कारात्' संस्कार से अनु- सन्धान होता है पूर्वजन्म में किये हुए अनुभव के वासना-संस्कार बीज से उत्पन्न होनेवाली स्मृति के कारण अनुसन्धान तब तक ही होता रहेगा, प्राण में तो क्षुधा-पिपासादि के आभास से अनुसन्धान होता है और बुद्धि में ज्ञान सुखादि के तारतम्य से अनुसन्धान होगा, शून्य में मूर्च्छा-समाधि आदि के आभास से अनुसन्धान होता है, यह सब भी विकल्प ही है, इस प्रकार 'स एवायं घटः' घटादि के अनुसन्धान में भी विकल्परूपता माननी चाहिए ! किन्तु इन अनुसन्धान भूमिकाओं में विद्या-शक्ति अधिकतया विद्युत् के समान कुछ देर के लिए चमक उठती है, इन सभी योजनाओं को गुरुवर्यों ने परमपदरूपी भुवन पर चढ़ने के लिए प्रथम सोपान के रूप में माना है ॥ ६ ॥
बालपन, युवापन एवं वृद्धापन आदि में इन पूर्व-पूर्वं प्रमाताओं से देहादि का ज्ञान नहीं होता है जिससे कि प्रमाता का प्रकाश न होने से प्रमेय विषय नहीं भासता है, देहादि प्रमाता का प्रकाश पूर्व प्रमाता के प्रकाश बिना नहीं होता है, वह भी पूर्वतर-पूर्वतम् प्रकाश के बिना नहीं होता है इसीलिए अनवस्था हो जायेगी, अपितु विशुद्ध प्रकाश ही देहादि प्रमाता का प्रकाश है, यह निरूपण करते हुए कही हुई युक्ति के द्वारा सदैव व्यवहारदशा में भी भगवान् की सृष्टि आदि शक्ति से वियोग रहता है यह कहा गया है, इस विषय में कहते हैं—
१३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-७ तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ॥ ७ ॥ यत् पूर्वं दर्शितं 'देहे बुद्धौ' इत्यादि तत् एवम् उपपद्यते, कथम् ? यदि व्यवहारे मायापदे देहप्राणादिमपि प्रभुरेव प्रकाशपरमार्थ इच्छया—मायाशक्तिरूपया, आविशन्—देहप्राणादि- प्राधान्येन स्वरूपं प्रदर्शयन्, अन्तः—संविन्मात्रे, भान्तम्—अहमित्येवंरूपम् अर्थौघम् इच्छयैव बहिः इदमिति भासयति तत एतदुपपद्यते, अन्यथा तु अनवस्था स्यात्, हेतौ लिङ्। अपि-शब्द एव-शब्दश्च भिन्नक्रमौ, यत् एतावत् उक्तं, तदिति—तस्मात् हेतोः, एवं जातं वक्ष्यमाणरूपम्, किं तत् ? यत् किल प्रभुः परस्परं व्यवहारकाले क्रेयविक्रेयप्रेक्षाव्याख्यादौ चैत्रमैत्रादिसंबन्धिनो देहप्राणादीन् एकतया तावति आभासे आविशन् अन्तर्भान्तमेव अनुज्झित्तन्तः-प्रकाशमेव सन्तं बहिः एकाभासतया भासयति ? इति संभाव्यते—इत्येतज्जातम्, [ इति संभावनायां लिङ् ], तेन तेन प्रमात्रा सह ऐक्यं सृज्यते, अन्येन प्रमात्रा ऐक्यं संह्रियते, घटादिमात्ररूपे स्थितिः क्रियते, इस प्रकार व्यवहार काल में भी ईश्वर देहादि अवस्थाओं में प्रवेश करते हुए अन्तःस्थित अर्थसमूह को ही अपनी इच्छा से बाहर की ओर भासित करते हैं ॥ ७ ॥ जिसको पूर्व में दिखा दिया है 'देहे बुद्धौ' अर्थात् देह, बुद्धि और प्राण इत्यादि प्रमातृरूप में अहं विमर्श किस युक्ति से सिद्ध होगा ? यदि मायोय जगत् के व्यवहार करने में देह, प्राणादि को भी प्रभु ही प्रकाश परमार्थ की इच्छा से अर्थात् जब माया-शक्ति से उसको प्रमाता के रूप में स्वीकार करता हुआ देह, प्राणादि की प्रधानता से अपना स्वरूप दिखाता हुआ अन्तःकरण में अवस्थित संवित् मात्र में भासित होता हुआ 'अहम्' इस परामर्शरूप में अर्थसमूह की इच्छा से बाहर 'इदम्' इस रूप से भासित करता है। इसीसे यह सिद्ध होता है, नहीं तो, प्रमातृगत वेद्यता में आवेश न करने पर अनवस्था दोष से ग्रस्त हो जायेगा। 'भासयेत्' इसमें हेतु के अर्थ में 'लिङ्' लकार है। 'अपि' शब्द और 'एव' शब्द का भिन्न क्रम है, इतना ही अपोहन का स्वरूप कह दिया, तदिति—इसलिए इस हेतु से, 'एव' शब्द का स्वरूप आगे कहेंगे, वह क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रभु परस्पर क्रय-विक्रय, देखना-सुनना, व्याख्या करना आदि व्यवहारकाल में चैत्र-मैत्रादि सम्बन्धियों के एकरूप से उतने ही आभास में प्रवेश कराता हुआ, भीतर भासित होनेवाले को न छोड़ता हुआ बाहर में एकरूप से प्रकाशित होता है अर्थात् क्या बाहर एवं भीतर दोनों एकरूप होकर भासित हुआ करता है ? यह संभव है ऐसा सिद्ध हुआ [ इसलिए संभावना में लिङ् लकार है ] उस- उस प्रमाता के साथ में एकता का सर्जन करता है, दूसरे प्रमाता के साथ एकरूप में बाँध देता है, एवं घटादिरूप में स्थिति कर देता है, परिपूर्ण स्वरूप को बद्ध कर देने से तिरोभाव रख १. सृष्टि में परमेश्वर का यही परमार्थ है—परमेश्वर प्राण शरीरादि में कर्तृरूप से प्रवेश कर बाहरी पदार्थों को पराधीनता को जड सी सम्पादन करते हुए सर्गादि सृष्टि करते हैं, जब देह प्राणादि उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं तब विश्वरूप से सदैव अपने अंगरूप अर्थराशि को प्रकाशित करते हैं, उसमें कोई देशक्रम और कालक्रम भी नहीं है इसी से व्यवहार में 'मायापदे' ऐसा कहा गया है।
अ.-१, आ.-६, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [१३५ पूर्णस्वरूपनिमोलनात् तिरोभाव आधीयते, तावति आभासे ऐक्यावभासनपूर्णत्ववितरणात् अनुग्रहः क्रियते, तेन न केवलं महासृष्टिषु महास्थितिषु महाप्रलयेषु प्रकोपतिरोधानेषु दीक्षाज्ञानाद्यनु- ग्रहेषु भगवतः कृत्यपञ्चकयोगः यावत् सततमेव व्यवहारेऽपि । यदुक्तम् - सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥' इति । 'प्रतिक्षणमविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥' इत्यादि च । तथा '.......प्राकाम्य- मात्मनि यदा प्रकटीकरोषि । व्यक्तीः...........॥' इति च ॥ ७ ॥ देता है, उतने आभास में ऐक्य अवभासन को परिपूर्णता कर देने के कारण अनुग्रह करता है, इसीसे केवल महासृष्टि में, महास्थिति में, महाप्रलय में, क्रोध के रोक देने में, दीक्षा ज्ञानादिरूप अनुग्रह करने में भगवान् के कृत्य पञ्चक का योग नहीं होता है, ऐसी बात नहीं है अपितु सर्वदा व्यवहार काल में भी होता है। जबकि आचार्य ने इस विषय में कहा है—सर्वदा विनोद के लिए ही मात्र सृष्टि करनेवाले, सदा सुख-आनन्द के लिए ही स्थिति-पालन करनेवाले और सदैव अपने स्वरूप में तीनों लोकों को लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे प्रत्यक्षरूप स्वामी को नमस्कार हो । सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की प्रतिक्षण-प्रतिपल कल्पना करते हुए भी, कोई एक अजन्मा निर्विकल्प की जय हो । तथा '...... प्राकाम्यमात्मनि यदा प्रकटीकरोषि ।' व्यक्तीः.........। [ स्वामी के भीतर ही ये भाव-पदार्थ रहते हैं वह प्रत्यक्ष घटित होता है, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में उनकी इच्छा से ही अन्तर में अवस्थित पदार्थ-राशि बाहर में भासित होती है-ऐसा कहा गया है ] ॥ ७ ॥ १. इस प्रकार स्वामी अपने में रहनेवाले अर्थ समूह का आभास करते हैं—ऐसा जो कहा गया है, उसीको घटाते हैं, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में अपनी इच्छा से ही अपने में रहे हुए पदार्थ वर्ग को बाहर प्रकट करते हैं। जिसका विवेचन श्री सोमानन्दपाद ने किया है— कुत्सिते कुत्सितस्य स्यात्कथमुन्मुखतेति चेत् । रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ पञ्चप्रकारकृत्योक्तिश्शिवत्वान्निजकर्मणे । प्रवृत्तस्य निमित्तानामपरेषां क्व मार्गणम् ॥ चेतन वही है जो प्रसरणशील है रूप प्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभास- मान है और विश्व भी विथ्या या गर्हित नहीं है; क्योंकि ऊपर से नीचे अगल-बगल चारों ओर से ठसा-ठस शिवरूप ही भरा पड़ा है, सर्वत्र शिव की सत्ता होने के कारण इसके कुत्सित-गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। गर्हित तो उसी को कहते हैं जो भेद दृष्टि से शिवरूप में देखता है। भगवान् परमेश्वर के सर्ग, स्थिति, प्रलय, अनुग्रह और तिरोधान ये पाँच प्रकार के कृत्य हैं अपने निज तत्त्वादिरूप प्रसरणार्थ ही प्रसर होता है। उसमें दूसरे निमित्त कहाँ ढूँढोगे। किन्तु कोई तो कहते हैं कि 'ईश्वरः स्वातन्त्र्यवास-सर्वकामः' ये तो अपने में पूर्ण हैं फिर इनको सृष्ट्यादि से क्या फल मिलने- वाला है ? 'क्योंकि जो कोई भी कार्य में प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है वह कुछ न कुछ प्रयोजन को लेकर ही प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है।' प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते । अर्थात् मतिमूढ भी उद्देश्य को आगे रखकर ही कार्य में प्रवृत्त होता है। भगवान् में तो यह संभव नहीं होता। लोक अनुग्रहार्थ ही प्रवृत्त होते हैं।
१३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-८ इह अन्तरर्थावभासः स्थित एव, तत् किं तत्र कारणान्तरचिन्तया इति प्रकृतं प्रमेयम्, तत्सिद्धये उपपत्तिः उक्ता, तेन विना इच्छारूपः प्रत्यवमर्शो न स्यात् इति, तत्प्रसङ्गात् प्रत्यवमर्श- विकल्पादिस্বরূপम् उपपादितम्, इति शिष्याणां धियं समाधातुं प्रकृतं प्रमेयम् उपपादयन् उपसंहरति— एवं स्मृतौ विकल्पे वाप्यपोह्नपरायणे । ज्ञाने वाप्यन्तराभासः स्थित एवेति निश्चितम् ॥ ८ ॥ प्रकाशात्मा परमेश्वर एव यतो देहादिप्रमातृताभिमानदशायामपि वस्तुतः प्रमाता, एवम् इति अतो हेतोः इदं सिद्धं भवति—स्मरणे अपोहनजीविते च विकल्पे अनुभवज्ञाने च अन्तराभासः प्रकाशविश्रान्तः स्थित एव, नात्र संशयः कश्चित्, यदि हि देहादिरेव परमार्थप्रमाता स्यात् तत् शरीरस्य प्राणस्य धियः शून्यस्य वा अन्तर्घटादि इति न किंचित् एतत्—घटादिपरि- हारेण देहादेः स्थितत्वात् । परमार्थप्रकाशस्तु सर्वसहः इति तत्रान्तर्विश्वम्, इति अनायास- सिद्धमेतत् ॥ ८ ॥ अपने स्वरूप में अर्थ का अवभास स्वसंवित् साक्षिरूप से रहता ही है, उसमें फिर दूसरे बाह्यार्थ वासना इत्यादि कारणों को खोजना व्यर्थ है । इसलिए प्रस्तुत प्रमेयरूप साध्य की सिद्धि के लिये युक्ति दे दी गई हैं, इसी कारण इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं हो सकता है, भीतर अर्थ का अवभास अवश्य ही रहता है, इसका समर्थन के प्रसङ्ग से प्रत्यवमर्श के विकल्पादि स्वरूप को युक्ति द्वारा सिद्ध किया है; इस प्रकार शिष्यों की बुद्धि के समाधानार्थ भीतर अर्थों के अवभासतत्त्व का निगम रीति से उपपादन करते हुए उपसंहार करते हैं— इस तरह स्मृति और विकल्प में अथवा अपोहन प्रधान ज्ञान में या भीतर में भी पदार्थों का अवभास अवस्थित ही होता है—यह तो निश्चित है ॥ ८ ॥ जबकि देह, बुद्धि, प्राणादि प्रमातृगत अभिमान अवस्था में भी वस्तुतः प्रकाशात्मा परमेश्वर ही प्रमाता रहते हैं। इस हेतु से सिद्ध हो जाता है कि [ प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ही सब का जीवन है ] स्मरण और अपोहन प्रधान विकल्प में अनुभव ज्ञान में, अन्तर में पदार्थों का अवभास प्रकाशरूप से ही रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं होता है, यदि देहादिरूप की सत्य- प्रमाता होता तो शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्यादि का अन्तःकरण में रहनेवाले घटादि पदार्थ किससे मेल करेगा, क्योंकि घटादि को छोड़कर देहादिरूपों में ही विद्यमान रहता है । परमार्थ प्रकाशरूप परमेश्वर तो सब कुछ रहनेवाले होते हैं इसलिए उनमें सारे विश्व की अन्तर्लीनता हो सकती है, यह बात तो अनायास ही सिद्ध है ॥ ८ ॥ १. उन दोनों का भी स्वरूप वैसा ही होने के कारण । क्योंकि अन्तःस्थित रहनेवाले का ही सर्वथा समर्थन करना होगा—उसके बिना बाहर में इच्छा-विमर्श नहीं हो सकता है और वह शुद्ध प्रकाश प्रमाता में अन्तर्लीनभाव हुए बिना थोड़ा सा भी नहीं घटता है । यद्यपि स्मृति इत्यादि देहादि प्रमाता के विषय हैं तथापि उन परमेश्वर-प्रकाश से ही प्रमातृरूपता होने के कारण उनमें ही तादात्म्यरूप से अवस्थित भाव-पदार्थ रहते हैं ।
अ.-१, आ.-६, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १३७ ननु अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनं यदि सर्वत्रास्ति कस्तर्हि स्मरणादौ आभासभेदः, न च असौ न संवेद्यते—स्फुटास्फुटतादिप्रस्फुरणस्य अनपह्ववनीयत्वात् ? इत्याशङ्क्याह— किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभासनात्मनि । पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ॥ ९ ॥ अनुभवज्ञानस्य ‘इदं नीलम्’ इति अन्तराभासं बहिराभासयतः सोऽन्तर्भावाभासो नैसर्गिको—निसृष्टेः स्वातन्त्र्यात् आयातो,न तु स्मरणादेरिव अन्यज्ञानकृतवासनादिबलात्, स्मरणे उत्प्रेक्षणे प्रत्यक्षपृष्ठभाविनि अध्यवसाये च योऽन्तर्नीलाद्यवभासो बाह्यतया अवभासयितव्यः नासौ स्वात्मकीयः अपि तु पूर्वानुभवसंस्कारजोऽसौ, तत्र संस्कारो नाम अनुभवस्य कालान्तरेऽपि अब प्रश्न किया जाता है कि यदि अन्तर में अवभासमान पदार्थ-समूह का सर्वत्र बाहर में आभास होता है, तो स्मरणादि में अन्तर के आभास का भेद कैसे होगा ? किन्तु यह [ भेद ] नहीं जाना जा सकता है यह बात नहीं है, अवश्य जाना जाता है—स्फुटरूप से अथवा अस्फुटरूप से इसका स्फुरण अवश्य कुछ न कुछ रहता है । इसको छिपा नहीं सकते हैं ? इस पर आशंका कर कहते हैं— बाहर की तरफ आभासमान होनेवाले ज्ञान में अन्तराभास स्वाभाविक रहता है । वह स्मरणादि में पूर्व के अनुभवरूप से रहता है ॥ ९ ॥ ‘इदं नीलम्’ यह नील है, वह निर्विकल्परूप अनुभवज्ञान का अन्तर में होनेवाला आभास है जोकि बाहर में भासित करता है वह आभास स्वाभाविक होता है, अपने अवभास से स्वतन्त्र होने के कारण आया हुआ रहता है; स्मरणादि के जैसा अन्य ज्ञान से किये गये वासनादि के बल से नहीं होता है, स्मरण, उत्प्रेक्षा, प्रत्यक्ष के अनन्तर अध्यवसाय में होनेवाले जो भीतर नीलादि का अवभास है वह बाह्यरूप से भासित होना चाहिए, वह अपना स्मरणकालीन नहीं है अपितु अनुभवपूर्वक है उसके संस्कार से उत्पन्न हुआ होता है, उसमें संस्कार क्या चीज है ? इसका समाधान करते हैं कि उसका आगे बने रहना यही संस्कार का स्वरूप है अर्थात् कालान्तर में भी उसका बना रहना ही संस्कार कहा जाता है वह जो आता हुआ अनुभव है १. यदि अन्तराभास पदार्थों का बाहर में आभासन ज्ञान, स्मृति और विकल्प में होता है तो कौन स्मरणादि में अन्तराभास का सर्वसाधारण भाव होने के कारण भेद विभाजन करेगा ? २. आभास भेद का स्फुरण ज्ञान में तो स्फुटरूप से रहता है और स्मृति आदि में अस्फुटरूप से रहता है । ३. क्योंकि दूरत्व और समीपत्व को लेकर प्रत्यक्ष के संस्कार से उत्पन्न होनेवाली दोनों स्मृति में भी पूर्व का अनुभूत ही अर्थ अन्तर में अवस्थित होकर संस्कार शब्द का वाच्य होता है इसीको क्षेत्रज्ञ अपनी इच्छा के द्वारा पूर्व काल से अवच्छिन्न करता हुआ मनोयोगपूर्वक देखता है इसमें कुछ अपूर्व सर्जन नहीं करता है । ४. पूर्व अनुभूत आभास का पृथक्-करण करना ही स्मृति का नया व्यापार नहीं है । किन्तु भिन्न किये हुए को ही अन्धकार से वह आवृत्त करने के बराबर है उसमें तो संस्काररूप से अवस्थित उस काल में भी रहता है । प्रतिबोधक अनुसन्धान दशामें आवरण के हट जाने से वही प्रकाशित होता है इसीका नाम अप्रमुषित [ न छोड़ना रूप है ] अत एव अनुभूत विषय का असंप्रमोष होना ही स्मृति है यह कुछ भी अपूर्व वस्तु की सृष्टि नहीं करती है अर्थात् इससे कोई अपूर्व पदार्थ का निर्माण नहीं होता है । १८