भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११३ मायापदे अतिदुर्घटं प्रतिभाति, तत्सम्पादने यत् अप्रतिहतं स्वातन्त्र्यं तदेव पुनः स्वातन्त्र्यशब्देन दर्शितम् । अत एव इत्यनेन तु विमर्शशक्तिरूपम् इति अपुनरुक्तम् । अथ वा अत एव स्वातन्त्र्यात् इति सामानाधिकरण्येन श्लोकद्वयेन सम्बन्धनीयम् । उदाहरणम् अत्र अर्थे दर्शयति—नीलादि- निर्माणवत् अस्य स्वतन्त्ररूपनिर्माणस्य अप्रसिद्धत्वात् ईश्वरो-भगवान्-आत्मा-नित्यो-विभुः- स्वतन्त्रः इत्येवमादौ हि प्रमातुः, पूजयितुः, ध्यातुः वा पृथग्भूतं तत् प्रमेयम्, पूज्यं, ध्येयं च भाति इति तत् तावत् निर्मितम्, न च अनीश्वररूपम् । एवं हि ईश्वर इति, अनीश्वर इति संकल्प- ध्यानादेः तुल्यत्वं स्यात्, न च एवम्—फलभेदस्य उपलब्धेः इति, तस्मात् स्वातन्त्र्यशून्यता- भासनेन स्वातन्त्र्ययुक्तताभासनेन च यत् इदम् उभयं ज्ञेयम् आत्मरूपमेव परमेश्वरो भासयति तत् विमर्शशक्तिबलात् एव, इति सैव प्रधानम् इति ॥ १५-१६ ॥ ननु प्रकाशबलात् भावव्यवस्था, स च प्रकाशो विमर्शसार इति विमर्शभेदे तदेव तत् इति वक्तुं युक्तम्, ईश्वर आत्मा इत्यादिसंकल्पेषु च निर्मितस्य इदन्तया परामर्शः, स्वातन्त्र्यं तु दुर्घटता दिखाई देती है, इसे सम्पादन करने में अप्रतिहत—जो कभी नहीं रुकनेवाला स्वातन्त्र्य है उसको स्वतन्त्र शब्द से बताया है । 'अत एव' शब्द श्लोक में दिया है इससे विमर्श-शक्ति का स्वरूप दिखलाया गया है अथवा इसका दूसरा भी अर्थ करते हैं कि 'अत एव' स्वातन्त्र्य होने के कारण सामानाधिकरण्यरूप से दोनों श्लोकों के साथ सम्बन्ध करना चाहिए । [ ईशादिसंकल्पैः ] ईश्वरादि के संकल्पों द्वारा उदाहरण अर्थ में बताया जाता है—नीलादि पदार्थों में स्वतन्त्ररूप से निर्माण करने का अभाव होने से स्वयं भगवान् परमेश्वर आत्मा, नित्य, विभु स्वतन्त्र है, इस प्रकार आदि में प्रमाता का, पूजन करनेवाले का, ध्यान करनेवाले का, अलग हुआ वह प्रमेय, पूज्य और ध्येय भासता है यह सब मान लेना है वह ईश्वर का ही रूप है, अनीश्वर का नहीं है । यह ईश्वर है और यह अनीश्वर है इसके संकल्प, ध्यानादि में तो फिर एकता हो जायेगी; ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों के फलों में भेद होता है, इसलिए स्वातन्त्र्यशून्यता का आभास नीलादि में और स्वातन्त्र्य युक्तता का आभास ईश्वरादि में इन दोनों को अपने रूप में परमेश्वर ही भासित करता है और वह भासन विमर्श-शक्ति के कारण ही होता है, इसीसे विमर्श-शक्ति प्रधान है ॥ १५-१६ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्रकाश के सामर्थ्य से भाव-पदार्थों की व्यवस्था होती है और वह प्रकाश का विमर्श ही साररूप है, विमर्श से अभेद होने पर भासन भी विमर्श है ऐसा कहना चाहिये, ईश्वर आत्मा है इसमें जो कुछ निर्मित होगा उसका इदन्तारूप से परामर्श होगा और स्वातन्त्र्य का तो अहं परामर्शरूप से होगा, इदन्ता से निर्मित हुए का अहंतारूप एतदेव स्वतन्त्रत्वमैश्वर्यं बोधरूपता ॥ 'जो परमेश्वर की लोकोत्तर, अति दुर्घट कार्य करने की सामर्थ्य-शक्ति है इसी को स्वतन्त्रत्व, ऐश्वर्य एवं बोधरूपता कहा जाता है ।' १. श्री सोमानन्दपाद ने इसका विवेचन शिवदृष्टि शास्त्र में किया है । 'गच्छतो निस्तरङ्गस्य जलस्यातितरङ्गिताम् । आरम्भे दृष्टिमापात्य तदौन्मुख्यं हि गम्यते ॥' इति यथा— १५