ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें११२] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ दृढेन सम्भावनानुमानेन, तत एव विमर्शशक्तिलक्षणात् कर्तृत्वात् हेतोः भवति, यतो हि अयम् आत्मानं परामृशति ततो विश्वनिर्भरत्वात् तथा नीलादित्वेन चकास्ति । ननु एषैव कुतः सम्भा- वना आत्मानं ज्ञेयीकरोति ?, इति आह पृथक् प्रकाशात् बहिर्भूता स्थितिः यस्य तादृक् ज्ञेयं नैव भवति । तुः अवधारणे । तत्र च उक्ता युक्तयः । अभ्युच्चययुक्तिमपि आह-यदि व्यतिरिक्तं ज्ञेयं स्यात् तत् ज्ञातृरूपस्य आत्मनो यत् एतत् ज्ञेयविषयम् औन्मुख्यं स्वसंवेदनसिद्धं दृश्यते तत् न अस्य स्यात्, तेन व्यतिरिक्तविषयौन्मुख्येन अन्याधीनत्वं नाम पारतन्त्र्यम् अस्य आनीयते । पारतन्त्र्यं च स्वातन्त्र्यस्य विरुद्धम् । स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वलक्षणम् आत्मनः स्वरूपम्, इति व्यतिरिक्तोन्मुख आत्मा अनात्मैव स्यात् । अनात्मा च जडो ज्ञेयं प्रति न उन्मुखीभवति इति प्रसङ्गः । ततः प्रसङ्गविपर्ययात् इदमायातम्—अव्यतिरिक्तोन्मुखः स्वतन्त्रः सन् आत्मानमेव ज्ञेयीकरोति इति । न च केवलं नीलादिरूपमेव ज्ञेयं, यावत् अत्यक्तकर्तृस्वभावं स्वातन्त्र्येण अपरित्यक्तमेव सन्तम् आत्मानं निर्माय व्यवहारेण ध्यानोपासनार्चनोपदेशादिना योजयति इति यत् सम्भाव्यते तदपि अत एव इति सम्बन्धः । ननु स्वातन्त्र्ययुक्तं च निर्मायते च इति विरुद्धम् इदम् ?, तत्राह—अद्वयात्मनः संविदेकरूपस्य स्वातन्त्र्यात् हेतोः इदं न न युज्यते, यत् किल अनुमान के द्वारा दिखाया है, इसी कारण विमर्श-शक्तिरूप कर्तृत्व ही इसमें हेतु होता है, क्योंकि यह अपने आप का परामर्श करता है इसलिए परिपूर्ण होने के कारण ठीक वैसा ही नीलत्व पीतत्वादिकों के रूपों में प्रकाशित होता है । अब शङ्का होती है कि सम्भावना अपने को क्यों ज्ञेय बनाती है ?, उत्तर देते हैं—कि प्रकाश से बाहर होकर उसकी स्थिति नहीं होती है वैसा ज्ञेय पदार्थ नहीं रहता है । 'तु' शब्द निश्चित अर्थ के रूप में है । इस प्रकार वहाँ पर युक्तियों को भी कह दिया गया है । और भी अधिक युक्ति देते हैं—यदि ज्ञेय अलग रहता है तो ज्ञातृरूप आत्मा की जो यह ज्ञेयविषयक उन्मुखता है जो कि अपने संवेदन ज्ञान से सिद्ध दिखाई देती है—वह इसकी उन्मुखता नहीं है, इसी कारण कर्ता से विषय भिन्न होने से पारतन्त्र्य उसमें आ जाता है और वह परतन्त्रता तो स्वतन्त्रता से विरुद्ध स्वभाववाली होती है । इस प्रकार स्वातन्त्र्य को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती जबकि यही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है भिन्न वस्तु की ओर उन्मुखता होने से आत्मा अनात्मारूप ही हो जायेगा जबकि यह अभीष्ट नहीं है । और अनात्मारूप होने के कारण जड हुआ वह ज्ञेय के प्रति उन्मुख नहीं होता । प्रसङ्ग से विपरीत होने के कारण यह सिद्ध हुआ कि—स्वयं उन्मुख स्वतन्त्र होकर अपने को ही ज्ञेय बनाता है और केवल नीलादिरूप को ही ज्ञेय नहीं बनाता है अपितु अपने को भी बनाता है, अपनी स्वतन्त्रता से कर्तृत्व स्वभाव को न छोड़ता हुआ ज्ञेयरूप में अपने को निर्माण करके ध्यान, उपासना, अर्चना और उपदेशादि से जोड़ता है यह जो सम्भव है वह भी 'अत एव का सम्बन्ध है।' अब शङ्का करते हैं कि स्वातन्त्र्य से युक्त भी है और निर्माण भी करता है यह तो परस्पर विरुद्ध दिखाई पड़ता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि अद्वैतरूप संवित् मात्र स्वातन्त्र्य हेतु से ऐसा नहीं हो सकता है, यह बात नहीं है अपितु सम्भव हो सकता है, मायामय जगत् में जो अति १. अतिदुर्घटकारित्वमस्यनुत्तरमेव यत् ।