भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १११ इत्यादि च । तत् एतेन विदुः इत्येतत् निर्वाहितम् । बौद्धैरपि अध्यवसायापेक्षं प्रकाशस्य प्रामाण्यं वदद्भिः उपगतप्राय एव अयम् अर्थः—अभिलापात्मकत्वात् अध्यवसायस्य इति ॥ १४ ॥ ननु असंख्यशक्तिश्रेणीशोभितवपुषि परमशिवे विमर्शशक्तिरेव इयम् इत्थंकारम् अभिषिच्यते कस्मात् ?, इत्याशङ्क्याह— आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक्स्थिति । ज्ञेयं न तु तदौन्मुख्यात्खण्ड्येतास्य स्वतन्त्रता ॥ १५ ॥ स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः । प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ १६ ॥ सर्वाः शक्तीः कर्तृत्वशक्तिः ऐश्वर्यात्मा समाक्षिपति । सा च विमर्शरूपा इति युक्तम् अस्या एव प्राधान्यम् इति तात्पर्येण उत्तरमुक्तम् । शब्दार्थस्तु अयं—प्रकाशात्मा परमेश्वरः स्वात्मानं ज्ञात्रेकरूपत्वात् अज्ञेयमपि ज्ञेयीकरोति इति यत् सम्भाव्यते—कारणान्तरस्य अनुपपत्तेः दर्शितत्वात् जाती है । इस प्रकार आगे भी कहते हैं कि— समस्त विद्याकलादि से सम्बन्धित रहनेवाली ही यह देखी जाती है एवं यह संसारी जीवों की चेतनता के समान है। बाह्य जगत् में तो देहधारियों का व्यवहार इसके बिना होना असम्भव सा है, अपने अन्तर में रहनेवाले का भी सहारा किसी न किसी रूप से इस से होता ही है। जैसे चेतन के न रहने पर प्राणी 'विसंज्ञ' ही हो जाता है वैसे वाक्, या शब्द के बिना भी उसकी स्थिति अचेतन के समान ही हो जाती है। वृक्ष-पाषाणादि को वाग्रूपता की आवश्यकता नहीं होती है। वाग्रूपता से ग्रहण किया हुआ चैतन्य ही सब प्रकार की सब सार्थक प्रवृत्तियों को प्रवृत्त करता है। यदि यह न रहे, तो प्राणी काठ को तरह निर्जीव ही रह जायेंगे । 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुः' अवभास के स्वभाव को विमर्श कहते हैं यह बात भी यहाँ पर आ गयी । अध्यवसाय को अपेक्षा रखनेवाले प्रकाश को विश्रान्ति होती है—ऐसा कहनेवाले बौद्धलोग भी प्रायः इसे स्वीकार करते हैं जो कि अध्यवसाय का अभिलाप स्वरूप है ॥ १४ ॥ 'ननु' कहकर अब शंका करते हैं कि असंख्य-शक्ति-सम्पन्न शिव में विमर्श-शक्ति ही क्यों इतना महत्त्व पाती है ? इस आशंका का उत्तर देते हैं— इसी कारण अपने आपको ही यह परमेश्वर अलग करके ज्ञेयरूप बना देता है । नहीं तो, उसकी ओर उन्मुख रहने से शिव की जो स्वतन्त्रता है वह खण्डित हो जाती ॥ १५ ॥ अद्वैतरूप अपनी स्वतन्त्रता से युक्त होकर अपने आप की ईशादि संकल्पों से निर्मित करके प्रभु व्यवहार कराता है ॥ १६ ॥ सारी शक्तियाँ कर्ता की ही शक्ति हैं ऐश्वर्यरूप में वही विमर्श हैं—यह कहना चाहिए । उसकी प्रधानता भी है, इसी तात्पर्य से ये सारी की सारी बातें कही गयी हैं। अब शब्दार्थ बताते हैं—यह प्रकाशरूप परमेश्वर अपने आपको ज्ञाता होने के कारण अज्ञेय होता हुआ भी ज्ञेय कर देता है इसकी जो सम्भावना है—इसमें दूसरा कोई कारण न मिलने से दृढ सम्भावना को