भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 343 में से

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११० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ इत्यागमेषु। तत्रभवद्भर्तृहरिणापि— ‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गम्यते ॥ वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥’ इति ‘सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । यदुत्क्रान्तौ विसंज्ञोऽयं दृश्यते काष्ठकुड्यवत् ॥’ स्थूल वाच्य-वाचकमय विश्व को विस्फुरित करने के लिए यह इच्छा-शक्ति बन जाती है । पश्चात् ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति के रूपों में अङ्कुरित हो जाती है, फिर मायापदवी पर आरूढ होकर विचित्र रूपों में प्रसृत हो जाती है। बाहर की ओर फैलनेवाली प्रक्रिया में यह मातृका शक्ति दो, नव और पचास रूपों में बँट जाती है। बीज और योनि के रूप से दो भेद हो जाते हैं स्वर समूह का नाम तो बीज है और व्यञ्जन समूह का नाम योनि है। १. अवर्ग 'अ' से अः पर्यन्त 'अमा', २. कवर्ग से 'कामा', ३. चवर्ग से 'चार्षङ्गी', ४. टवर्ग से 'टङ्कधारिणी', ५. तवर्ग से 'तारा', ६. पवर्ग से पार्वती', ७. यवर्ग से 'यक्षिणी', ८. शवर्ग से 'शारिका', ९. क्षवर्ग अनूत्तर और अनाहत के संघ को विस्तृत करनेवाली कूटबीज है। इस प्रकार इसका नव भेद हुए। शब्द समूह के प्रत्येक वर्ण-अक्षर को भिन्न-भिन्न शक्तिवाला है—ऐसा मानकर सोलह स्वरों एवं चौंतीस व्यञ्जनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की जाती है। इत्यादि, आगमों में उल्लेख मिलता है। श्रीभर्तृहरि ने भी अपनी 'वाक्यपदीयम्' में उल्लेख किया है— प्रत्यय अथवा ज्ञान दो प्रकार का होता है। हमारा वाग् व्यवहार जागृत् दशा का तो शब्दभावना से हो जाता है। भावना का साथ न होने पर अनुभूति में आनेवाले अनेकतथ्य हैं, जिन्हें शब्द से व्यक्त नहीं करते हैं, यद्यपि उन्हीं के साथ अनुभूत अन्य सत्यों को हम शब्द के द्वारा अभिव्यक्त भी करते हैं। सुप्तकाल में भी हम सत्यों अथवा स्वप्नों का अनुभव किये रहते हैं। शब्दों के साथ उनका वर्णन इसलिए नहीं करते हैं कि सूक्ष्मरूप से शब्दभावना के बीज उस काल में ग्रहण हो गये रहते हैं। तामसी अवस्था में पड़े रहने के कारण तमोरूपा दशा ही उसे कहना पड़ता है। किंतु जागृति दशा और सुषुप्ति दशा का जो ज्ञान है वह शब्द भावना के बिना कभी भी स्थिर नहीं हो सकेगा और न तो उसके स्वरूप का ही ठीक-ठीक बोध हो पायेगा। वाक् या शब्द से ही समस्त व्यवहार का बोध होता है और वही आत्माभिव्यक्ति एवं स्मृति अवस्था में भी कारण रहता है। ज्ञान की समस्त आभास शब्द या वाक् के रूप में ही अवस्थिति रहती है। उसीके माध्यम से सब प्रकार का विचार-विमर्श हो सकता है वह फिर किसी भी रूप में रहे, व्यक्त अथवा अव्यक्त । वाक् के न रहने पर तो प्रकाश ही प्रकाशित न हो पायेगा; क्योंकि समस्त व्यवहार ठप हो जायेगा। सा सर्वविद्याशिल्पनां कलां चोपबंधनी । तद्भादादभिनिष्पन्नं सर्वं वस्तु विभज्यते ॥ व्यावहारिक जगत् की समस्त वस्तुओं से वाक्-शब्द का सम्बन्ध निहित रहता है जैसा कि सभी को विद्या, शिल्प और कला आदि से सम्बन्ध प्रतिदिन रहता देखा भी जाता है, इसके द्वारा ही प्रत्येक निर्मित की गयी वस्तु के विषय में प्रयोज्य-प्रयोजक आदि की कल्पना भी की

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