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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

११० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ इत्यागमेषु। तत्रभवद्भर्तृहरिणापि— ‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गम्यते ॥ वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥’ इति ‘सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । यदुत्क्रान्तौ विसंज्ञोऽयं दृश्यते काष्ठकुड्यवत् ॥’ स्थूल वाच्य-वाचकमय विश्व को विस्फुरित करने के लिए यह इच्छा-शक्ति बन जाती है । पश्चात् ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति के रूपों में अङ्कुरित हो जाती है, फिर मायापदवी पर आरूढ होकर विचित्र रूपों में प्रसृत हो जाती है। बाहर की ओर फैलनेवाली प्रक्रिया में यह मातृका शक्ति दो, नव और पचास रूपों में बँट जाती है। बीज और योनि के रूप से दो भेद हो जाते हैं स्वर समूह का नाम तो बीज है और व्यञ्जन समूह का नाम योनि है। १. अवर्ग 'अ' से अः पर्यन्त 'अमा', २. कवर्ग से 'कामा', ३. चवर्ग से 'चार्षङ्गी', ४. टवर्ग से 'टङ्कधारिणी', ५. तवर्ग से 'तारा', ६. पवर्ग से पार्वती', ७. यवर्ग से 'यक्षिणी', ८. शवर्ग से 'शारिका', ९. क्षवर्ग अनूत्तर और अनाहत के संघ को विस्तृत करनेवाली कूटबीज है। इस प्रकार इसका नव भेद हुए। शब्द समूह के प्रत्येक वर्ण-अक्षर को भिन्न-भिन्न शक्तिवाला है—ऐसा मानकर सोलह स्वरों एवं चौंतीस व्यञ्जनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की जाती है। इत्यादि, आगमों में उल्लेख मिलता है। श्रीभर्तृहरि ने भी अपनी 'वाक्यपदीयम्' में उल्लेख किया है— प्रत्यय अथवा ज्ञान दो प्रकार का होता है। हमारा वाग् व्यवहार जागृत् दशा का तो शब्दभावना से हो जाता है। भावना का साथ न होने पर अनुभूति में आनेवाले अनेकतथ्य हैं, जिन्हें शब्द से व्यक्त नहीं करते हैं, यद्यपि उन्हीं के साथ अनुभूत अन्य सत्यों को हम शब्द के द्वारा अभिव्यक्त भी करते हैं। सुप्तकाल में भी हम सत्यों अथवा स्वप्नों का अनुभव किये रहते हैं। शब्दों के साथ उनका वर्णन इसलिए नहीं करते हैं कि सूक्ष्मरूप से शब्दभावना के बीज उस काल में ग्रहण हो गये रहते हैं। तामसी अवस्था में पड़े रहने के कारण तमोरूपा दशा ही उसे कहना पड़ता है। किंतु जागृति दशा और सुषुप्ति दशा का जो ज्ञान है वह शब्द भावना के बिना कभी भी स्थिर नहीं हो सकेगा और न तो उसके स्वरूप का ही ठीक-ठीक बोध हो पायेगा। वाक् या शब्द से ही समस्त व्यवहार का बोध होता है और वही आत्माभिव्यक्ति एवं स्मृति अवस्था में भी कारण रहता है। ज्ञान की समस्त आभास शब्द या वाक् के रूप में ही अवस्थिति रहती है। उसीके माध्यम से सब प्रकार का विचार-विमर्श हो सकता है वह फिर किसी भी रूप में रहे, व्यक्त अथवा अव्यक्त । वाक् के न रहने पर तो प्रकाश ही प्रकाशित न हो पायेगा; क्योंकि समस्त व्यवहार ठप हो जायेगा। सा सर्वविद्याशिल्पनां कलां चोपबंधनी । तद्भादादभिनिष्पन्नं सर्वं वस्तु विभज्यते ॥ व्यावहारिक जगत् की समस्त वस्तुओं से वाक्-शब्द का सम्बन्ध निहित रहता है जैसा कि सभी को विद्या, शिल्प और कला आदि से सम्बन्ध प्रतिदिन रहता देखा भी जाता है, इसके द्वारा ही प्रत्येक निर्मित की गयी वस्तु के विषय में प्रयोज्य-प्रयोजक आदि की कल्पना भी की

अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १११ इत्यादि च । तत् एतेन विदुः इत्येतत् निर्वाहितम् । बौद्धैरपि अध्यवसायापेक्षं प्रकाशस्य प्रामाण्यं वदद्भिः उपगतप्राय एव अयम् अर्थः—अभिलापात्मकत्वात् अध्यवसायस्य इति ॥ १४ ॥ ननु असंख्यशक्तिश्रेणीशोभितवपुषि परमशिवे विमर्शशक्तिरेव इयम् इत्थंकारम् अभिषिच्यते कस्मात् ?, इत्याशङ्क्याह— आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक्स्थिति । ज्ञेयं न तु तदौन्मुख्यात्खण्ड्येतास्य स्वतन्त्रता ॥ १५ ॥ स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः । प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ १६ ॥ सर्वाः शक्तीः कर्तृत्वशक्तिः ऐश्वर्यात्मा समाक्षिपति । सा च विमर्शरूपा इति युक्तम् अस्या एव प्राधान्यम् इति तात्पर्येण उत्तरमुक्तम् । शब्दार्थस्तु अयं—प्रकाशात्मा परमेश्वरः स्वात्मानं ज्ञात्रेकरूपत्वात् अज्ञेयमपि ज्ञेयीकरोति इति यत् सम्भाव्यते—कारणान्तरस्य अनुपपत्तेः दर्शितत्वात् जाती है । इस प्रकार आगे भी कहते हैं कि— समस्त विद्याकलादि से सम्बन्धित रहनेवाली ही यह देखी जाती है एवं यह संसारी जीवों की चेतनता के समान है। बाह्य जगत् में तो देहधारियों का व्यवहार इसके बिना होना असम्भव सा है, अपने अन्तर में रहनेवाले का भी सहारा किसी न किसी रूप से इस से होता ही है। जैसे चेतन के न रहने पर प्राणी 'विसंज्ञ' ही हो जाता है वैसे वाक्, या शब्द के बिना भी उसकी स्थिति अचेतन के समान ही हो जाती है। वृक्ष-पाषाणादि को वाग्रूपता की आवश्यकता नहीं होती है। वाग्रूपता से ग्रहण किया हुआ चैतन्य ही सब प्रकार की सब सार्थक प्रवृत्तियों को प्रवृत्त करता है। यदि यह न रहे, तो प्राणी काठ को तरह निर्जीव ही रह जायेंगे । 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुः' अवभास के स्वभाव को विमर्श कहते हैं यह बात भी यहाँ पर आ गयी । अध्यवसाय को अपेक्षा रखनेवाले प्रकाश को विश्रान्ति होती है—ऐसा कहनेवाले बौद्धलोग भी प्रायः इसे स्वीकार करते हैं जो कि अध्यवसाय का अभिलाप स्वरूप है ॥ १४ ॥ 'ननु' कहकर अब शंका करते हैं कि असंख्य-शक्ति-सम्पन्न शिव में विमर्श-शक्ति ही क्यों इतना महत्त्व पाती है ? इस आशंका का उत्तर देते हैं— इसी कारण अपने आपको ही यह परमेश्वर अलग करके ज्ञेयरूप बना देता है । नहीं तो, उसकी ओर उन्मुख रहने से शिव की जो स्वतन्त्रता है वह खण्डित हो जाती ॥ १५ ॥ अद्वैतरूप अपनी स्वतन्त्रता से युक्त होकर अपने आप की ईशादि संकल्पों से निर्मित करके प्रभु व्यवहार कराता है ॥ १६ ॥ सारी शक्तियाँ कर्ता की ही शक्ति हैं ऐश्वर्यरूप में वही विमर्श हैं—यह कहना चाहिए । उसकी प्रधानता भी है, इसी तात्पर्य से ये सारी की सारी बातें कही गयी हैं। अब शब्दार्थ बताते हैं—यह प्रकाशरूप परमेश्वर अपने आपको ज्ञाता होने के कारण अज्ञेय होता हुआ भी ज्ञेय कर देता है इसकी जो सम्भावना है—इसमें दूसरा कोई कारण न मिलने से दृढ सम्भावना को

११२] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ दृढेन सम्भावनानुमानेन, तत एव विमर्शशक्तिलक्षणात् कर्तृत्वात् हेतोः भवति, यतो हि अयम् आत्मानं परामृशति ततो विश्वनिर्भरत्वात् तथा नीलादित्वेन चकास्ति । ननु एषैव कुतः सम्भा- वना आत्मानं ज्ञेयीकरोति ?, इति आह पृथक् प्रकाशात् बहिर्भूता स्थितिः यस्य तादृक् ज्ञेयं नैव भवति । तुः अवधारणे । तत्र च उक्ता युक्तयः । अभ्युच्चययुक्तिमपि आह-यदि व्यतिरिक्तं ज्ञेयं स्यात् तत् ज्ञातृरूपस्य आत्मनो यत् एतत् ज्ञेयविषयम् औन्मुख्यं स्वसंवेदनसिद्धं दृश्यते तत् न अस्य स्यात्, तेन व्यतिरिक्तविषयौन्मुख्येन अन्याधीनत्वं नाम पारतन्त्र्यम् अस्य आनीयते । पारतन्त्र्यं च स्वातन्त्र्यस्य विरुद्धम् । स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वलक्षणम् आत्मनः स्वरूपम्, इति व्यतिरिक्तोन्मुख आत्मा अनात्मैव स्यात् । अनात्मा च जडो ज्ञेयं प्रति न उन्मुखीभवति इति प्रसङ्गः । ततः प्रसङ्गविपर्ययात् इदमायातम्—अव्यतिरिक्तोन्मुखः स्वतन्त्रः सन् आत्मानमेव ज्ञेयीकरोति इति । न च केवलं नीलादिरूपमेव ज्ञेयं, यावत् अत्यक्तकर्तृस्वभावं स्वातन्त्र्येण अपरित्यक्तमेव सन्तम् आत्मानं निर्माय व्यवहारेण ध्यानोपासनार्चनोपदेशादिना योजयति इति यत् सम्भाव्यते तदपि अत एव इति सम्बन्धः । ननु स्वातन्त्र्ययुक्तं च निर्मायते च इति विरुद्धम् इदम् ?, तत्राह—अद्वयात्मनः संविदेकरूपस्य स्वातन्त्र्यात् हेतोः इदं न न युज्यते, यत् किल अनुमान के द्वारा दिखाया है, इसी कारण विमर्श-शक्तिरूप कर्तृत्व ही इसमें हेतु होता है, क्योंकि यह अपने आप का परामर्श करता है इसलिए परिपूर्ण होने के कारण ठीक वैसा ही नीलत्व पीतत्वादिकों के रूपों में प्रकाशित होता है । अब शङ्का होती है कि सम्भावना अपने को क्यों ज्ञेय बनाती है ?, उत्तर देते हैं—कि प्रकाश से बाहर होकर उसकी स्थिति नहीं होती है वैसा ज्ञेय पदार्थ नहीं रहता है । 'तु' शब्द निश्चित अर्थ के रूप में है । इस प्रकार वहाँ पर युक्तियों को भी कह दिया गया है । और भी अधिक युक्ति देते हैं—यदि ज्ञेय अलग रहता है तो ज्ञातृरूप आत्मा की जो यह ज्ञेयविषयक उन्मुखता है जो कि अपने संवेदन ज्ञान से सिद्ध दिखाई देती है—वह इसकी उन्मुखता नहीं है, इसी कारण कर्ता से विषय भिन्न होने से पारतन्त्र्य उसमें आ जाता है और वह परतन्त्रता तो स्वतन्त्रता से विरुद्ध स्वभाववाली होती है । इस प्रकार स्वातन्त्र्य को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती जबकि यही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है भिन्न वस्तु की ओर उन्मुखता होने से आत्मा अनात्मारूप ही हो जायेगा जबकि यह अभीष्ट नहीं है । और अनात्मारूप होने के कारण जड हुआ वह ज्ञेय के प्रति उन्मुख नहीं होता । प्रसङ्ग से विपरीत होने के कारण यह सिद्ध हुआ कि—स्वयं उन्मुख स्वतन्त्र होकर अपने को ही ज्ञेय बनाता है और केवल नीलादिरूप को ही ज्ञेय नहीं बनाता है अपितु अपने को भी बनाता है, अपनी स्वतन्त्रता से कर्तृत्व स्वभाव को न छोड़ता हुआ ज्ञेयरूप में अपने को निर्माण करके ध्यान, उपासना, अर्चना और उपदेशादि से जोड़ता है यह जो सम्भव है वह भी 'अत एव का सम्बन्ध है।' अब शङ्का करते हैं कि स्वातन्त्र्य से युक्त भी है और निर्माण भी करता है यह तो परस्पर विरुद्ध दिखाई पड़ता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि अद्वैतरूप संवित् मात्र स्वातन्त्र्य हेतु से ऐसा नहीं हो सकता है, यह बात नहीं है अपितु सम्भव हो सकता है, मायामय जगत् में जो अति १. अतिदुर्घटकारित्वमस्यनुत्तरमेव यत् ।

अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११३ मायापदे अतिदुर्घटं प्रतिभाति, तत्सम्पादने यत् अप्रतिहतं स्वातन्त्र्यं तदेव पुनः स्वातन्त्र्यशब्देन दर्शितम् । अत एव इत्यनेन तु विमर्शशक्तिरूपम् इति अपुनरुक्तम् । अथ वा अत एव स्वातन्त्र्यात् इति सामानाधिकरण्येन श्लोकद्वयेन सम्बन्धनीयम् । उदाहरणम् अत्र अर्थे दर्शयति—नीलादि- निर्माणवत् अस्य स्वतन्त्ररूपनिर्माणस्य अप्रसिद्धत्वात् ईश्वरो-भगवान्-आत्मा-नित्यो-विभुः- स्वतन्त्रः इत्येवमादौ हि प्रमातुः, पूजयितुः, ध्यातुः वा पृथग्भूतं तत् प्रमेयम्, पूज्यं, ध्येयं च भाति इति तत् तावत् निर्मितम्, न च अनीश्वररूपम् । एवं हि ईश्वर इति, अनीश्वर इति संकल्प- ध्यानादेः तुल्यत्वं स्यात्, न च एवम्—फलभेदस्य उपलब्धेः इति, तस्मात् स्वातन्त्र्यशून्यता- भासनेन स्वातन्त्र्ययुक्तताभासनेन च यत् इदम् उभयं ज्ञेयम् आत्मरूपमेव परमेश्वरो भासयति तत् विमर्शशक्तिबलात् एव, इति सैव प्रधानम् इति ॥ १५-१६ ॥ ननु प्रकाशबलात् भावव्यवस्था, स च प्रकाशो विमर्शसार इति विमर्शभेदे तदेव तत् इति वक्तुं युक्तम्, ईश्वर आत्मा इत्यादिसंकल्पेषु च निर्मितस्य इदन्तया परामर्शः, स्वातन्त्र्यं तु दुर्घटता दिखाई देती है, इसे सम्पादन करने में अप्रतिहत—जो कभी नहीं रुकनेवाला स्वातन्त्र्य है उसको स्वतन्त्र शब्द से बताया है । 'अत एव' शब्द श्लोक में दिया है इससे विमर्श-शक्ति का स्वरूप दिखलाया गया है अथवा इसका दूसरा भी अर्थ करते हैं कि 'अत एव' स्वातन्त्र्य होने के कारण सामानाधिकरण्यरूप से दोनों श्लोकों के साथ सम्बन्ध करना चाहिए । [ ईशादिसंकल्पैः ] ईश्वरादि के संकल्पों द्वारा उदाहरण अर्थ में बताया जाता है—नीलादि पदार्थों में स्वतन्त्ररूप से निर्माण करने का अभाव होने से स्वयं भगवान् परमेश्वर आत्मा, नित्य, विभु स्वतन्त्र है, इस प्रकार आदि में प्रमाता का, पूजन करनेवाले का, ध्यान करनेवाले का, अलग हुआ वह प्रमेय, पूज्य और ध्येय भासता है यह सब मान लेना है वह ईश्वर का ही रूप है, अनीश्वर का नहीं है । यह ईश्वर है और यह अनीश्वर है इसके संकल्प, ध्यानादि में तो फिर एकता हो जायेगी; ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों के फलों में भेद होता है, इसलिए स्वातन्त्र्यशून्यता का आभास नीलादि में और स्वातन्त्र्य युक्तता का आभास ईश्वरादि में इन दोनों को अपने रूप में परमेश्वर ही भासित करता है और वह भासन विमर्श-शक्ति के कारण ही होता है, इसीसे विमर्श-शक्ति प्रधान है ॥ १५-१६ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्रकाश के सामर्थ्य से भाव-पदार्थों की व्यवस्था होती है और वह प्रकाश का विमर्श ही साररूप है, विमर्श से अभेद होने पर भासन भी विमर्श है ऐसा कहना चाहिये, ईश्वर आत्मा है इसमें जो कुछ निर्मित होगा उसका इदन्तारूप से परामर्श होगा और स्वातन्त्र्य का तो अहं परामर्शरूप से होगा, इदन्ता से निर्मित हुए का अहंतारूप एतदेव स्वतन्त्रत्वमैश्वर्यं बोधरूपता ॥ 'जो परमेश्वर की लोकोत्तर, अति दुर्घट कार्य करने की सामर्थ्य-शक्ति है इसी को स्वतन्त्रत्व, ऐश्वर्य एवं बोधरूपता कहा जाता है ।' १. श्री सोमानन्दपाद ने इसका विवेचन शिवदृष्टि शास्त्र में किया है । 'गच्छतो निस्तरङ्गस्य जलस्यातितरङ्गिताम् । आरम्भे दृष्टिमापात्य तदौन्मुख्यं हि गम्यते ॥' इति यथा— १५

११४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१७ अहंपरामर्शरूपम्, इति निर्मितस्य तद्रूपत्वाभावे कथं स्वातन्त्र्यान्मुक्तत्वम् इति ?, तत् एतत् परिहर्तुमाह— नाहन्तादिपरामर्शभेदादस्याप्यन्यतात्मनः । अहंदृश्यतयैवास्य सृष्टेस्तिङ्वाच्यकर्मवत् ॥ १७ ॥ स्वरूपे भावप्रत्ययः, आदिग्रहणात् आत्मेश्वरादिपरामर्शः, तिङ्ग्रहणं प्रत्ययोपलक्षणम्, कर्मग्रहणं क्रियावाचिसदसत्त्वभूतशक्तिरूपोपलक्षणम् । तत् अयम् अर्थः—अहम् इत्येवंरूपो यः परामर्शः, यच्च ईश्वरः प्रमाता आत्मा शिव इत्यादिः अनन्तप्रकारः परामर्शः, तस्य यद्यपि भेदोऽन्यान्यरूपता, तथापि तद्भेदात् हेतोः अस्य आत्मनो निर्मातृरूपस्य अहंपरामर्शमयस्य निर्मेयरूपस्य च ईश्वरादिपरामर्शास्पदस्य यो भेदः शङ्कितः, स न युक्तः, यत ईश्वर इत्यपि यः परामर्श में अभाव रहने पर कैसे वह स्वातन्त्र्य से युक्त हुआ ? इस शङ्का को दूर करने के लिए अब कहते हैं— अहन्ता और इदन्तादि परामर्श के भेद से इस आत्मा में भेद नहीं होता है। जैसे अहं परामर्श से ही सृष्टि में 'तिङ्' वाच्य का कर्म होता है ॥ १७ ॥ अहं इस अभिन्न प्रकाशरूप अव्यय में भाव प्रत्यय 'तल्' करके अहन्तारूप बनता है वही प्रकाश का अपना निजी लक्षण है, 'आदि' शब्द जो श्लोक में लिया गया है इससे आत्मा ईश्वरादि का परामर्श ग्रहण करना चाहिए, 'तिङ्' शब्द प्रत्यय का उपलक्षण करता है, कर्म के ग्रहण से क्रियावाची सद्रूप और असद्रूप शक्ति का उपलक्षण है। सब का सारांश यह है कि अहं ऐसा जो परामर्श है और जो ईश्वर प्रमाता है एवं आत्मा शिव है इत्यादि अनन्त प्रकार के जितने भी परामर्श हैं और उन अनन्त परामर्श के जितने भी भिन्न-भिन्नरूपों में भेद प्रतीत होते हैं, इन परामर्शों में भेद हेतु से अहंपरामर्शमय निर्माता की अपेक्षा से निर्मेयरूप ईश्वरादि परामर्श के आश्रयभूत परामर्श के जिस भेद की शङ्का की है—वह ठीक नहीं है, क्योंकि मैं 'बोधस्य स्वात्मनिष्ठस्य रचनां प्रति निर्वृत्तिः । तदास्थाप्रविकासो यस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते ॥' इति । तथा लोकव्यवहारोऽपि । 'गोस्तनात्पातः क्षीरे विकासस्तत एव हि । न च न क्षीरमित्येष व्यपदेशोऽस्ति तत्क्षणम् ॥' [ अहं परामर्श ही स्वातन्त्र्य है इदंभाव का परामर्श निर्मित रचना है। निर्मित परामर्श का तो अहं परामर्श में अभाव रहने के कारण परम स्वातन्त्र्य 'इदं' परामर्श कैसे बनेगा ? इसके समाधानमें उत्तर यह है ] कि अकुत्सित [ गर्हितता से रहित ] विषय को हो उन्मुखता मानी है उसे दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं। जैसे निस्तरंग जल का अतितरंग में परिणत हो जाने पर जलगत तरंग में सर्वप्रथम सूक्ष्म कल्पना उठती है वही उन्मुखता है, और हाथ की मुट्ठी बाँधने से पूर्व सुसूक्ष्म खिंचाव-नसोंका देखा जाता है उसी प्रकार अपने स्वरूप में स्थित बोधरूप की विश्व रचना के लिए जो सर्व प्रथम विकास प्रवृत्ति का प्रारम्भ होना, वही उन्मुखता कही जाती है । गौ के स्तन से निकला हुआ दूध विकार को ही प्राप्त हो जाता है और उस समय यह दुग्ध है—ऐसा क्या बोध नहीं होता है ? जब परामर्श ऐक्य होता है तब सर्वदा ऐक्य हो ही जाता है।

अ.-१, आ.-५, का-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११५ परामर्शः, स ईशनशीले ज्ञातृत्वकर्तृत्वतत्त्वे विश्राम्यति, ज्ञातृत्वादि च ज्ञानादौ, स्वातन्त्र्यम् अनन्यमुखप्रेक्षित्त्वम् अविच्छिन्नज्ञानादिशक्तियोगः, अविच्छेदश्च जानामि करोमि इति अस्मदर्थ- विश्रान्तिः इति । अस्य ईश्वरस्य आत्मनः सृष्टेः सृज्यमानस्य अहंविमर्शनोयत्वमेव । सृष्टेः इति वा हेतौ पञ्चमी । अस्य ईश्वरस्य यतः ईश्वरादिसंकल्पेषु अपि अहंपरामर्शनयोग्यस्यैव सृष्टिः । अर्हे कृत्यः । यथा क्रियाकारकसमुच्चयविकल्पादिशक्तयो यथास्वं तिङ् तृतीयादि च वादिप्रयोगा- वसेयपरामर्शपरमार्थः पाकः कर्ता समुच्चयो विकल्पः इत्यादिशब्दैः अभिधीयमानाः सत्त्वभावम् आपादिता अपि, पचति चैत्रेण च वा इत्येवंभूते मूलपरामर्शे विश्राम्यन्ति । अन्यथा तु ताः प्रतीता नैव भवेयुः । तद्वत् अत्रापि । एतदुक्तं भवति—परामर्शो नाम विश्रान्तिस्थानम्, पार्यन्तिकमेव तच्च पारमार्थिकम्, अह- मित्येवंरूपमेव । मध्यविश्रान्तिपदं तु यत् वृक्षमूलस्थानीयं ग्रामगमने तदपेक्षया सृष्टत्वम् उच्यते,— अनेन नीलादेः अपि, इदं नीलम् इति मध्यपरामर्शोऽपि मूलपरामर्शे अहमित्येव विश्रान्तेः आत्म- इति को विरोधः । मयत्वम् उपपादितम् एव । नीलम् इदम् अहं वेद्मि इति, अहं प्रकाशे इति हि इयत्तत्त्वम् । यथोक्तम् ‘इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढस्तु नीलादिविमर्शात् एव अर्थक्रियादिपरितोषा- भि मानी, इति नीलादेः स्वातन्त्र्यनिर्मुक्तत्वम् उक्तम् । आत्मादौ तु तन्मूलपरामर्शविश्रान्तिमन्तरेण ईश्वर हूँ यह परामर्श भी सामर्थ्यशाली ज्ञातृत्व-कर्तृत्व में विश्रान्ति लेता है, और ज्ञातृत्वादि परामर्श ज्ञान में विश्रान्त होता है, स्वातन्त्र्यरूप किसी की भी अपेक्षा न रखनेवाला होता है जिसका अविच्छिन्न ज्ञानादि शक्तियों से सम्बन्ध है, और अविच्छेद 'जानाति'—'करोमि'रूप 'अस्मत्' शब्द के अर्थ में ही विश्रान्त होता है । इस विश्वरूप अपने आत्मा की सृष्टि में सृज्यमानरूप पदार्थों की अहन्ता शब्द से ही विमर्शन के योग्य है । सृष्टि करने के कारण हेतु में पञ्चमी विभक्ति है । क्योंकि इस ईश्वर की ईश्वरादि संकल्पों में भी जबकि अहंपरामर्श के योग्य ही सृष्टि होती है । 'मृष्यतया' इसमें अहन्-योग्यता अर्थ में कृत्यप्रत्यय हुआ है । क्रिया कारक समुच्चय विकल्प शक्तियाँ यथाक्रम तिङ् और तृतीयादि विभक्ति वादी के प्रयोग से जानने योग्य सिद्ध परामर्श [सत्त्वभूत] पाक हो रहा है और कोई कर्ता कर रहा है जो विकल्प शब्दों से कहे गये सत्त्वभाव को कहनेवाला पचाता है अथवा चैत्र से पचाया जाता है इत्यादि मूल परामर्श में विश्रान्त होते हैं । अन्यथा वे शक्तियाँ प्रतीत ही नहीं होंगी । उसी प्रकार यहाँ पर भी है । इससे यह कहा जाता है कि परामर्श को ही विश्रान्ति का स्थान माना जाता है और वह अन्तिम पारमार्थिक तत्त्व है तथा उसका स्वरूप अहम् है । मध्य में विश्राम लेनेवाला जोकि गाँव को जाते समय वृक्ष के मूल स्थान में बैठना-उठना इत्यादि प्रमाता की अपेक्षा से ही बनाया गया कहा जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं होगा । इससे नीलादि परामर्श में भी अहन्तारूप मूल परामर्श में ही विश्रान्त है, इसी कारण आत्ममयत्व कहा है । मैं इसको नील के रूप में जानता हूँ, मैं प्रकाशित होता हूँ यही तो सारतत्त्व है । जिसके लिए कारिका में कहा है—'इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढ प्राणी तो नीलादि के विमर्श से ही अर्थक्रियादि परामर्श से संतुष्ट होकर उसका अभिमानी हो जाता है । इसलिए नीलादि को स्वतन्त्रता में सर्वथा भिन्न ही माना गया है । आत्मा आदि के मूल परामर्श में तो बिना विश्रान्त हुए प्रतीति की परिसमाप्ति मानते हैं और अर्थक्रिया को

११६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१८ प्रतीतिपरिसमाप्तिम् अर्थक्रियां च मूढोऽपि न अभिमन्यत इति तस्य निर्मितौ अपि अनुज्झितस्वा- तन्त्र्यम् उक्तम् ॥ १७ ॥ ननु एवं विश्वपरामर्शानाम् अहम् इत्येव विशुद्धैकपरामर्शविश्रान्तिरेव तत्त्वम् तत् कथम् इदम् उच्यते—ज्ञानस्मृत्यादिका अस्य शक्तय इति, ज्ञानस्य च निर्णयसंशयभेदा नीलादीनां च वैचित्र्यम् ? इति आशङ्कायां परिहारमाह— मायाशक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा । कथिता ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥ १८ ॥ अनुपपन्नम् अवभासनं माया इति उच्यते, ततश्च भिन्नं प्रकाशात् सर्वम् अवभासजातं माया, तत्र च चित्तत्त्वस्यैव स्वातन्त्र्यं मायाशक्तिः, तया भिन्नं यत् संवेद्यं प्रमातृश्च अन्योन्यतश्च, मायाशक्त्या भिन्नेन प्रमातुः अन्योन्यतो वेद्याच्च करणवर्गेण यत् संवेद्यं स एव गोचरो— विश्रान्तिपदं यस्याः तादृशी सती सैव प्रत्यवमर्शात्मा चितिः परावाग्रूपा, ज्ञानम् इति, संकल्प इति, अध्यवसाय इति च उच्यते, आदिग्रहणात् संशयः स्मृतिः इत्यादि । तथाहि—यत् इन्द्रियेण स्फुटग्राहिणा बाह्येन विषयेण स्फुटेन च नियन्त्रितं संवित्तत्त्वं यत् ज्ञानम् । मनसा विषयेण च अस्फुटेन संकल्पः । बुद्ध्या विषयेण च विषयत्वपर्यन्तभाजा अध्यवसायो निश्चयः । मूढ लोग भी नहीं मानते, इसलिए उसके निर्माण में भी स्वातन्त्र्य को नहीं छोड़ता हुआ कहा गया है ॥ १७ ॥ अब शङ्का करते हैं कि विश्व के समस्त परामर्शों का 'अहम्' इस विशुद्ध परामर्श मात्र में ही विश्रान्ति है तो फिर यह कैसे कहते हैं कि इसकी ज्ञानस्मृत्यादि शक्तियाँ हैं तथा ज्ञान के निर्णय और संशय भेद हैं एवं नीलादि पदार्थों में चित्र-वैचित्र्य रहता है ? यह नहीं बन सकता है इस आशंका का परिहार करते हैं— विभु परमेश्वर की माया-शक्ति से विमर्श-शक्ति ही भिन्न-भिन्न संवेद्य के विषय करनेवाली, ज्ञान-संकल्प-अध्यवसायादि नामों से कही गयी है ॥ १८ ॥ जो अवभास ठीक न बैठ सकें उसी को तो माया कहा जाता है, इसलिए प्रकाश से भिन्न सभी अवभास समूह माया है और चिदात्मा की स्वतन्त्रता ही माया-शक्ति है, उस माया-शक्ति से भिन्न जो संवेद्य है और प्रमाता के अन्योऽन्य सम्पर्क से और माया-शक्ति से प्रमाता के भिन्न होने से परस्पर वेद्य से भी और करण-वर्ग से जो ज्ञेय होता है वही उसका विषय है—उस संवेद्य में जिसकी विश्रान्ति होती है वैसी ही परामर्शात्मा चिति-शक्ति है वही परावाणी, ज्ञान, अध्यवसाय और संकल्पादि से कही जाती है। आदि ग्रहण से संशय, स्मृति से भी कही जाती है। क्योंकि बाह्य-इन्द्रियों द्वारा स्पष्टरूप से विषय का बोध होना ही ज्ञान है और मन द्वारा विषय का अस्फुटरूप से बोध होना संकल्प कहलाता है। बुद्धि से विषय का दृढरूप से निश्चय ही अध्यव- १. परमेश्वर विभु ही प्रमाता हैं वे परमेश्वर ही तो माया-शक्ति से संकुचित होकर ग्राहक जैसे हो जाते हैं। उसी प्रकार विमर्श-शक्ति भी माया-शक्ति के द्वारा वेद्य विषय के उपराग से संकुचित हो जाने पर ज्ञान-स्मरण संकल्पादि रूपों में परिणत हो जाती है। वस्तुतः विमर्श-शक्ति से भिन्न दूसरा कुछ भी ज्ञानादि नहीं है।

अ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [११७ विषयस्य च यत् भिन्नत्वं बहिरन्तःकरणानां च तत्प्रकाशाभेदात् अनुपपन्नं चित्तत्त्वेन आभास्यते, इति भेदे यतो विश्रान्तिः, न तु भेदस्य अभेदे ईश्वरसदाशिवादिवत्, ततो ज्ञानसंकल्पादयो भिन्नाः तस्य अप्रध्वस्तस्वस्वभावाभेदस्य संवित्तत्त्वस्य अनुसंधातुः शक्तय इति उक्ताः, संशया- दयश्च भिन्ना नीलादिवैचित्र्यं च इति सर्वम् अखण्डितम् ॥ १८ ॥ ननु प्रत्यवमर्शात्मकत्वं चितिशक्तेः संकल्पस्मरणादिशक्तिषु सविकल्पात्मिकासु भवतु । या तु निर्विकल्परूपा साक्षात्कारणलक्षणा अनुभवशक्तिः, तत्र कथम् । प्रत्यवमर्शो हि अभिलापभेद- योजनामयः, अभिलापविशेषयोजना च संकेतस्मरणम् अपेक्षते । तच्च संस्कारप्रबोधम् । सोऽपि तादृशदृशम्, इति एवं प्रथमसमये कथम् अभिलापयोगः ?, इति परस्य व्यामोहम् अपोह- यितुमाह— साक्षात्कारक्षणेऽप्यस्ति विमर्शः कथमन्थथा । धावनाद्युपपद्येत प्रतिसन्धानवर्जितम् ॥ १९ ॥ साय है। अन्तःकरणों में उस प्रकाश से अभिन्नता होने के कारण भेद नहीं बैठता, इसी कारण भेद का अभेद में जैसे—ईश्वर का सदाशिव में होता है, इसलिए ज्ञान संकल्पादि भिन्न होते हैं, नहीं विनष्ट हुए प्राण पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव में संवित्तत्त्व का अनुसन्धान करनेवाले की शक्तियाँ कही गयी हैं, इसलिए संशय, स्मृति, विकल्पादि और नीलादि भिन्न-भिन्न रूपों में रहने- वाले वैचित्र्य भाव सब के सब परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहते हैं ॥ १८ ॥ अब प्रश्न उठता है कि जो प्रत्यवमर्शात्मकत्व चिदात्मा की शक्ति है वह संकल्प-स्मरणादि के सविकल्पों में भले ही रहे, किन्तु निर्विकल्परूप जो साक्षात्कार करनेवाली अनुभव-शक्ति है उसमें प्रत्यवमर्शात्मकत्व किस तरह से है। क्योंकि प्रत्यवमर्श अभिलाप के भेद की योजना से युक्त होता है अभिलाप विशेष की योजना संकेत स्मरण की अपेक्षा रखती है और वह संकेत स्मरण संस्कार के जगने पर होता है। वह भी वैसी दृष्टि होने पर होता है, इस प्रकार साक्षात्कार के समय में कैसे अभिलाप का योग बैठ सकता है ? यह जो दूसरों को मोह-भ्रम हो रहा है उसे दूर करने के लिए कहते हैं— साक्षात्कार के समय में भी विमर्श रहता ही है, नहीं तो, प्रतिसन्धान से रहित धावन- वाचनादि क्रिया में कैसे परामर्श होता ॥ १९ ॥ १. अशुद्ध प्रमाता । २. पशु, जीव, प्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टकरूप पाश में बद्ध जाने के कारण सीमितरूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही इच्छा करता है। जानता है और करता है पतिप्रमाता असीमितरूप में सब कुछ एक साथ ही इच्छा करता है, जानता है और करता है फिर भी पशुप्रमाता की परमात्मा में ही क्रिया शीलता अवस्थित रहती है। पशुप्रमाता की अवस्थिति अपने सीमित स्वरूप में ही है । चिति- सत्ता पर ही दोनों रूपों में होनेवाली क्रिया शीलता आधार रखती है । ३. प्रत्यक्ष ज्ञान में भी द्रष्टा को दृश्य का सूक्ष्मरूप में प्रत्यवमर्श होता है, वाचन, धावन इत्यादि में शीघ्र क्रिया के द्वारा उन-उन दृश्यमान् को ग्रहण करने की इच्छा और छोड़ने की इच्छा अनुसंधान से ही होगी ।

११८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ इह तावत् चैतन्यस्य आत्मभूतोऽङ्गुलिनिर्देशादिप्रख्योऽभिलापयोगः, अन्यथा बालस्य प्रथमं व्यवहारे दृश्यमाने व्युत्पत्तिरेव न स्यात् । निर्विकल्पविज्ञानपरम्परया हि तं शब्दं शृणोति, तमर्थं पुरः पश्यति, पुनः तद्विविक्तं भूमलं पश्यति इति, घटम् आनय—नय—इति व्यवहारात् कथम् अस्य अयम् अर्थो हृदि परिस्फुरेत्, घट इति, इदमानय इति, इदं नय इति, इदमिति योजनाप्राणो हि अयमर्थः, योजना च विकल्पव्यापारः । अथ बालस्य प्राग्जन्मानुभूतसंकेत- स्मृतेः एवम्, तथापि संकेतकाले स शब्दो विषयत्वेन इदं भावेन अप्रत्यवमृश्यमानत्वात् भेदात् प्रच्युत्य निर्भासमानो विज्ञानशरीरविश्रान्तौकृतो वाचक इति भवति, तत् विज्ञानस्य स्वरूपं चेत् भाति, तत् अभिलापमयमेव इति, यथा विषयस्य सुखरूपत्वाभावेऽपि ज्ञानं सुखात्मकं भाति तथा मा भूत् अभिलापात्मा रूपादिः विषयः, तथापि विज्ञानं तदात्मकं अवभासिष्यते । अत्र तु दर्शने विषयस्यापि विमर्शमयत्वात् अभिलापमयत्वमेव वस्तुतः, स्तैमित्याद्यवस्थापि यदि न परामर्शमयी तर्हि अस्यां विकल्पात्मकप्रमातृव्यापारानुल्लासात् सम्भवः शपथपरमार्थ एव, निश्चित मायाजन्य विमर्श में चैतन्य का स्वरूपभूत अङ्गुलिनिर्देश के समान अभिलाप- योग रहता है, नहीं तो बालक को प्रथम व्यवहारदृष्टि में व्युत्पत्ति [ शक्तिग्रह ] ही नहीं होगी । क्योंकि बालक निर्विकल्प विज्ञान परम्परा से ही शब्द को सुनता हुआ, उस अर्थ को आगे की ओर सामने देखता है, फिर अर्थशून्य भूतल को देखता है, इसके बाद घट लावो और घट ले जावो—इस व्यवहार से बालक को इसका अर्थ हृदय में प्रतिफलित नहीं होगा, घट का ज्ञान और उसका ले आना फिर उसका ले जाना इत्यादि योजना में मिले रहना ही उसका अर्थ है और योजना ही विकल्प का व्यापार कहलाती है। यदि यह कहें कि बालक को पूर्वजन्म की स्मृति से ऐसा होता है—तो भी संकेत काल में विषयरूप से या इदंभाव से प्रत्यवमर्शन नहीं होने के कारण भेद से हटकर भासित होता हुआ विज्ञान शरीर में विश्राम लेकर यह शब्द वाचक होता है वही विज्ञान का स्वरूप है ऐसा यदि कहो, तो वह अभिलाप ही हो गया, [ जैसे माला-चन्दन-वनिता आदि विषयक सुख साधन के सुखरूपता का अभाव रहने पर भी ज्ञान तो सुखरूप से भासता है उसी प्रकार अभिलापभूत रूपादि विषयक न हो तो भी ज्ञान उस रूपत्त्व का भासित होगा ] इस प्रकार शब्द को आरोपित करता है जैसे विषय का सूक्ष्मरूप न होने पर भी ज्ञान सूक्ष्म होता है वैसा अभिलापरूपादि विषय सुखरूप नहीं है तब भी अभिला- पात्मक विज्ञान को तो अवभासित ही करेगा। हमारे स्वतन्त्र शैवाद्वैत दर्शन में तो विषय भी विमर्शमय होने के कारण वस्तुतः अभिलापमय ही होते हैं, सकल विकल्पों के क्षोभ से शून्य रहना आदि अवस्था भी परामर्शमयी नहीं रहती, तो इस अवस्था में विकल्परूप प्रमाता का १. सकल विकल्प के क्षोभ से रहित हो जाना ही स्तिमित कहलाता है । बाह्य ओर आन्तर से प्रसार का रुक जाना स्तैमित्य अर्थात् चांचल्य का अभाव हो जाना है । २. प्रत्यक्ष विषय के साधन में इन्द्रियाँ कल्पना से रहित हो जाती है — संहृत्य सर्वतश्चिन्तां स्तिमितेनान्तरात्मना । स्थितोऽपि चक्षुषा रूपमीक्षते साक्षजा मतिः ॥ पुनर्विकल्पयन्किंचिदासीन्मे कल्पनेदृशी । इति वेत्ति न पूर्वोक्तावस्थायामिन्द्रियाद्गतौ ॥

अ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११९ स्मरणं च न स्यात्, रूपविषयाध्यवसायी हि यदि विकल्प उदियात् किमन्यत्, सर्वचिन्तासंहरणेन स्तैमित्यं नाम न स्यात् इति, तत्रापि अस्ति अन्तः परामर्शः सकलेन च शब्दग्रामेण, शब्दनं हि सहन्ते वस्तूनि । तत्र च नियतशब्दयोजनं क्रियते । तथाहि—बालस्य पुरतः पिण्डे सहजो यः परामर्शः, अहम् इत्यविच्छेदेन इदम् इति विच्छेदेन वा तत्पृष्ठे एव गौर इति गौः इति वा शब्द आरोप्यते, सोऽपि अभ्यासात् प्रमातृमयी- भवति, तत्पृष्ठे च अन्यः शुक्ल इति बलीवर्द इति, एवमन्यत् इति संकेततत्त्वम् । तस्मात् अस्ति साक्षात्कारे प्रत्यवमर्शः । अपिशब्दस्य अयमाशयः—इह साक्षात्कारो वस्तुतः 'पश्यामि' इत्येवं- भूतविकल्पनव्यापारपर्यन्त एव । विकल्पो हि प्रत्यक्षस्य व्यापार, इति परोऽपि मन्यते । न च व्यापारः तद्वतो भिन्नो युक्तः, तत्स्वरूपभूतो हि सः । भवतु वा क्षणमात्रस्वभावः साक्षात्कारः तत्रापि अस्ति विमर्शः, अवश्यं चैतत्—अन्यथा इति यदि स न स्यात् एकाभिसंधानेन जवात् गच्छन् त्वरितं, च वर्णान् पठन्, द्रुतं च मन्त्रपुस्तकं वाचयन्, न अभिमतमेव गच्छेत्, उच्चारयेत्, व्यापार न होने से किसी की कल्पना भी नहीं हो सकती है और स्मरण भी नहीं हो सकता है, रूपविषयक ज्ञान ही यदि विकल्परूप से उदित हो तो फिर क्या कहना है, सब प्रकार की चिन्ता का संहार करके शान्त चुप-चाप बैठे रहना भी तो नहीं बनता है; क्योंकि वहाँ पर भी अन्तःकरण में परामर्श रहता ही है और सम्पूर्ण शब्दसमूह से विमर्श करते रहना सभी वस्तु-पदार्थ सह लेते हैं अब उसमें नियत शब्दों की योजना बनाते हैं, इसीको दिखाते हैं—जैसे कि बालक की अभिमुख अवस्थित वस्तु में सहज जो परामर्श होता है 'अहम्' इस अनवच्छिन्न प्रकाशरूप से, 'इदम्' इस परिच्छेद-परिमितरूप से भासता है अथवा उसी के पश्चात् ही 'अहम्' इस रूप में प्रकाशित होता है, गौ 'इदम्' इस रूप में भासता है—ऐसा शब्द का आरोप होता है, वह भी अभ्यास द्वारा प्रमाता से युक्त होकर होता है और उसी के पश्चात् दूसरा शुक्ल है, यह बैल है, इस प्रकार दूसरा ऐसा संकेततत्त्व है। इसलिए साक्षात्कार होने पर प्रत्यवमर्श ज्ञान होता है। 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि यहाँ पर साक्षात्कार परमार्थतः 'पश्यामि' मैं देखता हूँ—ऐसा विकल्प करनेवाले का व्यापार पर्यन्त ही रहता है। क्योंकि विकल्प ही प्रत्यक्ष का व्यापार माना जाता है, ऐसा सौगतादि का मानना है । व्यापार कोई व्यापारवाले से भिन्न नहीं होता और ऐसा मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वह तो उसका स्वरूपभूत होकर रहता है। भले ही क्षणभर रहे, क्षणमात्र स्वभाववाला साक्षात्कार होकर रहे किन्तु उसमें भी विमर्श ज्ञान रहता है और यह आवश्यक भी है—यदि वह उसमें नहीं रहेगा, तो एक अनुसन्धान से वेगपूर्वक गमन करते हुए, त्वरित गति से वर्णों को पढ़ते हुए, शीघ्रता से मन्त्र-पुस्तक को बाँचते हुए, अपने अभीष्ट वस्तु को भी नहीं नित्य-स्तिमित अन्तरात्मा के माध्यम से चारो ओर से चिन्ता को समेट कर स्थिर रहता हुआ भी चक्षु-इन्द्रिय के द्वारा रूप ग्रहण कर लेता है। वही प्रत्यक्ष बुद्धि कही जाती है। मेरी कुछ ऐसी ही कल्पना थी फिर ऐसा विकल्प करता हुआ, जो जानता है उसकी पूर्वोक्त अवस्था में इन्द्रियों की गति नहीं देखी जाती । १. मैं अपने में स्थिर हो गया हूँ। इस स्थिति में संकल्प, विकल्प एवं स्मरण इत्यादि का अपने आप अवरोध हो जाता है।

१२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ वाचयेत् वा । तथाहि—तस्मिन् देशे ज्ञानम् आचिक्रमिषा-आक्रमणम्-आक्रान्तता-ज्ञानं-प्रयोजना- न्तरानुसंधानम्-तित्यक्षा-देशान्तरानुसंधिः, तत्रापि आचिक्रमिषा इत्यादिना संयोजनवियोजनरूपेण परामर्शेन विना अभिमतदेशावाप्तिः कथं भवेत् । एवं त्वरितोद्ग्रहणवाचनादौ मन्तव्यम् । तत्र विशेषतः स्थानकरणाक्रमणादियोगः । अत्र च यतः पश्चाद्भाविस्थूलविकल्पकल्पना न संवेद्यते, तत एव त्वरितत्वम् इति सूक्ष्मेण प्रत्यवमर्शेन संवर्तितशब्दभावनामयेन भाव्यमेव । संवर्तिता हि शब्दभावना प्रसारणेन विवर्त्यमाना—स्थूलो विकल्पः यथा इदमित्यस्य प्रसारणा घटः शुक्ल इत्यादिः, तस्यापि पृथुबुध्नोदराकारः शुक्लत्वजातियुक्तगुणसमवायी इत्यादिः । धावु गतिशुद्धौ इति पाठात् धाविस्त्वरितगतौ स्वशक्तिवशात् वर्तत इति ॥ १९ ॥ भवतु एवं सूक्ष्मो विमर्शः प्रकाशशरीरावेशी, यत्र तु स्थूलत्वेन विकल्परूपता स्फुटा, तत्र शब्दो नीलादिवत् एव पृथक् प्रतिभासते—नीलम् इदम् इति, स कथं प्रकाशस्वरूपात् अपृथग्भूतः प्राप्त कर सकेगा, अथवा उच्चारण एवं बाँच भी नहीं पायेंगे । देखिये—उस देश में ज्ञान है आक्रमण करने की इच्छा का नया आक्रमण, आक्रान्त का ज्ञान होना दूसरे प्रयोजन का अनु- सन्धान करना है, त्याग करने की इच्छा देशान्तर की इच्छा का अनुसन्धान करना है, उसमें भी 'आचिक्रमिषा' इत्यादि वाक्यों से संयोजन-वियोजनरूप परामर्श बिना अभिमत देश की प्राप्ति कैसे होगी। इस प्रकार शीघ्रगति में ग्रहण करने और बाँचने इत्यादि में मानना होगा। यहाँ पर विशेष- रूप से स्थान-मूर्ध, ताल्वादि, करण, आक्रमण आदि का योग रहता है । [ यदि सर्वत्र नीलादि ] ज्ञान में शब्द है तो किञ्चित भी निर्विकल्पक सिद्ध हुआ, वैसा ही क्यों अवतरिका में दिया है ? [ या तु निर्विकल्पक रूपा ] इत्यादि वाक्य से जो यह निर्विकल्परूप है इत्यादि कहा जाता है, वह तो दूसरे का ही ज्ञान है, उसके न रहने पर भी हमारा कुछ भी अनिष्ट होनेवाला नहीं होगा देखिये—इसीको मैं अब भली भाँति जानता हूँ एवं मैं करता हूँ, इसका यही संकुचित स्वरूप है जबकि नियति, काल, राग, अशुद्ध विद्या, कला, माया उन छः कंचुकों से भरा हुआ, प्रकाश स्वभाव उस पुरुष नाम धारी माया प्रमाता का है । 'सब कुछ देखता हूँ इस प्रकार का बुद्धि- इन्द्रिय विशेष व्यापार वर्ग में जो अनुयायी है' मैं जानता हूँ, व्यापाररूप उसमें जो करण सामान्य रूप अशुद्ध विद्यातत्त्व है वह किञ्चित् भी स्वतन्त्र नहीं है अपि तु वह तो परमेश्वर की ही शक्ति है । जब कि उसके पीछे होनेवाली भावी स्थूल विकल्प की कल्पना ज्ञात नहीं होती है, इसलिए त्वरितत्त्व यह सूक्ष्म विमर्श से संवर्तित शब्द भावना से युक्त होना चाहिए । वह संवर्तिता ही शब्दता है जब कि प्रसारण = फैलने से स्थूल-विकल्प बन जाती है, जैसे 'इदम्' इसका फैलाव घट शुक्ल है इत्यादि रूपों में हो जाता है, उस घटादि का भी फैलाव पृथुबुध्नोदर आकार शुक्लत्व जाति से युक्त होकर गुण-समवायरूप हो जाना इत्यादि । यहाँ पर धावु-धातु गति की शक्ति अर्थ में पढ़ी गयी है । इसलिए धावु धातु त्वरित गति में अपनी शक्ति सामर्थ्य से प्रवृत्त होती है ॥ १९ ॥ ठीक है, इस प्रकार सूक्ष्म विमर्श प्रकाश शरीर में आविष्ट होकर रहता है । जहाँ पर स्थूल [अध्यवसाय] रूप से विकल्परूपता प्रस्फुट होती है वहाँ पर शब्द नीलादि पदार्थ की भाँति ही भिन्नरूप में प्रतिभासित होने लगता है—जैसा कि यह नील है, वह प्रकाश स्वरूप से अभिन्नरूप १. मूर्ध, ताल्वादि स्थान और जिह्वाग्रादि भाग करणेन्द्रिय इन दोनों के परस्पर संस्पर्श हो जाने पर ही वर्णों की निष्पत्ति होती है ।

अ.-१, आ.-५, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२१ स्यात्, शब्दात्मा च विमर्शः, स च तत्र मायात्मके भेदपदेऽपि प्रकाशापृथग्भूतो भवद्भिः इष्टः, तत् एतत् कथं प्रतिपत्तव्यम् ?, इत्याशङ्कयाह— घटोऽयमित्यध्यवसा नामरूपातिरेकिणी । परेशशक्तिरात्मैव भासते न त्विदन्तया ॥ २० ॥ केन एतत् उक्तम्—घट इति यः स्थूलः शब्दः स प्रकाशजीवितस्वभावो विमर्श इति । सोऽपि हि स्थूलः शब्दोऽर्थवत् पृथग्भूत एव भाति । तौ नामरूपलक्षणौ शब्दार्थौ एकरूपतया ‘सोऽयम्’ इत्येवंरूपत्वेन परामृशन्ती अध्यवसायशक्तिः या, सा परमेश्वरशक्तिः विमर्शरूपा आत्मवत् एव अहमित्यनवच्छिन्नत्वेन भाति, न तु कदाचित् इदन्तया—विच्छिन्नत्वेन भाति, विच्छिन्नत्वेन अवभासे परप्रतिष्ठत्वात् पुनर्विमर्शान्तरेण भाव्यम्, तत्रापि एवम् इति अनवस्था, अतो नीलस्य प्रकाशनमेव न स्यात्—प्रतिष्ठालाभाभावात् । तस्मात् ‘सर्व एव विमर्शः प्रकाशात् अविच्छिन्न एव’ इति। अध्यवसा इति, ‘आतश्चोपसर्गे ( पा० अ० ३-३-१६ ) इत्यङन्तः स्त्रियाम् ॥ २० ॥ में कैसे भासित होगा, और वह शब्द विमर्शंरूप में भासता है तो इसका मायात्मक भेदवाले संसार में भी प्रकाश से अभिन्नरूप में होकर भासना आपको भी अभीष्ट है, इसको कैसे जानना चाहिए ? इस प्रकार आशंका कर उत्तर देते हैं— वही यह घट है ऐसा जो अध्यवसाय [ज्ञान] नाम [घट] एवं रूप [पृथुबुध्नोदर आकार] से व्यतिरिक्त है। वही परमेश्वरकी शक्ति आत्मा के समान ‘अहम्’ इस अनवच्छिन्नरूप से भासती है ‘इदम्’ परिच्छिन्नरूप से नहीं भासती ॥ २० ॥ यह किसने कहा है—जो यह ‘घट’ स्थूल शब्द है वह प्रकाश जीवित स्वभाववाला विमर्श है। वह भी स्थूल शब्द के अर्थ की भाँति भिन्नरूप से ही भासता है उन नाम एवं रूप लक्षणवाले शब्दार्थ को जो एक [सोऽयम्] रूप से परामर्श न करनेवाली अध्यवसाय-शक्ति है, वह विमर्शरूप परमेश्वर की शक्ति आत्मा की जैसी अभेदभावपूर्वक ‘अहम्’ अनवच्छिन्नरूप से भासती है, वह कभी भी ‘इदन्तया’ अर्थात् विच्छिन्नरूप से नहीं भासती है। विच्छिन्नरूप से आभासित होनेपर तो अन्य प्रकाश की अपेक्षा रखनी पड़ती है दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला अप्रतिष्ठित कहलाता है, विच्छिन्न स्वतः प्रकाशित न होने के कारण अप्रतिष्ठित है, विमर्शं के बिना होना असम्भव ही है वह भी किसी अन्य से, इस प्रकार अनवस्था हो जायेगी, इसलिए नील का प्रकाशन ही नहीं होगा, क्योंकि प्रतिष्ठान = सभी संवेदन ज्ञानों को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नील में नहीं है। इसी कारण सब विमर्श प्रकाश से अविच्छिन्न ही है। ‘अध्यवसा’ यह प्रयोग ‘आतश्चोपसर्गे’ [३-३-१०६] इस पाणिनीय सूत्र के द्वारा ‘अङ’ स्त्रीलिङ की विवक्षा में ‘टाप्’ होकर निष्पन्न हुआ है ॥ २० ॥ १. अध्यवसायरूप ज्ञान ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकाशमान होनेवाले [ घटादि ] नाम एवं रूपादि से व्यतिरिक्त चिति-शक्ति ही आत्मरूप में अभिन्न होकर भासती है। १६

१२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-२१ ननु एवं सर्वस्यैव ज्ञानकलापस्य अहमित्येव प्रतिष्ठाने वेद्यभूमिसंस्पर्शो नास्ति वेद्यभुवि च देशकालयोगः न तु वेदकांशे देशकालयोगाभावे च यत् इदं ज्ञानानां स्वांशापेक्षया ज्ञानान्तरापेक्षया च सक्रमत्वं लक्ष्यते तत् कथं स्यात्, क्रमाभावे च एकत्वमेव वस्तुतो भवेत्, ततश्च 'ज्ञानस्मृत्यादि- शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' इति यत् उक्तं तत् कथं निर्वहेत् ? इत्याशङ्कां शमयन् पूर्वोक्तमुप- संहरति— केवलं भिन्नसंवेद्यदेशकालानुरोधतः । ज्ञानस्मृत्यवसायादि सक्रमं प्रतिभासते ॥ २१ ॥ सत्यम् एवम्—अक्रममेव संवित्तत्त्वम्, किन्तु स्वशक्तिवशात् भिन्नत्वेन भासितानि यानि वेद्यानि तेषां मूर्तिभेदकृतो यो दूरादूरवैतत्यावैतत्यादिः देशः, क्रियाभेदकृतश्च चिरशीघ्रक्रमादिरूपः कालः, तौ अनुरुध्य—च्छायामात्रेण अवलम्ब्य, ज्ञान-स्मरणायध्यवसायानां स्वांशा इव भान्ति, निरंशानामपि तद्भासमानांशकृतश्च सक्रमत्वावभासः परस्परापेक्षया स्वांशापेक्षया च, यद्यपि अब प्रश्न करते हैं कि सब ज्ञान का यह 'अहम्' परामर्शन ही जीवन है और जब वेद्य- भूमि से उस परामर्श का स्पर्श ही नहीं है एवं देश-काल का योग वेद्यभूमि में रहता है, इस प्रकार वेदक के अंश में देश-काल का योग न रहने से तो ज्ञानों का अपने अंश की अपेक्षा से अथवा अन्य ज्ञानों की अपेक्षा से सक्रमता दीख पड़ती है वह कैसे बैठेगी ? क्रम के अभाव में वस्तुतः एकत्व ही रहेगा। 'ज्ञान स्मृत्यादि शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' अर्थात् ज्ञान, स्मृति आदि शक्तियों से युक्त परमेश्वर कैसे होगा ? इस शंका का समाधान करते हुए पूर्वमें कहे गये का ही उपसंहार करते हैं— केवल भिन्न-भिन्न देश एवं काल के संवेद्य के अनुरोध से ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि क्रम से प्रतिभासित होते हैं ॥ २१ ॥ ठीक ही है, संवित् तत्त्व अक्रम ही रहता है, किन्तु अपनी माया-शक्ति के बल से भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होनेवाले जितने भी वेद्य पदार्थ हैं उनके मूर्ति भेदकृत् जो दूर-समीप और संकुचित-विस्तृत-विशाल इत्यादि देश भेद और क्रिया भेद से होनेवाले शीघ्र-विलम्ब इत्यादि जो काल-भेदादि इन्हीं दोनों भेदों को छायामात्र मान लेने पर ज्ञान, स्मृति एवं अध्यवसाय इनके अपने-अपने अंश मालूम होते हैं, निरंशों में भी आभास अंश से सक्रमत्व का अवभास परस्पर १. चिद्रूप की माया-शक्ति के द्वारा घटादि संवेद्य विषय उस-उस देश-कालादि से भिन्न होकर प्रकाशित होते हैं। जिसका अभेद से आक्रान्त होने पर विभिन्न देश कालादिरूप से ज्ञान, स्मृति-शक्ति इत्यादि अवभासित होने लगती है । २. चिति-शक्ति से वेद्य विषय भिन्नरूप में भासते हैं। देश-काल को लेकर उपलक्षण कहा गया है । स्फुट और अस्फुटरूप से सम्बन्ध का ज्ञान, स्मरण, संकल्पादि भेद अन्तरंग कहलाते हैं उसमें भी नील ज्ञान, पीत ज्ञान यह उस से भी अन्तरंगतर है, नील ज्ञान में भी सुख, दुःख, संवेदन इत्यादि का भेद अन्तरंगतर है । यह चिरकालीन ज्ञान एवं त्वरित ज्ञान यह बहिरंग है। यह पूर्व में ज्ञान हुआ, यह बाद में ज्ञान हुआ यह बहिरंगतर है, मच्छर का ज्ञान सूक्ष्म है हाथी का ज्ञान स्थूल होता है, यह बहिरंगतर भेद कहलाता है । अतः प्रधान वस्तु के कारण ज्ञान का भेद हो जाता है ।

अ.-१, आ.-६, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२३ कालक्रम एव स्फुटो विज्ञानेषु भाति न देशक्रमः, तथापि विमूढस्य पर्वतसंवेदनं विततमिव बदरसंवेदनं च सूक्ष्ममिव भाति—इति देशक्रमोऽपि दर्शितः, तेन वेद्यगतक्रमस्वीकाराभासात् सक्रमत्वम् आभासमानमपि न अपारमार्थिकम्—आभासमानस्य परमार्थत्वात्, ततश्च युक्तमुक्तम् ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तय’ इति । ‘मायाशक्त्या विभोः’ । इति श्लोकेन स्वरूपवैचित्र्यं ज्ञानानां दर्शितम् । अनेन तु देशकालवैचित्र्यम्—इति विशेषः । इति शिवम् ॥ २१ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम पञ्चममाह्निकम् ।

अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणाख्यं षष्ठमाह्निकम् स्वात्माभेदधनान्भावांस्तदपोहनटङ्कतः । छिन्दन्त्यः स्वेच्छया चित्ररूपकृतं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्मृतिशक्तिर्ज्ञानशक्तिश्च निरूपिता । अथ तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिर्वितत्य श्लोकैकादशकेन ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मा’ इत्यादिना ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ इत्यन्तेन निर्णीयते । तत्र श्लोकेन ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेष’ इति सूच्यते । ततः श्लोकेन । ‘शुद्धेऽहं- प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारासंभव’ उच्यते । ततः ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’ इति श्लोकेन । ततोऽपि अपेक्षा से और अपने अंश की अपेक्षा से होते हैं, यद्यपि कालक्रम ही स्पष्टरूप से विज्ञानों में भासता है, देशक्रम नहीं भासता, फिर भी विमूढ लोगों को पर्वत का संवेदन-ज्ञान विस्तृत = विशाल सा लगता है और बेर-फल का ज्ञान सूक्ष्म-छोटा सा लगता है, इस प्रकार देशक्रम भी बता दिया, इसलिए वेद्यगत क्रम के स्वीकार के अभ्यास से सक्रमत्व होता है, आभासित होने- वाले पदार्थ भी अपारमार्थिक नहीं है किन्तु आभासमान का स्वरूप पारमार्थिक ही है, इसीलिए सत्य ही कहा है कि ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तयः’ अर्थात् ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि भगवान् की ही शक्तियाँ है । ‘मायाशक्त्या विभोः ।’ प्रभु की माया-शक्ति से भेद होता है इस प्रकार श्लोक से ज्ञान, स्मृति, संकल्प, अध्यवसायादि के स्वरूप वैचित्र्य दिखा दिये और इससे देश-काल का वैचित्र्य भी ज्ञात हो जाता है ॥ २१ ॥ पञ्चम आह्निक समाप्त जो अपने आत्मा में अभिन्नरूप से रहनेवाले पदार्थ-भावों को लुप्त होने से रोकते हुए अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा चित्र-विचित्ररूप बनाते हैं, ऐसे शिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार स्मृति-शक्ति और ज्ञान-शक्ति का निरूपण कर दिया गया । अब उन दोनों पर अनुग्रह करनेवाली अपोहन-शक्ति का विस्तारपूर्वक ग्यारह श्लोकों से ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रका- शात्मा’ इत्यादि से लेकर ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ यहाँ तक निर्णय करते हैं । प्रथम श्लोक से ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेषः’ प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है यही विशेषता सूचित होती है । उसके पश्चात् ‘शुद्धेऽहं प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारसम्भवः’ अर्थात् ‘अहम्’ इस शुद्धप्रत्यवमर्श में व्यापार का होना संभव नहीं है यह कहा जाता है । अनन्तर एक श्लोक से ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’

१२४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-६, का.-१ द्वयेन । 'अशुद्धस्याहमित्येवमर्शस्य विकल्परूपता' । ततः श्लोकेन 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' । एवं 'भूतानुसंधानादिरूपमेव परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वम्' इति श्लोकेन । ततः 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थाव- भासस्य सत्तोपसंह्रियते' श्लोकेन । ततो द्वयेन 'तस्यैवार्थावभासस्यानुभवस्मरणादौ वैचित्र्यमु- च्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' इति श्लोकेन । इत्याह्निकस्य तात्पर्यार्थः । अथ ग्रन्थार्थो व्याख्यायते—उक्तमिदं 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं........' इति, तत्र विमर्शोऽभिलापात्मना शब्देन योजित एव, तद्योजनाकृतं च विकल्परूपत्वं शुद्धेऽपि परमेश्वरे प्राप्तं, न चैतदिष्टं—तस्य संसारपदे मायात्मन्युपपत्तेः—इत्याशङ्क्योचाह— अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मापि वाग्वपुः । नासौ विकल्पः स ह्युक्तो द्वयाक्षेपी विनिश्चयः ॥ १ ॥ प्रकाशस्य विशुद्धसंविद्रूपस्य देहादिसंस्पर्शर्नाबिलीभूतस्य यः आत्मा जीवितभूतः सारस्व- भावो विच्छेदशून्योऽन्तरभ्युपगमकल्पोऽनन्यमुखप्रेक्षित्त्वस्वात्मविश्रान्तिरूपः 'अहमिति' प्रत्यव- मर्शः असौ विकल्पो न भवति, विकल्पत्वाशङ्कायां बीजं दर्शयति—वाग्वपुरपीति । विषयरूपात् कहेंगे । फिर दो श्लोकों से 'अशुद्धस्याहमित्यवमर्शस्य विकल्परूपता' अपने दर्शन का सिद्धान्त स्थिर करेंगे । तब एक श्लोक से 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' एवंभूतानुसंधानरूपमेव परमेश्वरस्य सृष्टृत्वम्' यह कहेंगे कि तरह-तरह के अनुसन्धान करना—यही परमेश्वर की सृष्टि है । उसके बाद 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थावभासस्य सत्तोपसंह्रियते' इसी प्रसंग के अन्तर्गत चिदात्मा में अर्थाव- भास की सत्ता का उपसंहार करेंगे । तब दो श्लोकों से 'तस्यैवार्थावभासानुभव स्मरणादौ वैचित्र्य- मुच्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' उसीका अर्थ अवभास के अनुभव, स्मरण आदि में विचित्रता बतायेंगे और प्रसंग से प्राप्त अपनी ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा में उसकी उक्ति का उपयोग होता है—यह श्लोक से कहेंगे । यही इस आह्निक का अभिप्राय है । अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं—यह कहा गया है कि 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं.....।' अर्थात् विमर्श को अभिलापरूप शब्द से जोड़ दिया गया है, उस योजना से प्राप्त विकल्परूप शुद्ध परमेश्वर में भी मिलता है किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मायामय संसार में उसकी उपपत्ति बैठती है, इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— जो अहं प्रत्यवमर्श प्रकाशरूप वाणी का स्वरूप है । वह विकल्प नहीं है, वह तो द्वित्व की अपेक्षा रखनेवाला आत्मसाररूप निश्चय है ॥ १ ॥ जो विशुद्ध संविद्रूप प्रकाश है उसका देहादि संस्पर्श-सम्पर्क से नहीं बिगड़नेवाला जीवन है; आत्मा के सारस्वभाव, विच्छेदशून्य, भीतरी प्राप्ति के समान, किसी अन्य की अपेक्षा न रखने- वाला, अपने में विश्रान्ति लेनेवाला अहं इस रूप का परामर्श है—वह विकल्पित नहीं होता है, अर्थात् अहं प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है; विकल्परूप की शङ्का में बीज का अभाव दिखाते हैं—'वाग्वपुरिति' । क्योंकि श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होनेवाला शब्दरूप विषय से दूसरा ही अन्तः-

अ.-१, आ.-६, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२५ श्रोत्रग्राह्यात् शब्दादन्य एव अन्तरवभासमानः संविद्रूपावेशी शब्दनात्माभिलापोवागित्युनेनोक्तः- वक्ति अर्थं स्वाध्यासेन सोऽयमित्यभिसम्बन्धेन, यदि वाग्वपुः-कस्मान्न विकल्पः ? आह-नह्यस्य विकल्पलक्षणमस्ति, तथाहि-विविधा कल्पना विविधत्वेन च शङ्कितस्य कल्पोऽन्यव्यवच्छेदं विकल्पः, विविधत्वं च वह्नाववह्निसंभावनासमारोपनिरासे सति भवत्, द्वयं वह्न्यवह्विरूपमा- क्षिपति, तेन विकल्पेऽवश्यं तच्च निश्चेतव्यम्-अतश्च व्यपोहितव्यं भवति ॥ १ ॥ तथा च- भिन्नयोरवभासो हि स्याद्घटाघटयोर्द्वयोः । प्रकाशस्येव नान्यस्य भेदनस्त्ववभासनम् ॥ २ ॥ घटे हि दृष्टे घटस्थान एवाघटोऽपि योग्यदेशाभिमतस्थानाक्रमणशीलो विज्ञानजनकः स्व- कारणोपनीतः संभाव्यते पटादिस्वभावः, अतो घटाघटयोर्द्वयोरवभासस्य संभावनात् समारोपः सावकाशोभवति, अघटस्य सत्यारोपे निषेधलक्षणोऽपोहनव्यापारः-इति तदनुप्राणिता विकल्प- रूता घट इत्येतस्य निश्चियस्य, 'लिङ् संभावनायाम्' । यस्त्वयं प्रकाशो नाम तस्य स्थाने यः संभाव्यते स तावदप्रकाशरूपो न भवति-तुल्यकक्ष्यस्य हि संभावनं भवति, न च यत्प्रकाशेन कर्तव्यं तदप्रकाशस्य कदाचित् दृष्टं-संभावनारोपणादिबलादेव च अस्याप्रकाशरूपत्वं विघटेट, करण में भासता हुआ, संविद्रूप में बैठा हुआ शब्दनास्वरूप अभिलाप वाणी शब्द से कहा गया है अपने अध्यास से वही यह है-इस सम्बन्ध से यदि वचन = वाणी का स्वरूप है तो क्यों नहीं विकल्प होगा ? उत्तर देते हैं-इसका विकल्परूप नहीं है, क्योंकि अनेकरूप से अनेक प्रकार की कल्पना और शङ्का से युक्त कल्पना मान लेने पर दूसरे से व्यवच्छेद करना विकल्प कहलाता है, और विविधता क्या वस्तु है ? उसे कहते हैं-अग्नि में यह अग्नि नहीं है, इस सन्देह को दूर कर देने पर वह्नि-अवह्निरूप द्वित्व को आक्षेप करना और उस हेतु से विकल्प में द्वित्वरूप का निश्चय करना होगा । इससे क्या जोड़ेंगे और क्या विभक्त करेंगे एवं क्या हटायेंगे और क्या शङ्का करेंगे-यही कहना पड़ेगा । विकल्प में द्वित्व का समर्थन करता है ॥ १ ॥ जब घट और घट से भिन्न इन दो भिन्न पदार्थों का अवभास होता है। तब प्रकाश के जैसा अन्य भेद करनेवाले पदार्थ का अवभासन नहीं होता है ॥ २ ॥ जबकि घट के दर्शन होने पर उसी की जगह घट से भिन्न योग्य देश के अभिमत स्थान को आक्रमण करनेवाला विज्ञानजनक अपने कारण से प्राप्त किया गया पटादि स्वभावक आलोक भी सम्भव रहता है, इसलिए घट और अघट दोनों के अवभास की सम्भावना घट में घटभिन्न के आरोप की सम्भावना उपस्थित हो जाती है, घट से भिन्न का आरोप होने पर निषेधरूप अपोहन व्यापार होता है इस प्रकार अपोहन व्यापार से अनुप्राणित होकर घट की विकल्परूपता का निश्चय हो जाता है, 'स्यात्' इस वाक्य में जो 'लिङ्' लकार किया है वह सम्भावना अर्थ में है । किन्तु जिसको आप प्रकाश करते हैं उसके स्थान पर जिसकी सम्भावना की जाती है, वह अप्रकाश नहीं हो सकता; क्योंकि समान स्वरूपवाले की ही सम्भावना होती है, प्रकाश जिस कार्य को करता है वह अप्रकाश भी करे ऐसा कहीं देखा गया है ? सम्भावना के आरोपण के बल से ही इस अप्रकाश का विघटन हो सकता है, इसलिए प्रकाश के तुल्य अप्रकाशरूप उसी के सदृश

१२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-३ अतः प्रकाशनुल्यस्यान्यस्य। प्रकाशरूपस्य भेदिनस्तत्तुल्यकक्ष्यस्यापोहनात्मकभेदनव्यापारासहिष्णो- रवभासनमेव नास्ति, तदभावे कस्यापोहनम् ? अवभाससंभवेऽपि प्रकाशरूपत्वमेव । न च प्रका- शस्य स्वरूपदेशकालभेदो—येन द्वितीयः प्रकाश कस्मादपोद्यतेति, हीति—यस्मात् एवं, ततो द्वयाभावादपोहासंभवे विकल्परूपत्वाभावात् चिन्मात्रे परामर्शात्मनि अहमिति प्रत्यवमर्श एव, न तु विकल्पः ॥ २ ॥ ननु घटे परिनिष्ठितरूपे दृष्टे तद्दर्शनमुपजीवता विकल्पेन कथमघटस्य निषेधनं क्रियते, न ह्यघटस्य केनचिन्नामापि गृहीतम्, अघटवासनापि घंटे दृष्टे कथंकारं प्रबुध्यताम् ? सत्यम्—एवं शाक्यः पर्यनुयोज्यो, न सु वयम्, यतः — तदतत्प्रतिभाभाजा मात्रैवातद्व्यपोहनात् । तन्निश्चयनमुक्तो हि विकल्पो घट इत्ययम् ॥ ३ ॥ इह प्रमाता नाम प्रमाणादतिरिक्तः प्रमासु स्वतन्त्रः संयोजनवियोजनाद्याधारवशात् कर्ता दर्शितः, तस्य च प्रमातुरन्तः सर्वार्थावभासः, चिन्मात्रशरीरोऽपि तत्सामानाधिकरण्यवृत्तिरपि दर्पणनगरन्यायेनास्ति—इत्यपि उक्तम् । एवं च तत्प्रतिभां घटाभासम्, अतत्प्रतिभां च अघटाभासं प्रमाता भजते—सेवते तावत्, तद्विकल्पदशायां चित्स्वभावोऽसौ घटः चिद्देव विश्वशरीरः पूर्णः, भेद करनेवाला अपोहनरूप भेदन व्यापार को नहीं सहनेवाले का अवभासन नहीं होता है, उसके अभाव में किस का अपोहन होगा ? अवभास की सम्भावना होने पर भी प्रकाशरूपता ही रहती है और प्रकाश के स्वरूप में कोई देश-काल का भेद नहीं रहता है जिससे दूसरा प्रकाश एक से हटाया जा सके, ‘हि’ शब्द का अर्थ है कि जिससे ऐसा हो रहा है इसी कारण द्वित्व के अभाव से अपोहन की असम्भावना में विकल्परूप के अभाव से चिन्मात्र परामर्श में ‘अहम्’ यही परामर्श होता है, विकल्परूप से नहीं होता ॥ २ ॥ अब शङ्का करते हैं कि परिनिष्ठित, संकुचितरूप निर्विकल्प घट दशा के देखने पर उसके उपजीवित विकल्प के दर्शन से घट से भिन्न की निषेधता किस प्रकार करते हैं किसी ने अघट का नाम भी तो नहीं लिया है, घट से भिन्न की वासना के देखने पर कैसे प्रबुद्ध होगी ? ठीक है—इस विषय में बौद्धलोगों से ही पूछना चाहिए; हमसे मत प्रश्न करो, क्योंकि— उसकी प्रतिभा को नहीं प्राप्त करनेवाले, प्रमाता के द्वारा ही उससे भिन्न को ओझल कर देने पर उससे निश्चय छूटा हुआ ‘घटोऽयम्’ ऐसा कहना ही विकल्प है ॥ ३ ॥ यहाँ पर प्रमाण से अतिरिक्त विषयों में जो स्वतन्त्र रहता है उसी को प्रमाता शब्द से कहा जाता है जो कि संयोजन-वियोजनादि के आधारभूत होने से कर्ता भी कहा गया है और उस प्रमाता के भीतर सम्पूर्ण अर्थ का अवभास होता रहता है, चेतन शरीरवाला होता हुआ भी दर्पण में प्रतिबिम्बित होनेवाली नगरी के समान चेतन आत्मा में सभी पदार्थ प्रतिबिम्बित रहते हैं—इस विषय में विचार हो गया है और ऐसी परिस्थिति में उसकी प्रतिभा घटाभास है और जिसमें उसकी प्रतिभा नहीं है उस अघटाभास को प्रमाता प्राप्त करता है अर्थात् घटाभास और घट से भिन्न पटादि के आभास को प्रमाता प्राप्त कर लेता है, आभास की अविकल्प दशा में १. सदृश आदि की वासना ही कारण होती है ।

अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२७ न च तेन केचिद्व्यवहाराः, तत् मायाव्यापारमुल्लासयन्पूर्णमपि खण्डयति भावं, तेनाघटस्यात्मनः पटादेश्चापोहनं क्रियते निषेधनरूपं, तदेव व्यपोहनमाश्रित्य तस्य घटस्य निश्चयनमुच्यते ‘घट एव’ इति—एवार्थस्य संभाव्यमानापरवस्तुनिषेधरूपत्वात्, एष एव परितश्छेदात्तत्क्षणकल्पात् परिच्छेदः, हीति—यत एवं, तस्मात् युक्तं ‘द्वयापेक्षी विकल्प’ इति पूर्वश्लोकोक्ते वस्तुद्वये श्लोकद्वयेन हेतू क्रमेणोक्तौ, यस्मादेवं विकल्पः ततोऽहमिति शुद्धो विमर्शः न विकल्पः—इति श्लोकत्रयेण महा- वाक्यार्थः । शाक्यैरपि प्रमातुरेवायं व्यापार उक्तः ‘एकप्रत्यवमर्शाख्य’ इत्यत्र ‘प्रपत्तेति स्वयमिति’ च वदद्भिः, स त्वेतैः कथं समर्थ्यः—इत्यास्तामेतत् ॥ ३ ॥ नन्वेवमहमित्यपि प्रत्यवमर्शोऽनहंरूपस्य घटादेः प्रतियोगिनोऽपोहनीयस्यापोहे विकल्परूपता कथं न स्यात् ? इत्याशयेनाह— चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः । देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ ४ ॥ प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् । विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ ५ ॥ चित्स्वभाववाले चिदात्मा के जैसा विश्वशरीरूप होता हुआ भी पूर्ण रूप में रहता है और उसके विकल्परूप होने के कारण कोई भी व्यवहार नहीं होते हैं इसी कारण मायाव्यापार को उद्बुद्ध करते हुए विश्वशरीर भी प्रमाता पदार्थ को खण्डित कर देते हैं, अघट का जो स्वरूप पटादि है उसका अपोहन अर्थात् निषेध कर देना, उसी निषेधरूप पट को आश्रय करके घट का ‘घट एव’ शब्द से निश्चयन कहा जाता है। यही अपट वस्तु का निषेधरूप होने से ‘एवं’ अर्थ की सम्भाव्यमानता कही जाती है, चारों तरफ से हटा देने के कारण परिच्छेद कहा जाता है, ‘हि’ शब्द हेतु अर्थ में है, इसलिए पूर्व श्लोक से प्रत्यवमर्श विकल्परूप में कहा गया है ‘द्वयापेक्षी विकल्पः’ दो वस्तुओं की अपेक्षा रखनेवाला विकल्प होता है। दो श्लोकों के क्रम से दो हेतु कहे गये हैं, क्योंकि ऐसा विकल्प है इसलिए अहं यह विमर्श है, विकल्प नहीं है—तीन श्लोकों से महावाक्यार्थ लक्षित होता है। बौद्धों द्वारा भी यही कहा गया है कि यह प्रमाता का ही व्यवहार है ‘एकप्रत्यवमर्शाख्यः’ [ एक प्रत्यवमर्शाख्ये ज्ञाने एकत्र हि स्थितः । प्रपत्ता तदतद्धेतून् भावान् विभजते स्वयम् ॥ आचार्य धर्म कीर्ति का कथन है कि “एक परामर्श संज्ञक ज्ञान में एक जगह ही स्थित हुआ प्रमाता उस हेतु के और उससे भिन्न पदार्थ भावों को स्वयं विभक्त करता है।” ] उसका ये लोग कैसे समर्थन करेंगे इसलिए इसे छोड़ दो, अप्रासङ्गिक है ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि अहं इस परामर्श में अनहंरूप घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है इसके अपोहन में विकल्परूपता क्यों नहीं होगी ? इस अभिप्राय से कहते हैं— माया-शक्ति के द्वारा चित्तत्त्व को छिपा करके जो भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि और प्राण में आकाश के समान कल्पित होते हैं ॥ ४ ॥ ऐसा होने पर दूसरों को हटाने के कारण प्रमातारूप से अहं यह विमर्श अन्यप्रति रोगी के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही है ॥ ५ ॥

१२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५ अहंत्यवमर्शो द्विधा—शुद्धो मायोयश्च, तत्र शुद्धो यः संविन्मात्रे विश्वाभिन्ने विश्रवच्छा- याच्छुरितस्वच्छात्मनि वा। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ। तत्र शुद्धेऽहं-प्रत्यवमर्शे प्रतियोगी न कश्चिदपोहितव्यः संभवति—घटादेरपि प्रकाशसारत्वेनाप्रतियोगित्वेनानपोह्यत्वात्, इत्यपोह्यात्वा- भावे कथं तत्र विकल्परूपता। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ अन्यस्माद् देहादेर्घटादेश्च व्यवच्छेदेन भवन् विकल्प एव-इति वाक्यार्थः। अक्षरार्थस्तु—चित्तत्त्वं प्रकाशमात्ररूपं हित्वा सदप्यपहस्तनया अप्रधानीकृत्य भिन्ने देहादावहमेव देहादिः नीलादौ प्रमेये प्रमाता—इत्यभिमानेन 'योऽहं स्थूल' इत्यादिविमर्शः स विकल्प एव, न तु शुद्धं प्रत्यवमर्शमात्रम्। अत्र हेतुः —परो द्वितीयो देहादि- र्घटादिश्च यः प्रतियोगी तुल्यकक्षयोऽन्योन्यपरिहाराच्च विरुद्धस्तस्य योऽवभासः – समारोपणलक्षणः, तस्माद्यतोऽसौ तन्निषेधानुप्रणितोऽहमित्यवमर्शो जातः 'अहं स्थूलो, न कृशो, न घटादिः' इति शुद्धप्रकाशरूपस्य अपहस्तनमेव देहादेर्भेद हेतुः, तदपहस्तने तु परमेश्वरस्य स्वात्मप्रच्छादनेच्छारू- पाभेदाप्रकाशनं भ्रान्तिरूपं प्रति स्वातन्त्र्यरूपाम शक्तिर्हेतुः, चिद्रूपस्य चापहस्तनं देहादेरेव अत्यक्तवेद्यभावस्य भिन्नस्यैव उपपत्तिशून्यतयैव प्रमोतृताभिमानः। अहम् विमर्श दो प्रकार का है—एक तो शुद्ध है दूसरा मायीय है, इसमें शुद्ध विमर्श यह है कि जिस ज्ञानरूप चिन्मात्र में अभिन्न एकरूप से सारा विश्व प्रतिफलित होता है अथवा स्वच्छ सदाशिव चिदात्मा की दशा में झलकता रहता है। अशुद्ध मायीय विमर्श वेद्यरूप शरीरादि में रहता है। जो शुद्ध अहम् विमर्श है उसमें तो कुछ हटाने योग्य नहीं रहता है और घटादि के प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं रहता, जब अपोह्य ही नहीं रहेगा तो विकल्परूपता कैसे बनेगी ? किन्तु अशुद्ध मायीय वेद्यरूप देहादि में तो परस्पर एक दूसरे से भिन्न होने के कारण विकल्पता बनी ही रहती है। यह तो वाक्यार्थ हुआ अब अक्षरार्थ बतलाते हैं—जो प्रकाश मात्ररूप चित्तत्त्व है उसे छोड़कर प्राणादि पुर्यष्टक में रखता हुआ अपने को अप्रधान बनाकर अपने से भिन्न देह, बुद्धि और प्राणादि में, 'मैं' ही देहादि एवं नीलादि विषय का प्रमाता हूँ इस प्रकार अभिमान करता हुआ, स्थूलरूप में मेरा ही रूप है, इस प्रकार का विमर्श ही विकल्प कहलाता है, शुद्ध परामर्श में ऐसा नहीं होता है। क्यों नहीं है ? इसमें हेतु बताते हैं—दूसरा देहादि एवं घटादि बराबर के प्रतियोगी आपस में एक-दूसरे का परिहार करने से विरुद्ध है उसका जो अवभास समारोपरूप है, उससे जो भिन्न निषेध करनेवाला अहंविमर्श उत्पन्न होता है। जिसका शुद्ध स्वरूप है कि मैं स्थूल हूँ, मैं कृश नहीं हूँ, मैं घटादि भी नहीं हूँ इत्यादि, शुद्ध प्रकाशरूप का हटा देना ही देहादि के भेद में हेतु है, उससे हटा देने में तो अपने स्वरूप को छिपाने की इच्छा होने से अभेद का प्रकाशन नहीं करने देने में भ्रान्ति- वाले पदार्थों के विषय में तो भगवान् की अपनी स्वातन्त्र्यरूप माया-शक्ति ही मुख्य कारण है, चिद्रूप को छिपाना एवं देहादि अत्यक्त वेद्यभाव के भिन्न को उपपत्ति की शून्यतारूप से प्रमातृता का अभिमान करना है। १. देहादि की वासना की अपेक्षा से प्राण श्रेष्ठ होता है, संकल्प-विकल्प करना अन्तःकरण का धर्म है, जिसके अनुग्रह से चित्तत्व की प्राप्ति हो जाती है, उसका प्राण अधिष्ठेय बन जाता है, उसी प्रकार संविततत्त्व अधिष्ठित प्राण के द्वारा बुद्धिरूप पुर्यष्टक के सहारे शरीर अधिष्ठित रहता है। इसलिए चेतना स्वातन्त्र्य-शक्ति ही इसकी अधिष्ठातृ है, इस विषय में कहा भी है—

अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२९ तथा च—देहाभिमानभूमिकायां स्थिताश्चार्वाकाः ‘चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' इति कायमेव प्राधान्येनाहुः—स्त्रीबालमूर्खाणां तथाभिमानात् । ततोऽपि विवेकवन्तः पाकजोत्पत्ति- परिणामादिबलादस्थिरं शरीरं मन्वानाः प्राणशक्तिसमधिष्ठानेन च विना विकारशतावशं जैसा कि—चार्वाकादि नास्तिक लोग देहाभिमान भूमिका में रहते हैं। अलग-अलग मदिरा सम्बन्धी द्रव्य जबतक एक दूसरे से नहीं मिलते हैं तबतक उसमें मद-शक्ति नहीं आती है मिलते ही मदिरा में मद-शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार अलग-अलग भूत चैतन्य से रहित हैं वे जब आपस में एक दूसरे से मिल जाते हैं तब स्वाभाविक उसमें हलन-चलन करने की शक्ति आ जाती है, इसलिए चैतन्य की कल्पना केवल भ्रान्ति ही है। 'चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' यही चार्वाकों का सिद्धान्त है। शरीर को ही प्रधानता देते हैं। स्त्री, बालक और मूर्ख लोगों का भी वैसा ही अभिमान होता है। कुछ वेदान्ती लोग शरीर का उत्पन्न होना, बढ़ना-घटना एवं विनष्ट हो जानेवाले दोषों से शरीर का अस्थिर मानते हुए तथा प्राण-शक्ति के न रहने के प्रकाशरूपो भगवान्प्राणाधिष्ठान उच्यते । प्राण एवाधरो धर्मो हंसश्चेति त्रिवाहनः ॥ भगवान् प्रकाशात्मा ही प्राण का अधिष्ठान है—ऐसा कहा जाता है। अधिष्ठान का अधिष्ठेय प्राण ही आत्मा का धर्म है अर्थात् अधिष्ठान और अधिष्ठेय तथा इन दोनों का जो ज्ञान है वही त्रिवाहन है। अत एव गीता में भी भगवान् ने इसका उल्लेख किया है— शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ जैसे वायु सूक्ष्म गन्ध के परमाणु-रेणुको गन्ध के स्थान से ग्रहण कर ले जाता है, उसी प्रकार शरीर धारियों का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को पहले त्यागता है, उससे मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके दूसरे नये शरीर में ले जाता है। संविद्रूप ईश्वर प्राण-पुर्यष्टक के अधिष्ठान द्वारा शरीर को धारण किये रखते हैं—यह बात स्पन्दशास्त्र में भी श्री गुरुवर्यने कही है— यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् । .......................................प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥ लभते...............................................। इत्यत्र संहान्तरेण चक्रेणेति............................। जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य जड इन्द्रियों को भी चेतन की जैसी शक्ति सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति और संहारादि करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि उसकी यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इसलिए देहाभाव के भस्मीभूत हो जानेपर, स्वप्न अवस्था को जैसा निद्रा में डुबे हुए मोह- आवरण की स्थिति रहने पर भी चेतन में अधिष्ठित प्राण को अपनी गोद में रखनेवाले पुर्यष्टक की वैसी स्थिति परलोक में भी रहती है। फिर दूसरे देह के अधिष्ठान से भोगों को भोगने में कोई १७