ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [१०९ तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं तत्र तत्र अभिधीयते। सर्वस्य हि मन्त्र एव हृदयम्, मन्त्रश्च विमर्शनात्मा, विमर्शनं च परावाक्शक्तिमयम् । तत एवोक्तम्—'न तैर्विना भवेच्छब्दो नार्थो नापि चितेर्गतिः ।' इति । 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावम्.........।' इत्यादि च, विमर्श-शक्ति विश्व के परमपद में विश्रान्ति स्थानरूप है और यही विमर्शरूप स्वतन्त्रात्मक है उसे ही तत्-तत् स्थलों में कहा गया है। क्योंकि सब का मन्त्र ही प्रतिष्ठा-स्थान माना जाता है, एवं मन्त्र ही विमर्शात्मा है और विमर्श-शक्ति हो परावाणीरूपी शक्ति से युक्त है। इसी कारण कहा गया है— उन मन्त्रों के बिना न तो शब्द और अर्थविषयक ज्ञान ही होगा तथा चिति की गति का होना भी असम्भव ही है। अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त जितने भी वर्ण हैं उन्हें 'शब्दराशि' से पुकारा जाता है। शास्त्रों में इसको मातृका कहा जाता है। सारी की सारी भेदवाली वाचक-वाच्यरूप स्थूल शब्द- राशि को अपने भीतर अभेदरूप में धारण करनेवाली परा-शक्ति ही मातृका-शक्ति है जैसा कि 'सा हि भगवती अशेषवाच्य-वाचकात्मकजगद्भेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.........।' [ स्व० तन्त्र० ] 'स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा।' इसकी पूर्णता अहन्तारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से भिन्न और कुछ भी नहीं है। अपनी स्वतन्त्र सत्ता के बल से ही यह अपने आप अकार से लेकर क्षकार तक के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह के रूप में फैलकर बहुत प्रकार के वाच्यों और वाचकों से विश्व को आभासित कर लेती है यह सारा विश्व प्रमाता के रूप में ही इस से सिद्ध होता है। किन्तु इसकी पहचान ज्ञानी-सिद्धजनों के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं होती। इसलिए कहा है कि 'अज्ञाता माता मातृका विश्व जननी।' जिसको जानकारी न होने से माता ही 'मातृका' कही जाती है। इसका दूसरा अर्थ भी करते हैं—'एतदेव च ब्राह्मादि- मातृणां मातृत्वं तत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न जननी वाचकः' । इसी दर्शन में दिखाया गया है कि 'अ' से लेकर 'क्ष' तक की शब्दराशि चिद्रूप का ही बाहर में फैलाव है। भेद-दृष्टि में परिणत हो जाने पर यह शब्दराशि आठ भागों में विभक्त हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का परिवार भी पशु भूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चिच्छक्ति को चारों ओर से घेर लेती है जिससे कि पशु-जीवों को इसका बोध नहीं हो पाता है इसलिए आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं। प्रकाशरूप शिव और विमर्श-शक्ति इन दोनों की एक रसता ही सारे विश्व की आधारता है। 'अहं विमर्श' ही इसका स्वरूप है, जो कि वह महामन्त्र रूप है 'अ' अनुत्तर-तत्त्व एवं 'ह' अनाहत-शक्ति तत्त्व की प्रत्याहारदशा ही 'अहन्ता' है। सारी शब्दराशि उसके भीतर 'मयूर के अण्डरस' न्याय से अभेदपूर्वक रहती है। परावाणी भी कुछ लोग इसको कहते हैं। १. ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ (गी० १४-२७) हे अर्जुन ! उस अविनाशी पूर्ण ब्रह्म का और अमृत अमरणधर्म का एवं नित्यधर्म का और अखण्ड आनन्द का मैं ही एकमात्र आश्रय हूँ अर्थात् ये सबके सब मेरे ही ऐश्वर्य हैं। इसलिए इन सब का मैं परम आश्रय हूँ।