ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-५, का.-१४ भवति, यत् किल येन तुल्यकक्ष्यतया भाति तत् तस्य विशेषणं—कटक इव चैत्रस्य । न च देश- कालौ विमर्शेन तुल्यकक्ष्यौ भातः—तयोः इदन्तया तस्य च अहन्तया प्रकाशे तुल्यकक्ष्यत्वानुपपत्तेः । एवं देशकालास्पर्शात् विभुत्वं नित्यत्वं च—सकैलदेशकालस्पर्शोऽपि तन्निर्माणयोगात् इति, ततोऽपि व्यापकत्वनित्यत्वे । तदुक्तम्—'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ।' इति । सारम् इति यत् अतुच्छं रूपं तत् इयमेव विमर्शशक्तिः, ग्राह्यग्राहकाणां यत् प्रकाशात्मकं रूपं तस्यापि अप्रकाशवै- लक्षण्याक्षेपिका इयमेव इति, श्रीसारशास्त्रेऽपि निरूपितम्—'यत्सारमस्य जगतः सा शक्तिर्मालिनी परा ।' इति । सैषा, इति शक्तिप्रत्यभिज्ञानं दर्शितम् । हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनं, तस्यापि प्रकाशात्मकत्वं, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे बराबर भासता है वही उसका विशेषण होता है जैसे—चैत्र का कुण्डल अर्थात् कुण्डलवाला चैत्र है और विमर्श के साथ देश-काल बराबर रहकर भासित नहीं होते, देश और काल इन दोनों का इदन्ता के साथ सम्बन्ध रहता है और उसकी अहन्तरूप से प्रकाश तुल्यकक्षत्व नहीं बैठता; इस प्रकार देश-काल के स्पर्श से विभुत्व और नित्यत्व सिद्ध होता है—उसी तरह सकल देश- काल से स्पर्श भी हो सकता है, उसमें भी देश-काल के निर्माण का योग होने से; इसी से भी नित्यत्व और व्यापकत्व सिद्ध हो जाता है, इस विषय में कहा गया है—महासत्ता और महादेवी के रूप में यह सारा का सारा जड-चेतन विचित्र ढङ्ग से भासित होता है उसी का यह सारतत्त्व है—ऐसा कहा जाता है। वही वस्तु सारतत्त्ववाली होती है जो अतुच्छ अविनाशी हो और उसी को विमर्श-शक्ति कहा जाता है । जो ग्राह्य और ग्राहक के प्रकाशात्मक रूप हैं उनकी भी अप्रकाश रूप में विलक्षणता ले आनेवाली यही शक्ति है, श्रीसारतन्त्र में इसका निरूपण किया है—'इस संसार का जो सारतत्त्व है वह परम मालिनी-शक्ति है।' वही, यह शक्ति प्रत्यभिज्ञान को बताती है और उसोका नाम हृदय है जिसको प्रतिष्ठानरूप से कहा जाता है और वह स्थान "तथाहि जडभूतानाम्" कहे हुए नियम से जड एवं चेतन का है, उसकी भी प्रकाशात्मकता है, उसकी भी १. जो जिसके साथ जीता है वही उसका व्यवच्छेदक होता है । २. दिक्कालादिलक्षणेन व्यापकत्वं विहन्यते । अवश्यं व्यापको यो हि सर्वदिक्षु स वर्तते ॥ इति शिवदृष्टौ— दिशा-कालादिको लेकर उसका व्यापकत्व बन नहीं पाता है, विशेषण के लग जाने से परि- च्छिन्न बन जाता है जो सर्वत्र सभी दिशाओं और कालादि में समानरूप से व्यापक रहता है वही व्यापक है अर्थात् देश-कालादि से अनवच्छिन्न स्वभाववाला ही व्यापक माना जाता है । ३. इसका विवेचन अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार में किया है— अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद्विचित्ररचना मकुरान्तराले । बोधः परं निजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मकुरस्तथा तु ॥ जैसे दर्पण तल पर पदार्थ चित्र-विचित्र ढंग से भासित होते हैं, वैसे ही परम संविद्रूप में यह सारा का सारा संसार आभासित है । परम संविद्रूप को विमर्श-शक्ति के सामर्थ्य द्वारा उसका बोध रहता है किन्तु दर्पण को उसी प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का बोध नहीं रहता । ४. 'सैषा' क्योंकि तद् और एतद् ये दोनों शब्द परोक्ष और अपरोक्ष के वाचक होकर प्रत्यभिज्ञा सूचित करते हैं ।