भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०७

स्फुरति मम, न तु इतरत् इति, तत् एतत् घटत्वमेव यदि स्फुरत्त्वं स्फुरणसम्बन्धः, तत् सर्वस्य स्फुरेत् न कस्यचिद्वा, तस्मात् मम स्फुरति इति कोऽर्थः, मदीयं स्फुरणं स्पन्दनम्, एषैव च कञ्चिद्रूपता—यत् अचलमपि चलम् आभासते इति, प्रकाशस्वरूपं हि मनागपि नातिरिच्यते, अतिरिच्यते इव इति अचलमेव आभासभेदयुक्तमेव च भाति इति । तत उक्तम्— 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्वपुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसारः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ॥' इति तथा— 'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रति- ष्ठितः ॥' (स्प० २२) इति । '...........स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।' (स्प० २१) इति । 'गुणादिस्पन्द- निःष्यन्दाः.............।' (स्प० १९) इति च । लोकेऽपि विविधवैचित्र्ययोगेऽपि स्वरूपात् अचलन् जनो गम्भीरः स्पन्दवान् इति उच्यते । सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति इति महती, देशकालौ नीलादिवत् सैव सृजति ताभ्यां विशेषणीया न को भी नहीं होना चाहिए, इसलिए मुझे होता है इसका क्या तात्पर्य है, मेरा ही स्फुरण उसमें लगा हुआ है और स्पन्दन का अर्थ यह है कि कुछ चलनात्मक प्रवृत्ति का होना, एवं यही किञ्चित् झलकना है जो स्वयं अचल रहता हुआ भो द्रष्टा के यहाँ स्फुरित होता है, क्योंकि प्रकाशरूप द्रष्टा से वह थोड़ा सा भी अधिक नहीं होता है, [स्वतः ] अपने आप अधिक होने के समान, वह अचल रहता हुआ ही आभास भेद से मिला हुआ ही झलकता है । इसी कारण कहा है— सभी भावों में विज्ञानरूप शरीरवाला आत्मा ही अपनी इच्छा की वृद्धि को न रोककर दृष्टि क्रिया को फैलाता हुआ विश्वरूप ही रहता है और भी सुनो— अतिक्रोधी अथवा प्रहृष्ट-प्रसन्न रहनेवाला या किंकर्तव्यविमूढ रहनेवाला या दौड़ता हुआ जिस अवस्था में स्थित रहता—वही प्रतिष्ठित स्पन्द कहलाता है । (२२) स्प० अतः जो कोई अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है, वह तो जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव-परमानन्दमय तत्त्व की अनुभूति थोड़े ही काल में प्राप्त कर लेता है ॥ २१ ॥ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के रूप में बहनेवाले जो प्रवाह हैं वे सामान्य स्पन्द का ही आश्रय लेकर फैलता हुआ भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी-बाधक नहीं होता है । स्व-स्वभाव का आच्छादक नहीं हो पाता है ॥ १९ ॥ संसार में विविध प्रकार की विचित्रता के रहते हुए भी अपने स्वरूप से पदच्युत न होने- वाले पुरुष को महान् सत्ता भवन कर्तृरूप होने के कारण समस्त क्रियाओं को सम्पादन करने में सर्वतोभावेन स्वतन्त्र रखती है और वह महान् भवन कर्तृता होने के कारण आकाशकुसुमादिकों में भी व्याप्त होकर रहती है, नीलादि की तरह देश-काल का भी वही सृजन करती है देश-काल उसके विशेषण नहीं होते हैं अपितु नीलादि देश-काल के साथ सम्बन्ध रखता है, जो जिसके साथ १. सन्नेव हृदयप्रकाशो भवनक्रियाया भवति क्रिया । सैव क्रियाविमर्शः स्वस्था क्षुभिता च विश्वविस्तारः ॥ इति— भवन क्रिया का कर्ता विद्यमानरूप में हृदय प्रकाश ही होता है । वही क्रियाविमर्श अपने में स्थित होता हुआ क्षुभित होकर विश्व भर में विस्तीर्ण हो जाता है ।