भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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[१०६ ] ईश्‍वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ मात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम् ऐश्वर्यम् ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षितवम् उच्यते । परापरं तु इदंभावरूपस्य प्रत्यवमर्शस्य अख्यातिप्राणस्य—उद्बोधमात्रेऽपि अहंभाव एव विश्रान्तेः श्रीसदाशिवादिभूमौ पश्यन्तीदशायाम् । अपरं तु इदंभावस्यैव निरूढौ मायागर्भाधिकृतानामेव विष्णुविरिश्चेन्द्रादीनाम्, तत्तु एषां परमेश्वरप्रसादजमेव इति । अन्यानिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः, ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं, चैतन्यं च । तस्मात् युक्तमुक्तम्—‘········तेन जडात्स हि विलक्षणः ।' इति ॥ १३ ॥ प्रधानागमे ऽपि एतत् प्रदर्शितमेव इति निरूपयति— सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥ इह घटः कस्मात् अस्ति, खपुष्पं च कस्मात् नास्ति, इति उक्ते वक्तारो भवन्ति, घटो हि मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य एवं स्वामीपन है, जिसमें किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है। अपने में रहना सुख-संपन्नता है और दूसरों के आधीन रहना ही दुःख-दीनता है। अपना स्वरूप नहीं भासित होना ही इदंभाव का परामर्श कहलाता है। केवल उद्बोध हो जाने पर भी सदाशिव भूमिरूप पश्यन्तीदशा में अहंभाव की विश्रान्ति हो जाती है। जब इदंभाव की अभिवृद्धि होती है तो मायागर्भ में रहनेवाले ब्रह्मा, बिष्णु आदि तथा सभी लोकपालों का प्रभाव-प्रताप तो सब का सब महेश्वर के प्रसाद से ही होता है। किसी की अपेक्षा न रखना यही परमार्थतः आनन्द ऐश्वर्य और स्वातन्त्र्य है। इसलिए युक्तियुक्त ही कहा है—'तेन जडात् स हि विलक्षणः ।' क्योंकि वह जड से विलक्षण ही है ॥ १३ ॥ [ रहस्य आगमों में तथा परमेश्वर भाषितवेदान्तादि में प्रकाश की ही प्रधानता है ] इस प्रकार समस्त आगमशास्त्रों में भी विमर्शरूप प्रकाश की ही प्रधानता मानी जाती है। इसका निरूपण करते हैं— वह देदीप्यमान महा सत्ता है जिसमें देश-काल का ‘विच्छेद' स्पर्श नहीं होता, वह परमेश्वर की सारतत्त्ववाली चिति-शक्ति को हृदय अर्थात् प्रतिष्ठा स्थान कहा गया है ॥ १४ ॥ यहाँ पर घट रहता है और आकाशकुसुम नहीं रहता है, इस बात को बोलनेवाले कहते हैं, क्योंकि घट को मैं प्रत्यक्षरूप से देखता हूँ, आकाशकुसुम तो प्रत्यक्ष स्फुरित नहीं होता है, यदि घटत्व ही स्फुरित होता है तो वह प्रत्येक व्यक्ति को स्फुरित होगा। नहीं होता है, तो किसी आनन्दघन परम स्वातन्त्र्यरूप परमेश्वर का उल्लास परम-महा पश्यन्ती अवस्थाके कारण ही उल्लसित होता रहता है। वह परावाग्रूपता ही भगवान् की शक्ति है—ऐसा दिखला दिया है। आपस में एक-दूसरे से प्रेम प्राप्त करना ही रतिक्रीडा का आनन्द उल्लास है—इस प्रकार लौकिक दृष्टान्त से भी आनन्द ही प्रकट हुआ झलकता है। १. जबकि मुनि ने कहा है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' पराधीनता में ही दुःख है और अपने में रहना सुख है । २. ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रादि देव मायागर्भ के अधिकारी होने के कारण, इनमें अपना कुछ भी करने का सामर्थ्य नहीं होता।