भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

अ.-१, आ.-५, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०५ आभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यते इति उच्यते । एवं च विमर्शः स्वात्मनि अविमर्शाऽपि स्वात्मनि इत्यसिद्धमेतत् । विमर्शी हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवं-स्वभावः । प्रत्यवमर्शश्च अन्तरभिलापात्मकशब्दन- स्वभावः, तच्च शब्दनं संकेतनिरपेक्षमेव अविच्छिन्नचमत्कारात्मकम् अन्तर्मुखशिरोनिर्देशप्रख्यम् अकारादिमायीयसांकेतिकशब्दजीवितभूतं, नीलम् इदं, चैत्रोऽहम् इत्यादिप्रत्यवमर्शान्तरभित्ति- भूतत्वात्, पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वम् अपलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक्, अत एव सा स्वरसेन चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव पर- इसलिए चैत्र जानता है—ऐसा बोला जाता है। इस प्रकार इदन्ता आभास के विमर्श में अपना विमर्श और अविमर्श नहीं हो सकता है—यह बात असिद्ध है। विमर्श तो सब कुछ सहनेवाला होता है इदन्ता को भी अपना बना लेता है और अपने आप को भी देहादिरूप इदन्ता कर लेता है तथा दोनों को सदाशिव भूमि में एक भी कर लेता है एवं एक किये हुए को दो भागों में विभक्त कर देता है। एक को जाग्रत् अवस्था में बढ़ा देता है एवं दूसरे को शून्य अवस्था में दबा देता है—ऐसा स्वभाववाला है। प्रत्यवमर्श उसीको कहते हैं—जो भीतर ही भीतर जानना, और उसमें किसी का संकेत भी नहीं रहता, मैं स्वयं इन नीलादिरूप का भोक्ता हूँ— यही चमत्कार रहता है बिना बोले हुए स्वीकार कर लेने के बराबर 'अ० आ० क० ख० ग०' इत्यादि सांकेतिक शब्दों का जीवन है, यह नील है, मैं चैत्र हूँ—इत्यादि सभी परामर्शों के आश्रय होने से, और पूर्ण होने से परावाणी परामर्शरूप द्वारा सारे विश्व को देखती है, इसीलिए परावाणी कही जाती है, वह अपने आपमें स्वात्मविश्रान्तिरूप चिद्रूप से निरन्तर उदित होती रहती है। 'अहं' इस परामर्शरूप में सदैव स्फुरित रहती है। यही परमात्मा का १. “पृ पालनपूरणयोः” पालन एवं पोषण अर्थ में पढ़ी गयी “पृ” धातु से 'परा' शब्द व्युत्पन्न हुआ है। २. अनस्तमिता का अर्थ है जिसका सदा उदय है। जिसका जगत् में उदय होता देखा जाता है उसका अस्त होना निश्चित है किन्तु जिसका सदा उदय है वह कभी-भी अस्त होता ही नहीं, इसलिए सदोदित कहा जाता है। 'सदोदित' सदा उगी हुई चित्ति-शक्ति है जिसमें निरन्तर क्रिया शीलता और स्पन्द रूपता रहती है। ३. कुछ लोगों का कहना यह है कि पश्यन्ती अवस्था ही मुख्य आनन्दरूप है परा अवस्था नहीं होती, क्योंकि वह तो पररूप रहने के कारण नहीं होती है, इसी को 'एवकार' शब्द से लक्षित करता है, श्री सोमानन्दपाद ने भी इस विषय में कहा है—'विमर्श अनुभव के द्वारा यह वाग्रूपता अनुगत होती है। इस प्रकार यहाँ से प्रारम्भ कर 'ऐसी भले ही चर्चा करते रहो; जैसे पश्यन्ती अवस्था ही उपयुक्त है।' 'यो हि पश्यति पश्यन्तीं स देवः परमः शिवः ।' इत्यादि तक । 'जो लोग पश्यन्ती अवस्था को ही देखते हैं, वही देव परम शिव है। इत्यादि से भगवान् का स्वरूप शब्दरूप है—ऐसा कहा गया है। इसका भट्टनारायण ने भी उल्लेख किया है— सुगिरा चित्तहारिण्या पश्यन्त्या दृश्यमानया । जयत्युल्लासितानन्दमहिमा परमेश्वरः ॥ चित्त को आकर्षित करनेवाली दृश्यमान पश्यन्तीरूप वाग्रूपता से आनन्दकन्द महिमावाले परमेश्वर का उत्कर्ष उल्लसित होता है। १४