ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१३ कर्तृता तात्पर्य्येण इति समासः अर्धयुक्त पादविश्रान्तिः इति हि काव्ये समयः, न शास्त्रे । यदि वा चित् क्रिया आत्मा उदितः, चितिकर्तृता च, इति पृथगेव । एवं तु न क्वचित् पठितम् ॥ १२ ॥ ननु यथा प्रकाशोऽप्रकाशश्च इति उभयमपि स्वात्मनि, ततश्च प्रकाश इति उक्ते जडात् न वैलक्षण्यम् उदितं स्यात्, तद्वत् विमर्शोऽपि अविमर्शोऽपि च स्वात्मनि, इति तेनापि कथं वैलक्षण्यं जड/जडयोः इत्याशङ्क्याह— चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक्स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥ १३ ॥ चेतयति इत्यत्र या चितिः चितिक्रिया तस्याः प्रत्यवमर्शः स्वात्मचमत्कारलक्षण आत्मा स्वभावः, तथाहि—घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते स्वात्मा न परामृश्यते न स्वात्मनि तेन प्रका- श्यते न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेतयत इति उच्यते । चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते, स्वात्मा परामृश्यते स्वात्मन्येव प्रकाश्यते, इवमिति यः परिच्छेद एतावद्रूपतया तद्विलक्षणोभावेन नील-पीत-सुख-दुःख-तच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन इसकी आधे पाद में ही पाद की विश्रान्ति की हुई है काव्यशास्त्र में तो यह नियम चलता भी है किन्तु आगमशास्त्रादि में ऐसा नियम नहीं है एवं ऐसा होना भी चाहिए । अथवा चित् क्रिया को ही आत्मा कहा हो और चिति का कर्तृत्व भी आत्मा में रख दिया हो यह तो कहीं पर भी नहीं पढ़ा गया है । भिन्न रूप से भी जहाँ पर पढ़ा है वहाँ पर 'आत्मा चैतन्यम्' और चिति कर्तृता इसी रूप में पढ़ा गया है ॥ १२ ॥ 'ननु' कहकर शंका करते हैं। यदि प्रकाश और अप्रकाश ये दोनों भी आत्मा में ही रहते हैं और आत्मा में रहने के कारण प्रकाश ऐसा मात्र कहने पर जड से विलक्षण कुछ भी नहीं उदित होता है, उसी प्रकार विमर्श और अविमर्श भी तो आत्मा में ही रहते हैं, तब फिर जड ओर चेतन अजड की विलक्षणता कैसे मालूम पड़ेगी । इस प्रकार आशंका कर उत्तर में कहते हैं— चिति-चेतन जो प्रत्यवमर्शरूप है—'अहम् अस्मि' यही इसका पारमार्थिक स्वरूप है । अपने ही रस में देदीप्यमान परावाणी के रूप से रहता है । उस परमात्मा का वही मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य है ॥ १३ ॥ 'चेतयति' इस क्रिया में, जो चिति (जानने अर्थ में क्रिया) है उसका परामर्श स्मरणरूप से करना यही इसका अपना चमत्काररूप स्वभाव है, क्योंकि घट अपने आपको प्रकाशित नहीं कर सकता अर्थात् अपरिच्छिन्नरूप में नहीं भासता है, इसी कारण घट स्वयं जानता है—ऐसे कोई नहीं बोलते हैं । चैत्र तो अपने में सर्वदा ज्ञानमय होने के कारण चमत्कृत ही रहता है, एवं अपने में ही प्रकाशित रहता है और सारे विश्व को अपने में किये रहता है । नील-पीत, सुख-दुःखादि से युक्त होकर रहना एवं कभी न रहना ये सारी बातें उसमें होती रहती हैं, १. यह परावाग्रूपता आद्य-शक्ति अभिन्नरूप से रहती है नित्य संवित् स्वरूप होने के कारण, आदि और अन्त अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से रहित है । दूसरे परतन्त्रभाव की अपेक्षा नहीं रखनेवाली, स्वातन्त्र्य, ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहती है ।