ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०१ इह अवभासस्य प्रकाशस्य, अनवभासस्य च प्रकाशस्य घटादेः परस्परपरिहारेण द्वयोः स्वात्मनि चेत् व्यवस्थानं, तत् घटपटयोः इव इदमजडम् इदं जडम् इति दुरुपपादं वैलक्षण्यम् । अथ अवभासो यतोऽर्थस्य सम्बन्धी, ततो नाजडः, र्तार्ह सम्बन्धमात्रेण मृत् अपि घटस्य इति अजडा स्यात् । अथ न स्वसम्बन्धमात्रम् अपि तु अवभासोऽर्थस्य प्रकाशः, र्तार्ह अर्थात्मना स प्रकाश इति समापतितम् । न च अन्यात्मना अन्यस्य प्रकाश उपपन्नः । अथ अन्यस्वभावोऽपि घटोऽवभासस्य कारणम्, र्तार्ह अवभासोऽपि घटस्य कारणम् इति घटोऽपि अजडः स्यात् । अथ अन्येनापि सता घटेन यतोऽवभासस्य प्रतिबिम्बरूपा च्छाया दत्ता, ताम् असौ अवभासो बिभ्रत् घटस्य इति उच्यते, ततश्च अजडः, र्तार्ह स्फटिकसलिलमुकुरादिः अपि एवंभूत एव, इति अजड एव स्यात् । अथ तथा- भूतर्माप आत्मानं तं च घटादिकं स्फटिकादिः न पराम्रष्टुं समर्थ इति जडः, तथा परामर्शनमेव अजाड्यजीवितम् अन्तर्बहिष्करणस्वातन्त्र्यस्वरूपं स्वाभाविकम् अवभासस्य स्वात्मविश्रान्ति- लक्षणम् अनन्यमुखप्रेक्षितवं नाम । 'अहमेवं प्रकाशात्मा प्रकाशे' इति हि विमर्शोदये स्वसंविदेव प्रमातृप्रमेयप्रमाणादि चरितार्थम् अभिमन्यते न तु अतिरिक्तं काङ्क्षति, स्फटिकादि हि गृहीतप्रति- बिम्बमपि तथाभावेन सिद्धौ प्रमात्रन्तरम् अपेक्षते, इति निर्विमर्शत्वात् जडम् । सर्वं तु वस्तुतो अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । स्वरूप परामर्श करनेवाले ही इसको जानते हैं और तत्त्ववेत्तालोग विमर्श को अहम्, असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्तिरूप, ज्ञाता, कहते हैं । अन्यथा अर्थ से उपरक्त रहने पर भी विमर्श से शून्य प्रकाश स्फटिकादि के तुल्य जड हो जायेगा ॥ ११ ॥ अवभासरूप प्रकाश का और अनवभासरूप अप्रकाश घटादि का परस्पर परिहार हो जाने से [ प्रकाश और घट ] इन दोनों का अपने में परिनिष्ठित स्वरूप मानोगे तो यह जड है एवं यह अजड-चेतन है इस प्रकार चेतन और जड के भेद का पता ही नहीं चलेगा । अब यदि दूसरे पक्ष में कहो कि अवभास पदार्थ सम्बन्धी है और सम्बन्धी होने के कारण जड उसे नहीं मानोगे, तब तो मिट्टी भी घट का सम्बन्धी होने से जड नहीं होगी । इसलिए यह कहना पड़ेगा कि केवल सम्बन्ध मात्र नहीं है अपितु अर्थ के प्रकाश का नाम अवभास है, तब तो फिर वही बात आ गयी जो अर्थरूप से प्रकाश होता है और घट का अन्यरूप से प्रकाश उपपन्न नहीं हुआ । प्रकाश से भिन्न स्वभाववाला भी घट अवभास का कारण होता है, तब तो अवभास भी घट का कारण हुआ इस तरह घट भी अजड चेतनरूप हो जायेगा और प्रकाश का सम्बन्धी होने के कारण अजड- चेतनरूप हो हो जाये, अब कहो कि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करनेवाला स्फटिकादि अपने को' परामर्श करने में समर्थ नहीं हो सकता है इसलिए वह चेतन नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि परामर्शन ही चेतनता का जीवन है, भीतर में और बाहर में स्वतन्त्र स्वाभाविक, अवभास का स्वात्म- विश्रान्तिरूप किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला है इसी को स्वात्मपरामर्श कहा जाता है । 'अहमेव प्रकाशात्मा प्रकाशे' मैं ही प्रकाशरूप में प्रकाशित हो रहा हूँ इस विमर्श के उदय होने पर अपना संवित् ही प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि को ठीक-ठीक मानते हैं उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते हैं और स्फटिकादि तो प्रतिबिम्ब ग्रहण करने पर भी वैसा अपने को सिद्ध करने में अन्य प्रमाता की अपेक्षा रखता है, अतः विमर्श से रहित होना जड ही है, वस्तुतः यह सब