ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१२ विमर्शात्मकप्रमातृस्वभावतादात्म्याहंपरामर्शविश्रान्तेः अजडमेव पूर्वापरकोट्योः । यदुक्तम्— 'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिविमर्शः सोऽहमित्ययम् ॥' इति । मध्यावस्थैव तु इदन्ताविमृश्यमानपूर्वापरकोटिः, विमूढानां मायापदं संसारः, इति विमर्श एव प्रधानं भगवत इति स्थितम् ॥ ११ ॥ न केवलं संवित्तत्त्वस्य अस्माभिः एव विमर्शप्राधान्यम् उक्तम् यावत् आगमान्तरैरपि इति दर्शयति— आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता । तात्पर्येणोदितस्तेन जडात्स हि विलक्षणः ॥ १२ ॥ यतो विमर्श एव प्रधानम् आत्मनो रूपम् अमुमेव हेतुं प्रयोजनरूपम् उद्दिश्य आत्मा धर्मि- स्वभावो द्रव्यभूतोऽपि, चैतन्यम् इति धर्मवाचिना शब्देन सामानाधिकरण्यम् आश्रित्य उदितः कथितः, भगवता शिवसूत्रेषु 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) इति पठितम्, चैतन्यम् इति हि धर्मवाच- कुछ विमर्शरूप प्रमाता है उसका तादात्म्यरूप अहंपरामर्श में विश्रान्त हो जाने के कारण वह तो आगे या पीछे सर्वदा अजड-चेतनरूप ही रहता है । इस विषय में कहा भी है— इदम् यह परिच्छिन्न-भिन्न विमर्श को सफलता तभी होती है जबकि अपने स्वरूप में अहं इस रूप से विमर्श करता हुआ विश्राम लेता हो । वही मायीयरूप में जब आता है तभी इदन्ता के आगे-पीछे कोटिवाला विमूढा को माया पद में रहनेवाले संसारी कहा जाता है, इसलिए विमर्श ही भगवान् का प्रधानरूप है यह सिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ केवल हम लोगों ने ही संवित्तत्त्व ज्ञान को विमर्शमय नहीं माना है अपितु हमारे साथ- साथ आगम शास्त्रों [ पातंजलन्यायादि ] ने भी माना है, इसे दिखाते हैं— इसलिए आत्मा चैतन्य है चित्तत्त्व क्रिया भी चेतन कर्तावाली होती है । इसी कारण जड से वह चेतन आत्मा एक विलक्षण पदार्थ है ॥ १२ ॥ क्योंकि आत्मा चेतन का प्रधानरूप तो विमर्श ही है इसी को हेतु मानकर आत्मा को धर्मी स्वरूप, द्रव्यरूप, चैतन्य माना जाता है, आत्मा के साथ चैतन्य का सामानाधिकरण्य रूप से उपादान किया है, शिवसूत्र में भगवान् सदाशिव ने भी 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) चैतन्य को १. पूर्व-अपर कोटि में तो एक विशुद्ध शिवरूपता ही सभी के लिए रहती है इसी का श्रीसोमानन्दपाद ने भी निर्देश किया है— न परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता । यावत्समप्रज्ञानाग्र ज्ञातृस्पर्शदशास्वपि ॥ स्थितेव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले । इति । वह व्यवस्था उस परमशिवरूप अवस्था में व्यवस्थित होकर रहती है कि उसमें दूसरा कोई नहीं रहता, जैसे सभी ज्ञानों का प्रारम्भ से लेकर वैसा ही फल की परिसमाप्ति तक उसी में विश्रान्त होकर रहता है, उसकी विश्रान्ति के बिना अर्थ का बोध ही नहीं होता, अनेक प्रकार से ज्ञानों की समग्रता मध्य अवस्था में प्रत्यगात्मा के कारण ही लक्षित होती है ।