ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना प्रत्यभिज्ञादर्शन की प्राचीनता एवं गुरुपर्वक्रम प्रत्यभिज्ञादर्शन एक अत्यन्त प्राचीन दर्शन है, जितना कि सच्चिदानन्द स्वरूप परम शिव। इस दर्शन का आदि और अन्त पाना कठिन है; क्योंकि शिव से इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का गहन सम्बन्ध है जिसके स्वरूप का आदि और अन्त ब्रह्मा आदि देव भी नहीं पा सके हैं। इसलिए हम लोगों के मन एवं वाणी का अविषय ही है। यह संविद्रूप परम शिव सृष्टि से पूर्व 'अहम्' इस रूप में अव्यक्तरूप से रहा। 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किंचन मिषत् ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥१॥ स इमाँल्लोकानसृजत' (ऐत० १।२) इस श्रुति वाक्य से सिद्ध होता है कि यह एक मात्र परमात्मतत्त्व ही सृष्टि से पूर्व था, अतः परमात्मा ने ईक्षणरूप संकल्प किया कि मैं सम्पूर्ण लोकों की रचना करूँ। इस प्रकार वही परम शिव 'इदम्' इस नाम-रूपात्मक जगद्रूप से व्यक्त हो गया। इस दर्शन का तादात्म्य अद्वैत परक उपनिषदों से मिलता है। जिस अद्वैततत्त्व का प्रतिपादन उपनिषदों ने किया है, ठीक उसी तत्त्व का प्रतिपादन शैवाद्वैत वेदान्तदर्शन में हुआ है, केवल नाम-रूप की भिन्नता है, वस्तु सारूप्यत्व तो एक ही है जैसा कि पुष्पदन्ताचार्य ने महिम्नः स्तोत्र में उल्लेख किया है—'रुचीनां वैचित्र्यादृजु-कुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।' अर्थात् परमार्थ पथ के पथिकों का प्रस्थान भिन्न-भिन्न होने पर भी रुचि के वैचित्र्य से टेढ़ी-मेढी व सरल गतिपूर्वक गमन करनेवाली सरिताओं के लिए सागर के समान एक मात्र परमात्मा ही लक्ष्य रहता है। इस दर्शन में गुरु परम्परा के क्रम से भी अद्वैत-वेदान्त की भांति अतिप्राचीनता झलकती है। अद्वैत- वेदान्त में गुरु परम्परा का वर्णन भी ठीक इस शैवाद्वैत की प्राचीनता से मिलता है इससे सिद्ध होता है कि यह प्रत्यभिज्ञादर्शन भी प्राचीन ही है। अद्वैतवेदान्त की गुरु परम्परा में 'नारायणं पद्मभवं वशिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च व्यासं शुकं गोडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्यशिष्यम् । श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यं तं तोटकं वार्तिक कारमन्यानस्मद्गुरून्सन्ततमानतोऽस्मि।' इस प्रकार से भगवान् नारायण से लेकर आचार्य भगवत्पाद शङ्कर के शिष्य सुरेश्वराचार्य तक एवं आगे विद्यारण्यमुनि इत्यादि शुद्धरूप से वेदान्तदर्शन के आचार्य माने जाते हैं। आज से सहस्रों वर्ष पूर्व, जबकि राम, परशुराम, कृष्ण इत्यादि अवतरित नहीं हुए थे, इन सबों से पूर्व इस सप्तद्वीपा वसुन्धरा पर शैवाद्वैतवेदान्त का ही अत्यधिक प्रचार-प्रसार था, चौबीस या जितने भी अवतार हुए हों, इन अवतारों के अनन्तर ही छोटे-मोटे सम्प्रदायों का उदय हुआ है और भिन्न-भिन्न दर्शनों का निर्माण हुआ है। 'कालक्रमेण जगतः परिवर्तमानाः' इस न्याय से संसार परिवर्तनशील है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है, धीरे-धीरे इस दर्शन का लोप होने लगा। जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है 'एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥४-२॥ हे अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी आत्मविश्रान्तिरूप योग को कल्प के आदि में सूर्य के प्रति कहा था और सूर्य ने मनु के प्रति कहा और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुए आत्मविश्रान्तिरूप योग को राजर्षियों ने प्राप्त किया किन्तु इस योग का धरातल पर प्रायः लोप हो गया था। इसे पुनः तुम्हारे लिए मैं कहता हूँ।