ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 15, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १० ] भगवान् परमशिव ने निम्न प्रकार से आदेश दिया है—मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया चोदयामास मुनि दुर्वाससं नाम । ततः स भगवान् देवादेशं प्राप्य यत्नवान् । ससर्ज मानसं पुत्रं त्र्यम्बकादित्यनामकम् । यावत्पञ्चदशः पुत्रः । स कदाचिद्रागवशात् । ब्राह्मणीमानयामास ततो जातस्तथा विधः । तनयः स च कालेन कश्मीरेष्वागतो अभवत् । नाम्ना स संगमादित्यो वर्षादित्यस्तु तत्सुतः । तस्याप्यभूत्स भगवानरुणादित्यसंशकः । आनन्द संज्ञकस्तस्मात् । तस्मादस्मि समुद्भूतः सोमानन्दाख्य ईदृशः ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकण्ठ मूर्त्ति से लेकर श्री सोमानन्दपाद पर्यन्त एवं आगे भी इस दर्शन की परम्परा अनवच्छिन्न धारावत् चली । इन्होंने सर्व-प्रथम शैवाद्वैतधारा को ग्रन्थ का प्रारूप दिया, इस प्रकार श्री सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' की रचना करके मुमुक्षुजन के मानसपटल को अमृतधारा से सींच दिया । इस प्रत्यभिज्ञादर्शन की प्रखरता का सूर्य धरातल पर प्राणियों को प्रकाशित करता हुआ चला आ रहा है। आचार्य उत्पलदेव ने 'शिवदृष्टिशास्त्र' जो कि आगमशास्त्ररूप है इसके अनुसार ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का निर्माण किया है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का उपसंहार करते हुए आचार्य ने अपना जीवन क्रम का परिचय दिया है। जैसा कि—'जनस्यायत्नसिद्ध्यर्थमुदयाकर सूनुना । ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयमुत्पलेनोपपादिता ।। श्री उदयाकर इनके पिता थे । इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर आचार्य अभिनवगुप्त ने विमर्शिनी टीका की है। इस प्रकार अभिनवगुप्त ने गुरुपरम्परा क्रम के अनुसार विद्याध्ययन करके अनेकानेक ग्रन्थों का निर्माण किया । इन्होंने उल्लेख किया है कि 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्त विस्तरे गुरुनिर्मिते । शिवदृष्टिप्रकरणे करोमि पदसंगतिम् । श्रीसोमानन्दनाथस्य विज्ञानप्रतिबिम्बकम् । बुद्ध्वाभिनवगुप्तोऽहं श्रीमल्लक्ष्मणगुप्ततः । श्री लक्ष्मणगुप्त से विद्याध्ययन करके ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ऊपर विमर्शिनी एवं बृहत्प्रत्यभिज्ञाविवृत्ति-विमर्शिनी का निर्माण आचार्य अभिनवगुप्त ने किया है । इन टीकाओं का निर्माण करके आचार्य अभिनवगुप्त ने इस दर्शन की कहीं अधिक शोभा बढायी है और इसके उत्थान में विमर्शिनीकार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रत्यभिज्ञादर्शन का नामान्तर इस दर्शन को शैवाद्वैत वेदान्तदर्शन; स्वातन्त्र्यदर्शन, प्रत्यभिज्ञादर्शन और षडर्ध अर्थात् त्रिकदर्शन भी कहते हैं । शैवाद्वैत इसलिए कहते हैं कि इस दर्शन में जीव एवं शिव की अद्वैतरूपता का प्रतिपादन है । स्वतन्त्ररूप से विचार-विमर्श इस दर्शन में किया गया है अतः यह स्वातन्त्र्य दर्शन है । प्रत्यग् अभिन्न अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा होती है कि मैं वही सच्चिदानन्द परम शिव हूँ इस प्रकार शक्ति और शक्तिमान् की अभिन्नता से भगवान् परम शिव ही पशु, पशुपति और पाश है अत एव इस शास्त्र को त्रिक शास्त्र नाम से कहा है । इसी त्रिक शास्त्र को सामान्यजन ईश्वर, जीव और प्रकृति कहते हैं और अद्वैत-वेदान्ती ब्रह्म, जीव और माया कहते हैं । इस दर्शन की दृढ़-प्रतिज्ञा यह प्रत्यभिज्ञा शास्त्र आत्मरूप वैभव देनेवाला है; क्योंकि 'कथंचिदासाद्य महेश्वरस्य...समस्त संपत्समवासिहेतुं...।' महेश्वर की दासता सम्पूर्ण आत्म-विश्रान्तिरूप ऐश्वर्य देने में कारण है । भौतिक स्वार्थ में संलग्न व्यक्ति परमार्थ पथ का पथिक हो एवं हृदयकमल में विद्या ज्ञान का प्रदीपप्रकाशपुञ्ज प्रकट करें अपनी संकीर्ण अकिंचन भावना का त्याग करते हुए मैं स्वयं परमेश्वर स्वरूप हूँ, यह समझे । किन्तु मोहवशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणे नेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते ।' अर्थात् मोह माया के आवरण से घेरा हुआ प्राणी अपने स्वरूप को देखता हुआ भी स्व-स्वरूप की उपेक्षा कर देता है । ज्ञान-शक्ति का हृदय