भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

[ ११ ] पर प्रकाश करने के लिए इस प्रत्यभिज्ञा का स्मरण कराया जाता है कि मैं महेश्वर हूँ मैं जडभूत नहीं हूँ; क्योंकि जड का स्वभाव परिच्छिन्न है । संविद्रूप ज्ञान जड से विलक्षण है 'जडाद्विलक्षणो बोधः ।' इसलिए संविद्रूप का परिच्छेद नहीं होता है तथा इच्छा और क्रिया ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है, सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम समुदाय महेश्वर का ही वैभव है । ज्ञान-शक्ति का स्वरूप परमेश्वर अपनी हृदयरूपी गुहा के भीतर स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण पदार्थराशि को ज्ञान-शक्तिरूप प्रदीप से आभासित करते हैं, इस प्रकार ज्ञान-शक्ति से ही स्मृति-शक्ति का जीवन रहता है, विशिष्ट देश एवं काल के आभास से युक्त होकर वर्तमान काल में भिन्न-भिन्न रूपों में आभासित होना ही ज्ञान-शक्ति का स्वरूप माना जाता है आन्तर अवस्थित पदार्थों का बाह्यरूप से भासित होना ही घटता है किन्तु वे पदार्थ माया प्रमाता में भेदपूर्वक भासते हैं और शुद्ध चिद्रूप में 'अन्तःस्थिताम्' अर्थात् अन्तर से सम्बन्ध रखते हुए उसके साथ एकताभाव को प्राप्त कर प्रकाशता की स्थिति सदैव बनाये रखते हैं इसलिए चिद्रूप की भिन्नता को न छोड़नेवाले पदार्थों के आरोपित प्रमाता की अपेक्षा भेद से अवभासित होना ही तो महेश्वर देव की ज्ञान-शक्ति है । पदार्थों की प्रकाशात्मता इस प्रकार प्रकाश ही तो अर्थों का स्वरूप है, अपने स्वरूप की प्रकाशता प्रकाश से अभिन्न रहती है; क्योंकि अर्थ ही नीलादि पदार्थ है और वही नीलादि रूपता को प्रकाशता है माहेश्वर प्रकाश से भी प्रकाश भिन्न है इससे तो फिर अनुसन्धान का योग ही नहीं बैठ सकता है इसलिए अर्थ का स्वरूप प्रकाशमानत्व प्रकाश से अभिन्न है । इस प्रकार चिद्रूप आत्मा में असद्रूप के समान रहते हुए की जड समुदाय प्रकाश का ही स्वरूप है; क्योंकि प्रकाश न तो प्रकाश से भिन्न है और न अर्थ से ही भिन्न है स्वयं प्रकाशरूप ज्ञान से अर्थ अभिन्न ही रहता है इसलिए बोधरूप प्रकाश से अभेदपूर्वक ही अर्थ अवस्थित रहता है । चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ सच्चिदानन्द देव ही अपने आन्तर स्थित तत्त्व-समुदाय को इच्छा-शक्तिवशात् बाहर की ओर आभासित करते हैं । जैसे योगो उपादानकारण आदि के बिना भी पदार्थराशि को अभिव्यक्त करते हैं अर्थात् स्वप्न, संकल्प, मनोराज्य आदि में बाह्य उपकरणों के बिना भी यथार्थ विचित्र रूपों में प्रकाशित हो जाते हैं उसी प्रकार प्रमाताओं में भी आभासविचित्रता यद्यपि स्थिर नहीं है तो भी पूर्वकालीन संस्कार समूह को लेकर उनमें यथाकाल उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि योगी अपने योग-शक्ति से समस्त पदार्थों का निर्माण क्षणमात्र में उपादानकारण के बिना भी पुर, सेना, किला आदि के रूप में सृजन कर देते हैं । इस विषय में भट्ट दिवाकरवत्स का कथन है कि 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभासनासतेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमि- त्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनैकहेतुः ॥ अर्थात् हे महेश्वर ! तुम्हारी ज्ञान-शक्ति से अतिरिक्त कोई पदार्थों को विचित्र-चित्र रूपों में आभासित करने के लिए स्वप्न में भी दूसरा कारण दिखायी नहीं देता है । इस नाम-रूपात्मक विश्व का विस्तार करने में एकमात्र हेतु संविद्रूप की सामर्थ्य- शक्ति ही है ।