ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] श्रुतिगतप्रामाण्य इस विषय में उपनिषद् वाक्य का भी प्रमाण मिलता है—'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं कृत्स्नमिदं जगत् ॥' इस नाम-रूपात्मक विश्व का सृष्टा महेश्वर है माया को प्रकृति और मायाधीश को महेश्वर समझो, उस परमात्मा के अवयवरूप से ही यह सारा का सारा विश्व व्याप्त है । 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः' इत्यादि अर्थात् उस सच्चिदानन्द पूर्ण परमात्मा से ही आकाश, वायु आदि तत्त्वों की उत्पत्ति श्रुतियों से सुनी जाती है । इससे सिद्ध होता है कि उस संविद्रूप सच्चिदानन्द देव के भीतर ही यह सारा का सारा तत्त्व समूह आकर के रूप में रहता है और अपनी इच्छा- शक्ति से बाहर की ओर प्रकाशित होता है; क्योंकि परमात्मा ने इच्छा कि 'एकोऽहं बहुस्याम्' मैं अकेला हूँ अनेकों रूपों में विभक्त हो जाऊँ; महेश्वर की स्वातन्त्र्य-शक्ति से ही तत्त्व-समूह बाहर भासित होते हैं । परमेश्वर को सृष्टि रचना में बाह्य उपकरणों की अपेक्षा नहीं होती है जैसे कि कुंभकार को बाह्य उपकरणों की अपेक्षा होती है । उन्हीं से कुंभकार घट का निर्माण कर सकता है। किन्तु परमेश्वर में यह बात नहीं है वह तो स्वतः इस विश्व प्रपञ्च का निर्माण करते हैं किसी अन्य की अपेक्षा रखनेवाले नहीं है। अतः महेश्वर को अभिन्ननिमित्तोपादान कारण कहा जाता है । इसमें श्रुति वाक्य प्रमाण है—यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ( मु० १-७ ) जिस प्रकार मकड़ी अपने शरीर से ही तन्तुओं को बाहर की ओर निकालती है उसे किसी अन्य की इसमें अपेक्षा नहीं होती है और प्रसारित तन्तुओं को पुनः अपने में समेट लेती है । जैसे भूमि से व्रीहि, यव, ओषधि, अन्न आदि उत्पन्न होते हैं जीवित प्राणी से केश-आदि उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म से यह अखिल संसार उत्पन्न होता है और पुनः प्रलय काल में उसी में समाहित हो जाता है। इसीलिए बाह्य-पदार्थों की प्रकाशता में चिदात्मा देव की हो ज्ञान-शक्ति कारण है । परम शिव का स्वातन्त्र्य आन्तर स्थित अर्थ समूह का ही बाहर की ओर प्रकाश होता है यदि ऐसी बात है तो फिर वह क्यों स्वतः प्रकाशित नहीं होता है ? इसका समाधान यह है कि संविद्रूप सच्चिदानन्द देव में रहनेवाली पदार्थराशि निरन्तर आभासित होती रहती है किन्तु 'अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ।' परमेश्वर की इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं होता है । चिदात्मा में संपूर्ण पदार्थ समूह निरन्तर भासित होते रहना यह उसका स्वरूप नहीं है किन्तु अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से, स्वामीपन से एवं ऐश्वर्य से, चित्र-विचित्र प्रकार से, कार्य-कारणभाव के क्रम व अक्रम से संविद्रूप ज्ञान ही इस पदार्थराशि को बाहर की ओर आभासित करते हैं प्रमाताओं के भेद से विस्तारपूर्वक उसमें भी आभास को कहीं पर एकत्रित कर देते हैं । जैसा कि नृत्याङ्गना अपने स्वाङ्ग से विविध प्रकार की भावभङ्गी दिखा करके प्रेक्षक वर्ग की दृष्टि को अपनी ओर आकर्षित करती हुई एकत्रित कर लेती है, उतने अंश में ही आभासों की एकरूपता बनी रहती है; क्योंकि परमेश्वर का विभाग अवस्था में भी वैसा स्वरूप रहता है । शरीर, प्राण आदिकों का आभासों के अंशों में 'चितिशक्तिरपरिणा- मिनी ।' अर्थात् चिति-शक्ति परिणामशील नहीं होती है । यद्यपि प्रकाश एवं अप्रकाश दोनों ही आत्मा में रहते हैं तो भी प्रकाश की कुछ तो विलक्षणता नहीं दिखायी देती है वैसे ही विमर्श एवं अविमर्श भी तो आत्मा में रहते हैं इससे जड एवं अजड की प्रतीति कैसे होगी ?