भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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[ १३ ] 'अहम्' प्रत्यवमर्श ही इसका वास्तविक स्वरूप है वह अपने ही रस से परावाणी के रूप में उदित रहता है, यही परमात्मा का मुख्य स्वातन्त्र्य है। चिति-शक्ति का परामर्श स्मरण करना ही स्वभाव है; क्योंकि जड वस्तु स्वयं अपने आप से प्रकाशित नहीं होती है और न तो किसी अन्य को प्रकाशित कर सकती है। चैत्र आदि व्यक्ति तो स्वयं अपना परामर्श करते हैं और स्वयं अपने से प्रकाशित भी रहते हैं। इसलिए यह परावाणी आद्य-शक्ति अभिन्न स्वभाववालो है, निरन्तर संविद्रूप से स्फुरित रहने के कारण उत्पत्ति-विनाश से रहित रहती है, अन्य की अपेक्षा न रखनेवाली होने से इसे स्वातन्त्र्य-शक्ति भी कही जाती है। वह सम्पूर्ण परामर्शों का आश्रयरूप होने से एवं अपने में पूर्ण होने से परावाणी परामर्श द्वारा सारे विश्व को अपने स्वरूप में देखती है और 'अहं' इस परामर्शरूप से निरन्तर स्फुरित रहती है यही सच्चिदानन्द परमात्मा का परम स्वातन्त्र्य है। 'सा स्फुरता महासत्ता देशकालाविशेषिणी। सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।। वह भवन कर्तृता महासत्ता निरन्तर विस्फुरित रहती है इसे देश एवं काल स्पर्श नहीं करता इसलिए सच्चिदानन्द देव प्रतिक्षण सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयादि के द्वारा प्रमातृ-वर्ग के संयोजन-वियोजन की विचित्रता से सम्पूर्ण विश्व को प्रपञ्चित किया करते हैं। इस प्रकार आचार्यपाद का कथन है 'सदा सृष्टि विनोदाय सदा स्थितिसुखासिने सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय भवते नमः।' श्रीभट्टनारायण ने भी कहा है—मुहुर्मुहूर्विश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ।। अर्थात् अनेक प्रकार से तीनों लोकों की निरन्तर कल्पना करते हुए स्व-स्वरूप में विश्रान्त रहनेवाले निर्विकल्प अजन्मा की जय हो। इससे सिद्ध होता है कि संविद्रूप भगवान् सच्चिदानन्द देव में पदार्थतत्त्व रहते हैं किन्तु उनकी इच्छा-शक्ति के बिना बाहर में प्रकाशित नहीं होते हैं। परामर्श का नाम ही विकल्प है और वह भगवान् सच्चिदानन्द देव में कैसे सम्भव हो सकता है ? आभास का स्वभाव ही प्रत्यवमर्श है, इसे स्वरूप का प्रत्यवमर्श कर्ता ही भली-भाँति जानता है इसका दूसरा नाम अहम्, स्वातन्त्र्य स्वभाववाला एवं असांकेतिक है, नहीं तो अर्थ से उपरक्त होने पर भी प्रत्यवमर्श से रहित होकर प्रकाश स्फटिकादि के समान जड ही हो जाता है। संविद्रूप तत्त्व को विमर्शयुक्त अन्य आगमशास्त्रों ने भी अङ्गीकार किया है। इस विषय में कहते हैं कि 'आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता। जडात्स हि विलक्षणः ।।' अर्थात् आत्मतत्त्व सच्चिद्रूप है चिद्रूप क्रिया भी चेतन कर्ता से युक्त रहती है। इसलिए आत्म-तत्त्व जड वस्तु से विलक्षण है। चिति-क्रिया ही वही विश्वरूप परमेश्वर का स्वात्म प्रतिष्ठा रूप हृदय है। देश एवं कालादि के भाव से तो उसकी व्यापकता समाप्त होती है। किन्तु व्यापक तो वही है जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्यापकभाव रखता हो अर्थात् देश एवं कालादि से अनवच्छिन्न स्वरूपवाला ही व्यापक कहलाता है। विभु परमेश्वर की माया-शक्ति के द्वारा विमर्शात्मिका चिति-शक्ति ही भिन्न-भिन्न संवेद्य विषयों में विभक्त होकर ज्ञान, संकल्प एवं अध्यवसाय आदि संज्ञाओं से पुकारी जाती है। परमेश्वर ही पशु प्रमाता अपनी माया-शक्ति से बन जाते हैं इस प्रकार विमर्शात्मिका शक्ति भी माया-शक्ति के द्वारा विषयों के उपराग से संकुचित होकर ज्ञान-स्मरण आदि रूपों में परिणत हो आती है। परमार्थतः विमर्शात्मिका-शक्ति से अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं। इस प्रकार अतिसूक्ष्मरूप से विमर्श प्रकाशवपु में आविष्ट होकर भासता है जिसमें स्थूलरूप से विकल्पता प्रस्फुट होती है उसमें तो नीलादि-पदार्थ के समान भिन्नरूप में प्रतिभासित होने लगता है। जैसा कि यह नील है, वह प्रकाश स्वरूप से अभिन्न होकर कैसे भासित होगा ? वह मायामय संसार में तो प्रकाश से अभेद रखता हुआ भासता है वही यह घट है जो कि अध्यवसाय ज्ञान नामरूपात्मक प्रपञ्च से भिन्न है,