भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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[ १४ ] परमेश्वर की चिति-शक्ति आत्मा के समान 'अहम्' इस अनवच्छिन्नरूप में निरन्तर भासती है । इदन्तया अर्थात् परिच्छिन्नभाव से नहीं भासती है । संवित्तत्त्व का कोई क्रम नहीं है, किन्तु परमेश्वर की माया-शक्ति से भिन्न-भिन्न रूपों में जितने भी आभासित होनेवाले पदार्थ हैं उन सबों को मूर्त्ति भेदकृत दूर-समीप एवं संकुचित-विशाल आदि देश भेद और क्रिया भेद से शीघ्र-विलम्ब इत्यादि को कालकृत भेद से आभासित करते हैं उन सबों के अनुरोध से ज्ञान, स्मृति और अध्यवसाय आदि क्रम से प्रकाशित होते हैं । इसलिए कहा है कि 'ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तयः' अर्थात् ज्ञान, स्मृति एवं अध्यवसाय आदि भगवान् परम शिव की ही शक्तियाँ है । अपोहनशक्ति का स्वरूप जो सच्चिदानन्दघन परम शिव अपने स्वरूप में अवस्थित पदार्थराशि को प्रस्फुरित होने से रोकते हुए अपनी स्वातन्त्र्यरूप इच्छा-शक्ति के द्वारा वैचित्र्यभाव प्रकट करते हैं ज्ञान-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों पर अनुग्रह करनेवाली परमेश्वर को ही अपोहन-शक्ति है; क्योंकि गीता में भगवान् ने भी कहा है कि 'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।' अर्थात् मुझ से ही स्मृति, ज्ञान एवं अपोहन होता है ऊह का अर्थ तर्क, संशय- विपर्यय होता है जो उससे रहित हो वही अपोहन है । स्व-स्वरूप में निरन्तर प्रस्फुरित रहना ही अपोहन है और वहो परमात्मा की शक्ति है । इसलिए अपोहन-शक्ति का शुद्ध अहं प्रत्यवमर्श प्रकाश स्वरूप है उसका परावाग्रूपता ही वपु है उसमें विकल्पता नहीं रहती है, वह तो द्वित्व की अपेक्षा रखनेवाला चिद्रूपसार तत्त्व है । किसी अन्य को अपेक्षा न रखनेवाला, स्व-स्वरूप में स्थिर रहनेवाला अहं प्रत्यवमर्श है । वह विकल्पित नहीं होता है । शुद्ध अहं परामर्श में जो घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है । इसमें तो अवश्य विकल्पता रहती है परमेश्वर भी माया-शक्ति के चित्तत्त्व को प्रच्छन्न कर जो कि भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि एवं प्राण आदि में गगन के सदृश आरोपित हो जाते हैं । इस प्रकार प्रमातृरूप से अहं अन्य प्रतियोगी के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही माना जायेगा । अहं विमर्श शुद्ध एवं अशुद्ध के भेद से दो प्रकार के होते हैं शुद्ध सच्चिदानन्द परम शिव में यह सारा का सारा विश्व अभिन्नरूप से प्रतिबिम्बित होकर झलकता है और उसमें तो कुछ भी दूर करने योग्य होता ही नहीं है । इस प्रकार घटादि का कोई प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं बनता है । किन्तु अशुद्ध प्रमाताओं में ऐसी बात नहीं है अपने स्वरूप को अप्रधान बना करके अपने से भिन्न देह-गेहादि में मिथ्या अभिमान कर लेता है इसलिए विकल्पकरूपता बन जाती है और इसी का नाम विकल्प है । परमार्थतः देह, बुद्धि, प्राण आदिकों की अभिमानदशा में भी प्रकाश स्वरूप परमेश्वर ही प्रमाता है और वही परमेश्वर ही सब का जीवन तत्त्व है । स्मृति, अपोहन प्रधान विकल्प, अनुभव और आन्तर पदार्थों का ही आभास प्रकाशरूप से रहता है, परमात्मा तो सब कुछ सहनेवाला होता है इसलिए उसमें विश्व की अन्तर्लीनता सदैव बनी रहती है । 'निष्प्रपञ्चो निराभासः शुद्धः स्वात्मान्यवस्थितः । सर्वातीतः शिवो ज्ञेयो यं विदित्वा विमुच्यते ।।' अर्थात् अपने आप में परिपूर्ण रहनेवाला शुद्ध, निराभास, निष्प्रपञ्च सब से अतीत शिव स्वरूप को जान करके साधक मुक्त हो जाता है । इस प्रकार व्यवहार दशा में भी परमेश्वर देहादि में प्रवेश कर अन्तःस्थित पदार्थ समूह को अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से बाहर की ओर अभिव्यक्त करते हैं । कीट-पतङ्ग आदि सम्पूर्ण प्रमाताओं में अवभासनरूप ज्ञान-शक्ति और उल्लेखनरूप क्रिया-शक्ति नैसर्गिक रहती है ।