भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

[ १५ ] एकाश्रय एवं माहैश्वर्य का निरूपण समस्त शक्तिरूपी पदार्थ-रत्नों का एकमात्र आश्रय महेश्वर ही है। इस नाम-रूपात्मक विश्व महेश्वर की शक्ति से ही अवस्थित है शक्तिमान् से शक्ति किसी अन्य जगह नहीं रहती परन्तु उसी में तद्रूप होकर रहती है जैसा कि हिम से भिन्न शीतलता नहीं रहती एवं वह्नि से भिन्न उष्णता नहीं रहती है। 'शिवः शक्तस्तथा भावनिच्छया कर्तुमीहते । शक्त्योऽस्य जगत् कृत्स्नम्।' शक्ति शक्तिमान् से भिन्न नहीं होती है। 'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रयरूषिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥' तत्-तत् वस्तु-पदार्थों में क्रमशः यह जो घटादि की प्रतिभा अनुरञ्जित हो रही है। अनन्त-शक्ति सम्पन्न, अक्रमरूप, सच्चिदानन्द महेश्वर ही प्रमातृरूप से उन सभी में रहते हैं। इस विषय में कठश्रुति का भी कथन है कि—'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' अर्थात् उस परम ब्रह्म परमात्मा को सूर्य, चन्द्र एवं नक्षत्रगण भी प्रकाशित नहीं कर सकते हैं तो फिर यह अग्नि कैसे उसे प्रकाशित कर सकेगी ? उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित है। जीव एवं शिव की एकरूपता के बिना संविद्रूप ज्ञानों का लोकोत्तर व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकेगा; क्योंकि संविद्रूप प्रकाश की एकरूपता से ही ज्ञानों में एकरूपता बन सकती है और वह एकमात्र परमार्थ- स्वरूप प्रमाता से ही संभव है। क्रिया-शक्ति का प्राधान्य सच्चिदानन्द स्वरूप परम शिव को क्रिया-शक्ति अत्यन्त प्रिय है अपनी ज्ञान-शक्ति के द्वारा यह क्रीडा-क्षेत्ररूप जगत् विविध भावभङ्गी से युक्त होकर क्रिया-शक्ति से देशरूप एवं कालरूप से बाहर की ओर फैलता है। संविद्रूप परम शिव में क्रिया-शक्ति अक्रमपूर्वक रहती है और जीवों में क्रिया-शक्ति क्रम से युक्त होकर रहती है। क्रम से युक्त होकर भासित होने का नाम ही क्रिया है वह काल आदि परिच्छेद से रहित परमेश्वर में कैसे क्रम से युक्त होकर रहेगी ? अक्रम स्वभाववाले परमेश्वर में क्रमशील क्रिया का होना घटना नहीं है। यह बात नहीं है, काल-शक्ति से लौकिक क्रिया में क्रमरूपता तो संभव है। निरन्तर निर्वाध्य- रूप से होनेवाले परमेश्वर की क्रिया में क्रमरूपता नहीं होती है। जैसा कि परमेश्वर में क्रमरूपता अभाव मिलता है अर्थात् लौकिक क्रिया की सक्रमरूपता काल-शक्ति के आभास विच्छेदन सामर्थ्य का प्रदर्शन ही प्रभु की शक्ति से होता है। किन्तु परमेश्वर से तादात्म्य रखनेवाली अभेदात्मिका क्रिया-शक्ति को काल का स्पर्श भी नहीं होता है जिस प्रकार परमेश्वर में क्रमरूपता नहीं बन सकती है। उसी प्रकार परमेश्वर की क्रिया में भी क्रमरूपता नहीं होती है; क्योंकि वह तो उन्हीं की जैसी शाश्वत् रहती है। कालक्रम एवं देशक्रम का विवेचन तब फिर काल किस को कहा जाय ? जगत् के पदार्थों की उत्पत्ति, आम्रमञ्जरी को होना एवं क्रमशः षड् ऋतुओं का आगमन तथा मयूर एवं कोकिलों के मद-विलासादि होने से जो ज्ञान होता है वही काल है अर्थात् सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादिकों का क्रमशः गतिशील रहना ही काल कहलाता है। 'काल एव क्रमः, क्रम एव कालः ।' अर्थात् काल ही क्रम है एवं क्रम ही काल है। नैयायिकों का काल पदार्थ यह है कि 'जन्यानां जनकः कालो जगतामाश्रयो मतः' सम्पूर्ण उत्पत्ति-शील पदार्थों का जनक काल है