भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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और जगत् के पदार्थों का आश्रय माना गया है । इस प्रकार पामर प्राणियों का काल मृत्यु है और ज्ञानियों का काल उससे एक विलक्षण ही है । इस प्रकार आभास-पदार्थों को स्व-स्वरूप से बाहर की ओर फैलनेवाली जो परमेश्वर की शक्ति है वही काल-शक्ति है । परमेश्वर मूर्ति के रूप से देशक्रम को एवं क्रिया की विचित्र- रूपता के आभास से कालक्रम को प्रकाशित करते हैं । जो आभास का विषय देश एवं काल का क्रम है वह किसी अन्य से भासित होनेवाला प्रमाता नहीं है; क्योंकि इसी से सब कुछ वस्तुएँ आभासित होती हैं इस प्रकार देशक्रम और कालक्रम प्रमाता में कैसे रहेंगे ? अभी मैं इस स्थान विशेष में हूँ यह देशक्रम है और भूत-भविष्यादि को लेकर कालक्रम प्रमाता में दीख पड़ता है, परमेश्वर तो स्वयं देश एवं काल क्रम से शून्य है, आभासों के भेद से कालक्रम भासता है और जो विच्छिन्नाभास है वह स्वयं शून्यादि प्रमाता के बिना आभासित नहीं हो सकता है, परिमित प्रमाताओं के द्वारा ही पदार्थों का भासन होता है, संविद्रूप आत्मस्वभाव से स्वयं अपने में परिपूर्ण है विद्वान् परमेश्वर की निर्माण-शक्ति से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद प्रकाशित होता है । प्रत्यभिज्ञादर्शन का तत्त्वक्रम सच्चिदानन्द परम शिव के गर्भ में ‘मयूराण्डवत्’ सदाशिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त पदार्थतत्त्व झलकते हैं । प्रत्यभिज्ञादर्शन में छत्तीस तत्त्व संग्रहीत हैं इनके नाम निम्न प्रकार से हैं— १. शिव, २. शक्ति, ३. सदाशिव, ४. ईश्वर, ५. शुद्धविद्या, ६. माया, ७. कला, ८. विद्या, ९. राग, १०. नियति, ११. काल, १२. पुरुष, १३. प्रकृति, १४. बुद्धि, १५. अहङ्कार, १६. मन, १७. श्रोत्र, १८. त्वक्, १९. चक्षु, २०. रसना, २१. घ्राण, २२. वाक्, २३. पाणि, २४. पाद, २५. पायु, २६. उपस्थ, २७. शब्द, २८. स्पर्श, २९. रूप, ३०. रस, ३१. गन्ध, ३२. आकाश, ३३. वायु, ३४. तेज, ३५. जल, ३६. पृथिवी । ‘ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः’ । परम शिव तत्त्व एक होता हुआ भी भिन्न-भिन्न विशेषताओं के लिए हुए अपनी स्वातन्त्र्य-शक्ति से अनेक रूपों में विभक्त हो जाता है विश्व को बाहर की ओर स्फुटरूप से अभिव्यक्त करना ही उन्मेष है जिसमें इदमंश अर्थात् ईश्वरतत्त्व की प्रधानता रहती है । अस्फुटरूप से अन्तःकरण में सपेट लेने का नाम निमेष है और निमेष ही सदाशिवतत्त्व है जिससे जगत् का प्रलय भी होता है और अहम् अंश की प्रधानता रहती है । अहम् एवं इदम् इन दोनों बुद्धियों का सामाना- धिकरण्य विद्यातत्त्व में रहता है । किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखनेवाला ‘अहम्’ विमर्श है और इदम् अंश को परप्रकाश की अपेक्षा रहती है । इदम् अंश के विमर्श से उपपन्न वेद्य अवस्था को अङ्गीकार किये हुए परापश्यमान पदार्थों को ठीक-ठीक समझ लेना ही शुद्ध विद्या है । परमेश्वर के स्वातन्त्र्य से उपजीवित होनेवाली विद्येश्वर-शक्ति शुद्धविद्या है । जिसमें ‘अहम्’ और ‘इदम्’ इन दोनों अंशों का ज्ञान पृथक्-पृथक्, रहता है । जबकि भेद का प्रारम्भ तो यहाँ से हो होता है फिर भी भेद के भीतर अभेद बना रहता है इसमें क्रिया की प्रधानता रहती है ‘मन्त्र’ इस तत्त्व का प्रमाता माना जाता है इसका विमर्श ‘इदं च अहम् च’ इस रूप से होता है विश्व भिन्न रूप से भासता है परन्तु सर्वथा नहीं, इसलिए यह शुद्धविद्या है विद्यातत्त्व में अवस्थित रहने के कारण विद्येश्वरों को ईश्वर, सर्वज्ञ भी कहा जाता है । त्रिविधमल का विवेचन और उपसंहार माया से विमोहित होकर जीव कर्मबन्धन में बद्ध हो जाता है और विद्या से विमुक्त हो जाता है; क्योंकि जीव कालादि पञ्चकञ्चुकों से आवेष्टित होकर शून्य, प्राणादि संकुचितरूप में संसरण करता है इसलिए संसारी