भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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[ १७ ] पशु हो जाता है। यही पशु जीव आणव, कार्म और मायीय इन मलों से युक्त रहता है। ज्ञान स्वरूप को छिपानेवाला आणवमल है जिस में जीव अणुमात्र अर्थात् संकुचितरूप को प्राप्त हो जाता है। जन्म और भोग को देनेवाला मायीयमल है और माया-शक्ति द्वारा कर्ता की अज्ञानता में कार्यमल रहता है। शून्यादि प्रमा- ताओं को प्रलयाकल से पुकारा है इनमें कार्यमल तो रहता ही है किन्तु मायीय विकल्प से रहता है। विज्ञेश्वर लोग वेद्य को भिन्न रूप से देखते है जैसे तन्तुवाय वस्त्र की दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही उसे देखता है इसलिए विज्ञेश्वरों में मायामल का सम्बन्ध माना जाता है। इस प्रकार पशु जीव और देव त्रिविधमल से युक्त होते हैं। संसार के लिए एक मात्र कारण कार्यमल को माना गया है। इस प्रकार यह छत्तीस तत्त्व से युक्त विश्व भगवान् सच्चिदानन्द देव की प्राणादि शक्तियों के रूप में स्थित है। भगवान् परम शिव प्राण-अपान, समान, उदान और व्यानरूप से सम्पूर्ण पशु जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि विविध रूपों में विभक्त हो जाते हैं। ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ।’ सम्पूर्ण जड-जङ्गम प्राणियों का आत्मा महेश्वर ही है और वह गगनवत् व्याप्त है। यह सारा का सारा वैभव मेरा ही है इस प्रकार जाननेवाले का विमर्श दृढ़ हो जाने पर जीवन्मुक्त हो जाता है। अर्वाचीन युग के महर्षि श्री गोपालशास्त्री दर्शनकेशरी के आशीर्वाद से इस ग्रन्थ को नया रूप प्राप्त हुआ है एवं यह कार्य पूर्ण हुआ है। साहित्यवेदान्ताचार्य श्रीवंशपति द्विवेदी एम. ए., एवं डॉ० श्री चन्द्रकान्त द्विवेदी के हार्दिक प्रोत्साहन से मेरा मनोबल सदैव बढा है। भारतीय संस्कृत- संस्कृति में उत्कृष्ट श्रद्धा-भावना रखनेवाले मफतलालग्रुप एवं हमारे सेवक-मण्डल ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए धनराशि व्यय की है। स्वच्छ मुद्रणकार्य के लिए प्रेस के अध्यक्ष श्री पं० विश्वम्भरनाथ द्विवेदी को धन्यवाद । भगवान् परम शिव इन लोगों का कल्याण करें । कृष्णानन्दसागर.